वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ७२ ] स्वायम्भुव, स्वारोचिष, उत्तम, तामस, रैवत चाक्षुष-मन्वन्तरोंके मरुद्गणकी उत्पत्तिका वर्णन ३५१
| सा चाप्सराः शक्रमेत्य याथातथ्यं न्यवेदयत्।<br>ततो बहुतिथे काले सा ग्राही शङ्खरूपिणी ॥ ३४<br>समुद्धृता महाजालैर्मत्स्यबन्धेन मानिनी।<br>स तां दृष्ट्वा महाशङ्खीं स्थलस्थां मत्स्यजीविकः ॥ ३५<br>निवेदयामास तदा ऋतुध्वजसुतेषु वै।<br>तथाऽभ्येत्य महात्मानो योगिनो योगधारिणः ॥ ३६ | पिताके राज्यमें चले गये। उस अप्सराने भी इन्द्रके पास जाकर उनसे सत्य तथ्यको बतला दिया। उसके बाद बहुत समयके पश्चात् किसी धीवरने महाजालद्वारा उस शङ्खरूपिणी मानिनी बड़ी मछलीको पकड़ लिया। मछलीसे जीवनका निर्वाह करनेवाले (धीवर)-ने भूमिपर पड़ी हुई उस महाशङ्खीको देखकर ऋतुध्वजके पुत्रोंसे निवेदित किया। योगको धारण करनेवाले वे महात्मा योगी उसके निकट गये॥ ३२-३६॥ |
| नीत्वा स्वमन्दिरं सर्वे पुरवाप्यां समुत्सृजन्।<br>ततः क्रमाच्छङ्खिनी सा सुषुवे सप्त वै शिशून् ॥ ३७<br>जातमात्रेषु पुत्रेषु मोक्षभावमगाच्च सा।<br>अमातृपितृका बाला जलमध्यविहारिणः ॥ ३८<br>स्तन्यार्थिनो वै रुरुदुरथाभ्यागात् पितामहः।<br>मा रुदध्वमितीत्याह मरुतो नाम पुत्रकाः ॥ ३९<br>यूयं देवा भविष्यध्वं वायुस्कन्धविचारिणः।<br>इत्येवमुक्त्वाथादाय सर्वांस्तान् दैवतान् प्रति ॥ ४०<br>नियोज्य च मरुन्मार्गे वैराजं भवनं गतः।<br>एवमासंश्च मरुतो मनोः स्वारोचिषेऽन्तरे ॥ ४१ | उन सभीने उसको अपने घर लाकर नगरके तालाबमें छोड़ दिया। उस शङ्खिनीने क्रमशः सात पुत्रोंको जन्म दिया। पुत्रोंका जन्म होते ही वह शङ्खिनी संसारसे बिदा हो गयी। अब बिना माता-पिताके वे बालक जलमें विचरण करने लगे। दूधके लिये वे विलखने लगे। उस समय वहाँ पितामह आ गये। उन्होंने 'मत रोओ' ऐसा कहा। इसीलिये उनका नाम मरुत् हुआ। 'तुमलोग वायुके कंधेपर विचरण करनेवाले देवता होगे' यह कहनेके बाद वे उन सभी देवताओंको ले जाकर उन्हें वायुमार्गमें नियुक्त कर ब्रह्मलोकको चले गये। इस प्रकार स्वारोचिष मनुके समयमें मरुत् हुए॥ ३७-४१॥ |
| उत्तमे मरुतो ये च ताञ्छृणुष्व तपोधन।<br>उत्तमस्यान्ववाये तु राजासीन्निषधाधिपः ॥ ४२<br>वपुष्मानिति विख्यातो वपुषा भास्करोपमः।<br>तस्य पुत्रो गुणश्रेष्ठो ज्योतिष्मान् धार्मिकोऽभवत् ॥ ४३<br>स पुत्रार्थी तपस्तेपे नदीं मन्दाकिनीमनु।<br>तस्य भार्या च सुश्रोणी देवाचार्यसुता शुभा ॥ ४४<br>तपश्चरणयुक्तस्य बभूव परिचारिका।<br>सा स्वयं फलपुष्पाम्बुसमित्कुशं समाहरत् ॥ ४५ | तपोधन ! उत्तम (मन्वन्तर)-में जो मरुत् थे, अब उनके विषयमें सुनिये। उत्तमके वंशमें शरीरसे सूर्यके सदृश वपुष्मान् नामके प्रसिद्ध निषधोंके एक राजा थे। उनका उत्तम गुणोंवाला ज्योतिष्मान् नामका एक धार्मिक पुत्र था। वह पुत्रकी कामनासे मन्दाकिनी नदीके किनारे तपस्या करने लगा। देवताओंके आचार्य बृहस्पतिकी सुन्दरी पुत्री उसकी कल्याणकारिणी पत्नी थी। वह उस तपस्वीकी सेविका बनी। वह स्वयं फल, पुष्प, जल, समिधा एवं कुश लाती थी॥ ४२-४५॥ |
| चकार पद्मपत्राक्षी सम्यक् चातिथिपूजनम्।<br>पतिं शुश्रूषमाणा सा कृशा धमनिसंतता ॥ ४६<br>तेजोयुक्ता सुचार्वङ्गी दृष्टा सप्तर्षिभिर्वने।<br>तां तथा चारुसर्वाङ्गीं दृष्ट्वाऽथ तपसा कृशाम् ॥ ४७<br>पप्रच्छुस्तपसो हेतुं तस्यास्तद्भर्तुरेव च।<br>साऽब्रवीत् तनयार्थाय आवाभ्यां वै तपः क्रिया ॥ ४८ | कमलदलके समान नयनोंवाली वह अच्छी तरह अतिथियोंका सत्कार करती थी। पतिकी सेवा करते हुए उसका शरीर दुबला हो गया तथा नाड़ियाँ दिखायी देने लगीं। सप्तर्षियोंने उस तेजस्विनी सर्वाङ्गसुन्दरीको वनमें देखा। तपसे दुर्बल उस सर्वाङ्गसुन्दरीको देखकर उन लोगोंने उसकी तथा उसके पतिकी तपस्याका कारण पूछा। उसने कहा—हम दोनों पुत्रके लिये तप कर रहे हैं। |