वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ३७२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७५ |
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| रक्तवाजिसमारूढा रक्ताङ्गी राजसी हि सा।<br>पीताम्बरा पीतवर्णा पीतमाल्यानुलेपना ॥ २०<br>सौवर्णस्यन्दनचरा तामसं गुणमाश्रिता।<br>नीलाम्बरा नीलमाल्या नीलगन्धानुलेपना ॥ २१<br>नीलवृषसमारूढा त्रिगुणा सा प्रकीर्तिता।<br>या सा श्वेताम्बरा श्वेता सत्त्वाढ्या कुञ्जरस्थिता ॥ २२<br>सा ब्रह्माणं समायाता चन्द्रं चन्द्रानुगानपि।<br>या रक्ता रक्तवसना वाजिस्था रजसान्विता ॥ २३<br>तां प्रादाद् देवराजाय मनवे तत्समेषु च।<br>पीताम्बरा या सुभगा रथस्था कनकप्रभा ॥ २४<br>प्रजापतिभ्यस्तां प्रादाच्छुक्राय च विशःसु च।<br>नीलवस्त्राऽलिसदृशी या चतुर्थी वृषस्थिता ॥ २५<br>सा दानवान् नैर्ऋतांश्च शूद्रान् विद्याधरानपि।<br>विप्राद्याः श्वेतरूपां तां कथयन्ति सरस्वतीम् ॥ २६ | तथा रक्तवर्णके अश्वपर आरूढ़ थी। (तीसरी युवती) तमोगुण-प्रधाना, पीतवर्णके शरीरवाली, पीतवर्णका वस्त्र धारण करनेवाली, पीतवर्णकी माला और अनुलेपनसे युक्त तथा सुवर्णके बने रथपर आरूढ़ थी। (चौथी युवती) त्रिगुण-प्रधाना, नील शरीरवाली, नीलेवर्णका वस्त्र धारण करनेवाली एवं नीले वर्णकी माला, चन्दन और अनुलेपनसे युक्त तथा नील वर्णके वृषपर आरूढ़ थी। सत्त्वप्रधाना, श्वेतवर्णकी शरीरवाली, श्वेतवस्त्र धारण करनेवाली हाथीपर आरूढ़ (युवती) ब्रह्मा, चन्द्रमा एवं चन्द्रमाके अनुयायियोंके पास चली गयी। रजोगुणसे युक्त, रक्तवर्णकी शरीरवाली, रक्तवस्त्र धारण करनेवाली एवं घोड़ेपर आरूढ़ युवतीको (उन्होंने) इन्द्र, मनु तथा उनके समानवाले लोगोंको प्रदान किया। कनकवर्णकी शरीरवाली, पीतवर्णके वस्त्र धारण करनेवाली, सौभाग्यवती, रथपर आरूढ़ा युवतीको (उन्होंने) प्रजापतियों, शुक्र एवं वैश्योंको दिया। नीलवर्णके वस्त्रको धारण करनेवाली, भ्रमरके समान, वृषपर स्थित चौथी (युवती) दानवों, नैर्ऋतों, शूद्रों एवं विद्याधरोंके पास चली गयी। उस श्वेतरूपाको विप्र आदि सरस्वती कहते हैं॥ १७—२६॥ | | स्तुवन्ति ब्रह्मणा सार्धं मखे मन्त्रादिभिः सदा।<br>क्षत्रिया रक्तवर्णां ता जयश्रीमिति शंसिरे ॥ २७<br>सा चेन्द्रेणासुरश्रेष्ठ मनुना च यशस्विनी।<br>वैश्यास्तां पीतवसनां कनकाङ्गीं सदैव हि ॥ २८<br>स्तुवन्ति लक्ष्मीमित्येवं प्रजापालास्तथैव हि।<br>शूद्रास्तां नीलवर्णाङ्गीं स्तुवन्ति च सुभक्तितः ॥ २९<br>श्रिया देवीति नाम्ना तां समं दैत्यैश्च राक्षसैः।<br>एवं विभक्तास्ता नार्यस्तेन देवेन चक्रिणा ॥ ३० | यज्ञमें वे ब्रह्माके सहित उसका मन्त्रादिसे सदा स्तुति करते हैं। क्षत्रियजन उस रक्तवर्णाको जयश्री कहते हैं। असुरश्रेष्ठ! वह इन्द्र तथा मनुके साथ यशोमती हुई। वैश्य तथा प्रजापतिगण उस पीतवसना कनकाङ्गीकी स्तुति सदा लक्ष्मीके नामसे करते हैं। दैत्यों एवं राक्षसोंके साथ शूद्रगण श्रीदेवीके नामसे भक्तिपूर्वक उस नीलवर्णाङ्गीकी स्तुति करते हैं। इस प्रकार उन चक्र धारण करनेवाले देवने उन नारियोंका विभाजन किया॥ २७—३०॥ | | एतासां च स्वरूपस्थास्तिष्ठन्ति निधयोऽव्ययाः।<br>इतिहासपुराणानि वेदाः साङ्गास्तथोक्तयः ॥ ३१<br>चतुःषष्टिकलाः श्वेता महापद्मो निधिः स्थितः।<br>मुक्तासुवर्णरजतं रथाश्वगजभूषणम् ॥ ३२<br>शस्त्रास्त्रादिकवस्त्राणि रक्ता पद्मो निधिः स्मृतः।<br>गोमहिष्यः खरोष्ट्रं च सुवर्णाम्बरभूमयः ॥ ३३<br>ओषध्यः पशवः पीता महानीलो निधिः स्थितः।<br>सर्वासामपि जातीनां जातिरेका प्रतिष्ठिता ॥ ३४ | अक्षय निधियाँ इनके स्वरूपमें स्थित हैं। इतिहास, पुराण, साङ्ग वेद, स्मृतियाँ, चौंसठ कलाएँ तथा महापद्म निधि श्वेताङ्गीके अन्तर्गत हैं। मुक्ता, सुवर्ण, रजत, रथ, अश्व, गज, भूषण, शस्त्र, अस्त्र एवं वस्त्रस्वरूप पद्मानिधि रक्ताङ्गीके अन्तर्गत हैं। गौ, भैंस, गर्दभ, उष्ट्र, सुवर्ण, वस्त्र, भूमि, ओषधियाँ एवं पशुस्वरूप महानील निधि पीताङ्गीमें स्थित हैं। अन्य सभी जातियोंको अपनेमें समाविष्ट करनेवाली सारी जातियोंमें सर्वश्रेष्ठ जाति |