भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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| ३५० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७० | | :--- | :--- |

| त्वमादिरन्तो मध्यश्च त्वमनादिः सहस्रपात्।<br>विजयस्त्वं सहस्राक्षो विरूपाक्षो महाभुजः॥६४<br><br>अनन्तः सर्वगो व्यापी हंसः प्राणाधिपोऽच्युतः।<br>गीर्वाणपतिरव्यग्रो रुद्रः पशुपतिः शिवः॥६५<br><br>त्रैविद्यस्त्वं जितक्रोधो जितारिर्विजितेन्द्रियः।<br>जयश्च शूलपाणिस्त्वं त्राहि मां शरणागतम्॥६६ | आप आदि, मध्य एवं अन्त हैं, (साथ ही) आप आदि-रहित एवं हजारों पैरोंवाले सहस्रपात् हैं। आप विजय हैं। आप हजारों आँखोंवाले, विरूप आँखवाले एवं बड़ी भुजावाले हैं। आप अन्तसे रहित, सर्वगत, व्यापी, हंस, प्राणोंके स्वामी (सदा स्वस्वरूपमें स्थित) अच्युत, देवाधिदेव, शान्त, रुद्र, पशुपति एवं शिव हैं। आप तीनों वेदोंके जाननेवाले, क्रोधको जीत लेनेवाले, शत्रुओंको विजित करनेवाले, इन्द्रियजयी, जय एवं शूलपाणि हैं। आप मुझ शरणागतकी रक्षा करें॥६०-६६॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>इत्थं महेश्वरो ब्रह्मन् स्तुतो दैत्याधिपेन तु।<br>प्रीतियुक्तः पिङ्गलाक्षो हैरण्याक्षिमुवाच ह॥६७<br><br>सिद्धोऽसि दानवपते परितुष्टोऽस्मि तेऽन्धक।<br>वरं वरय भद्रं ते यमिच्छसि विनाऽम्बिकाम्॥६८ | पुलस्त्यजी बोले—ब्रह्मन्! दैत्योंके स्वामी अन्धकके इस प्रकार स्तुति करनेपर लालिमा लिये भूरे रंगकी आँखवाले महेश्वरने प्रसन्न होकर हिरण्याक्षके पुत्र अन्धकसे कहा—दानवपति अन्धक! तुम सिद्ध हो गये हो; मैं तुम्हारे ऊपर प्रसन्न हूँ। अम्बिकाके सिवाय तुम जो चाहो, वह वर माँगो। तुम्हारा कल्याण हो॥६७-६८॥ | | अन्धक उवाच<br>अम्बिका जननी मह्यं भगवांस्त्र्यम्बकः पिता।<br>वन्दामि चरणौ मातुर्वन्दनीया ममाम्बिका॥६९<br><br>वरदोऽसि यदीश न तद् यातु विलयं मम।<br>शारीरं मानसं वाग्जं दुष्कृतं दुर्विचिन्तितम्॥७०<br><br>तथा मे दानवो भावो व्यपयातु महेश्वर।<br>स्थिराऽस्तु त्वयि भक्तिस्तु वरमेतत् प्रयच्छ मे॥७१ | अन्धकने (विनीत भावसे) कहा—अम्बिका मेरी माता और आप त्र्यम्बक मेरे पिता हैं। अम्बिका मेरी वन्दनीया हैं। मैं उन माताके चरणोंकी वन्दना करता हूँ। ईशान! यदि आप मुझे वर देना चाहते हैं तो मेरे शरीरसम्बन्धी, मनसम्बन्धी एवं वचनसम्बन्धी पाप तथा नीच विचार नष्ट हो जायें। महेश्वर! मेरा दानवीय विचार भी दूर हो जाय एवं आपमें मेरी अटल भक्ति हो जाय—मुझे यही वर दीजिये॥६९-७१॥ | | महादेव उवाच<br>एवं भवतु दैत्येन्द्र पापं ते यातु संक्षयम्।<br>मुक्तोऽसि दैत्यभावाच्च भृङ्गी गणपतिर्भव॥७२<br><br>इत्येवमुक्त्वा वरदः शूलाग्रादवतार्य तम्।<br>निर्मार्ज्य निजहस्तेन चक्रे निर्व्रणमन्धकम्॥७३<br><br>ततः स्वदेहतो देवान् ब्रह्मादीनाजुहाव सः।<br>ते निश्चेरुर्महात्मानो नमस्यन्तस्त्रिलोचनम्॥७४<br><br>गणान् सनन्दीनाहूय संनिवेश्य तदाग्रतः।<br>भृङ्गिनं दर्शयामास धुवं नैषोऽन्धकेति हि॥७५ | (भगवान्) महादेवने कहा—दैत्येन्द्र! ऐसा ही हो। तुम्हारे पाप नष्ट हो जायँ। तुम दानवीय विचारसे मुक्त हो गये। अब तुम भृङ्गी नामके गणपति हो गये। इस प्रकार कहकर वरदानी महादेवने उस अन्धकको शूलकी नोकसे उतारा और अपने हाथसे सहलाकर बिना घावका कर दिया। उसके बाद उन्होंने अपने शरीरमें स्थित ब्रह्मादि देवोंका आह्वान किया। वे सभी महान् देवगण त्र्यम्बक शिवको नमस्कार करते हुए बाहर निकले। नन्दीके साथ गणोंको बुलाकर और सामने बैठाकर भृङ्गीको दिखलाते हुए उन्होंने कहा—निश्चय ही यह अन्धक (पहले-जैसा) नहीं रह गया है॥७२-७५॥ | | तं दृष्ट्वा दानवपतिं संशुष्कपिशितं रिपुम्।<br>गणाधिपत्यमापन्नं प्रशंसुर्वृषध्वजम्॥७६ | उस सूखे हुए मांसवाले शत्रु दानवपतिको गणाधिप हुआ देखकर वे सभी वृषध्वज (शंकर) की प्रशंसा |