वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७२ ---|--- ते चास्यै वरदा ब्रह्मन् जाताः सप्त महर्षयः।<br>व्रजध्वं तनयाः सप्त भविष्यन्ति न संशयः ॥ ४९<br>युवयोर्गुणसंयुक्ता महर्षीणां प्रसादतः।<br>इत्येवमुक्त्वा जग्मुस्ते सर्व एव महर्षयः ॥ ५० | ब्रह्मन्! सातों महर्षियोंने उसे वर दिया—तुम जाओ; महर्षियोंकी कृपासे तुम दोनोंको निःसन्देह सात गुणवान् पुत्र होंगे। इस प्रकार कहकर वे सभी महर्षि चले गये॥ ४९–५०॥ स चापि राजर्षिरगात् सभार्यो नगरं निजम्।<br>ततो बहुतिथे काले सा राज्ञो महिषी प्रिया ॥ ५१<br>अवाप गर्भं तन्वङ्गी तस्मान्नृपतिसत्तमात्।<br>गुर्विण्यामथ भार्यायां ममरासौ नराधिपः ॥ ५२<br>सा चाप्यारोढुमिच्छन्ती भर्तारं वै पतिव्रता।<br>निवारिता तदामात्यैर्न तथापि व्यतिष्ठत ॥ ५३<br>समारोप्याथ भर्तारं चितायामारुहच्च सा।<br>ततोऽग्निमध्यात् सलिले मांसपेश्यपतन्मुने ॥ ५४<br>साऽम्भसा सुखशीतेन संसिक्ता सप्तधाऽभवत्।<br>तेऽजायन्ताथ मरुत उत्तमस्यान्तरे मनोः ॥ ५५ | वे राजर्षि भी अपनी पत्नीके सहित नगरमें गये। उसके बाद बहुत समय बीत जानेपर राजाकी उस प्रिय रानीने उन नृपतिश्रेष्ठसे गर्भ धारण किया। भार्याके गर्भिणी होनेपर वे राजा संसारसे चल बसे। उस पतिव्रताने अपने पतिके साथ चितापर आरूढ़ होनेकी इच्छा की। मन्त्रियोंने उसे रोका, परंतु वह रुकी नहीं। पतिको चितापर रखकर वह भी उसपर चढ़ गयी। मुने! उसके बाद अग्निके बीचसे जलमें एक मांसपेशी गिरी। अत्यन्त शीतल जलसे संसिक्त होनेपर वह (मांसपेशी) सात टुकड़ोंमें अलग-अलग हो गयी। वे ही टुकड़े उत्तम मनुके कालमें मरुत् हुए॥ ५१–५५॥ तामसस्यान्तरे ये च मरुतोऽप्यभवन् पुरा।<br>तानहं कीर्तयिष्यामि गीतनृत्यकलिप्रिय ॥ ५६<br>तामसस्य मनोः पुत्रो ऋतध्वज इति श्रुतः।<br>स पुत्रार्थी जुहावाग्नौ स्वमांसं रुधिरं तथा ॥ ५७<br>अस्थीनि रोमकेशांश्च स्नायुमज्जायकृद्घनम्।<br>शुक्रं च चित्रगौ राजा सुतार्थी इति नः श्रुतम् ॥ ५८ | हे गीतनृत्यकलिप्रिय (नारदजी)! पहले तामस मन्वन्तरमें जो मरुत् हुए (अब मैं) उनका वर्णन करूँगा। तामस मनुके पुत्र ऋतध्वज नामसे विख्यात थे। उन्होंने पुत्रकी अभिलाषासे अग्निमें अपने शरीरके मांस और रक्तका हवन किया। हमलोगों ने सुना है कि पुत्रके अभिलाषी (उन) राजाने अस्थि, रोम, केश, स्नायु, मज्जा, यकृत् और घने शुक्रकी अग्निमें आहुति दी॥ ५६–५८॥ सप्तस्वेवार्चिषु ततः शुक्रपातादनन्तरम्।<br>मा मा क्षिपस्वेत्यभवच्छब्दः सोऽपि मृतो नृपः ॥ ५९<br>ततस्तस्माद्धुतवहात् सप्त तत्तेजसोपमाः।<br>शिशवः समजायन्त ते रुदन्तोऽभवन् मुने ॥ ६०<br>तेषां तु ध्वनिमाकर्ण्य भगवान् पद्मसम्भवः।<br>समागम्य निवार्याथ स चक्रे मरुतः सुतान् ॥ ६१<br>ते त्वासन् मरुतो ब्रह्मंस्तामसे देवतागणाः।<br>येऽभवन् रैवते तांश्च शृणुष्व त्वं तपोधन ॥ ६२ | उसके बाद सातों अग्नियोंमें शुक्रपात होनेपर 'मत फेंको, मत फेंको' इस प्रकारका शब्द होने लगा। वे राजा भी मर गये। मुने! उसके बाद उस अग्निसे सात तेजस्वी शिशु उत्पन्न हुए और वे रोने लगे। उनके रोनेकी ध्वनि सुनकर भगवान् कमलयोनि (ब्रह्मा)-ने आकर मना किया और उन पुत्रोंको मरुत् नामका देवता बना दिया। ब्रह्मन्! वे ही तामस मन्वन्तरमें (मरुद्गण) नामक देवता हुए। हे तपोधन! रैवत मन्वन्तरमें जो (मरुद्गण) हुए उनका विवरण आगे सुनिये—॥ ५९–६२॥ रैवतस्यान्ववाये तु राजासीद् रिपुजिद् वशी।<br>रिपुजिन्नामतः ख्यातो न तस्यासीत् सुतः किल ॥ ६३ | रैवतके वंशमें शत्रुओंपर विजय प्राप्त करनेवाले संयमी रिपुजित् नामसे विख्यात एक राजा थे। उनको