वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
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| अध्याय ७५ ] | त्रैलोक्य-लक्ष्मीका बलिके यहाँ आना, श्वेत लक्ष्मी आदिकी उत्पत्ति | ३७१ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तं प्राह भगवान् योगी स्वभावं जगतोऽपि हि।<br>न केवलं हि भवतो हृतं तेन बलीयसा ॥ ५<br>पश्यस्व तिष्य देवेन्द्रं वरुणं च समारुतम्।<br>भास्करोऽपि हि दीनत्वं प्रयातो हि बलाद् बलेः ॥ ६<br>न तस्य कश्चित् त्रैलोक्ये प्रतिषेद्धाऽस्ति कर्मणः।<br>ऋते सहस्रं शिरसं हरिं दशशताङ्घ्रिकम् ॥ ७<br>स भूमिं च तथा नाकं राज्यं लक्ष्मीं यशोऽव्ययः।<br>समाहरिष्यति बलेः कर्तुः सद्धर्मगोचरम् ॥ ८ | योगी भगवान् ब्रह्माने उससे कहा—केवल तुम्हारा ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण लोकका स्वभाव उस बलशालीने हरण कर लिया है। कले! मरुत्के साथ वरुण और देवेन्द्रको देखो। बलिके पराक्रमसे सूर्य भी निस्तेज-से हो गये हैं। सहस्रशीर्षा तथा सहस्रपाद (विष्णु)-के सिवा तीनों लोकोंमें उसके कर्मको बंद करनेवाला कोई नहीं दीखता है। वे अविनाशी बलिद्वारा किये गये सद्धर्मके हेतु मिली हुई उसकी भूमि, स्वर्ग, राज्य, लक्ष्मी एवं यशका अपहरण करेंगे ॥ ५-८ ॥ |
| इत्येवमुक्तो देवेन ब्रह्मणा कलिरव्ययः।<br>दीनान् दृष्ट्वा स शक्रादीन् विभीतकवनं गतः ॥ ९<br>कृतः प्रावर्त्तत तदा कलेर्नाशाज्जगत्त्रये।<br>धर्मोऽभवच्चतुष्पादश्चातुर्वर्ण्येऽपि नारद ॥ १०<br>ततोऽहिंसा च सत्यं च शौचमिन्द्रियनिग्रहः।<br>दया दानं त्वानृशंस्यं शुश्रूषा यज्ञकर्म च ॥ ११<br>एतानि सर्वजगतः परिव्याप्य स्थितानि हि।<br>बलिना बलवान् ब्रह्मंस्तिष्योऽपि हि कृतः कृतः ॥ १२ | भगवान् ब्रह्माके इस प्रकार कहनेपर अव्यय कलि, इन्द्र आदि देवताओंको चिन्तित हुआ देखकर विभीतक वनमें चला गया। नारदजी! कलिके अदृश्य हो जानेसे तीनों लोकोंमें सत्ययुग प्रवर्तित हो गया। चारों वर्णोंमें चारों चरणोंसे धर्म व्याप्त हो गया। तपस्या, अहिंसा, सत्य, पवित्रता, इन्द्रियनिग्रह, दया, दान, मृदुता, सेवा और यज्ञकार्य—ये सभी समस्त जगत्में छा गये। ब्रह्मन्! बलिने बलशाली कलिको भी सत्ययुग बना दिया ॥ ९-१२ ॥ |
| स्वधर्मस्थायिनो वर्णा ह्याश्रमांश्चाविशन् द्विजाः।<br>प्रजापालनधर्मस्थाः सदैव मनुजर्षभाः ॥ १३<br>धर्मोत्तरे वर्तमाने ब्रह्मन्नस्मिञ्जगत्त्रये।<br>त्रैलोक्यलक्ष्मीर्वरदा त्वायाता दानवेश्वरम् ॥ १४<br>तामागतां निरीक्ष्यैव सहस्राक्षाश्रियं बलिः।<br>पप्रच्छ काऽसि मां ब्रूहि केनास्यर्थेन चागता ॥ १५<br>सा तद्वचनमाकर्ण्य प्राह श्रीः पद्ममालिनी।<br>बले शृणुष्व याऽस्मि त्वामायाता महिषी बलात् ॥ १६ | सभी वर्ण अपने-अपने धर्ममें स्थित हो गये। द्विजगण अपने-अपने आश्रमोंका पालन करने लगे तथा राजा प्रजापालनरूपी धर्मका आचरण करने लगे। ब्रह्मन्! इन तीनों लोकोंके धर्म-परायण होनेपर वरदायिनी त्रैलोक्यलक्ष्मी दानवराज बलिके पास आयीं। इन्द्रकी लक्ष्मीको उपस्थित हुई देखकर बलिने पूछा—मुझे यह बतलाओ कि तुम कौन हो और किस उद्देश्यसे आयी हो। कमलकी मालासे अलंकृत लक्ष्मीने उसकी बात सुनकर कहा—बले! मैं हठात् तुम्हारे पास आयी हूँ; मैं जो (स्त्री) हूँ उसे सुनो—॥ १३-१६ ॥ |
| अप्रमेयबलो देवो योऽसौ चक्रगदाधरः।<br>तेन त्यक्तस्तु मघवा ततोऽहं त्वामिहागता ॥ १७<br><br>स निर्ममे युवतयश्चतस्रो रूपसंयुताः।<br>श्वेताम्बरधरा चैव श्वेतस्रगनुलेपना ॥ १८<br><br>श्वेतवृन्दारकारूढा सत्त्वाढ्या श्वेतविग्रहा।<br>रक्ताम्बरधरा चान्या रक्तस्रगनुलेपना ॥ १९ | अमित शक्तिशाली चक्र और गदाको धारण करनेवाले देव विष्णुने इन्द्रको छोड़ दिया है। अतः मैं यहाँ तुम्हारे पास आयी हूँ। उन्होंने (विष्णुने) रूपसे सम्पन्न चार युवतियोंकी सृष्टि की। (पहली युवती) सत्त्वप्रधाना, श्वेतवर्णकी शरीरवाली, श्वेतवर्णका वस्त्र धारण करनेवाली, श्वेतमाल्य और अनुलेपनसे युक्त एवं श्वेत गजपर आरूढ़ थी। (दूसरी युवती) रजोगुणप्रधाना, रक्तवर्णकी शरीरवाली, रक्तवर्णके वस्त्रको धारण करनेवाली, रक्तवर्णके माल्य और अनुलेपनसे युक्त |