वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
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अध्याय ७२ ] स्वायम्भुव, स्वारोचिष, उत्तम, तामस, रैवत चाक्षुष-मन्वन्तरोंके मरुद्गणकी उत्पत्तिका वर्णन ३६१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| स समाराध्य तपसा भास्करं तेजसां निधिम्।<br>अवाप कन्यां सुरतिं तां प्रगृह्य गृहं ययौ॥ ६४<br><br>तस्यां पितृगृहे ब्रह्मन् वसन्त्यां स पिता मृतः।<br>साऽपि दुःखपरीताङ्गी स्वां तनुं त्यक्तुमुद्यता॥ ६५<br><br>ततस्तां वारयामासुर्ऋषयः सप्त मानसाः।<br>तस्यामासक्तचित्तास्तु सर्व एव तपोधनाः॥ ६६ | पुत्र नहीं था। उन्होंने तपद्वारा तेजवनिधि सूर्यकी आराधना कर सुरति नामकी कन्या प्राप्त की और उसे लेकर वे घर चले गये। ब्रह्मन्! उस कन्याके पितृ-गृहमें रहते हुए पिताका देहावसान हो गया। वह भी शोकसे आकुल होकर अपने शरीरका परित्याग करनेके लिये तैयार हुई। उसके बाद सात मानस ऋषियोंने उसे मना किया। किंतु वे सभी तपोधन उसमें आसक्तचित्त हो गये थे॥ ६३-६६॥ |
| अपारयन्ती तद्दुःखं प्रज्वाल्याग्निं विवेश ह।<br>ते चापश्यन्त ऋषयस्तच्चित्ता भावितास्तथा॥ ६७<br><br>तां मृतामृषयो दृष्ट्वा कष्टं कष्टेति वादिनः।<br>प्रजग्मुर्ज्वलनाच्चापि सप्ताजायन्त दारकाः॥ ६८<br><br>ते च मात्रा विना भूता रुरुदुस्तान् पितामहः।<br>निवारयित्वा कृतवांल्लोकनाथो मरुद्गणान्॥ ६९<br><br>रैवतस्यान्तरे जाता मरुतोऽमी तपोधन।<br>शृणुष्व कीर्तयिष्यामि चाक्षुषस्यान्तरे मनोः॥ ७० | किंतु वह कन्या उस दुःखको सहन न कर सकनेके कारण आग जलाकर उसमें प्रवेश कर गयी। उसमें आसक्त तथा प्रभावित ऋषियोंने उसे देखा। उसे मरा हुआ देखकर वे ऋषि ‘दुःखकी बात है’, ‘दुःखकी बात है’ कहते हुए चले गये। उसके बाद उस अग्निसे सात पुत्र हुए। माताके अभावमें वे रोने लगे। लोकनाथ पितामह ब्रह्माने उन्हें (रोनेसे) रोककर मरुद्गणका पद दे दिया। तपोधन! वे ही रैवत मन्वन्तरमें मरुद्गण हुए। अब मैं चाक्षुष मनुके कालके मरुद्गणोंका वर्णन करूँगा, उसे सुनिये-॥ ६७-७०॥ |
| आसीन्मङ्किरिति ख्यातस्तपस्वी सत्यवाक् शुचिः।<br>सप्तसारस्वते तीर्थे सोऽतप्यत महत्त्पः॥ ७१<br><br>विघ्नार्थं तस्य तुषिता देवाः संप्रेषयन् वपुम्।<br>सा चाभ्येत्य नदीतीरे क्षोभयामास भामिनी॥ ७२<br><br>ततोऽस्य प्राच्यवच्छुक्रं सप्तसारस्वते जले।<br>तां चैवाप्यशपन्मूढां मुनिर्मङ्कणको वपुम्॥ ७३<br><br>गच्छ लब्धाऽसि मूढे त्वं पापस्यास्य महत् फलम्।<br>विध्वंसयिष्यति हयो भवतीं यज्ञसंसदि॥ ७४<br><br>एवं शप्त्वा ऋषिः श्रीमाञ्जगामाथ स्वमाश्रमम्।<br>सरस्वतीभ्यः सप्तभ्यः सप्त वै मरुतोऽभवन्॥ ७५<br><br>एतत् तवोक्ता मरुतः पुरा यथा<br>जाता वियद्व्याप्तिकरा महर्षे।<br>येषां श्रुते जन्मनि पापहानि-<br>र्भवेच्च धर्माभ्युदयो महान् वै॥ ७६ | मङ्कि नामसे विख्यात सत्यवादी और पवित्र एक तपस्वी थे। उन्होंने सप्तसारस्वततीर्थमें महान् तप किया था। देवताओंने उनकी तपस्यामें विघ्न डालनेके लिये ‘वपु’ नामकी अप्सराको भेजा। उस भामिनीने नदीके किनारे आकर मुनिको क्षोभित कर दिया। उसके बाद उनका शुक्र च्युत होकर सप्तसारस्वतके जलमें गिर गया। मुनि मङ्कणकने उस मूढ़ा वपुको भी शाप दे दिया। हे मूढ़े! चली जाओ। तुम इस पापका दारुण फल प्राप्त करोगी। यज्ञसंसद्में तुमको अश्व विध्वस्त करेगा। श्रीमान् ऋषि इस प्रकार शाप देकर अपने आश्रममें चले गये। उसके बाद सप्तसरस्वतियोंसे सात मरुत् उत्पन्न हुए। महर्षे! पूर्वकालमें आकाशव्यापी मरुद्गण जिस प्रकार उत्पन्न हुए थे, उसे मैंने आपसे कहा। इनका वर्णन सुननेसे पापका नाश तथा धर्मका महान् अभ्युदय होता है॥ ७१-७६॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें बहत्तरवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ७२ ॥