भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३४८श्रीवामनपुराण[ अध्याय ७०

| यद्भूम्‍यां न्यपतद् विप्र स्वेदबिन्दुः शिवाननात् ।<br>तस्मादङ्गारपुञ्जाभो बालकः समजायत ॥ ४२<br>स बालस्तृषितोऽत्यर्थं पपौ रुधिरमान्धकम् ।<br>कन्या चोत्कृत्य संजातमसृग्विलिलिहेऽद्भुता ॥ ४३ | एक कन्या उत्पन्न हुई। विप्र! शिवके मुखसे भूमिपर गिरे पसीनोंकी बूँदोंसे अंगारे-जैसी कान्तिवाला एक बालक उत्पन्न हुआ॥ ३९—४२॥<br>अत्यन्त प्यासा वह बालक अन्धकका रक्त पीने लगा और अद्भुत कन्या भी काटकर उत्पन्न हुए रक्तको चाटने लगी। उसके बाद भैरवका रूप धारण करनेवाले वरदानी शंकरने प्रातःकालके सूर्यके समान कान्तिवाली उस कन्यासे जगत्-कल्याणकारी महान् वचन कहा— | | ततस्तामाह बालार्कप्रभां भैरवमूर्तिमान् ।<br>शङ्करो वरदो लोके श्रेयोऽर्थाय वचो महत् ॥ ४४<br>त्वां पूजयिष्यन्ति सुरा ऋषयः पितरोरगाः ।<br>यक्षविद्याधराश्चैव मानवाश्च शुभङ्करि ॥ ४५<br>त्वां स्तोष्यन्ति सदा देवि बलिपुष्पोत्करैः करैः ।<br>चर्चिकेति शुभं नाम यस्माद् रुधिरचर्चिता ॥ ४६ | शुभकारिणि! देवता, ऋषि, पितर, सर्पादि, यक्ष, विद्याधर एवं मानव तुम्हारी पूजा करेंगे। देवि! (वे लोग) बलि एवं पुष्पाञ्जलिसे तुम्हारी स्तुति करेंगे। यतः तुम रक्तसे चर्चित (लथपथ) हो, अतः तुम्हारा शुभ नाम 'चर्चिका' होगा॥ ४३—४६॥ | | इत्येवमुक्ता वरदेन चर्चिका<br>भूतानुजाता हरिचर्मवासिनी ।<br>महीं समन्ताद् विचचार सुन्दरी<br>स्थानं गता हिङ्गुलताद्रिमुत्तमम् ॥ ४७<br>तस्यां गतायां वरदः कुजस्य<br>प्रादाद् वरं सर्ववरोत्तमं यत् ।<br>ग्रहाधिपत्यं जगतां शुभाशुभं<br>भविष्यति त्वद्वशगं महात्मन् ॥ ४८ | वरदानी शंकरके ऐसा कहनेपर व्याघ्रचर्मको वस्त्ररूपमें धारण करनेवाली और सब भूतोंके बाद उत्पन्न हुई सुन्दरी चर्चिका पृथ्‍वीपर चारों ओर विचरती हुई इंगुरके रंगवाले उत्तम पर्वतपर चली गयी। उसके (वहाँ) चले जानेपर वरदानी शंकरने कुज (मंगल)को सर्वश्रेष्ठ वर दिया। (उन्होंने कहा—) महात्मन्! तुम ग्रहोंके स्वामी बनोगे तथा संसारका शुभ और अशुभ तुम्हारे अधीन होगा। | | हरोऽन्धकं वर्षसहस्त्रमात्रं<br>दिव्यं स्वनेत्रार्कहुताशनेन ।<br>चकार संशुष्कतनुं त्वशोणितं<br>त्वगस्थिशेषं भगवान् स भैरवः ॥ ४९<br>तत्राग्निना नेत्रभवेन शुद्धः<br>स मुक्तपापोऽसुरराड् बभूव ।<br>ततः प्रजानां बहुरूपमीशं<br>नाथं हि सर्वस्य चराचरस्य ॥ ५०<br>ज्ञात्वा स सर्वेश्वरमीशमव्ययं<br>त्रैलोक्यनाथं वरदं वरेण्यम् ।<br>सर्वैः सुराद्यैर्नतमीड्यमाद्यं<br>ततोऽन्धकः स्तोत्रमिदं चकार ॥ ५१ | उन भैरव-रूपधारी भगवान् शिवने अपने अग्नि और सूर्यरूपी नेत्रोंसे एक हजार दिव्य वर्षोंतक अन्धकके शरीरको सुखाकर रक्तरहित कर हड्डी तथा चाम शेष रखकर कंकाल बना दिया। शंकरके नेत्रसे उत्पन्न अग्निद्वारा शुद्ध होनेके कारण वह असुरराज पापसे छूट गया। उसके बाद अनेक रूप धारण करके प्रजाओंका नियमन करनेवाले, समस्त चर और अचरके स्वामी, सर्वेश्वर, अविनाशी ईश, त्रैलोक्यपति, वरदानी, वरेण्य, सभी सुरादिकोंद्वारा विनयपूर्वक स्तुति करनेयोग्य एवं सबके आदिमें रहनेवाले शंकरको वास्तवरूपमें जानकर अन्धकने यह स्तुति की—॥ ४७—५१॥ | | अन्धक उवाच<br>नमोऽस्तु ते भैरव भीममूर्ते<br>त्रिलोकगोप्त्रे शितशूलधारिणे ।<br>विंशार्द्धबाहो भुजगेशहार<br>त्रिनेत्र मां पाहि विपन्नबुद्धिम् ॥ ५२<br>जयस्व सर्वेश्वर विश्वमूर्ते<br>सुरासुरैर्वन्दितपादपीठ ।<br>त्रैलोक्यमातुर्गुरवे वृषाङ्क<br>भीतः शरण्यं शरणागतोऽस्मि ॥ ५३ | अन्धकने कहा— हे विशालकाय भैरव! हे त्रिलोककी रक्षा करनेवाले! हे तीक्ष्ण शूल धारण करनेवाले! आपको नमस्कार है। हे दस भुजाओंवाले तथा नागेशका हार धारण करनेवाले त्रिनेत्र! आप मुझ नष्टमतिकी रक्षा करें। हे देवों तथा असुरोंसे वन्दित पादपीठवाले विश्वमूर्ति सर्वेश्वर! आपकी जय हो। हे त्रिलोक-जननीके स्वामी वृषाङ्क! मैं भयभीत होकर आप शरणागतकी रक्षा करनेवालेकी शरणमें आया हूँ। |