वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| ३५० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७० | | :--- | :--- |
| त्वमादिरन्तो मध्यश्च त्वमनादिः सहस्रपात्।<br>विजयस्त्वं सहस्राक्षो विरूपाक्षो महाभुजः॥६४<br><br>अनन्तः सर्वगो व्यापी हंसः प्राणाधिपोऽच्युतः।<br>गीर्वाणपतिरव्यग्रो रुद्रः पशुपतिः शिवः॥६५<br><br>त्रैविद्यस्त्वं जितक्रोधो जितारिर्विजितेन्द्रियः।<br>जयश्च शूलपाणिस्त्वं त्राहि मां शरणागतम्॥६६ | आप आदि, मध्य एवं अन्त हैं, (साथ ही) आप आदि-रहित एवं हजारों पैरोंवाले सहस्रपात् हैं। आप विजय हैं। आप हजारों आँखोंवाले, विरूप आँखवाले एवं बड़ी भुजावाले हैं। आप अन्तसे रहित, सर्वगत, व्यापी, हंस, प्राणोंके स्वामी (सदा स्वस्वरूपमें स्थित) अच्युत, देवाधिदेव, शान्त, रुद्र, पशुपति एवं शिव हैं। आप तीनों वेदोंके जाननेवाले, क्रोधको जीत लेनेवाले, शत्रुओंको विजित करनेवाले, इन्द्रियजयी, जय एवं शूलपाणि हैं। आप मुझ शरणागतकी रक्षा करें॥६०-६६॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>इत्थं महेश्वरो ब्रह्मन् स्तुतो दैत्याधिपेन तु।<br>प्रीतियुक्तः पिङ्गलाक्षो हैरण्याक्षिमुवाच ह॥६७<br><br>सिद्धोऽसि दानवपते परितुष्टोऽस्मि तेऽन्धक।<br>वरं वरय भद्रं ते यमिच्छसि विनाऽम्बिकाम्॥६८ | पुलस्त्यजी बोले—ब्रह्मन्! दैत्योंके स्वामी अन्धकके इस प्रकार स्तुति करनेपर लालिमा लिये भूरे रंगकी आँखवाले महेश्वरने प्रसन्न होकर हिरण्याक्षके पुत्र अन्धकसे कहा—दानवपति अन्धक! तुम सिद्ध हो गये हो; मैं तुम्हारे ऊपर प्रसन्न हूँ। अम्बिकाके सिवाय तुम जो चाहो, वह वर माँगो। तुम्हारा कल्याण हो॥६७-६८॥ | | अन्धक उवाच<br>अम्बिका जननी मह्यं भगवांस्त्र्यम्बकः पिता।<br>वन्दामि चरणौ मातुर्वन्दनीया ममाम्बिका॥६९<br><br>वरदोऽसि यदीश न तद् यातु विलयं मम।<br>शारीरं मानसं वाग्जं दुष्कृतं दुर्विचिन्तितम्॥७०<br><br>तथा मे दानवो भावो व्यपयातु महेश्वर।<br>स्थिराऽस्तु त्वयि भक्तिस्तु वरमेतत् प्रयच्छ मे॥७१ | अन्धकने (विनीत भावसे) कहा—अम्बिका मेरी माता और आप त्र्यम्बक मेरे पिता हैं। अम्बिका मेरी वन्दनीया हैं। मैं उन माताके चरणोंकी वन्दना करता हूँ। ईशान! यदि आप मुझे वर देना चाहते हैं तो मेरे शरीरसम्बन्धी, मनसम्बन्धी एवं वचनसम्बन्धी पाप तथा नीच विचार नष्ट हो जायें। महेश्वर! मेरा दानवीय विचार भी दूर हो जाय एवं आपमें मेरी अटल भक्ति हो जाय—मुझे यही वर दीजिये॥६९-७१॥ | | महादेव उवाच<br>एवं भवतु दैत्येन्द्र पापं ते यातु संक्षयम्।<br>मुक्तोऽसि दैत्यभावाच्च भृङ्गी गणपतिर्भव॥७२<br><br>इत्येवमुक्त्वा वरदः शूलाग्रादवतार्य तम्।<br>निर्मार्ज्य निजहस्तेन चक्रे निर्व्रणमन्धकम्॥७३<br><br>ततः स्वदेहतो देवान् ब्रह्मादीनाजुहाव सः।<br>ते निश्चेरुर्महात्मानो नमस्यन्तस्त्रिलोचनम्॥७४<br><br>गणान् सनन्दीनाहूय संनिवेश्य तदाग्रतः।<br>भृङ्गिनं दर्शयामास धुवं नैषोऽन्धकेति हि॥७५ | (भगवान्) महादेवने कहा—दैत्येन्द्र! ऐसा ही हो। तुम्हारे पाप नष्ट हो जायँ। तुम दानवीय विचारसे मुक्त हो गये। अब तुम भृङ्गी नामके गणपति हो गये। इस प्रकार कहकर वरदानी महादेवने उस अन्धकको शूलकी नोकसे उतारा और अपने हाथसे सहलाकर बिना घावका कर दिया। उसके बाद उन्होंने अपने शरीरमें स्थित ब्रह्मादि देवोंका आह्वान किया। वे सभी महान् देवगण त्र्यम्बक शिवको नमस्कार करते हुए बाहर निकले। नन्दीके साथ गणोंको बुलाकर और सामने बैठाकर भृङ्गीको दिखलाते हुए उन्होंने कहा—निश्चय ही यह अन्धक (पहले-जैसा) नहीं रह गया है॥७२-७५॥ | | तं दृष्ट्वा दानवपतिं संशुष्कपिशितं रिपुम्।<br>गणाधिपत्यमापन्नं प्रशंसुर्वृषध्वजम्॥७६ | उस सूखे हुए मांसवाले शत्रु दानवपतिको गणाधिप हुआ देखकर वे सभी वृषध्वज (शंकर) की प्रशंसा |
अध्याय ७० ] अन्धकका शिव-शूलसे भेदन, भैरवादिकी उत्पत्ति, अन्धककृत शिवस्तुति, अन्धकका भृङ्गित्त्व ३५१
| ततस्तान् प्राह भगवान् सम्परिष्वज्य देवताः।<br>गच्छध्वं स्वानि धिष्ण्यानि भुङ्ग्ध्वं त्रिदिवं सुखम्॥ ७७<br><br>सहस्राक्षोऽपि संयातु पर्वतं मलयं शुभम्।<br>तत्र स्वकार्यं कृत्वैव पश्चाद् यातु त्रिविष्टपम्॥ ७८<br><br>इत्येवमुक्त्वा त्रिदशान् समाभाष्य व्यसर्जयत्।<br>पितामहं नमस्कृत्य परिष्वज्य जनार्दनम्।<br>ते विसृष्टा महेशेन सुरा जग्मुस्त्रिविष्टपम्॥ ७९ | करने लगे। उसके बाद भगवान् शंकरने उन देवोंको गले लगाकर कहा—देवताओ! आपलोग अपने-अपने स्थानको जाइये और स्वर्ग-सुखका उपभोग कीजिये। इन्द्र भी सुखद मलयपर्वतपर जायें तथा वहाँ अपना काम समाप्त करके ही स्वर्ग चले जायें। ऐसा कहकर देवोंसे वार्तालाप कर देवोंको विदा कर दिया। महेशने पितामहको नमस्कार तथा जनार्दनको गले लगाकर उन सभीको विदा कर दिया। (महेशसे विदा किये गये) वे देवगण स्वर्गको चले गये॥ ७६—७९॥ |
| महेन्द्रो मलयं गत्वा कृत्वा कार्यं दिवं गतः।<br>गतेषु शक्रप्राग्येषु देवेषु भगवाञ्छिवः॥ ८०<br><br>विसर्जयामास गणाननुमान्य यथार्हतः।<br>गणाश्च शङ्करं दृष्ट्वा स्वं स्वं वाहनमास्थिताः॥ ८१<br><br>जग्मुस्ते शुभलोकानि महाभोगानि नारद।<br>यत्र कामदुघा गावः सर्वकामफलद्रुमाः॥ ८२<br><br>नद्यस्त्वमृतवाहिन्यो हृदाः पायसकर्दमाः।<br>स्वां स्वां गतिं प्रयातेषु प्रमथेषु महेश्वरः॥ ८३<br><br>समादायान्धकं हस्ते सनन्दिः शैलमभ्यगात्।<br>द्वाभ्यां वर्षसहस्राभ्यां पुनरागाद्धरो गृहम्॥ ८४<br><br>ददृशे च गिरेः पुत्रीं श्वेतार्ककुसुमस्थिताम्।<br>समायातं निरीक्ष्यैव सर्वलक्षणसंयुतम्॥ ८५<br><br>त्यक्त्वाऽर्कपुष्पं निर्गत्य सखीस्ताः समुपाह्वयत्।<br>समाहूताश्च देव्या ता जयाद्यास्तूर्णमागमन्॥ ८६ | महेन्द्र भी मलयाचलपर जा करके (अपना) कार्य सम्पन्नकर स्वर्ग चले गये। शिवने इन्द्र आदि देवोंके चले जानेपर गणोंको यथायोग्य सम्मानित कर विदा कर दिया। [पुलस्त्यजी कहते हैं कि] नारदजी! गण भी शंकरका दर्शन कर अपने वाहनोंपर आरूढ़ हो विशाल भोगसे सम्पन्न उन सुखद लोकोंको चले गये, जहाँकी गौएँ इच्छित वस्तु प्रदान करनेवाली थीं, वृक्ष समस्त कर्मरूपी फलोंके दाता थे, नदियाँ अमृतकी धारा बहानेवाली थीं और सरोवर दूधके पङ्कसे भरे थे। महेश्वर प्रमथोंके अपने-अपने स्थानपर चले जानेपर अन्धकका हाथ पकड़कर (उसे साथ लिये हुए) नन्दीसहित पर्वतपर चले गये। (वे) शंकर दो हजार वर्षोंके बाद फिर अपने घर लौटे। उन्होंने सफेद अर्क (आक या मन्दार)-के फूलमें स्थित गिरिजाको देखा। पार्वती समस्त चिह्नोंसे युक्त शंकरको आया हुआ देखते ही अर्कके फूलको छोड़कर बाहर निकल आयीं और उन्होंने (अपनी जयादि) सखियोंको पुकारा। पुकारी गयीं वे जया आदि सभी देवियाँ शीघ्र वहाँ चली आयीं॥ ८०—८६॥ |
| ताभिः परिवृता तस्थौ हरदर्शनलालसा।<br>ततस्त्रिनेत्रो गिरिशां दृष्ट्वा प्रेक्ष्य च दानवम्॥ ८७<br><br>नन्दिनं च तथा हर्षादालिलिङ्गे गिरेः सुताम्।<br>अथोवाचैष दासस्ते कृतो देवि मयाऽन्धकः॥ ८८<br><br>पश्यस्व प्रणतिं यातं स्वसुतं चारुहासिनि।<br>इत्युच्चार्यान्धकं चैव पुत्र एहीति सत्वरम्॥ ८९ | उन (अपनी सहेली जयादि देवियों)-से घिरी हुई पार्वतीजी शिवके दर्शनकी अभिलाषासे (प्रतीक्षामें) खड़ी रहीं। त्रिनेत्रधारी शंकरने गिरिजाको देखकर दानव एवं नन्दीके ऊपर भी दृष्टिपात किया; फिर प्रसन्नतापूर्वक गिरिसुताको गले लगा लिया। उसके बाद उन्होंने कहा—देवि! मैंने अन्धकको तुम्हारा दास बना लिया है। चारुहासिनि! प्रणाम कर रहे अपने पुत्रको देखो। ऐसा कहनेके बाद उन्होंने कहा—पुत्र! |
७३- बलि, मय-प्रभृति दैत्योंका देवताओंके साथ युद्ध, कालनेमिके साथ विष्णुभगवान्का युद्ध और कालनेमिका वध
| ३५२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७० |
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| व्रजस्व शरणं मातुरेशा श्रेयस्करी तव।<br>इत्युक्तो विभुना नन्दी अन्धकश्च गणेश्वरः ॥ ९०<br><br>समागम्याम्बिकापादौ ववन्दतुरुभावपि।<br>अन्धकोऽपि तदा गौरीं भक्तिनम्रो महामुने।<br>स्तुतिं चक्रे महापुण्यां पापघ्नीं श्रुतिसम्मिताम् ॥ ९१ | शीघ्र यहाँ आओ। अपनी इस माताकी शरणमें जाओ! ये तुम्हारा कल्याण करेंगी। प्रभुके इस प्रकार कहनेपर गणेश्वर नन्दी एवं अन्धक दोनोंने जाकर अम्बिकाके चरणोंमें प्रणाम किया। महामुने ! उसके बाद श्रद्धापूर्वक नम्र होकर अन्धकने गौरीकी पाप नाश करनेवाली एवं अत्यन्त पवित्र वेद-सम्मत स्तुति की ॥ ८७-९१ ॥ | | अन्धक उवाच<br>ॐ नमस्ये भवानीं भूतभव्यप्रियां लोकधात्रीं जनित्रीं स्कन्दमातरं महादेवप्रियां धारिणीं स्यन्दिनीं चेतनां त्रैलोक्यमातरं धरित्रीं देवमातरमथेज्यां श्रुतिं स्मृतिं दयां लज्जां कान्तिमग्र्यामसूयां मतिं सदापावनीं दैत्यसैन्यक्षयकरीं महामायां वैजयन्तीं सुशुभां कालरात्रिं गोविन्दभगिनीं शैलराजपुत्रीं सर्वदेवार्ार्चितां सर्वभूतार्चितां विद्यां सरस्वतीं त्रिनयनमहिषीं नमस्यामि मृडानीं शरण्यां शरणमुपागतोऽहं नमो नमस्ते ॥<br><br>इत्थं स्तुता सान्धकेन परितुष्टा विभावरी।<br>प्राह पुत्र प्रसन्नाऽस्मि वृणुष्व वरमुत्तमम् ॥ ९२ | अन्धकने कहा— ॐ मैं भवानीको प्रणाम करता हूँ। मैं भूतभव्य—शङ्करकी प्रिया, लोकधात्री, जनित्री, कार्तिकेयकी जननी, महादेवकी प्रिया, लोकोंको धारण करनेवाली, स्यन्दिनी, चेतना, त्रैलोक्यजननी, धरित्री, देवमाता, इज्या, श्रुति, स्मृति, दया, लज्जा, श्रेष्ठ कान्ति, अग्र्या, असूया, मति, सदापावनी, दैत्योंकी सेनाओंका विनाश करनेवाली, महामाया वैजयन्ती, अत्यन्त शोभावाली, कालरात्रि, गोविन्दभगिनी, शैलराजपुत्री, सर्वदेवोंसे पूजित, सर्वभूतोंसे पूजित, विद्या, सरस्वती, शंकरकी महारानीको प्रणाम करता हूँ। मैं शरणागतोंकी रक्षा करनेवाली मृडानीकी शरणमें आया हूँ। (देवि!) आपको बार-बार प्रणाम है। अन्धकके इस प्रकार स्तुति करनेपर भवानीने प्रसन्न होकर कहा—पुत्र! मैं प्रसन्न हूँ। तुम उत्तम वर माँगो ॥ ९२ ॥ | | भृङ्गिरुवाच<br>पापं प्रशममायातु त्रिविधं मम पार्वति।<br>तथेश्वरे च सततं भक्तिरस्तु ममाम्बिके ॥ ९३ | भृङ्गीने कहा— पार्वति! अम्बिके! मेरे त्रिविध—मानसिक, कायिक, वाचिक पाप दूर हो जायँ एवं भगवान् शिवमें मेरी भक्ति सदा बनी रहे ॥ ९३ ॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>बाढमित्यब्रवीद् गौरी हिरण्याक्षसुतं ततः।<br>स चास्ते पूजयञ्छर्वं गणानामधिपोऽभवत् ॥ ९४<br><br>एवं पुरा दानवसत्तमं तं<br>महेश्वरेणाथ विरूपदृष्ट्या।<br>कृत्वैव रूपं भयदं च भैरवं<br>भृङ्गित्त्वमीशेन कृतं स्वभक्त्या ॥ ९५<br><br>एतत् तवोक्तं हरकीर्तिवर्धनं<br>पुण्यं पवित्रं शुभदं महर्षे।<br>संकीर्तनीयं द्विजसत्तमेषु<br>धर्मयुरारोग्यधनैषिणा सदा ॥ ९६ | पुलस्त्यजी बोले— उसके बाद गौरीने हिरण्याक्षके पुत्र अन्धकसे कहा—ऐसा ही हो। वह वहाँ रहकर शिवकी पूजा करते हुए गणाधिप हो गया। इस प्रकार पहले समयमें महेश्वरने उस दानवश्रेष्ठको अपनी विरूपदृष्टिसे भयदायक भीषण रूप प्रदानकर अपनी भक्तिसे 'भृङ्गी' बना दिया। महर्षे (नारदजी)! मैंने आपसे शिवकी कीर्तिको बढ़ानेवाला यह पुण्य पवित्र एवं शुभद आख्यान कहा। धर्म, आयु, आरोग्य एवं धनको चाहनेवालोंको श्रेष्ठ द्विजातियोंमें इसका कीर्तन सदा करना चाहिये ॥ ९४-९६ ॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें सत्तरवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ७० ॥
अध्याय ७१ ] * इन्द्रका मलयपर असुरोंसे युद्ध, मरुतोंकी उत्पत्तिकी कथा * ३५३
एकहत्तरवाँ अध्याय
इन्द्रका मलयपर असुरोंसे युद्ध, उनका 'पाकशासन' और 'गोत्रभिद्' होनेका हेतु; मरुतोंकी उत्पत्तिकी कथा
| नारद उवाच<br>मलयेऽपि महेन्द्रेण यत्कृतं ब्राह्मणर्षभ।<br>निष्पादितं स्वकं कार्यं तन्मे व्याख्यातुमर्हसि॥ १<br><br>पुलस्त्य उवाच<br>श्रूयतां यन्महेन्द्रेण मलये पर्वतोत्तमे।<br>कृतं लोकहितं ब्रह्मन्नात्मनश्च तथा हितम्॥ २<br>अन्धासुरस्यानुचरा मयतारपुरोगमाः।<br>ते निर्जिताः सुरगणैः पातालगमनोत्सुकाः॥ ३<br>ददृशुर्मलयं शैलं सिद्धाध्युषितकन्दरम्।<br>लतावितानसंछन्नं मत्तसत्त्वसमाकुलम्॥ ४<br>चन्दनैरुरगाक्रान्तैः सुशीतैरभिसेवितम्।<br>माधवीकुसुमामोदं ऋष्यर्चितहरं गिरिम्॥ ५<br>तं दृष्ट्वा शीतलच्छायं श्रान्ता व्यायामकर्षिताः।<br>मयतारपुरोगास्ते निवासं समरोचयन्॥ ६<br>तेषु तत्रोपविष्टेषु प्राणतृप्तिप्रदोऽनिलः।<br>विवाति शीतः शनकैर्दक्षिणो गन्धसंयुतः॥ ७<br>तत्रैव च रतिं चक्रुः सर्व एव महासुराः।<br>कुर्वन्तो लोकसम्पूज्ये विद्वेषं देवतागणे॥ ८<br>ताञ्ज्ञात्वा शङ्करः शक्रं प्रेषयन्मलयेऽसुरान्।<br>स चापि ददृशे गच्छन् पथि गोमातरं हरिः॥ ९<br>तस्याः प्रदक्षिणां कृत्वा दृष्ट्वा शैलं च सुप्रभम्।<br>ददृशे दानवान् सर्वान् संहृष्टान् भोगसंयुतान्॥ १०<br><br>अथाजुहाव बलहा सर्वानैव महासुरान्।<br>ते चाप्याययुरव्यग्रा विकिरन्तः शरोत्करान्॥ ११<br><br>तानागतान् बाणजालैः रथस्थोऽद्भुतदर्शनः।<br>छादयामास विप्रर्षे गिरीन् वृष्ट्या यथा घनः॥ १२<br><br>ततो बाणैरवच्छाद्य मयादीन् दानवान् हरिः।<br>पाकं जघान तीक्ष्णाग्रैर्मार्गणैः कङ्कवाससैः॥ १३ | नारदने कहा— द्विजश्रेष्ठ! महेन्द्रने मलयपर्वतपर भी अपना जो कार्य पूरा किया उसे आप मुझसे कहिये॥ १॥<br><br>पुलस्त्यजी बोले— ब्रह्मन्! महेन्द्रने श्रेष्ठ मलयपर्वतपर जगत्के हित तथा अपने कल्याणके लिये जो कार्य किया था, उसे सुनिये। मय, तार आदि अन्धकासुरके अनुचर दैत्य देवताओंसे पराजित होकर पाताललोकमें जानेके लिये अत्यन्त उत्सुक होने लगे। उन लोगोंने सिद्धोंसे भरे कन्दराओंवाले तथा लतासमूहसे ढके, आमोदभरे प्राणियोंसे व्याप्त, साँपोंसे घिरे सुशीतल चन्दनसे युक्त तथा सुगन्धित माधवी लताके फूलोंकी सुगन्धिसे पूर्ण ऋषियोंद्वारा पूजित शंकरके मलयगिरिको देखा॥ २—५॥<br><br>परिश्रमसे थके-माँदे तथा शक्तिहीन मय, तार आदि दानवोंने शीतल छायावाले उस पर्वतको देखकर वहाँ निवास करनेकी इच्छा की। उन लोगोंके वहाँ ठहर जानेपर प्राणोंको संतुष्टि प्रदान करनेवाली सुगन्धसे पूर्ण तथा शीतल दक्षिणी हवा मन्द-मन्द बहने लगी। जगत्-पूज्य देवताओंसे शत्रुता करते हुए सभी श्रेष्ठ दैत्य सुखसे वहीं रहने लगे। शंकरने उन असुरोंको मलयपर्वतपर रहते हुए जानकर इन्द्रको वहाँ भेजा। मार्गमें जाते हुए इन्द्रने गोमाताको देखा॥ ६—९॥<br><br>उसकी प्रदक्षिणा करनेके बाद उन्होंने सुकान्तिसे सम्पन्न पर्वतपर भोगसे संयुत तथा हर्षित सभी दानवोंको देखा। उसके बाद इन्द्रने सभी महासुरोंको ललकारा। वे भी बिना किसी हिचकके बाणोंकी वर्षा करते हुए आ गये। विप्रर्षे! रथपर बैठे हुए अद्भुत दिखायी पड़नेवाले इन्द्रने आये हुए उन दानवोंको बाणोंके समूहोंसे इस प्रकार ढक दिया जिस प्रकार बादल जलकी वर्षासे पर्वतोंको ढक देता है। उसके बाद इन्द्रने मय आदि दानवोंको बाणोंसे ढककर कङ्क पक्षीके पंख लगे तेज-नुकीली धारवाले बाणोंसे पाक नामके दानवका वध कर दिया॥ १०—१३॥ |
| ३५४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७१ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तत्र नाम विभुर्लेभे शासनत्वात् शरैर्दृढैः।<br>पाकशासनतां शक्रः सर्वामरपतिर्विभुः॥ १४<br>तथाऽन्यं पुरनामानं बाणासुरसुतं शरैः।<br>सुपुङ्खैर्दारयामास ततोऽभूत् स पुरन्दरः॥ १५<br>हत्वेत्थं समरेऽजैषीद् गोत्रभिद् दानवं बलम्।<br>तच्चापि विजितं ब्रह्मन् रसातलमुपागमत्॥ १६<br>एतदर्थं सहस्राक्षः प्रेषितो मलयाचलम्।<br>त्र्यम्बकेन मुनिश्रेष्ठ किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि॥ १७ | मजबूत बाणोंसे पाकको दण्डित (शासित) करनेके कारण सभी अमरोंके पति विभु इन्द्रको पाकशासनताकी प्राप्ति हुई। इसी प्रकार उन्होंने सुन्दर पंख लगे बाणोंसे दूसरे पुर नामक बाणासुरके पुत्रका (भी) वध कर दिया। इसीसे वे पुरन्दर हुए। ब्रह्मन्! इस प्रकार उन दानवोंका नाश कर इन्द्रने युद्धमें दानव-सेनाको जीत लिया। हारा हुआ वह दानवोंका सेना-समूह रसातलमें चला गया। मुनिश्रेष्ठ! इसीलिये शंकरने इन्द्रको मलयपर्वतपर भेजा था। अब आप और क्या सुनना चाहते हैं? ॥ १४-१७॥ |
| नारद उवाच<br>किमर्थं दैवतपतिर्गोत्रभित् कथ्यते हरिः।<br>एष मे संशयो ब्रह्मन् हृदि सम्परिवर्तते॥ १८ | नारदने कहा (पूछा)— ब्रह्मन्! मेरे हृदयमें यह संदेह है कि देवपति (इन्द्र)-को गोत्रभिद् क्यों कहा जाता है॥ १८॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>श्रूयतां गोत्रभिच्छक्रः कीर्तितो हि यथा मया।<br>हते हिरण्यकशिपौ यच्चकारारिमर्दनः॥ १९<br>दितिर्विनष्टपुत्रा कश्यपं प्राह नारद।<br>विभो नाथोऽसि मे देहि शक्रहन्तारमात्मजम्॥ २०<br>कश्यपस्तामुवाचाथ यदि त्वमसितेक्षणे।<br>शौचाचारसमायुक्ता स्थास्यसे दशतीर्दश॥ २१<br>संवत्सराणां दिव्यानां ततस्त्रैलोक्यनायकम्।<br>जनयिष्यसि पुत्रं त्वं शत्रुघ्नं नान्यथा प्रिये॥ २२ | पुलस्त्यजी बोले— मैंने इन्द्रको गोत्रभिद् जैसे कहा तथा हिरण्यकशिपुके मार दिये जानेपर शत्रुमर्दन इन्द्रने जो किया? आप (सब) सुनें। नारदजी! पुत्रकी मृत्यु हो जानेपर दितिने कश्यपसे कहा—प्रभो! आप मेरे पति हैं, मुझे इन्द्रका वध करनेवाला पुत्र दीजिये। कश्यपने उससे कहा—असितनयने! यदि तुम सौ दिव्य वर्षोंतक पवित्र आचरण करोगी तो तुम तीनों लोकोंका मार्गदर्शक एवं शत्रुसंहारकारी पुत्र उत्पन्न करोगी। प्रिये! इसके सिवा दूसरा कोई उपाय नहीं है॥ १९-२२॥ |
| इत्येवमुक्ता सा भर्त्रा दितिर्नियममास्थिता।<br>गर्भाधानमृषिः कृत्वा जगामोदयपर्वतम्॥ २३<br>गते तस्मिन् मुनिश्रेष्ठे सहस्त्राक्षोऽपि सत्वरम्।<br>तमाश्रममुपागम्य दितिं वचनमब्रवीत्॥ २४<br>करिष्याम्यनुशुश्रूषां भवत्या यदि मन्यसे।<br>बाढमित्यब्रवीद् देवी भाविकर्मप्रचोदिता॥ २५<br>समिदाहरणादीनि तस्याश्चक्रे पुरन्दरः।<br>विनीतात्मा च कार्यार्थी छिद्रान्वेषी भुजङ्गवत्॥ २६ | पतिके ऐसा कहनेपर दितिने नियमका निर्वाह करना प्रारम्भ कर दिया। कश्यप ऋषि गर्भाधान करके उदयगिरिपर चले गये। उन मुनिश्रेष्ठके उदयगिरिपर चले जानेके पश्चात् इन्द्रने शीघ्रतासे उस आश्रममें जाकर दितिसे यह वचन कहा—यदि आप अनुमति प्रदान करें तो मैं आपकी सेवा करूँ। भवितव्यतासे प्रेरित होकर देवीने कहा—ठीक है। विनीत बना हुआ इन्द्र अपने कार्यकी सिद्धिके लिये बिल खोजनेवाले सर्पकी भाँति अवसरकी प्रतीक्षा करते हुए उस (दिति)-के लिये लकड़ी आदि लानेका कार्य करने लगे॥ २३-२६॥ |
| एकदा सा तपोयुक्ता शौचे महति संस्थिता।<br>दशवर्षशतान्ते तु शिरःस्नाता तपस्विनी॥ २७ | एक हजार वर्ष बीत जानेपर मनोयोगसे पवित्रताका पालन करनेमें लगी हुई वह तपस्विनी एक दिन सिरसे स्नान करनेके बाद बालोंको खोले हुए अपने घुटनोंपर |
| अध्याय ७१ ] | * इन्द्रका मलयपर असुरोंसे युद्ध, मरुतोंकी उत्पत्तिकी कथा * | ३५५ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| जानुभ्यामुपरि स्थाप्य मुक्तकेशा निजं शिरः।<br>सुष्वाप केशप्रान्तैस्तु संश्लिष्टचरणाऽभवत् ॥ २८<br><br>तमन्तरमशौचस्य ज्ञात्वा वेदः सहस्रदृक्।<br>विवेश मातुरुदरं नासारन्ध्रेण नारद ॥ २९<br><br>प्रविश्य जठरं क्रुद्धो दैत्यमातुः पुरन्दरः।<br>ददर्शोर्ध्वमुखं बालं कटिन्यस्तकरं महत् ॥ ३० | सिर रखकर सो गयी। उसके बालोंके ऊपरी भाग (लटककर) पैरोंसे लग गये। नारदजी! सहस्राक्ष इन्द्रदेव अपवित्रताके लिये उस अवसरको (उपयुक्त) जानकर नासिकाके छिद्रसे माताके उदरमें प्रवेश कर गये। इन्द्रने दैत्यमाताकी विशाल कोखमें प्रवेश कर कमरपर हाथ रखे ऊपरको मुख किये हुए एक बालकको देखा॥ २७-३०॥ |
| तस्यैवास्तेऽथ ददृशे पेशीं मांसस्य वासवः।<br>शुद्धस्फटिकसंकाशां कराभ्यां जगृहेऽथ ताम् ॥ ३१<br><br>ततः कोपसमाध्मातो मांसपेशीं शतक्रतुः।<br>कराभ्यां मर्दयामास ततः सा कठिनाऽभवत् ॥ ३२<br><br>ऊर्ध्वेनार्धं च ववृधे त्वधोऽध ववृधे तथा।<br>शतपर्वाऽथ कुलिशः संजातो मांसपेशितः ॥ ३३<br><br>तेनैव गर्भं दितिजां वज्रेण शतपर्वणा।<br>चिच्छेद सप्तधा ब्रह्मन् स रुरोद च विस्वरम् ॥ ३४ | इन्द्रने उस बालकके मुँहमें एक शुद्ध स्फटिकके समान मांसपेशी देखी। इन्होंने उस मांसपेशीको दोनों हाथोंसे पकड़ लिया। उसके बाद क्रोधकी आगसे संतप्त हुए शतक्रतुने अपने दोनों हाथोंसे उस मांसपेशीको मसल दिया जिससे वह कठोर हो गयी (अब वह पिण्डके रूपमें हो गयी)। उस पिण्डका आधा भाग ऊपरकी ओर और आधा भाग नीचेकी ओर बढ़ गया। इस प्रकार उस मांसपेशीसे सौ पोरोंवाला वज्र बन गया। ब्रह्मन्! (इन्द्रने) उन्हीं पोरोंवाले वज्रसे दितिके द्वारा धारण किये हुए गर्भको सात भागोंमें काट डाला। फिर वह गर्भमें रहनेवाला बालक बिलखते स्वरमें रोने लगा॥ ३१-३४॥ |
| ततोऽप्यबुध्यत दितिर्जानाच्चक्रचेष्टितम्।<br>शुश्राव वाचं पुत्रस्य रुदमानस्य नारद ॥ ३५<br><br>शक्रोऽपि प्राह मा मूढ रुदस्वेति सुघर्घरम्।<br>इत्येवमुक्त्वा चैकैकं भूयश्चिच्छेद सप्तधा ॥ ३६<br><br>ते जाता मरुतो नाम देवभूत्याः शतक्रतोः।<br>मातुरेवापचारेण चलन्ते ते पुरस्कृताः ॥ ३७<br><br>ततः सकुलिशः शक्रो निर्गम्य जठरात् तदा।<br>दितिं कृताञ्जलिपुटः प्राह भीतस्तु शापतः ॥ ३८<br><br>ममास्ति नापराधोऽयं यच्छस्तस्तनयस्तव।<br>तवैवापनयाच्छस्तस्तन्मे न क्रोद्धुमर्हसि ॥ ३९ | [पुलस्त्यजी कहते हैं-] नारदजी! उसके बाद दिति जग गयी और उसने इन्द्रकी की हुई चेष्टाको जान लिया। उसने रोते हुए पुत्रकी वाणी सुनी। इन्द्रने भी कहा-मूर्ख! घर्घर शब्दसे मत रोओ। ऐसा कहकर उन्होंने प्रत्येक टुकड़ेको पुनः सात-सात टुकड़ोंमें काट डाला। वे (कटे हुए टुकड़े) इन्द्रके मरुत् नामके देवभूत्य हो गये। माताके ही अनुचित कार्य करनेके कारण वे आगे चलते हैं। उसके बाद वज्र लिये हुए इन्द्रने जठरसे बाहर आकर एवं शापसे भयभीत होकर हाथ जोड़कर दितिसे कहा-आपके पुत्रको जो मैंने काटा है इसमें मेरा अपराध नहीं है। आपके ही अपचरण (पवित्रताका पालन न करने)-से वह काटा गया। अतः मेरे ऊपर आपको कुपित नहीं होना चाहिये॥ ३५-३९॥ |
| दितिरुवाच<br>न तवात्रापराधोऽस्ति मन्ये दिष्टमिदं पुरा।<br>सम्पूर्णे त्वपि काले वै याऽशौचत्वमुपागता ॥ ४० | दितिने कहा- इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है। मैं इसे पूर्वनियोजित मानती हूँ। इसीसे समय पूरा होनेपर भी मैंने अपवित्रताका आचरण कर दिया॥ ४० ॥ |
७४- बलि-बाणका देवताओंसे युद्ध, बलिकी विजय, प्रह्लादका स्वर्गमें आना, बलिको प्रह्लादका उपदेश
| ३५६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७२ |
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| पुलस्त्य उवाच<br>इत्येवमुक्त्वा तान् बालान् परिसान्त्व्य दितिः स्वयम्।<br>देवराज्ञा सहैतांस्तु प्रेषयामास भामिनी॥ ४१<br>एवं पुरा स्वानपि सोदरान् स<br>गर्भस्थितानुज्जरितुं भयार्तः।<br>बिभेद वज्रेण ततः स गोत्रभित्<br>ख्यातो महर्षे भगवान् महेन्द्रः॥ ४२ | पुलस्त्यजी बोले— भामिनी दितिने ऐसा कहनेके बाद उन बालकोंको सान्त्वना देकर उन्हें देवराजके साथ ही भेज दिया। महर्षे! इस प्रकार पूर्वकालमें भयार्त होकर महेन्द्रने गर्भस्थित अपने ही सहोदरोंके विनाशके लिये उन्हें वज्रद्वारा काट दिया। इसीसे वे 'गोत्रभित्' नामसे प्रसिद्ध हो गये॥ ४१-४२॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ७१॥
बहत्तरवाँ अध्याय
स्वायम्भुव, स्वारोचिष, उत्तम, तामस, रैवत चाक्षुष-मन्वन्तरोंके मरुद्गणकी उत्पत्तिका वर्णन
| नारद उवाच<br>यदमी भवता प्रोक्ता मरुतो दितिजोत्तमाः।<br>तत् केन पूर्वमासन् वै मरुन्मार्गेण कथ्यताम्॥ १<br><br>पूर्वमन्वन्तरेष्वेव समतीतेषु सत्तम।<br>के त्वासन् वायुमार्गस्थास्तन्मे व्याख्यातुमर्हसि॥ २ | नारदजीने कहा— (पुलस्त्यजी!) आपने दितिसे उत्पन्न उत्तम मरुद्गणोंका जो वर्णन किया उसके विषयमें यह कहिये कि पहले वे मरुत् किस मार्गमें अवस्थित थे; सत्तम! आप मुझे विशेषरूपसे यह बतलाइये कि पूर्व मन्वन्तरके बीत जानेपर कौन (मरुत्) वायुमार्गमें स्थित थे?॥ १-२॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>श्रूयतां पूर्वमरुतामुत्पत्तिं कथयामि ते।<br>स्वायम्भुवं समारभ्य यावन्मन्वन्तरं त्विदम्॥ ३<br><br>स्वायम्भुवस्य पुत्रोऽभून्मनोर्नाम प्रियव्रतः।<br>तस्यासीत् सवनो नाम पुत्रस्त्रैलोक्यपूजितः॥ ४<br><br>स चानपत्यो देवर्षे नृपः प्रेतगतिं गतः।<br>ततोऽरूदत् तस्य पत्नी सुदेवा शोकविह्वला॥ ५<br><br>न ददाति तदा दग्धुं समालिङ्ग्य स्थिता पतिम्।<br>नाथ नाथेति बहुशो विलपन्ती त्वनाथवत्॥ ६ | पुलस्त्यजी बोले— (नारदजी!) स्वायम्भुव मन्वन्तरसे लेकर इस मन्वन्तरतकके पहलेतकके मरुद्गणोंकी उत्पत्ति आपसे कहता हूँ, उसे सुनिये—स्वायम्भुव मनुके पुत्रका नाम प्रियव्रत था। तीनों लोकोंमें सत्कार प्राप्त सवन उन प्रियव्रतके पुत्र थे। देवर्षे! वे राजा पुत्रहीन ही मृत्युको प्राप्त हो गये। उसके बाद उनकी सुदेवा नामकी पत्नी शोकसे विह्वल होकर रोने लगी। उसने उस मृत-शरीरको दाह-संस्कार करनेके लिये नहीं दिया। पतिके गलेसे लिपटी हुई वह 'हा नाथ, हा नाथ' कहती हुई असहायकी भाँति अत्यधिक विलाप करने लगी॥ ३-६॥ |
| तामन्तरिक्षादशरीरिणी वाक्<br>प्रोवाच मा राजपत्नीह रोदीः। | उस समय आकाशसे अशरीरिणीवाणीने उससे |
अध्याय ७२ ] स्वायम्भुव, स्वारोचिष, उत्तम, तामस, रैवत चाक्षुष-मन्वन्तरोंके मरुद्गणकी उत्पत्तिका वर्णन ३५७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यद्यस्ति ते सत्यमनुत्तमं तदा<br>भवत्वयं ते पतिना सहाग्निः॥ ७<br>सा तां वाणीमन्तरिक्षान्निशम्य<br>प्रोवाचेदं राजपुत्री सुदेवा।<br>शोचाम्येनं पार्थिवं पुत्रहीनं<br>नैवात्मानं मन्दभाग्यं विहङ्ग॥ ८<br>सोऽथाब्रवीन्मा रुदस्वायताक्षि<br>पुत्रास्त्वत्तो भूमिपालस्य सप्त।<br>भविष्यन्ति वह्निमारोह शीघ्रं<br>सत्यं प्रोक्तं श्रद्दधत्स्व त्वमद्य॥ ९<br>इत्येवमुक्ता खचरेण बाला<br>चितौ समारोप्य पतिं वराहम्।<br>हुताशमासाद्य पतिव्रता तं<br>संचिन्तयन्ती ज्वलनं प्रपन्ना॥ १० | कहा—राजपत्नि! तुम रोओ मत। यदि तुम्हारा सत्य (पति-सेवा)-व्रत श्रेष्ठ है तो यह अग्नि पतिके साथ तुम्हारे हितके लिये हो। आकाशसे हुई उस वाणीको सुनकर राजपुत्री सुदेवाने कहा—आकाशचारिन्! मैं इस सुत-हीन राजाके लिये सोच कर रही हूँ; न कि अपने दुर्भाग्यके लिये। उस आकाशवाणीने फिर कहा—विशालनयने! तुम रोओ मत। तुम्हारे गर्भसे तो राजाको सात पुत्र होंगे। तुम शीघ्र चितापर चढ़ जाओ। मैं सच कहता हूँ। इसपर तुम आज विश्वास करो। आकाशचारीके ऐसा कहनेपर उस बालाने श्रेष्ठ पतिको चितापर रखा और पतिका ध्यान करती हुई जलती चितामें प्रवेश कर वह पतिव्रता अग्निकी शरणमें चली गयी (जल मरी) ॥ ७–१०॥ |
| ततो मुहूर्तान्नृपतिः श्रिया युतः<br>समुत्तस्थौ सहितो भार्ययाऽसौ।<br>खमुत्पपाताथ स कामचारी<br>समं महिष्या च सुनाभपुत्र्या॥ ११<br>तस्याम्बरे नारद पार्थिवस्य<br>जाता रजोग्ना महिषी तु गच्छतः।<br>स दिव्ययोगात् प्रतिसंस्थितोऽम्बरे<br>भार्यासहायो दिवसानि पञ्च॥ १२<br>ततस्तु षष्ठेऽहनि पार्थिवेन<br>रितुर्न वन्ध्योऽद्य भवेद् विचिन्त्य।<br>रराम तन्व्या सह कामचारी<br>ततोऽम्बरात् प्राच्यवतास्य शुक्रम्॥ १३<br>शुक्रोत्सर्गावसाने तु नृपतिर्भार्यया सह।<br>जगाम दिव्यया गत्या ब्रह्मलोकं तपोधन॥ १४ | उसके बाद क्षणभरमें शोभासे सम्पन्न वह राजा पत्नीके साथ उठा और सुनाभकी पुत्री अपनी राजरानीके साथ आकाशमें जाकर स्वच्छन्दतासे भ्रमण करने लगा। नारदजी! आकाशमें जाते हुए उस राजाकी रानी रजस्वला हो गयी। वह राजा दिव्ययोगसे आकाशमें भार्या (सुदेवा)-के साथ पाँच दिनोंतक रहा। उसके बाद छठे दिन आज ऋतु व्यर्थ न हो जाय—ऐसा सोचकर कामचारी राजा भार्याके साथ विहार करने लगा। उसके बाद आकाशसे उसका शुक्र स्खलित हो गया। तपोधन! शुक्र-त्याग करनेके पश्चात् राजा पत्नीके साथ दिव्यगतिसे ब्रह्मलोकको चला गया॥ ११–१४॥ |
| तदम्बरात् प्रचलितमभ्रवर्णं<br>शुक्रं समाना नलिनी वपुष्मती।<br>चित्रा विशाला हरितालिनी च<br>सप्तर्षिपत्न्यो ददृशुर्यथेच्छया॥ १५<br>तद् दृष्ट्वा पुष्करे न्यस्तं प्रत्यैच्छन्त तपोधन।<br>मन्यमानास्तदमृतं सदा यौवनलिप्सया॥ १६<br>ततः स्नात्वा च विधिवत् सम्पूज्य तान् निजान् पतीन्।<br>पतिभिः समनुज्ञाताः पपुः पुष्करसंस्थितम्॥ १७ | समाना, नलिनी, वपुष्मती, चित्रा, विशाला, हरिता एवं अलिनी—इन सात ऋषि-पत्नियोंने आकाशसे गिरते हुए अभ्रकके समान वर्णवाले शुक्रको इच्छाभर देखा। तपोधन! उसे देखकर उसको अमृत समझती हुई उन सबोंने स्थायी युवावस्था प्राप्त करनेकी लालसासे उसे कमलमें रख लिया। उसके बाद वे स्नान करके अपने-अपने पतियोंका पूजनकर उन पतियोंकी अनुमतिसे कमलमें रखे राजाके उस शुक्रको अमृत मानती हुई |
| ३५८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७२ |
|---|
| तच्छुक्रं पार्थिवेन्द्रस्य मन्यमानास्तदामृतम्।<br>पीतमात्रेण शुक्रेण पार्थिवेन्द्रोद्भवेन ताः॥ १८<br>ब्रह्मतेजोविहीनास्ता जाताः पत्यस्तपस्विनाम्।<br>ततस्तु तत्यजुः सर्वे सदोषास्ताश्च पत्नयः॥ १९ | पान कर गयीं। राजाके शुक्रका पान करते ही तपस्वियोंकी वे पत्नियाँ ब्रह्मतेजसे रहित हो गयीं। उसके बाद उन तपस्वी लोगोंने अपनी उन दोषिणी पत्नियोंका त्याग कर दिया॥ १५—१९॥ | | सुषुवुः सप्त तनयान् रुदतो भरवं मुने।<br>तेषां रुदितशब्देन सर्वमापूरितं जगत्॥ २०<br><br>अथाजगाम भगवान् ब्रह्मा लोकपितामहः।<br>समभ्येत्याब्रवीद् बालान् मा रुदध्वं महाबलाः॥ २१<br>मरुतो नाम यूयं वै भविष्यध्वं वियच्चराः।<br>इत्येवमुक्त्वा देवेशो ब्रह्मा लोकपितामहः॥ २२<br>तानादाय वियच्चारी मारुतानादिदेश ह।<br>ते त्वासन् मरुतस्त्वाद्या मनोः स्वायम्भुवेऽन्तरे॥ २३ | मुने! उन ऋषिकी पत्नियोंने भयंकर रुदन करते हुए सात पुत्रोंको जन्म दिया। उनकी रुलाई सारे संसारमें भर गयी। उसके बाद भगवान् लोकपितामह ब्रह्मा आ गये। बालकोंके समीप जाकर उन्होंने कहा—हे महाबलवानो! रोओ मत। तुम्हारा नाम मरुत् होगा। तुम आकाशमें विचरण करनेवाले होओगे। इतना कहकर लोकपितामह देवेश ब्रह्मा उन मरुतोंको लेकर आकाशमें चले गये और उन्हें (आकाशमें रहनेका) आदेश दे दिया। वे ही स्वायम्भुव मनुके समयमें 'आद्य मरुत्' हुए॥ २०—२३॥ | | स्वारोचिषे तु मरुतो वक्ष्यामि शृणु नारद।<br>स्वारोचिषस्य पुत्रस्तु श्रीमानासीत् क्रतुध्वजः॥ २४<br>तस्य पुत्राभवन् सप्त सप्ताच्चिः प्रतिमा मुने।<br>तपोऽर्थं ते गताः शैलं महामेरुं नरेश्वराः॥ २५<br>आराधयन्तो ब्रह्माणं पदमैन्द्रमथेप्सवः।<br>ततो विपश्चिन्नामाथ सहस्राक्षो भयातुरः॥ २६<br>पूतनामप्सरोमुख्यां प्राह नारद वाक्यवित्।<br>गच्छस्व पूतने शैलं महामेरुं विशालिनम्॥ २७ | नारदजी! अब मैं स्वारोचिष मन्वन्तरके मरुतोंका वर्णन करता हूँ, (उसे) सुनो। स्वारोचिषके पुत्र श्रीमान् क्रतुध्वज थे। मुने! उनके अग्निके समान सात पुत्र थे। वे सभी नरेश्वर तपस्या करनेके लिये महामेरुपर्वतपर चले गये। वे इन्द्रपदको प्राप्त करनेकी इच्छासे ब्रह्माकी आराधना करने लगे। उसके बाद बुद्धिमान् इन्द्र भयभीत हो गये। नारदजी! वक्ताके अभिप्रायको स्पष्टतः समझनेवाले इन्द्रने अप्सराओंमें प्रधान पूतनासे कहा—पूतने! तुम महान् विशाल मेरुपर्वतपर जाओ॥ २४—२७॥ | | तत्र तप्यन्ति हि तपः क्रतुध्वजसुता महत्।<br>यथा हि तपसो विघ्नं तेषां भवति सुन्दरि॥ २८<br>तथा कुरुष्व मा तेषां सिद्धिर्भवतु सुन्दरि।<br>इत्येवमुक्ता शक्रेण पूतना रूपशालिनी॥ २९<br>तत्राजगाम त्वरिता यत्रातप्यन्त ते तपः।<br>आश्रमस्याविदूरे तु नदी मन्दोदवाहिनी॥ ३०<br>तस्यां स्नातुं समायाताः सर्व एव सहोदराः।<br>साऽपि स्नातुं सुचार्वङ्गी त्ववतीर्णा महानदीम्॥ ३१ | वहाँ क्रतुध्वजके पुत्र महान् तप कर रहे हैं। सुन्दरि! उनके तपमें जिस प्रकार विघ्न हो तथा हे सुन्दरि! उन्हें सिद्धिकी प्राप्ति जैसे न हो सके—ऐसा उपाय करो। इन्द्रके कहनेपर रूपवती पूतना शीघ्र वहाँ गयी, जहाँ वे तपस्या कर रहे थे। आश्रमके पास ही मन्द जल-प्रवाहवाली नदी थी। सभी सगे भाई उस नदीमें स्नान करनेके लिये आये। वह सुन्दरी भी स्नान करनेके लिये उस महानदीमें उतरी॥ २८—३१॥ | | ददृशुस्ते नृपाः स्नातां ततश्चक्षुभिरे मुने।<br>तेषां च प्राच्यवच्छुक्रं तत्पपौ जलचारिणी॥ ३२<br>शङ्खिनी ग्राहमुख्यस्य महाशङ्खस्य वल्लभा।<br>तेऽपि विभ्रष्टतपसो जग्मू राज्यं तु पैतृकम्॥ ३३ | मुने! उन राजपुत्रोंने स्नान करती हुई उस पूतनाको देखा और वे क्षुभित हो गये; परिणामतः उनका शुक्रपात हो गया। मछलियोंमें प्रधान महाशङ्खकी प्रिया शङ्खिनीने उसे पी लिया। तपके भ्रष्ट हो जानेपर वे भी अपने |
अध्याय ७२ ] स्वायम्भुव, स्वारोचिष, उत्तम, तामस, रैवत चाक्षुष-मन्वन्तरोंके मरुद्गणकी उत्पत्तिका वर्णन ३५१
| सा चाप्सराः शक्रमेत्य याथातथ्यं न्यवेदयत्।<br>ततो बहुतिथे काले सा ग्राही शङ्खरूपिणी ॥ ३४<br>समुद्धृता महाजालैर्मत्स्यबन्धेन मानिनी।<br>स तां दृष्ट्वा महाशङ्खीं स्थलस्थां मत्स्यजीविकः ॥ ३५<br>निवेदयामास तदा ऋतुध्वजसुतेषु वै।<br>तथाऽभ्येत्य महात्मानो योगिनो योगधारिणः ॥ ३६ | पिताके राज्यमें चले गये। उस अप्सराने भी इन्द्रके पास जाकर उनसे सत्य तथ्यको बतला दिया। उसके बाद बहुत समयके पश्चात् किसी धीवरने महाजालद्वारा उस शङ्खरूपिणी मानिनी बड़ी मछलीको पकड़ लिया। मछलीसे जीवनका निर्वाह करनेवाले (धीवर)-ने भूमिपर पड़ी हुई उस महाशङ्खीको देखकर ऋतुध्वजके पुत्रोंसे निवेदित किया। योगको धारण करनेवाले वे महात्मा योगी उसके निकट गये॥ ३२-३६॥ |
| नीत्वा स्वमन्दिरं सर्वे पुरवाप्यां समुत्सृजन्।<br>ततः क्रमाच्छङ्खिनी सा सुषुवे सप्त वै शिशून् ॥ ३७<br>जातमात्रेषु पुत्रेषु मोक्षभावमगाच्च सा।<br>अमातृपितृका बाला जलमध्यविहारिणः ॥ ३८<br>स्तन्यार्थिनो वै रुरुदुरथाभ्यागात् पितामहः।<br>मा रुदध्वमितीत्याह मरुतो नाम पुत्रकाः ॥ ३९<br>यूयं देवा भविष्यध्वं वायुस्कन्धविचारिणः।<br>इत्येवमुक्त्वाथादाय सर्वांस्तान् दैवतान् प्रति ॥ ४०<br>नियोज्य च मरुन्मार्गे वैराजं भवनं गतः।<br>एवमासंश्च मरुतो मनोः स्वारोचिषेऽन्तरे ॥ ४१ | उन सभीने उसको अपने घर लाकर नगरके तालाबमें छोड़ दिया। उस शङ्खिनीने क्रमशः सात पुत्रोंको जन्म दिया। पुत्रोंका जन्म होते ही वह शङ्खिनी संसारसे बिदा हो गयी। अब बिना माता-पिताके वे बालक जलमें विचरण करने लगे। दूधके लिये वे विलखने लगे। उस समय वहाँ पितामह आ गये। उन्होंने 'मत रोओ' ऐसा कहा। इसीलिये उनका नाम मरुत् हुआ। 'तुमलोग वायुके कंधेपर विचरण करनेवाले देवता होगे' यह कहनेके बाद वे उन सभी देवताओंको ले जाकर उन्हें वायुमार्गमें नियुक्त कर ब्रह्मलोकको चले गये। इस प्रकार स्वारोचिष मनुके समयमें मरुत् हुए॥ ३७-४१॥ |
| उत्तमे मरुतो ये च ताञ्छृणुष्व तपोधन।<br>उत्तमस्यान्ववाये तु राजासीन्निषधाधिपः ॥ ४२<br>वपुष्मानिति विख्यातो वपुषा भास्करोपमः।<br>तस्य पुत्रो गुणश्रेष्ठो ज्योतिष्मान् धार्मिकोऽभवत् ॥ ४३<br>स पुत्रार्थी तपस्तेपे नदीं मन्दाकिनीमनु।<br>तस्य भार्या च सुश्रोणी देवाचार्यसुता शुभा ॥ ४४<br>तपश्चरणयुक्तस्य बभूव परिचारिका।<br>सा स्वयं फलपुष्पाम्बुसमित्कुशं समाहरत् ॥ ४५ | तपोधन ! उत्तम (मन्वन्तर)-में जो मरुत् थे, अब उनके विषयमें सुनिये। उत्तमके वंशमें शरीरसे सूर्यके सदृश वपुष्मान् नामके प्रसिद्ध निषधोंके एक राजा थे। उनका उत्तम गुणोंवाला ज्योतिष्मान् नामका एक धार्मिक पुत्र था। वह पुत्रकी कामनासे मन्दाकिनी नदीके किनारे तपस्या करने लगा। देवताओंके आचार्य बृहस्पतिकी सुन्दरी पुत्री उसकी कल्याणकारिणी पत्नी थी। वह उस तपस्वीकी सेविका बनी। वह स्वयं फल, पुष्प, जल, समिधा एवं कुश लाती थी॥ ४२-४५॥ |
| चकार पद्मपत्राक्षी सम्यक् चातिथिपूजनम्।<br>पतिं शुश्रूषमाणा सा कृशा धमनिसंतता ॥ ४६<br>तेजोयुक्ता सुचार्वङ्गी दृष्टा सप्तर्षिभिर्वने।<br>तां तथा चारुसर्वाङ्गीं दृष्ट्वाऽथ तपसा कृशाम् ॥ ४७<br>पप्रच्छुस्तपसो हेतुं तस्यास्तद्भर्तुरेव च।<br>साऽब्रवीत् तनयार्थाय आवाभ्यां वै तपः क्रिया ॥ ४८ | कमलदलके समान नयनोंवाली वह अच्छी तरह अतिथियोंका सत्कार करती थी। पतिकी सेवा करते हुए उसका शरीर दुबला हो गया तथा नाड़ियाँ दिखायी देने लगीं। सप्तर्षियोंने उस तेजस्विनी सर्वाङ्गसुन्दरीको वनमें देखा। तपसे दुर्बल उस सर्वाङ्गसुन्दरीको देखकर उन लोगोंने उसकी तथा उसके पतिकी तपस्याका कारण पूछा। उसने कहा—हम दोनों पुत्रके लिये तप कर रहे हैं। |
७५- त्रैलोक्य-लक्ष्मीका बलिके यहाँ आना, श्वेत लक्ष्मी आदिकी उत्पत्ति, निधियोंका वर्णन, जयश्रीका बलिमें मिलना और बलिकी समृद्धिका वर्णन
३६० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७२ ---|--- ते चास्यै वरदा ब्रह्मन् जाताः सप्त महर्षयः।<br>व्रजध्वं तनयाः सप्त भविष्यन्ति न संशयः ॥ ४९<br>युवयोर्गुणसंयुक्ता महर्षीणां प्रसादतः।<br>इत्येवमुक्त्वा जग्मुस्ते सर्व एव महर्षयः ॥ ५० | ब्रह्मन्! सातों महर्षियोंने उसे वर दिया—तुम जाओ; महर्षियोंकी कृपासे तुम दोनोंको निःसन्देह सात गुणवान् पुत्र होंगे। इस प्रकार कहकर वे सभी महर्षि चले गये॥ ४९–५०॥ स चापि राजर्षिरगात् सभार्यो नगरं निजम्।<br>ततो बहुतिथे काले सा राज्ञो महिषी प्रिया ॥ ५१<br>अवाप गर्भं तन्वङ्गी तस्मान्नृपतिसत्तमात्।<br>गुर्विण्यामथ भार्यायां ममरासौ नराधिपः ॥ ५२<br>सा चाप्यारोढुमिच्छन्ती भर्तारं वै पतिव्रता।<br>निवारिता तदामात्यैर्न तथापि व्यतिष्ठत ॥ ५३<br>समारोप्याथ भर्तारं चितायामारुहच्च सा।<br>ततोऽग्निमध्यात् सलिले मांसपेश्यपतन्मुने ॥ ५४<br>साऽम्भसा सुखशीतेन संसिक्ता सप्तधाऽभवत्।<br>तेऽजायन्ताथ मरुत उत्तमस्यान्तरे मनोः ॥ ५५ | वे राजर्षि भी अपनी पत्नीके सहित नगरमें गये। उसके बाद बहुत समय बीत जानेपर राजाकी उस प्रिय रानीने उन नृपतिश्रेष्ठसे गर्भ धारण किया। भार्याके गर्भिणी होनेपर वे राजा संसारसे चल बसे। उस पतिव्रताने अपने पतिके साथ चितापर आरूढ़ होनेकी इच्छा की। मन्त्रियोंने उसे रोका, परंतु वह रुकी नहीं। पतिको चितापर रखकर वह भी उसपर चढ़ गयी। मुने! उसके बाद अग्निके बीचसे जलमें एक मांसपेशी गिरी। अत्यन्त शीतल जलसे संसिक्त होनेपर वह (मांसपेशी) सात टुकड़ोंमें अलग-अलग हो गयी। वे ही टुकड़े उत्तम मनुके कालमें मरुत् हुए॥ ५१–५५॥ तामसस्यान्तरे ये च मरुतोऽप्यभवन् पुरा।<br>तानहं कीर्तयिष्यामि गीतनृत्यकलिप्रिय ॥ ५६<br>तामसस्य मनोः पुत्रो ऋतध्वज इति श्रुतः।<br>स पुत्रार्थी जुहावाग्नौ स्वमांसं रुधिरं तथा ॥ ५७<br>अस्थीनि रोमकेशांश्च स्नायुमज्जायकृद्घनम्।<br>शुक्रं च चित्रगौ राजा सुतार्थी इति नः श्रुतम् ॥ ५८ | हे गीतनृत्यकलिप्रिय (नारदजी)! पहले तामस मन्वन्तरमें जो मरुत् हुए (अब मैं) उनका वर्णन करूँगा। तामस मनुके पुत्र ऋतध्वज नामसे विख्यात थे। उन्होंने पुत्रकी अभिलाषासे अग्निमें अपने शरीरके मांस और रक्तका हवन किया। हमलोगों ने सुना है कि पुत्रके अभिलाषी (उन) राजाने अस्थि, रोम, केश, स्नायु, मज्जा, यकृत् और घने शुक्रकी अग्निमें आहुति दी॥ ५६–५८॥ सप्तस्वेवार्चिषु ततः शुक्रपातादनन्तरम्।<br>मा मा क्षिपस्वेत्यभवच्छब्दः सोऽपि मृतो नृपः ॥ ५९<br>ततस्तस्माद्धुतवहात् सप्त तत्तेजसोपमाः।<br>शिशवः समजायन्त ते रुदन्तोऽभवन् मुने ॥ ६०<br>तेषां तु ध्वनिमाकर्ण्य भगवान् पद्मसम्भवः।<br>समागम्य निवार्याथ स चक्रे मरुतः सुतान् ॥ ६१<br>ते त्वासन् मरुतो ब्रह्मंस्तामसे देवतागणाः।<br>येऽभवन् रैवते तांश्च शृणुष्व त्वं तपोधन ॥ ६२ | उसके बाद सातों अग्नियोंमें शुक्रपात होनेपर 'मत फेंको, मत फेंको' इस प्रकारका शब्द होने लगा। वे राजा भी मर गये। मुने! उसके बाद उस अग्निसे सात तेजस्वी शिशु उत्पन्न हुए और वे रोने लगे। उनके रोनेकी ध्वनि सुनकर भगवान् कमलयोनि (ब्रह्मा)-ने आकर मना किया और उन पुत्रोंको मरुत् नामका देवता बना दिया। ब्रह्मन्! वे ही तामस मन्वन्तरमें (मरुद्गण) नामक देवता हुए। हे तपोधन! रैवत मन्वन्तरमें जो (मरुद्गण) हुए उनका विवरण आगे सुनिये—॥ ५९–६२॥ रैवतस्यान्ववाये तु राजासीद् रिपुजिद् वशी।<br>रिपुजिन्नामतः ख्यातो न तस्यासीत् सुतः किल ॥ ६३ | रैवतके वंशमें शत्रुओंपर विजय प्राप्त करनेवाले संयमी रिपुजित् नामसे विख्यात एक राजा थे। उनको
अध्याय ७२ ] स्वायम्भुव, स्वारोचिष, उत्तम, तामस, रैवत चाक्षुष-मन्वन्तरोंके मरुद्गणकी उत्पत्तिका वर्णन ३६१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| स समाराध्य तपसा भास्करं तेजसां निधिम्।<br>अवाप कन्यां सुरतिं तां प्रगृह्य गृहं ययौ॥ ६४<br><br>तस्यां पितृगृहे ब्रह्मन् वसन्त्यां स पिता मृतः।<br>साऽपि दुःखपरीताङ्गी स्वां तनुं त्यक्तुमुद्यता॥ ६५<br><br>ततस्तां वारयामासुर्ऋषयः सप्त मानसाः।<br>तस्यामासक्तचित्तास्तु सर्व एव तपोधनाः॥ ६६ | पुत्र नहीं था। उन्होंने तपद्वारा तेजवनिधि सूर्यकी आराधना कर सुरति नामकी कन्या प्राप्त की और उसे लेकर वे घर चले गये। ब्रह्मन्! उस कन्याके पितृ-गृहमें रहते हुए पिताका देहावसान हो गया। वह भी शोकसे आकुल होकर अपने शरीरका परित्याग करनेके लिये तैयार हुई। उसके बाद सात मानस ऋषियोंने उसे मना किया। किंतु वे सभी तपोधन उसमें आसक्तचित्त हो गये थे॥ ६३-६६॥ |
| अपारयन्ती तद्दुःखं प्रज्वाल्याग्निं विवेश ह।<br>ते चापश्यन्त ऋषयस्तच्चित्ता भावितास्तथा॥ ६७<br><br>तां मृतामृषयो दृष्ट्वा कष्टं कष्टेति वादिनः।<br>प्रजग्मुर्ज्वलनाच्चापि सप्ताजायन्त दारकाः॥ ६८<br><br>ते च मात्रा विना भूता रुरुदुस्तान् पितामहः।<br>निवारयित्वा कृतवांल्लोकनाथो मरुद्गणान्॥ ६९<br><br>रैवतस्यान्तरे जाता मरुतोऽमी तपोधन।<br>शृणुष्व कीर्तयिष्यामि चाक्षुषस्यान्तरे मनोः॥ ७० | किंतु वह कन्या उस दुःखको सहन न कर सकनेके कारण आग जलाकर उसमें प्रवेश कर गयी। उसमें आसक्त तथा प्रभावित ऋषियोंने उसे देखा। उसे मरा हुआ देखकर वे ऋषि ‘दुःखकी बात है’, ‘दुःखकी बात है’ कहते हुए चले गये। उसके बाद उस अग्निसे सात पुत्र हुए। माताके अभावमें वे रोने लगे। लोकनाथ पितामह ब्रह्माने उन्हें (रोनेसे) रोककर मरुद्गणका पद दे दिया। तपोधन! वे ही रैवत मन्वन्तरमें मरुद्गण हुए। अब मैं चाक्षुष मनुके कालके मरुद्गणोंका वर्णन करूँगा, उसे सुनिये-॥ ६७-७०॥ |
| आसीन्मङ्किरिति ख्यातस्तपस्वी सत्यवाक् शुचिः।<br>सप्तसारस्वते तीर्थे सोऽतप्यत महत्त्पः॥ ७१<br><br>विघ्नार्थं तस्य तुषिता देवाः संप्रेषयन् वपुम्।<br>सा चाभ्येत्य नदीतीरे क्षोभयामास भामिनी॥ ७२<br><br>ततोऽस्य प्राच्यवच्छुक्रं सप्तसारस्वते जले।<br>तां चैवाप्यशपन्मूढां मुनिर्मङ्कणको वपुम्॥ ७३<br><br>गच्छ लब्धाऽसि मूढे त्वं पापस्यास्य महत् फलम्।<br>विध्वंसयिष्यति हयो भवतीं यज्ञसंसदि॥ ७४<br><br>एवं शप्त्वा ऋषिः श्रीमाञ्जगामाथ स्वमाश्रमम्।<br>सरस्वतीभ्यः सप्तभ्यः सप्त वै मरुतोऽभवन्॥ ७५<br><br>एतत् तवोक्ता मरुतः पुरा यथा<br>जाता वियद्व्याप्तिकरा महर्षे।<br>येषां श्रुते जन्मनि पापहानि-<br>र्भवेच्च धर्माभ्युदयो महान् वै॥ ७६ | मङ्कि नामसे विख्यात सत्यवादी और पवित्र एक तपस्वी थे। उन्होंने सप्तसारस्वततीर्थमें महान् तप किया था। देवताओंने उनकी तपस्यामें विघ्न डालनेके लिये ‘वपु’ नामकी अप्सराको भेजा। उस भामिनीने नदीके किनारे आकर मुनिको क्षोभित कर दिया। उसके बाद उनका शुक्र च्युत होकर सप्तसारस्वतके जलमें गिर गया। मुनि मङ्कणकने उस मूढ़ा वपुको भी शाप दे दिया। हे मूढ़े! चली जाओ। तुम इस पापका दारुण फल प्राप्त करोगी। यज्ञसंसद्में तुमको अश्व विध्वस्त करेगा। श्रीमान् ऋषि इस प्रकार शाप देकर अपने आश्रममें चले गये। उसके बाद सप्तसरस्वतियोंसे सात मरुत् उत्पन्न हुए। महर्षे! पूर्वकालमें आकाशव्यापी मरुद्गण जिस प्रकार उत्पन्न हुए थे, उसे मैंने आपसे कहा। इनका वर्णन सुननेसे पापका नाश तथा धर्मका महान् अभ्युदय होता है॥ ७१-७६॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें बहत्तरवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ७२ ॥
| ३६२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७३ |
|---|
तिहत्तरवाँ अध्याय
बलि, मय-प्रभृति दैत्योंका देवताओंके साथ युद्ध, कालनेमिके साथ विष्णुभगवान्का युद्ध और कालनेमिका वध
| पुलस्त्य उवाच | |
|---|---|
| पुलस्त्य उवाच<br>एतदर्थं बलिर्दैत्यः कृतो राजा कलिप्रिय।<br>मन्त्रप्रदाता प्रह्लादः शुक्रश्चासीत् पुरोहितः ॥ १<br><br>ज्ञात्वाऽभिषिक्तं दैतेयं विरोचनसुतं बलिम्।<br>दिदृक्षवः समायाताः समयाः सर्व एव हि ॥ २<br><br>तानागतानिरीक्ष्यैव पूजयित्वा यथाक्रमम्।<br>पप्रच्छ कुलजान् सर्वान् किंनु श्रेयस्करं मम ॥ ३<br><br>तमूचुः सर्व एवैनं शृणुष्व सुरमर्दन।<br>यत् ते श्रेयस्करं कर्म यदस्माकं हितं तथा॥ ४ | पुलस्त्यजी बोले—कलिप्रिय (नारदजी)! बलि दैत्यको इसीलिये राजा बनाया गया था। प्रह्लाद उसके परामर्श देनेवाले मन्त्री तथा शुक्राचार्य पुरोहित थे। विरोचनके पुत्र बलि दैत्यको राज्यपर अभिषिक्त हुआ जानकर मयके साथ सभी दैत्य उसे देखनेकी इच्छासे आये। उन (वहाँ) आये हुए अपने कुलपुरुषोंको देखकर (बलिने) यथाक्रम उनकी पूजा की एवं उनसे पूछा कि मेरे लिये क्या कल्याणकारी है? उन सभीने उससे कहा—देवमर्दन! तुम्हारे लिये जो कल्याणकारी और हमारे लिये हितकर कर्म है, उसे सुनो—॥ १-४॥ |
| पितामहस्तव बली आसीद् दानवपालकः।<br>हिरण्यकशिपुर्वीरः स शक्रोऽभूज्जगत्रये ॥ ५<br><br>तमागम्य सुरश्रेष्ठो विष्णुः सिंहवपुर्धरः।<br>प्रत्यक्षं दानवेन्द्राणां नखैस्तं हि व्यदारयत् ॥ ६<br><br>अपकृष्टं तथा राज्यमन्धकस्य महात्मनः।<br>तेषामर्थे महाबाहो शङ्करेण त्रिशूलिना ॥ ७<br><br>तथा तव पितृव्योऽपि जम्भः शक्रेण घातितः।<br>कुजम्भो विष्णुना चापि प्रत्यक्षं पशुवत् तव ॥ ८ | तुम्हारे पितामह, हिरण्यकशिपु बलवान्, वीर और दानवकुलके पालन करनेवाले थे। तीनों लोकोंके वे इन्द्र हो गये थे। किंतु सिंहशरीर धारणकर देवोंमें श्रेष्ठ श्रीविष्णुने उनके पास आकर श्रेष्ठ दानवोंके सामने ही उन्हें अपने नखोंसे विदीर्ण कर डाला। महाबाहो! त्रिशूल धारण करनेवाले शंकरने भी उन (देवों)-के लिये महान् बलशाली अन्धकका राज्य छीन लिया था। और इन्द्रने तुम्हारे चाचा (पिताके भाई) जम्भको मार दिया एवं विष्णुने तुम्हारे सामने कुजम्भको पशुकी तरह मार डाला॥ ५-८॥ |
| शम्भुः पाको महेन्द्रेण भ्राता तव सुदर्शनः।<br>विरोचनस्तव पिता निहतः कथयामि ते ॥ ९ | मैं तुमसे बतला दे रहा हूँ कि महेन्द्रेने शम्भु, पाक और तुम्हारे भाई सुदर्शन एवं तुम्हारे पिता विरोचनको मार डाला है। |
| श्रुत्वा गोत्रक्षयं ब्रह्मन् कृतं शक्रेण दानवः।<br>उद्योगं कारयामास सह सर्वैर्महासुरैः ॥ १०<br><br>रथैरन्ये गजैरन्ये वाजिभिश्चापरेऽसुराः।<br>पदातयस्तथैवान्ये जग्मुर्युद्धाय दैवतैः ॥ ११<br><br>मयोऽग्रे याति बलवान् सेनानाथो भयङ्करः।<br>सैन्यस्य मध्ये च बलिः कालनेमिश्च पृष्ठतः ॥ १२ | [पुलस्त्यजी कहते हैं कि] ब्रह्मन्! इन्द्रद्वारा किये गये अपने कुलका विनाश सुनकर दानव बलिने समस्त महान् असुरोंको युद्ध करनेके लिये तैयारी करनेकी प्रेरणा दी। फिर तो कुछ असुर रथोंपर, कुछ हाथियोंपर, कुछ घोड़ोंपर और कुछ पैदल ही देवताओंसे युद्ध करनेके लिये चल पड़े। सेनाके आगे-आगे भयङ्कर महाबलशाली सेनापति मय चल रहा था। सेनाके बीचमें |
| अध्याय ७३ ] | बलि, मय-प्रभृति दैत्योंका देवताओंके साथ युद्ध और कालनेमिका वध | ३६३ | | :--- | :--- |
| वामपार्श्वमवष्टभ्य शाल्वः प्रथितविक्रमः।<br>प्रयाति दक्षिणं घोरं तारकाख्यो भयङ्करः॥ १३ | बलि, पीछे कालनेमि, बायीं ओर प्रसिद्ध पराक्रमवाला शाल्व तथा दाहिनी बगलमें भयङ्कर तारक नामका असुर कुशलतासे चल रहा था॥ ९—१३॥ | | दानवानां सहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानि च।<br>सम्प्रायातानि युद्धाय देवैः सह कलिप्रिय॥ १४<br><br>श्रुत्वाऽसुराणामुद्योगं शक्रः सुरपतिः सुरान्।<br>उवाच याम दैत्यांस्तान् योद्धुं सबलसंयुतान्॥ १५<br><br>इत्येवमुक्त्वा वचनं सुरराट् स्यन्दनं बली।<br>समारुरोह भगवान् यतमातलिवाजिनम्॥ १६<br><br>समारूढे सहस्राक्षे स्यन्दनं देवतागणाः।<br>स्वं स्वं वाहनमारुह्य निश्चेरुर्युद्धकाङ्क्षिणः॥ १७ | कलिप्रिय (नारदजी) ! हजारों, दस-दस लाखों, (ही नहीं,) दस-दस करोड़ोंकी संख्यामें—असंख्य दैत्य देवताओंसे युद्ध करनेके लिये निकल पड़े। असुरोंकी (इस प्रकारकी) युद्ध करनेकी तैयारीको सुनकर देवताओंके स्वामी इन्द्रने देवताओंसे कहा—देवताओ! हम सब देवगण भी लड़ाई करनेके लिये दल-बलके साथ आये हुए दैत्योंसे लड़नेके लिये चलें। इस प्रकारकी घोषणा कर बलवान् भगवान् देवपति इन्द्र अपने सारथि मातलिद्वारा नियन्त्रित घोड़ोंवाले रथपर चढ़ गये। इन्द्रके रथपर चढ़ जानेपर देवतालोग भी अपने-अपने वाहनोंपर सवार होकर युद्धकी इच्छासे बाहर निकल चले॥ १४—१७॥ | | आदित्या वसवो रुद्राः साध्या विश्वेऽश्विनौ तथा।<br>विद्याधरा गुह्यकाश्च यक्षराक्षसपन्नगाः॥ १८<br><br>राजर्षयस्तथा सिद्धा नानाभूताश्च संहताः।<br>गजानन्ये रथानन्ये हयानन्ये समारुहन्॥ १९<br><br>विमानानि च शुभ्राणि पक्षिवाहानि नारद।<br>समारुह्याद्रवन् सर्वे यतो दैत्यबलं स्थितम्॥ २०<br><br>एतस्मिन्नन्तरे धीमान् वैनतेयः समागतः।<br>तस्मिन् विष्णुः सुरश्रेष्ठ अधिरुह्य समभ्यगात्॥ २१ | आदित्य, वसु, रुद्र, साध्य, विश्वेदेव, अश्विनीकुमार, विद्याधर, गुह्यक, यक्ष, राक्षस, पन्नग, राजर्षि, सिद्ध तथा अनेक प्रकारके भूत एकत्र हो गये। कुछ हाथियोंपर, कुछ रथोंपर और कुछ घोड़ोंपर आरूढ़ हुए। नारदजी! कुछ देवगण पक्षियोंद्वारा वाहित होनेवाले उज्ज्वल विमानोंपर चढ़कर वहाँ पहुँच गये, जहाँ दैत्योंकी सेना (पहलेसे) डटी हुई थी। इसी समय बुद्धिमान् गरुड़जी आ गये। देवोंमें श्रेष्ठ विष्णु उनपर आरूढ़ होकर आ गये॥ १८—२१॥ | | तमागतं सहस्राक्षस्त्रैलोक्यपतिमव्ययम्।<br>ववन्द मूर्ध्नावनतः सह सर्वैः सुरोत्तमैः॥ २२<br><br>ततोऽग्रे देवसैन्यस्य कार्तिकेयो गदाधरः।<br>पालयञ्जघनं विष्णुर्याति मध्ये सहस्रदृक्॥ २३<br><br>वामं पार्श्वमवष्टभ्य जयन्तो व्रजते मुने।<br>दक्षिणं वरुणः पार्श्वमवष्टभ्याव्रजद् बली॥ २४<br><br>ततोऽमराणां पृतना यशस्विनी<br>स्कन्देन्द्रविष्ण्वम्बुपसूर्यपालिता ।<br>नानास्त्रशस्त्रोद्यतदोःसमूहा<br>समाससादारिबलं महीध्रे॥ २५ | फिर तो हजार आँखोंवाले इन्द्रने सभी देवताओंके साथ सिर झुकाकर उन आये हुए तीनों लोकोंके स्वामी नित्य (विष्णुभगवान्)-की वन्दना की। उसके बाद कार्तिकेय देवसेनाके अग्रभागकी, गदाधारी श्रीविष्णु सेनाके पीछे भागकी और सहस्रलोचन इन्द्र बीचभागकी रक्षा करते हुए चलने लगे। नारद मुने! जयन्त बायीं ओरकी सेनाको समेटकर चले एवं बलवान् वरुण दाहिनी बगलकी सेनाको समेटकर चले। उसके बाद नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंको धारण करनेवालोंसे गठित और स्कन्द, विष्णु, वरुण एवं सूर्यसे संरक्षित देवोंकी यशस्विनी सेना शत्रुसैन्यके निकट पर्वतपर पहुँच गयी॥ २२—२५॥ | | उदयाद्रितटे रम्ये शुभे समशिलातले।<br>निर्वृक्षे पक्षिरहिते जातो देवासुरो रणः॥ २६ | उदयाचलके वृक्ष एवं पक्षियोंसे रहित रमणीय शुभ एवं समतल पथरीले मैदानमें देवों और दैत्योंका |
७६- प्रायश्चित्त-हेतु इन्द्रकी तपस्या, माताके आश्रममें आना, अदितिकी तपस्या और वासुदेवकी स्तुति, वासुदेवका अदितिके पुत्र बननेका आश्वासन और स्वतेजसे अदितिके गर्भमें प्रवेश
३६४ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ७३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| संनिपातस्तयो रौद्रः सैन्ययोरभवन्मुने।<br>महीधरोत्तमे पूर्वं यथा वानरहस्तिनोः॥ २७<br><br>रणरेणू रथोद्भूतः पिङ्गलो रणमूर्धनि।<br>संध्यानुरक्तः सदृशो मेघः खे सुरतापस॥ २८<br><br>तदासीत् तुमुलं युद्धं न प्राज्ञायत किंचन।<br>श्रूयते त्वनिशं शब्दश्छिन्धि भिन्धीति सर्वतः॥ २९ | भारी युद्ध हुआ। मुनि नारदजी! पहले समयमें जैसा युद्ध बन्दर एवं हाथियोंके बीच हुआ था, वैसा ही घमासान संग्राम उन दोनों सेनाओंमें हुआ। सुरतापस! रथसे उड़ी हुई युद्धकी पिङ्गल वर्णकी धूल युद्ध-भूमिके ऊपर आकाशमें स्थित सन्ध्याकालके लाल बादलकी भाँति लग रही थी। उस समय चल रहे घनघोर युद्धमें कुछ भी नहीं जाना जा रहा था। चारों ओर लगातार '(काटकर) टुकड़े-टुकड़े कर दो', 'विदीर्ण कर दो' के शब्द ही सुनायी पड़ रहे थे॥ २६-२९॥ |
| ततो विशसनो रौद्रो दैत्यानां दैवतैः सह।<br>जातो रुधिरनिष्यन्दो रजःसंयमनात्मकः॥ ३०<br><br>शान्ते रजसि देवाद्यास्तद् दानवबलं महत्।<br>अभिद्रवन्ति सहिताः समं स्कन्देन धीमता॥ ३१<br><br>निजघ्नुर्दानवान् देवाः कुमारभुजपालिताः।<br>देवान् निजघ्नुर्दैत्याश्च मयगुप्ताः प्रहारिणः॥ ३२<br><br>ततोऽमृतरसास्वादाद् विना भूताः सुरोत्तमाः।<br>निर्जिताः समरे दैत्यैः समं स्कन्देन नारद॥ ३३ | उसके बाद देवोंके साथ दैत्योंकी भयङ्कर मार-काटसे उत्पन्न रक्तप्रवाहकी धारा बह चली, जो धूलको शान्त करनेवाली हो गयी—रक्त और धूल मिलकर कीच बन गयी। धूलके शान्त हो जानेपर देवता आदि बुद्धिमान् कार्तिकेयके साथ बड़े दानव-दलपर टूट पड़े। कुमार कार्तिकेयके बाहुबलसे रक्षित देवताओंने दैत्योंका हनन किया और मयके द्वारा रक्षित दैत्योंने प्रहार करते हुए देवताओंको मारा। किंतु नारदजी! उसके बाद अमृतरसका आस्वाद न लेने—अमृत न पीनेके कारण कार्तिकेयके सहित श्रेष्ठ देवता युद्धमें दैत्योंसे पराजित हो गये॥ ३०-३३॥ |
| विनिर्जितान् सुरान् दृष्ट्वा वैनतेयध्वजोऽरिहा।<br>शार्ङ्गमानम्य बाणौघैर्निजघान ततस्ततः॥ ३४<br><br>ते विष्णुना हन्यमानाः पतत्रिभिरयोमुखैः।<br>दैतेयाः शरणं जग्मुः कालनेमिं महासुरम्॥ ३५<br><br>तेभ्यः स चाभयं दत्त्वा ज्ञात्वाऽजेयं च माधवम्।<br>विवृद्धिमगमद् ब्रह्मन् यथा व्याधिरुपेक्षितः॥ ३६<br><br>यं यं करेण स्पृशति देवं यक्षं सकिन्नरम्।<br>तं तमादाय चिक्षेप विस्तृते वदने बली॥ ३७ | देवताओंको पराजित हुआ देखकर शत्रुओंका दमन करनेवाले गरुडध्वज विष्णु शार्ङ्गधनुषको चढ़ाकर चारों ओर बाणोंकी वर्षा करने लगे। श्रीविष्णुद्वारा लोहेके मुँहवाले बाणोंसे मारे जा रहे दैत्य कालनेमि नामके महान् असुरकी शरणमें गये। ब्रह्मन्! उन्हें (दैत्योंको) अभय दान देकर और माधव (विष्णु)-को अजेय जानकर भी (वह) उपेक्षित व्याधिके सदृश (घमण्डमें) बढ़ने लगा। बलवान् वह कालनेमि जिस देवता, यक्ष या किन्नरको हाथसे छू (पकड़) लेता था उसे लेकर अपने फैले मुँहमें झोंक देता था॥ ३४-३७॥ |
| संरम्भाद् दानवेन्द्रो विमृदति दितिजैः<br> संयुतो देवसैन्यं<br>सेन्द्रं सार्कं सचन्द्रं करचरणनखै-<br> रस्त्रहीनोऽपि वेगात्।<br>चक्रैर्वैश्वानराभैस्तववनिगगनयो-<br> स्तिर्यगूर्ध्वं समन्तात्<br>प्राप्तेऽन्ते कालवह्नेर्जगदखिलमिदं<br> रूपमासीद् दिधक्षोः॥ ३८ | वह दैत्येन्द्र कालनेमि बिना अस्त्रका था; फिर भी दानवोंके साथ मिलकर क्रोध करके हाथ, पैर और नखके प्रहारसे ही इन्द्र, सूर्य और चन्द्रमाके साथ देवसेनाको तेजीसे मारने लगा। वह आगके समान चक्रोंसे आकाश एवं पृथ्वीपर नीचे-ऊपर चारों ओर वार करने लगा। उस समय उसका रूप प्रलय-कालमें समस्त जगत्को दग्ध करनेवाली आग (प्रलयाग्नि)-के समान था। |
| अध्याय ७३ ] | बलि, मय-प्रभृति दैत्योंका देवताओंके साथ युद्ध और कालनेमिका वध | ३६५ | | :--- | :--- | | तं दृष्ट्वा वर्द्धमानं रिपुमतिबलिनं देवगन्धर्वमुख्याः<br>सिद्धाः साध्याश्विमुख्या भयतरलदृशः प्राद्रवन् दिक्षु सर्वे।<br>पोप्लूयन्तश्च दैत्या हरिममरगणैरर्चितं चारुमौलिं<br>नानाशास्त्रास्त्रपातैर्विगलितयशसं चक्रुरुत्सिक्तदर्पाः ॥ ३९<br>तानित्थं प्रेक्ष्य दैत्यान् मयबलिपुरगान् कालनेमिप्रधानान्<br>बाणैराकृष्य शार्ङ्गं त्वनवरतमुरोभेदिभिर्वज्रकल्पैः ।<br>कोपादारक्तदृष्टिः सरथगजहयान् दृष्टिनिर्धूतवीर्यान्<br>नाराचाख्यैः सुपुङ्खैर्जलद इव गिरीन् छादयामास विष्णुः ॥ ४०<br>तैर्बाणैश्छाद्यमाना हरिकरनुदितैः कालदण्डप्रकाशै-<br>र्नाराचैरर्धचन्द्रैर्बलिमयपुरगा भीतभीतास्त्वरन्तः ।<br>प्रारम्भे दानवेन्द्रं शतवदनमथो प्रेषयन् कालनेमिं<br>स प्रायाद् देवसैन्यप्रभुममितबलं केशवं लोकनाथम् ॥ ४१ | उस बलिष्ठ शत्रुको बढ़ते देखकर देवता, गन्धर्व, सिद्ध, साध्य, अश्विनीकुमार आदि भयसे इधर-उधर (देखते हुए घबड़ाकर) चारों ओर भागने लगे। उछलते-कूदते हुए दैत्य अत्यन्त घमण्डके साथ देवोंसे पूजित सुन्दर मुकुटवाले विष्णुभगवान्के सामने जाकर अनेक प्रकारके शस्त्रास्त्रोंके आघातसे उनके (अजेयत्ववाले) यशको समाप्त करने लगे—विष्णुकी पराजय मानने लगे। इस प्रकार प्रहार कर रहे मय, बलि एवं कालनेमि आदि दैत्योंको देखकर विष्णुके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये। फिर तो उन्होंने अपनी दृष्टिसे ही रथ, हाथी और घोड़ोंको शक्ति और पराक्रमसे रहित कर दिया तथा उसी तरह सुन्दर पंखोंवाले लोहेके बने अर्द्धचन्द्रके समान 'नाराच' बाणोंसे पर्वतको ढक दिया, जैसे मेघ पर्वतको ढक देते हैं। विष्णुके हाथोंसे छोड़े गये कालदण्डके समान अर्धचन्द्राकार उन लोहेके बने 'नाराच' बाणोंसे ढके हुए बलि एवं मय आदि दैत्योंने डरकर तुरंत पहले दानवेन्द्र शतमुख कालनेमिको प्रेषित किया। वह अति बलवान् देव सेनापति लोकनाथ केशवके सामने उपस्थित हुआ॥ ३८-४१॥ | | तं दृष्ट्वा शतशीर्षमुद्यतगदं शैलेन्द्रशृङ्गाकृतिं<br>विष्णुः शार्ङ्गमपास्य सत्वरमथो जग्राह चक्रं करे।<br>सोऽप्येनं प्रसमीक्ष्य दैत्यविटपप्रच्छेदनं मानिनं<br>प्रोवाचाथ विहस्य तं च सुचिरं मेघस्वनो दानवः ॥ ४२ | गदा उठाये हुए सौ सिरवाले पर्वतशृंगके समान कालनेमिको देखकर विष्णुने (अपने) शार्ङ्गधनुषको छोड़कर हाथमें जल्दीसे चक्रको ले लिया। इनको देखकर बहुत देरतक जोरसे हँसते हुए मेघके समान बोलनेवाले उस कालनेमि दानवने दैत्यरूपी वृक्षोंके | | अयं स दनुपुत्रसैन्यवित्रासकृद्रिपुः<br>परमकोपितः स मधोर्विघातकृत्।<br>हिरण्यनयनान्तकः कुसुमपूजारतिः<br>क्व याति मम दृष्टिगोचरे निपतितः खलः ॥ ४३ | काटनेवाले सुख-दुःखकी परवाह न करनेवाले मनस्वी हरिसे कहा—यही दानव-सेनाको डरानेवाला शत्रु, अत्यन्त क्रोधी, मधुको मारनेवाला, हिरण्याक्षका वध करनेवाला और फूलोंसे की गयी पूजासे प्रसन्न होनेवाला है। यह खल मेरी आँखोंके सामने आकर अब कहाँ जा सकता | | यद्येष संप्रति ममाहवमभ्युपैति<br>नूनं न याति निलयं निजम्बुजाक्षः।<br>मन्मुष्टिपिष्टशिथिलाङ्गमुपात्तभस्म<br>संद्रक्ष्यते सुरजनो भयकातराक्षः ॥ ४४ | है। यह कमलनयन यदि इस समय मेरे साथ युद्ध करे तो अपने घर नहीं जा सकेगा और तब देवतालोग मेरी मुट्ठीमें पिसनेसे शिथिल अङ्गोंवाले इस (विष्णु)-को भयसे कातर नेत्रोंसे धूलिधूसरित हुआ देखेंगे। |
| ३६६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७४ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| इत्येवमुक्त्वा मधुसूदनं वै<br> स कालनेमिः स्फुरिताधरोष्ठः।<br>गदां खगेन्द्रोपरि जातकोपो<br> मुमोच शैले कुलिशं यथेन्द्रः॥ ४५<br>तामापतन्तीं प्रसमीक्ष्य विष्णु-<br> र्घोरा गदां दानवबाहुमुक्ताम्।<br>चक्रेण चिच्छेद सुदुर्गतस्य<br> मनोरथं पूर्वकृतेव कर्म॥ ४६ | मधुसूदन भगवान् विष्णुसे ऐसा कहकर क्रोधसे अधरोष्ठको फड़काते हुए कालनेमिने, गरुड़पर अपनी गदा इस प्रकार फेंकी जैसे इन्द्र पर्वतपर वज्र फेंकते हैं। भगवान् विष्णुने दानवके हाथसे छूटी हुई उस भयदायिनी गदाको आते देखकर चक्रसे उसे ऐसे नष्ट कर दिया जैसे पूर्वकृत कर्म भाग्यहीन मनुष्यके मनोरथको नष्ट कर देता है॥ ४२—४६॥ |
| गदां छित्त्वा दानवाभ्याशमेत्य<br> भुजौ पीनौ सम्प्रचिच्छेद वेगात्।<br>भुजाभ्यां कृत्ताभ्यां दग्धशैलप्रकाशः<br> संदृश्येताप्यपरः कालनेमिः॥ ४७<br>ततोऽस्य माधवः कोपाच्छिरश्चक्रेण भूतले।<br>छित्त्वा निपातयामास पक्वं तालफलं यथा॥ ४८<br>तथा विबाहुर्विशिरा मुण्डतालो यथा वने।<br>तस्थौ मेरुरिवाकम्प्यः कबन्धः क्ष्माधरेश्वरः॥ ४९<br>तं वैनतेयोऽप्युरसा खगोत्तमो<br> निपातयामास मुने धरण्याम्।<br>यथाऽम्बराद् बाहुशिरः प्रनष्ट-<br> बलं महेन्द्रः कुलिशेन भूम्याम्॥ ५०<br>तस्मिन् हते दानवसैन्यपाले<br> सम्पीड्यमानास्त्रिदशैस्तु दैत्याः।<br>विमुक्तशस्त्रात्तकचर्मवस्त्राः<br> सम्प्राद्रवन् बाणमृतेऽसुरेन्द्राः॥ ५१ | गदाको काटकर विष्णुभगवान् दानवके निकट चले गये और उन्होंने शीघ्रतासे उसकी मोटी-मोटी बाहुओंको काट डाला। भुजाओंके कट जानेपर कालनेमि दूसरे दग्ध पर्वतके समान दिखलायी पड़ने लगा। उसके बाद माधव (लक्ष्मीपति)-ने क्रोधपूर्वक चक्रसे उसके सिरको काटकर पके हुए ताड़के फलके समान धरतीपर गिरा दिया। वनमें ढूँठे तरकुलके समान बाहुओं एवं सिरसे हीन कबन्ध अचल पर्वतराज मेरुके समान खड़ा रहा। मुने! जैसे महेन्द्रने वज्रसे बाँह और सिररहित बलको पृथिवीपर गिराया था, उसी प्रकार पक्षिश्रेष्ठ गरुड़ने अपनी छातीसे धक्का देकर उस (कबन्ध)-को पृथ्वीपर गिरा दिया। उस दानव-सेनापति (कालनेमि)-के मारे जानेपर बाणासुरके सिवा देवोंसे अत्यन्त पीड़ित सभी दैत्य शस्त्र, पट्टा, ढाल और वस्त्रको छोड़कर भाग गये॥ ४७—५१॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें तिहत्तरवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ७३॥
चौहत्तरवाँ अध्याय
बलि-बाणका देवताओंसे युद्ध, बलिकी विजय, प्रह्लादका स्वर्गमें आना, बलिको प्रह्लादका उपदेश
| पुलस्त्य उवाच | पुलस्त्यजी बोले— |
|---|---|
| संनिवृत्ते ततो बाणे दानवाः सत्वरं पुनः।<br>निवृत्ता देवतानां च सशस्त्रा युद्धलालसाः॥ १ | —उसके बाद बाणासुरके लौट आनेपर फिर दानव तुरंत शस्त्र लेकर देवताओंसे युद्ध करनेकी इच्छासे लौट पड़े। |
| विष्णुरप्यमितौजस्तं ज्ञात्वाऽजेयं बलेः सुतम्।<br>प्राह्यामन्त्र्य सुरान् सर्वान् युध्यध्वं विगतज्वराः॥ २ | अत्यधिक तेजस्वी विष्णुने बलिके पुत्र बाणको अजेय जान करके देवताओंको बुलाकर कहा—आपलोग निर्भय होकर (सतर्कतासे) |
अध्याय ७४] बलि-बाणका देवताओंसे युद्ध, बलिकी विजय, प्रह्लादका स्वर्गमें आना ३६७
| विष्णुनाऽथ समादिष्टा देवाः शक्रपुरोगमाः।<br>युयुधुर्दानवैः सार्धं विष्णुस्त्वन्तरधीयत॥ ३<br><br>माधवं गतमाज्ञाय शुक्नो बलिमुवाच ह।<br>गोविन्देन सुरास्त्यक्तास्त्वं जयस्वाधुना बले॥ ४<br>स पुरोहितवाक्येन प्रीतो याते जनार्दने।<br>गदामादाय तेजस्वी देवसैन्यमभिद्रुतः॥ ५<br>बाणो बाहुसहस्रेण गृह्य प्रहरणान्यथ।<br>देवसैन्यमभिद्रुत्य निजघान सहस्रशः॥ ६<br>मयोऽपि मायामास्थाय तैस्तै रूपान्तरैर्मुने।<br>योधयामास बलवान् सुराणां च वरूथिनीम्॥ ७<br>विद्युज्जिह्वः पारिभद्रो वृषपर्वा शतेक्षणः।<br>विपाको विक्षरः सैन्यं तेऽपि देवानुपाद्रवन्॥ ८<br>ते हन्यमाना दितिजैर्देवाः शक्रपुरोगमाः।<br>गते जनार्दने देवे प्रायशो विमुखाऽभवन्॥ ९<br>तान् प्रभग्नान् सुरगणान् बलिबाणपुरोगमाः।<br>पृष्ठतश्चाद्रवन् सर्वे त्रैलोक्यविजिगीषवः॥ १०<br>सम्बाध्यमाना दैतेयैर्देवाः सेन्द्रा भयातुराः।<br>त्रिविष्टपं परित्यज्य ब्रह्मलोकमुपागताः॥ ११<br>ब्रह्मलोकं गतेष्वित्थं सेन्द्रेष्वपि सुरेषु वै।<br>स्वर्गभोक्ता बलिर्जातः सपुत्रभ्रातृबान्धवः॥ १२<br>शक्रोऽभूद् भगवान् ब्रह्मन् बलिबाणो यमोऽभवत्।<br>वरुणोऽभून्मयः सोमो राहुर्ह्लादो हुताशनः॥ १३<br><br>स्वर्भानुरभवत् सूर्यः शुक्रश्चासीद् बृहस्पतिः।<br>येऽन्येऽप्यधिकृता देवास्तेषु जाताः सुरारयः॥ १४<br><br>पञ्चमस्य कलेरादौ द्वापरान्ते सुदारुणः।<br>देवासुरोऽभूत् संग्रामो यत्र शक्रोऽप्यभूद् बलिः॥ १५<br><br>पातालाः सप्त तस्यासन् वशे लोकत्रयं तथा।<br>भूर्भुवःस्वरिति ख्यातं दशलोकाधिपो बलिः॥ १६<br>स्वर्गे स्वयं निवसति भुञ्जन् भोगान् सुदुर्लभान्।<br>तत्रोपासन्त गन्धर्वा विश्वावसुपुरोगमाः॥ १७ | युद्ध कीजिये। विष्णुसे आदेश पाकर इन्द्र आदि देवता दानवोंके साथ युद्ध करने लगे। किंतु विष्णु अदृश्य हो गये। विष्णुको वहाँसे चला गया जानकर शुक्रने बलिसे कहा—बले! विष्णुने देवताओंको अकेले युद्धके लिये छोड़ दिया है। अब तुम जय प्राप्त करो॥ १-४॥<br><br>दुष्टजनोंको ताड़ना देनेवाले भगवान् विष्णुके चले जानेपर तेजस्वी बलि पुरोहित (शुक्राचार्य)-के वाक्यसे हर्षित हो गदा लेकर देवसेनाकी ओर दौड़ा। बाणासुरने हजार हाथोंमें अस्त्र-शस्त्र लेकर देवसेनापर चढ़ाई कर दी और हजारोंका वध कर दिया। मुने! बलवान् मय दानव भी मायाके द्वारा विभिन्न रूपोंको धारणकर अमरोंकी सेनाके साथ युद्ध करने लगा। विद्युज्जिह्व, पारिभद्र, वृषपर्वा, शतेक्षण, विपाक तथा विक्षर भी देवताओंकी सेनापर टूट पड़े॥ ५-८॥<br><br>भगवान् विष्णुके चले जानेपर इन्द्र आदि देवता दैत्योंके द्वारा मारे जानेपर युद्धसे पराङ्मुख हो गये। तीनों लोकोंपर विजय पानेकी इच्छावाले बलि एवं बाण आदि सभी (दैत्य) भागते हुए देवताओंके पीछे दौड़ पड़े। दैत्योंके द्वारा पीड़ित इन्द्र आदि देवता डरकर और स्वर्गको छोड़कर ब्रह्मलोक चले गये। फिर तो इन्द्रके साथ ही देवताओंके ब्रह्मलोक चले जानेपर बलि अपने पुत्र, भाई और बान्धवोंके साथ स्वर्गका भोक्ता हो गया॥ ९-१२॥<br><br>ब्रह्मन्! भाग्यशाली बलि इन्द्र हुआ और बाण यम बना। मय दानव वरुण बन गया, राहु चन्द्र बना और ह्लाद अग्नि बन गया। केतु सूर्य बना और शुक्राचार्य बृहस्पति बन गये। इसी प्रकार अन्य विभिन्न अधिकार-प्राप्त देवताओंके पदोंपर असुरोंने अधिकार जमा लिया। पाँचवें कलियुगके प्रारम्भ और द्वापरयुगके आखिरी भागमें देवताओं और दैत्योंका भयङ्कर युद्ध हुआ, जब कि बलि इन्द्र बन गया। सातों पाताल और भूः, भुवः, स्वः नामके प्रसिद्ध तीनों लोक उसके वशमें हो गये थे। इस प्रकार बलि दस लोकोंका शासक बन गया था॥ १३-१६॥<br><br>इन्द्र बना हुआ बलि अत्यन्त दुर्लभ भोगोंको स्वयं भोगता हुआ स्वर्गमें रहने लगा। वहाँ विश्वावसु आदि |
७७- प्रह्लादसे अदितिके गर्भमें विष्णुके प्रविष्ट होनेकी बात जानकर बलिका विष्णुको दुर्वचन, प्रह्लादद्वारा बलिको शाप और अनुनय करनेपर उपदेश
| ३६८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७४ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तिलोत्तमाद्याप्सरसो नृत्यन्ति सुरतापस।<br>वादयन्ति च वाद्यानि यक्षविद्याधरादयः॥ १८<br><br>विविधानपि भोगांश्च भुञ्जन् दैत्येश्वरो बलिः।<br>सस्मार मनसा ब्रह्मन् प्रह्लादं स्वपितामहम्॥ १९<br><br>संस्मृतो नृमणा चासौ महाभागवतोऽसुरः।<br>समभ्यागात् त्वरायुक्तः पातालात् स्वर्गमव्ययम्॥ २० | गन्धर्व उसकी सेवा करने लगे। देवर्षे! तिलोत्तमा आदि अप्सराएँ (उसे प्रसन्न करनेके लिये) नृत्य किया करती थीं और यक्ष तथा विद्याधर आदि बाजे बजाते थे। ब्रह्मन्! विविध भोगोंका भोग करते हुए दैत्येश्वर बलिने अपने पितामह प्रह्लादका मनसे स्मरण किया। पौत्र (बलि)-के स्मरण करते ही वे महान् भागवत (विष्णुके परम भक्त) असुर प्रह्लादजी पातालसे अक्षय स्वर्गलोकमें चले आये॥ १७—२०॥ |
| तमागतं समीक्ष्यैव त्यक्त्वा सिंहासनं बलिः।<br>कृताञ्जलिपुटो भूत्वा ववन्दे चरणावुभौ॥ २१<br><br>पादयोः पतितं वीरं प्रह्लादस्त्वरितो बलिम्।<br>समुत्थाप्य परिष्वज्य विवेश परमासने॥ २२<br><br>तं बलिः प्राह भोस्तात त्वत्प्रसादात् सुरा मया।<br>निर्जिताः शक्रराज्यं च हृतं वीर्यबलान्मया॥ २३<br><br>तदिदं तात मद्वीर्यविनिर्जितसुरोत्तमम्।<br>त्रैलोक्यराज्यं भुङ्क्ष्व त्वं मयि भृत्ये पुरःस्थिते॥ २४ | उन्हें आया हुआ देखते ही बलिने सिंहासन छोड़कर और हाथ जोड़कर उनके चरणोंकी वन्दना की। प्रह्लाद चरणोंमें पड़े हुए वीर बलिको जल्दीसे उठाकर और गले लगाकर उचित सुन्दर आसनपर बैठ गये। बलिने उनसे कहा—अये तात! मैंने आपके पुण्य-प्रसादसे (प्राप्त) पराक्रम और बलसे देवताओंको जीत लिया और इन्द्रके राज्यको छीन लिया है। तात! आप मेरे पराक्रमसे जीते गये देवोंवाले इन उत्तम तीनों लोकोंके राज्यका भोग करें और मैं आपके सामने नौकर बनकर रहूँ॥ २१—२४॥ |
| एतावता पुण्ययुतः स्याम तात यत् स्वयम्।<br>त्वदङ्घ्रिपूजाभिरतस्त्वदुच्छिष्टान्नभोजनः॥ २५<br><br>न सा पालयतो राज्यं धृतिर्भवति सत्तम।<br>या धृतिर्गुरुशुश्रूषां कुर्वतो जायते विभो॥ २६<br><br>ततस्तदुक्तं बलिना वाक्यं श्रुत्वा द्विजोत्तम।<br>प्रह्लादः प्राह वचनं धर्मकामार्थसाधनम्॥ २७<br><br>मया कृतं राज्यमकण्टकं पुरा<br> प्रशासिता भूः सुहृदोऽनुपूजिताः।<br>दत्तं यथेष्टं जनितास्तथात्मजाः<br> स्थितो बले सम्प्रति योगसाधकः॥ २८ | तात! इस प्रकार आपके चरणोंकी पूजासे और आपके जूठे अन्नका भोजन करनेसे मैं पुण्यवान् हो जाऊँगा। सत्तम! विभो! राज्यका पालन करनेवाले शासकमें वह धीरता नहीं होती, जो धीरता गुरुकी सेवा करनेवालोंमें होती है। द्विजोत्तम! उसके बाद प्रह्लादने बलिके कहे वचनको सुनकर धर्म, अर्थ और कामका साधक वचन कहा। बलिराज! मैंने पहले शत्रुओंकी विघ्न-बाधासे रहित राज्य किया है। (मैं) पृथ्वीका शासन और मित्रोंका सत्कार कर चुका हूँ, इच्छानुसार दान दे चुका हूँ। (गृहस्थ-धर्मके नाते) मैंने पुत्रोंको भी उत्पन्न किया है। किंतु (इन सबसे शान्ति न पाकर) इस समय मैं योगसाधक बन गया हूँ॥ २५—२८॥ |
| गृहीतं पुत्र विधिवन्मया भूयोऽर्पितं तव।<br>एवं भव गुरूणां त्वं सदा शुश्रूषणे रतः॥ २९<br><br>इत्येवमुक्त्वा वचनं करे त्वादाय दक्षिणे।<br>शाक्रे सिंहासने ब्रह्मन् बलिं तूर्णं न्यवेशयत्॥ ३०<br><br>सोपविष्टो महेन्द्रस्य सर्वरत्नमये शुभे।<br>सिंहासने दैत्यपतिः शुशुभे मघवानिव॥ ३१ | पुत्र! मैंने तुम्हारे दिये (राज्य)-को विधिपूर्वक ग्रहणकर पुनः तुमको दे दिया। तुम गुरुओंकी सेवामें इसी प्रकार सदा लगे रहो। (पुलस्त्यजी कहते हैं—) ब्रह्मन्! ऐसा वचन कहकर (प्रह्लादने बलिका) दाहिना हाथ पकड़कर उसे तुरंत इन्द्रके सिंहासनपर आसीन करा दिया। महेन्द्रके सभी रत्नोंसे बने शुभ सिंहासनपर बैठा हुआ वह दैत्यपति बलि इन्द्रके समान शोभित |
अध्याय ७४] बलि-बाणका देवताओंसे युद्ध, बलिकी विजय, प्रह्लादका स्वर्गमें आना [३६१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तत्रोपविष्टश्चैवासौ कृताञ्जलिपुटो नतः।<br>प्रह्लादं प्राह वचनं मेघगम्भीरया गिरा॥ ३२ | हुआ। उसपर बैठनेके बाद उसने विनयपूर्वक हाथ जोड़कर मेघके गर्जनके समान गम्भीर वाणीमें प्रह्लादसे कहा॥ २९—३२॥ |
| यन्मया तात कर्तव्यं त्रैलोक्यं परिरक्षता।<br>धर्मार्थकाममोक्षेष्वस्तदादिशतु मे भवान्॥ ३३<br><br>तद्वाक्यसमकालं च शुक्रः प्रह्लादमब्रवीत्।<br>यद्युक्तं तन्महाबाहो वदस्वाद्योत्तरं वचः॥ ३४<br><br>वचनं बलिशुक्राभ्यां श्रुत्वा भागवतोऽसुरः।<br>प्राह धर्मार्थसंयुक्तं प्रह्लादो वाक्यमुत्तमम्॥ ३५<br><br>यदायत्यां क्षमं राजन् यद्धितं भुवनस्य च।<br>अविरोधेन धर्मस्य अर्थस्योपार्जनं च यत्॥ ३६<br><br>सर्वसत्त्वानुगमनं कामवर्गफलं च यत्।<br>परत्रेह च यच्छ्रेयः पुत्र तत्कर्म आचर॥ ३७<br><br>यथा श्लाघ्यं प्रयास्यद्य यथा कीर्तिर्भवेत्तव।<br>यथा नायशसो योगस्तथा कुरु महामते॥ ३८ | तात! तीनों लोकोंकी रक्षा करते हुए जो मेरे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—(इन चारों पुरुषार्थों)-के लिये करणीय कार्य है, उसके लिये आप मुझे आदेश दें। उस (बलि)-के वाक्यके साथ ही शुक्रने (भी) प्रह्लादसे कहा—महाबाहो! जो उचित हो वह उत्तर दीजिये। विष्णुके भक्त प्रह्लादने बलि और शुक्रकी बात सुनकर धर्म और अर्थसे युक्त श्रेष्ठ वचन कहा—पुत्र! भविष्यके लिये जो उपयुक्त हो, संसारके लिये जो हितकारी हो और धर्मके अनुकूल जो अर्थका उपार्जन और सभी प्राणियोंके अनुकूल जो कामवर्गका फल है एवं इस लोक और परलोकमें जो कल्याणकारी कर्म हो उसका आचरण करो। महामते! तुम जैसे प्रशंसनीय बन सको तथा जैसे तुम्हें यश प्राप्त हो एवं अकीर्ति न हो वैसे ही कर्तव्यको किया करो॥ ३३—३८॥ |
| एतदर्थं श्रियं दीप्तां काङ्क्षन्ते पुरुषोत्तमाः।<br>येनैतानि गृहेऽस्माकं निवसन्ति सुनिर्वृताः॥ ३९<br><br>कुलजो व्यसने मग्नः सखा चार्थबहिः कृतः।<br>वृद्धो ज्ञातिर्गुणी विप्रः कीर्तिश्च यशसा सह॥ ४०<br><br>तस्माद् यथैते निवसन्ति पुत्र<br>राज्यस्थितस्येह कुलोद्गताद्याः।<br>तथा यतस्वामलसत्त्वचेष्ट<br>यथा यशस्वी भविताऽसि लोके॥ ४१<br><br>भूम्यां सदा ब्राह्मणभूषितायां<br>क्षत्रान्वितायां दृढवापिताताम्।<br>शुश्रूषणासक्तसमुद्भवाया-<br>मृद्धिं प्रयान्तीह नराधिपेन्द्राः॥ ४२ | उत्तम पुरुष उत्कृष्ट लक्ष्मीकी अभिलाषा इसीलिये करते हैं कि विपत्तिमें पड़ा हुआ अच्छे कुलका व्यक्ति, धनहीन मित्र, वृद्ध, ज्ञाति, गुणी ब्राह्मण एवं यशोदायिनी कीर्ति उनके गृहमें शान्तिपूर्वक निवास कर सकें। अतः हे पवित्र विचार एवं चेष्टावाले पुत्र! राज्यके स्थिर हो जानेपर जैसे (उपर्युक्त) कुलोत्पन्नादि (तुम्हारे गृहमें) रह सकें एवं जैसे तुम लोकमें यशस्वी हो सको वैसा ही प्रयत्न करो। पृथ्वीके सदा ब्राह्मणोंसे सुशोभित होने, क्षत्रियोंसे सनाथ होने, (वैश्योंद्वारा) भलीभाँति (जोते)-बोये जाने तथा सेवारत (शूद्रों)-से सम्पन्न होनेपर अच्छे राजाओंको समृद्धि प्राप्त होती है॥ ३९—४२॥ |
| तस्माद् द्विजाग्र्याः श्रुतिशास्त्रयुक्ता<br>नराधिपांस्ते प्रतियाजयन्तु।<br>दिव्यैर्यजन्तु ऋतुभिर्द्विजेन्द्रा<br>यज्ञाग्निधूमेन नृपस्य शान्तिः॥ ४३<br><br>तपोऽध्ययनसम्पन्ना याजनाध्यापने रताः।<br>सन्तु विप्रा बले पूज्यास्त्वत्तोऽनुज्ञामवाप्य हि॥ ४४ | इसलिये (तुम्हारे शासनमें) वेद-शास्त्रसे सम्पन्न उत्तम ब्राह्मण राजाओंसे यज्ञ करवावें एवं श्रेष्ठ द्विजगण दिव्य यज्ञ किया करें। यज्ञकी अग्निके धूएँसे राजाको शान्ति मिलती है। बले! तपस्या और वेदाध्ययनसे संयुक्त यजन और अध्यापनमें लगे रहनेवाले ब्राह्मण तुम्हारी |