वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ३७० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७५ |
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| स्वाध्याययज्ञनिरता दातारः शस्त्रजीविनः।<br>क्षत्रियाः सन्तु दैत्येन्द्र प्रजापालनधर्मिणः॥ ४५<br><br>यज्ञाध्ययनसम्पन्ना दातारः कृषिकारिणः।<br>पाशुपाल्यं प्रकुर्वन्तु वैश्या विपणिजीविनः॥ ४६<br>ब्राह्मणक्षत्रियविशां सदा शुश्रूषणे रताः।<br>शूद्राः सन्त्वसुरश्रेष्ठ तवाज्ञाकारिणः सदा॥ ४७<br><br>यदा वर्णाः स्वधर्मस्था भवन्ति दितिजेश्वर।<br>धर्मवृद्धिस्तदा स्याद्वै धर्मवृद्धौ नृपोदयः॥ ४८<br><br>तस्माद्वर्णाः स्वधर्मस्थास्त्वया कार्याः सदा बले।<br>तद्वृद्धौ भवतो वृद्धिस्तद्धानौ हानिरुच्यते॥ ४९<br><br>इत्थं वचः श्राव्य महासुरेन्द्रो<br>बलिं महात्मा स बभूव तूष्णीम्।<br>ततो यदाज्ञापयसे करिष्ये<br>इत्थं बलिः प्राह वचो महर्षे॥ ५० | अनुमति पाकर पूजित हों। दैत्येन्द्र! क्षत्रिय स्वाध्याय एवं यज्ञमें निरत, दान देनेवाले, शस्त्र-जीवी तथा प्रजा-पालन करनेवाले हों। वैश्यगण यज्ञाध्ययनसे सम्पन्न, दाता, कृषिकर्त्ता एवं वाणिज्यजीवी हों तथा पशुपालनका कर्म करें॥ ४३-४६॥<br><br>असुरश्रेष्ठ! शूद्रगण ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंकी सेवामें सदा लगे रहें और तुम्हारे आदेशका सदा पालन करें। दितिजेश्वर! जब सभी वर्णके लोग अपने-अपने धर्ममें स्थित रहते हैं तब निश्चय ही धर्मकी वृद्धि होती है और धर्मकी वृद्धि होनेपर राजाकी उन्नति होती है। इसलिये बले! तुम सभी वर्णोंको उनके धर्ममें सदा लगाये रहो। उसकी (स्वधर्मकी) वृद्धिसे राजाकी वृद्धि होती है। उसकी हानिसे हानि कही गयी है। महासुरेन्द्र महात्मा प्रह्लाद बलिसे ऐसा कहकर मौन हो गये। (पुलस्त्यजी कहते हैं—) महर्षे! उसके बाद बलिने इस प्रकार कहा—आपने जो आदेश दिया, उसीके अनुसार मैं कार्य करूँगा॥ ४७-५०॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें चौहत्तरवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ७४॥
पचहत्तरवाँ अध्याय
त्रैलोक्य-लक्ष्मीका बलिके यहाँ आना, श्वेत लक्ष्मी आदिकी उत्पत्ति, निधियोंका वर्णन, जयश्रीका बलिमें मिलना और बलिकी समृद्धिका वर्णन
</div>| पुलस्त्य उवाच<br>ततो गतेषु देवेषु ब्रह्मलोकं प्रति द्विज।<br>त्रैलोक्यं पालयामास बलिर्धर्मान्वितः सदा॥ १<br><br>कलिस्तदा धर्मयुतं जगद् दृष्ट्वा कृते यथा।<br>ब्रह्माणं शरणं भेजे स्वभावस्य निषेवणात्॥ २<br><br>गत्वा स ददृशे देवं सेन्द्रैर्देवैः समन्वितम्।<br>स्वदीप्त्या द्योतयन्तं च स्वदेशं ससुरासुरम्॥ ३<br><br>प्रणिपत्य तमाहाथ तिष्यो ब्रह्माणमीश्वरम्।<br>मम स्वभावो बलिना नाशितो देवसत्तम॥ ४ | **पुलस्त्यजी बोले—**द्विज! देवोंके ब्रह्मलोक चले जानेपर बलि सदा धर्मसे युक्त (धार्मिक) रहते हुए तीनों लोकोंका पालन करने लगा। उस समय संसारको सत्ययुगकी भाँति धर्मसे सम्पन्न हुआ देखकर कलियुग अपने कर्त्तव्यका सेवन करनेके हेतु ब्रह्माकी शरणमें गया। वहाँ जाकर उसने ब्रह्माको इन्द्र आदि देवोंके साथ देखा। वे अपनी प्रभासे सुरों और असुरोंसे युक्त अपने लोकको प्रदीपित कर रहे थे। उन ईश्वर ब्रह्माको प्रणामकर कलिने उनसे कहा—देवश्रेष्ठ! बलिने मेरे स्वाभाविक कर्मको नष्ट कर दिया है॥ १-४॥ |