वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ७४] बलि-बाणका देवताओंसे युद्ध, बलिकी विजय, प्रह्लादका स्वर्गमें आना [३६१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तत्रोपविष्टश्चैवासौ कृताञ्जलिपुटो नतः।<br>प्रह्लादं प्राह वचनं मेघगम्भीरया गिरा॥ ३२ | हुआ। उसपर बैठनेके बाद उसने विनयपूर्वक हाथ जोड़कर मेघके गर्जनके समान गम्भीर वाणीमें प्रह्लादसे कहा॥ २९—३२॥ |
| यन्मया तात कर्तव्यं त्रैलोक्यं परिरक्षता।<br>धर्मार्थकाममोक्षेष्वस्तदादिशतु मे भवान्॥ ३३<br><br>तद्वाक्यसमकालं च शुक्रः प्रह्लादमब्रवीत्।<br>यद्युक्तं तन्महाबाहो वदस्वाद्योत्तरं वचः॥ ३४<br><br>वचनं बलिशुक्राभ्यां श्रुत्वा भागवतोऽसुरः।<br>प्राह धर्मार्थसंयुक्तं प्रह्लादो वाक्यमुत्तमम्॥ ३५<br><br>यदायत्यां क्षमं राजन् यद्धितं भुवनस्य च।<br>अविरोधेन धर्मस्य अर्थस्योपार्जनं च यत्॥ ३६<br><br>सर्वसत्त्वानुगमनं कामवर्गफलं च यत्।<br>परत्रेह च यच्छ्रेयः पुत्र तत्कर्म आचर॥ ३७<br><br>यथा श्लाघ्यं प्रयास्यद्य यथा कीर्तिर्भवेत्तव।<br>यथा नायशसो योगस्तथा कुरु महामते॥ ३८ | तात! तीनों लोकोंकी रक्षा करते हुए जो मेरे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—(इन चारों पुरुषार्थों)-के लिये करणीय कार्य है, उसके लिये आप मुझे आदेश दें। उस (बलि)-के वाक्यके साथ ही शुक्रने (भी) प्रह्लादसे कहा—महाबाहो! जो उचित हो वह उत्तर दीजिये। विष्णुके भक्त प्रह्लादने बलि और शुक्रकी बात सुनकर धर्म और अर्थसे युक्त श्रेष्ठ वचन कहा—पुत्र! भविष्यके लिये जो उपयुक्त हो, संसारके लिये जो हितकारी हो और धर्मके अनुकूल जो अर्थका उपार्जन और सभी प्राणियोंके अनुकूल जो कामवर्गका फल है एवं इस लोक और परलोकमें जो कल्याणकारी कर्म हो उसका आचरण करो। महामते! तुम जैसे प्रशंसनीय बन सको तथा जैसे तुम्हें यश प्राप्त हो एवं अकीर्ति न हो वैसे ही कर्तव्यको किया करो॥ ३३—३८॥ |
| एतदर्थं श्रियं दीप्तां काङ्क्षन्ते पुरुषोत्तमाः।<br>येनैतानि गृहेऽस्माकं निवसन्ति सुनिर्वृताः॥ ३९<br><br>कुलजो व्यसने मग्नः सखा चार्थबहिः कृतः।<br>वृद्धो ज्ञातिर्गुणी विप्रः कीर्तिश्च यशसा सह॥ ४०<br><br>तस्माद् यथैते निवसन्ति पुत्र<br>राज्यस्थितस्येह कुलोद्गताद्याः।<br>तथा यतस्वामलसत्त्वचेष्ट<br>यथा यशस्वी भविताऽसि लोके॥ ४१<br><br>भूम्यां सदा ब्राह्मणभूषितायां<br>क्षत्रान्वितायां दृढवापिताताम्।<br>शुश्रूषणासक्तसमुद्भवाया-<br>मृद्धिं प्रयान्तीह नराधिपेन्द्राः॥ ४२ | उत्तम पुरुष उत्कृष्ट लक्ष्मीकी अभिलाषा इसीलिये करते हैं कि विपत्तिमें पड़ा हुआ अच्छे कुलका व्यक्ति, धनहीन मित्र, वृद्ध, ज्ञाति, गुणी ब्राह्मण एवं यशोदायिनी कीर्ति उनके गृहमें शान्तिपूर्वक निवास कर सकें। अतः हे पवित्र विचार एवं चेष्टावाले पुत्र! राज्यके स्थिर हो जानेपर जैसे (उपर्युक्त) कुलोत्पन्नादि (तुम्हारे गृहमें) रह सकें एवं जैसे तुम लोकमें यशस्वी हो सको वैसा ही प्रयत्न करो। पृथ्वीके सदा ब्राह्मणोंसे सुशोभित होने, क्षत्रियोंसे सनाथ होने, (वैश्योंद्वारा) भलीभाँति (जोते)-बोये जाने तथा सेवारत (शूद्रों)-से सम्पन्न होनेपर अच्छे राजाओंको समृद्धि प्राप्त होती है॥ ३९—४२॥ |
| तस्माद् द्विजाग्र्याः श्रुतिशास्त्रयुक्ता<br>नराधिपांस्ते प्रतियाजयन्तु।<br>दिव्यैर्यजन्तु ऋतुभिर्द्विजेन्द्रा<br>यज्ञाग्निधूमेन नृपस्य शान्तिः॥ ४३<br><br>तपोऽध्ययनसम्पन्ना याजनाध्यापने रताः।<br>सन्तु विप्रा बले पूज्यास्त्वत्तोऽनुज्ञामवाप्य हि॥ ४४ | इसलिये (तुम्हारे शासनमें) वेद-शास्त्रसे सम्पन्न उत्तम ब्राह्मण राजाओंसे यज्ञ करवावें एवं श्रेष्ठ द्विजगण दिव्य यज्ञ किया करें। यज्ञकी अग्निके धूएँसे राजाको शान्ति मिलती है। बले! तपस्या और वेदाध्ययनसे संयुक्त यजन और अध्यापनमें लगे रहनेवाले ब्राह्मण तुम्हारी |