वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| अध्याय ७५ ] | त्रैलोक्य-लक्ष्मीका बलिके यहाँ आना, श्वेत लक्ष्मी आदिकी उत्पत्ति | ३७३ |
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| अन्येषामपि संहर्त्री नीला शङ्खे निधिः स्थितः ।<br>एतासु संस्थितानां च यानि रूपाणि दानव ।<br>भवन्ति पुरुषाणां वै तान् निबोध वदामि ते ॥ ३५ | (परसामान्यात्मक) स्वरूप शङ्खनिधिकी नीलाङ्गी देवीमें स्थिति है। दानव ! इन (निधियों)-के स्वरूपके अन्तर्गत पुरुषोंके जो लक्षण होते हैं, मैं उनका वर्णन कर रही हूँ, उन्हें समझो— ॥ ३१–३५ ॥ | | सत्यशौचाभिसंयुक्ता मखदानोत्सवे रताः ।<br>भवन्ति दानवपते महापद्माश्रिता नराः ॥ ३६<br>यज्विनः सुभगा दृप्ता मानिनो बहुदक्षिणाः ।<br>सर्वसामान्यसुखिनो नराः पद्माश्रिताः स्मृताः ॥ ३७<br>सत्यानृतसमायुक्ता दानाहरणदक्षिणाः ।<br>न्यायान्यायव्ययोपेता महानीलाश्रिता नराः ॥ ३८<br>नास्तिकाः शौचरहिताः कृपणा भोगवर्जिताः ।<br>स्तेयानृतकथायुक्ता नराः शङ्खाश्रिता बले ॥ ३९<br>इत्येवं कथितस्तुभ्यं तेषां दानव निर्णयः ॥ ४० | दानवपते! महापद्मके आश्रित रहनेवाले मनुष्य सत्य और शौचसे युक्त तथा यजन, दान और उत्सव करनेमें लीन रहते हैं। पद्मके आश्रित रहनेवाले मनुष्य यज्ञ करनेवाले, सौभाग्यशाली, अहङ्कारी, मानप्रिय, बहुत दक्षिणा देनवाले तथा सर्वसाधारण लोगोंसे सुखी होते हैं। महानीलके आश्रित रहनेवाले व्यक्ति सत्य तथा असत्यसे युक्त, देने और लेनेमें चतुर तथा न्याय, अन्याय और व्यय करनेवाले होते हैं। बले! शङ्खके आश्रित रहनेवाले पुरुष नास्तिक, अपवित्र, कृपण, भोगहीन, चोरी करनेवाले एवं असत्य बोलनेवाले होते हैं। दानव ! मैंने इस प्रकार आपसे उनके स्वरूपका वर्णन किया ॥ ३६–४० ॥ | | अहं सा रागिणी नाम जयश्रीस्त्वामुपागता ।<br>ममास्ति दानवपते प्रतिज्ञा साधुसम्मता ॥ ४१<br>समाश्रयामि शौर्याढ्यं न च क्लीबं कथंचन ।<br>न चास्ति भवतस्तुल्यो त्रैलोक्येऽपि बलाधिकः ॥ ४२<br>त्वया बलविभूत्या हि प्रीतिर्मे जनिता ध्रुवा ।<br>यत्त्वया युधि विक्रम्य देवराजो विनिर्जितः ॥ ४३<br>अतो मम पुरा प्रीतिर्जाता दानव शाश्वती ।<br>दृष्ट्वा ते परमं सत्त्वं सर्वेभ्योऽपि बलाधिकम् ॥ ४४ | वही रागिणी नामकी जयश्री मैं आपके पास आयी हूँ। दानवपते ! मेरी साधुजनोंसे अनुमोदित एक प्रतिज्ञा है। मैं वीर पुरुषका आश्रय करती हूँ। नपुंसकके पास कभी नहीं जाती। तीनों लोकोंमें आपके सदृश बलवान् दूसरा कोई नहीं है। अपनी बल-सम्पत्तिसे तुमने मेरेमें दृढ़ प्रीति उत्पन्न की है, क्योंकि संग्राममें पराक्रम कर तुमने देवराजको जीता है। दानव ! इसीसे आपके श्रेष्ठ सत्त्व एवं सभीसे अधिक बलको देखकर (आपके प्रति) मेरी स्थायी एवं उत्तम प्रीति उत्पन्न हो गयी है ॥ ४१–४४ ॥ | | शौण्डीर्यमानिनं वीरं ततोऽहं स्वयमागता ।<br>नाश्चर्यं दानवश्रेष्ठ हिरण्यकशिपोः कुले ॥ ४५<br>प्रसूतस्यासुरेन्द्रस्य तव कर्म यदीदृशम् ।<br>विशेषितस्त्वया राजन् दैतेयः प्रपितामहः ॥ ४६<br>विजितं विक्रमाद् येन त्रैलोक्यं वै परैर्हृतम् ।<br>इत्येवमुक्त्वा वचनं दानवेन्द्रं तदा बलिम् ॥ ४७<br>जयश्रीश्चन्द्रवदना प्रविष्टाऽद्योतयच्छुभा ।<br>तस्यां चाथ प्रविष्टायां विधवा इव योषितः ॥ ४८<br>समाश्रयन्ति बलिनं ह्रीश्रीधीधृतिकीर्तयः ।<br>प्रभा मतिः क्षमा भूतिर्विद्या नीतिर्दया तथा ॥ ४९ | अतः मैं अत्यन्त बलशाली तथा मानी वीर आपके पास अपने-आप ही आयी हूँ। दानवश्रेष्ठ ! हिरण्यकशिपुके वंशमें उत्पन्न आप असुरेन्द्रके लिये इस प्रकारके कर्मोंके करनेमें कोई आश्चर्य नहीं है। राजन् ! शत्रुओंकेद्वारा अधिकृत त्रैलोक्यको अपने पराक्रमसे जीतकर आपने दितिके पुत्र अपने प्रपितामहको और विशिष्ट कर दिया है। दानवेन्द्र बलिसे इस प्रकार कहकर चन्द्रवदना शुभा जयश्री (बलिमें) प्रवेश करके (उन्हें) प्रकाशित करने लगी। उनके प्रवेश कर जानेपर ही, श्री, धी (बुद्धि), धृति, कीर्ति, प्रभा, मति, क्षमा, भूति (समृद्धि), विद्या, नीति, दया, |