वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ३७४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७६ |
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| श्रुतिः स्मृतिर्धृतिः कीर्तिर्मूर्तिः शान्तिः क्रियान्विता।<br>पुष्टिस्तुष्टी रुचिस्त्वन्या तथा सत्त्वाश्रिता गुणाः।<br>ताः सर्वा बलिमाश्रित्य व्यश्राम्यन्त यथासुखम्॥ ५०<br><br>एवं गुणोऽभूद् दनुपुङ्गवोऽसौ<br>बलिर्महात्मा शुभबुद्धिरात्मवान्।<br>यज्वा तपस्वी मृदुरेव सत्यवाग्<br>दाता विभर्ता स्वजनाभिगोप्ता॥ ५१<br><br>त्रिविष्टपं शासति दानवेन्द्रे<br>नासीत् क्षुधार्तो मलिनो न दीनः।<br>सदोज्ज्वलो धर्मरतोऽथ दान्तः<br>कामोपभोक्ता मनुजोऽपि जातः॥ ५२ | श्रुति, स्मृति, धृति, कीर्ति, मूर्ति, शान्ति, क्रिया, पुष्टि, तुष्टि, रुचि एवं अन्य सभी सत्त्वगुणके आश्रित अन्य देवियाँ भी विधवा स्त्रियोंकी भाँति बलिकी छत्रछायामें आनन्दपूर्वक रहने लगीं। अच्छी बुद्धिवाले, आत्मनिष्ठ, यज्ञ करनेवाले, तपस्वी, कोमल स्वभाववाले, सत्यवक्ता, दानी, अभावग्रस्तोंके अभावको दूरकर पालन-पोषण एवं स्वजनोंकी रक्षा करनेवाले दैत्यश्रेष्ठ महात्मा बलि इस प्रकारके गुणोंसे सम्पन्न थे। दानवेन्द्र बलिके स्वर्गका शासन करते समय कोई भूखसे दुखी, मलिन एवं अभावग्रस्त नहीं था। मनुष्य भी सदा शुद्ध धर्म-परायण, इन्द्रियविजयी एवं इच्छानुकूल भोगसे सम्पन्न हो गये॥ ४५-५२॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें पचहत्तरवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ७५॥
छिहत्तरवाँ अध्याय
प्रायश्चित्त-हेतु इन्द्रकी तपस्या, माताके आश्रममें आना, अदितिकी तपस्या और वासुदेवकी स्तुति, वासुदेवका अदितिके पुत्र बननेका आश्वासन और स्वतेजसे अदितिके गर्भमें प्रवेश
| पुलस्त्य उवाच<br>गते त्रैलोक्यराज्ये तु दानवेषु पुरन्दरः।<br>जगाम ब्रह्मसदनं सह देवैः शचीपतिः॥ १<br>तत्रापश्यत् स देवेशं ब्रह्माणं कमलोद्भवम्।<br>ऋषिभिः सार्धमासीनं पितरं स्वं च कश्यपम्॥ २<br>ततो ननाम शिरसा शक्रः सुरगणैः सह।<br>ब्रह्माणं कश्यपं चैव तांश्च सर्वांस्तपोधनान्॥ ३<br>प्रोवाचेन्द्रः सुरैः सार्धं देवनाथं पितामहम्।<br>पितामह हृतं राज्यं बलिना बलिना मम॥ ४<br>ब्रह्मा प्रोवाच शक्रैतद् भुज्यते स्वकृतं फलम्।<br>शक्रः पप्रच्छ भो ब्रूहि किं मया दुष्कृतं कृतम्॥ ५<br>कश्यपोऽप्याह देवेशं भ्रूणहत्या कृता त्वया।<br>दित्युदरात् त्वया गर्भः कृत्तो वै बहुधा बलात्॥ ६ | पुलस्त्यजी बोले—(नारदजी!) तीनों लोकोंका राज्य दानवोंके अधीन हो जानेपर शचीपति इन्द्र देवोंके साथ ब्रह्मलोक गये। वहाँ उन्होंने ऋषियोंके साथ बैठे हुए कमलयोनि ब्रह्मा एवं अपने पिता कश्यपको देखा। उसके बाद इन्द्रने देवताओंके सहित ब्रह्मा, कश्यप एवं उन सभी तपोधनोंको सिर झुकाकर प्रणाम किया। देवोंके साथ इन्द्रने देवनाथ पितामहसे कहा—पितामह! बलवान् बलिने मेरा राज्य छीन लिया है। ब्रह्माने कहा—इन्द्र! यह तुम अपने किये हुए कर्मका फल भोग रहे हो। इन्द्रने पूछा—कृपया आप बतलाइये कि मैंने कौन-सा दुष्कर्म किया है। कश्यपने भी (उत्तरमें) इन्द्रसे कहा—तुमने भ्रूण (गर्भस्थित बालक)-की हत्या की है। तुमने दितिके उदरमें स्थित गर्भको बलपूर्वक अनेक टुकड़ोंमें काट डाला है॥ १-६॥ |