भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय ७०] अन्धकका शिव-शूलसे भेदन, भैरवादिकी उत्पत्ति, अन्धककृत शिवस्तुति, अन्धकका भृङ्गित्त्व ३४९


श्लोकअर्थ
त्वां नाथ देवाः शिवमीरयन्ति<br>सिद्धा हरं स्थाणुं महर्षयश्च।<br>भीमं च यक्षा मनुजा महेश्वरं<br>भूताश्च भूताधिपमाममन्ति॥ ५४<br>निशाचरा उग्रमुपार्चयन्ति<br>भवेति पुण्याः पितरो नमन्ति।<br>दासोऽस्मि तुभ्यं हर पाहि मां<br>पापक्षयं मे कुरु लोकनाथ॥ ५५हे नाथ! देवता आपको शिव (मङ्गलमय) कहते हैं। सिद्धलोग आपको हर (पापहारी), महर्षिलोग स्थाणु (अचल), यक्षलोग भीम, मनुष्य महेश्वर और भूत भूताधिपति मानते हैं। निशाचर उग्र नामसे आपकी अर्चना करते हैं तथा पुण्यात्मा पितृगण भव नामसे आपको नमस्कार करते हैं। हे हर! मैं आपका दास हूँ, आप मेरी रक्षा करें। हे लोकनाथ! मेरे पापोंका आप विनाश कीजिये॥ ५२-५५॥
भवांस्त्रिदेवस्त्रियुगस्त्रिधर्मा<br>त्रिपुष्करश्चासि विभो त्रिनेत्र।<br>त्रय्यारुणिस्त्रिश्रुतिरव्ययात्मन्<br>पुनीहि मां त्वां शरणं गतोऽस्मि॥ ५६<br>त्रिणाचिकेतस्त्रिपदप्रतिष्ठः<br>षडङ्गवित् त्वं विषयेष्वलुब्धः।<br>त्रैलोक्यनाथोऽसि पुनीहि शम्भो<br>दासोऽस्मि भीतः शरणागतस्ते॥ ५७<br>कृतं महच्छङ्कर तेऽपराधं<br>मया महाभूतपते गिरीश।<br>कामारिणा निर्जितमानसेन<br>प्रसादये त्वां शिरसा नतोऽस्मि॥ ५८<br>पापोऽहं पापकर्माऽहं पापात्मा पापसम्भवः।<br>त्राहि मां देव ईशान सर्वपापहरो भव॥ ५९हे सर्वसमर्थ त्रिनेत्र! आप त्रिदेव, त्रियुग, त्रिधर्मा तथा त्रिपुष्कर हैं। हे अव्ययात्मन्! आप त्रय्यारुणि तथा त्रिश्रुति हैं। आप मुझे पवित्र करें। मैं आपकी शरणमें आया हूँ। आप त्रिणाचिकेत, त्रिपदप्रतिष्ठ (स्वर्ग, मर्त्य, पातालरूप तीनों पदोंपर प्रतिष्ठित) षडङ्गवित् (वेदके शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष—इन छह अङ्गोंके जाननेवाले), विषयोंके प्रति अनासक्त तथा तीनों लोकोंके स्वामी हैं। हे शम्भो! आप मुझे पवित्र करें। मैं आपका दास हूँ। भयभीत होकर मैं आपकी शरणमें आया हूँ। हे शंकर! हे महाभूतपते! हे गिरीश! कामरूपी शत्रुने मेरे मनको जीत लिया था, इसलिये मैंने आपका महान् अपराध किया है। मैं आपको सिर झुकाकर प्रणाम करता हूँ। मैं पापी, पापकर्मा, पापात्मा तथा पापसे उत्पन्न हूँ। हे देव ईशान! हे समस्त पापोंको हरण करनेवाले महादेव! आप मेरी रक्षा कीजिये॥ ५६-५९॥
मा मे क्रुध्यस्व देवेश त्वया चैतादृशोऽस्म्यहम्।<br>सृष्टः पापसमाचारो मे प्रसन्नो भवेश्वर॥ ६०देवेश! आप मेरे ऊपर कुपित न हों। आपने ही मुझे इस प्रकारके पापका आचरण करनेवाला बनाया है। ईश्वर! मेरे ऊपर प्रसन्न होइये।
त्वं कर्ता चैव धाता च त्वं जयस्त्वं महाजयः।<br>त्वं मङ्गल्यस्त्वमोंकारस्त्वमीशानो ध्रुवोऽव्ययः॥ ६१आप सृष्टि तथा पालन-पोषण करनेवाले हैं। आप ही जय और आप ही महाजय हैं। आप मङ्गलमय हैं। आप ओंकार हैं। आप ही ईशान, अव्यय तथा ध्रुव हैं।
त्वं ब्रह्मा सृष्टिकृन्नाथास्त्वं विष्णुस्त्वं महेश्वरः।<br>त्वमिन्द्रस्त्वं वषट्कारो धर्मस्त्वं च सुरोत्तमः॥ ६२आप सृष्टि करनेवाले ब्रह्मा तथा (सब कुछ करनेमें) समर्थ हैं। आप विष्णु और महेश्वर हैं। आप इन्द्र हैं, आप वषट्कार हैं, आप धर्म तथा देवोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं।
सूक्ष्मस्त्वं व्यक्तरूपस्त्वं त्वमव्यक्तस्त्वमीश्वरः।<br>त्वया सर्वमिदं व्याप्तं जगत् स्थावरजङ्गमम्॥ ६३आप (कठिनतासे देखे जाने योग्य) सूक्ष्म हैं, आप (प्रतीतिका विषय होनेसे) व्यक्तरूप हैं, आप अप्रकटरहस्य—अव्यक्त हैं, आप ईश्वर हैं, आपसे ही यह चर-अचर जगत् व्याप्त (ओतप्रोत या ढका) है।