वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
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| ३६८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७४ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तिलोत्तमाद्याप्सरसो नृत्यन्ति सुरतापस।<br>वादयन्ति च वाद्यानि यक्षविद्याधरादयः॥ १८<br><br>विविधानपि भोगांश्च भुञ्जन् दैत्येश्वरो बलिः।<br>सस्मार मनसा ब्रह्मन् प्रह्लादं स्वपितामहम्॥ १९<br><br>संस्मृतो नृमणा चासौ महाभागवतोऽसुरः।<br>समभ्यागात् त्वरायुक्तः पातालात् स्वर्गमव्ययम्॥ २० | गन्धर्व उसकी सेवा करने लगे। देवर्षे! तिलोत्तमा आदि अप्सराएँ (उसे प्रसन्न करनेके लिये) नृत्य किया करती थीं और यक्ष तथा विद्याधर आदि बाजे बजाते थे। ब्रह्मन्! विविध भोगोंका भोग करते हुए दैत्येश्वर बलिने अपने पितामह प्रह्लादका मनसे स्मरण किया। पौत्र (बलि)-के स्मरण करते ही वे महान् भागवत (विष्णुके परम भक्त) असुर प्रह्लादजी पातालसे अक्षय स्वर्गलोकमें चले आये॥ १७—२०॥ |
| तमागतं समीक्ष्यैव त्यक्त्वा सिंहासनं बलिः।<br>कृताञ्जलिपुटो भूत्वा ववन्दे चरणावुभौ॥ २१<br><br>पादयोः पतितं वीरं प्रह्लादस्त्वरितो बलिम्।<br>समुत्थाप्य परिष्वज्य विवेश परमासने॥ २२<br><br>तं बलिः प्राह भोस्तात त्वत्प्रसादात् सुरा मया।<br>निर्जिताः शक्रराज्यं च हृतं वीर्यबलान्मया॥ २३<br><br>तदिदं तात मद्वीर्यविनिर्जितसुरोत्तमम्।<br>त्रैलोक्यराज्यं भुङ्क्ष्व त्वं मयि भृत्ये पुरःस्थिते॥ २४ | उन्हें आया हुआ देखते ही बलिने सिंहासन छोड़कर और हाथ जोड़कर उनके चरणोंकी वन्दना की। प्रह्लाद चरणोंमें पड़े हुए वीर बलिको जल्दीसे उठाकर और गले लगाकर उचित सुन्दर आसनपर बैठ गये। बलिने उनसे कहा—अये तात! मैंने आपके पुण्य-प्रसादसे (प्राप्त) पराक्रम और बलसे देवताओंको जीत लिया और इन्द्रके राज्यको छीन लिया है। तात! आप मेरे पराक्रमसे जीते गये देवोंवाले इन उत्तम तीनों लोकोंके राज्यका भोग करें और मैं आपके सामने नौकर बनकर रहूँ॥ २१—२४॥ |
| एतावता पुण्ययुतः स्याम तात यत् स्वयम्।<br>त्वदङ्घ्रिपूजाभिरतस्त्वदुच्छिष्टान्नभोजनः॥ २५<br><br>न सा पालयतो राज्यं धृतिर्भवति सत्तम।<br>या धृतिर्गुरुशुश्रूषां कुर्वतो जायते विभो॥ २६<br><br>ततस्तदुक्तं बलिना वाक्यं श्रुत्वा द्विजोत्तम।<br>प्रह्लादः प्राह वचनं धर्मकामार्थसाधनम्॥ २७<br><br>मया कृतं राज्यमकण्टकं पुरा<br> प्रशासिता भूः सुहृदोऽनुपूजिताः।<br>दत्तं यथेष्टं जनितास्तथात्मजाः<br> स्थितो बले सम्प्रति योगसाधकः॥ २८ | तात! इस प्रकार आपके चरणोंकी पूजासे और आपके जूठे अन्नका भोजन करनेसे मैं पुण्यवान् हो जाऊँगा। सत्तम! विभो! राज्यका पालन करनेवाले शासकमें वह धीरता नहीं होती, जो धीरता गुरुकी सेवा करनेवालोंमें होती है। द्विजोत्तम! उसके बाद प्रह्लादने बलिके कहे वचनको सुनकर धर्म, अर्थ और कामका साधक वचन कहा। बलिराज! मैंने पहले शत्रुओंकी विघ्न-बाधासे रहित राज्य किया है। (मैं) पृथ्वीका शासन और मित्रोंका सत्कार कर चुका हूँ, इच्छानुसार दान दे चुका हूँ। (गृहस्थ-धर्मके नाते) मैंने पुत्रोंको भी उत्पन्न किया है। किंतु (इन सबसे शान्ति न पाकर) इस समय मैं योगसाधक बन गया हूँ॥ २५—२८॥ |
| गृहीतं पुत्र विधिवन्मया भूयोऽर्पितं तव।<br>एवं भव गुरूणां त्वं सदा शुश्रूषणे रतः॥ २९<br><br>इत्येवमुक्त्वा वचनं करे त्वादाय दक्षिणे।<br>शाक्रे सिंहासने ब्रह्मन् बलिं तूर्णं न्यवेशयत्॥ ३०<br><br>सोपविष्टो महेन्द्रस्य सर्वरत्नमये शुभे।<br>सिंहासने दैत्यपतिः शुशुभे मघवानिव॥ ३१ | पुत्र! मैंने तुम्हारे दिये (राज्य)-को विधिपूर्वक ग्रहणकर पुनः तुमको दे दिया। तुम गुरुओंकी सेवामें इसी प्रकार सदा लगे रहो। (पुलस्त्यजी कहते हैं—) ब्रह्मन्! ऐसा वचन कहकर (प्रह्लादने बलिका) दाहिना हाथ पकड़कर उसे तुरंत इन्द्रके सिंहासनपर आसीन करा दिया। महेन्द्रके सभी रत्नोंसे बने शुभ सिंहासनपर बैठा हुआ वह दैत्यपति बलि इन्द्रके समान शोभित |