भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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अध्याय ७६ ] प्रायश्चित्त-हेतु इन्द्रकी तपस्या, माताके आश्रममें आना, अदितिकी तपस्या और वासुदेवकी स्तुति ३७५

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पितरं प्राह देवेन्द्रः स मातृदोषतो विभो।<br>कृन्तनं प्राप्तवान् गर्भो यदशौचा हि साभवत् ॥ ७<br>ततोऽब्रवीत् कश्यपस्तु मातृदोषः स दासताम्।<br>गतस्ततो विनिहतो दासोऽपि कुलिशेन भो ॥ ८<br>तच्छ्रुत्वा कश्यपवचः प्राह शक्रः पितामहम्।<br>विनाशं पाप्मनो ब्रूहि प्रायश्चित्तं विभो मम ॥ ९<br>ब्रह्मा प्रोवाच देवेशं वसिष्ठः कश्यपस्तथा।<br>हितं सर्वस्य जगतः शक्रस्यापि विशेषतः ॥ १०<br>शङ्खचक्रगदापाणिर्माधवः पुरुषोत्तमः।<br>तं प्रपद्यस्व शरणं स ते श्रेयो विधास्यति ॥ ११<br>सहस्राक्षोऽपि वचनं गुरूणां स निशम्य वै।<br>प्रोवाच स्वल्पकालेन कस्मिन् प्राप्यो बहूदयः।<br>तमूचुर्देवता मर्त्ये स्वल्पकाले महोदयः ॥ १२इन्द्रने अपने पिता कश्यपसे कहा—विभो! जननीके दोषसे वह गर्भ छिन्न हुआ था; क्योंकि वे अपवित्र हो गयी थीं। उसके बाद कश्यपने कहा—माताके दोषसे वह दासताको प्राप्त हो चुका था, उसके बाद तुमने दासको भी वज्रसे मारा। कश्यपके उस वचनको सुनकर इन्द्रने पितामहसे कहा—विभो! मुझे पापका नाश करनेवाला प्रायश्चित्त बतला दीजिये। ब्रह्मा, वसिष्ठ एवं कश्यपने देवेश (इन्द्र)-से सब जगत्के लिये—विशेषरूपसे इन्द्रके लिये हितकारी वचन कहा—तुम शङ्ख, चक्र तथा गदा धारण करनेवाले पुरुषोत्तमभगवान् लक्ष्मीपति श्रीविष्णुकी शरणमें जाओ। वे तुम्हारा कल्याण करेंगे। उन सहस्राक्षने गुरुजनोंका वचन सुनकर कहा—थोड़े समयमें अधिक-से-अधिक उन्नतिकी प्राप्ति कहाँ सम्भव है? देवोंने उनसे कहा—स्वल्प समयमें महती उन्नति मर्त्यलोकमें सम्भव है॥ ७-१२॥
इत्येवमुक्तः सुरराड् विरिञ्चिना<br>मरीचिपुत्रेण च कश्यपेन।<br>तथैव मित्रावरुणात्मजेन<br>वेगान्महीपृष्ठमवाप्य तस्थौ ॥ १३<br>कालिञ्जरस्योत्तरतः सुपुण्य-<br>स्तथा हिमाद्रेरपि दक्षिणस्थः।<br>कुशस्थलात् पूर्वत एव विश्रुतो<br>वसोः पुरात् पश्चिमतौऽवतस्थे ॥ १४<br>पूर्वं गयेन नृवरेण यत्र<br>यज्ञोऽश्वमेधः शतकृत्सदक्षिणः।<br>मनुष्यमेधः शतकृत्सहस्रकृन्<br>नरेन्द्रसूनुश्च सहस्रकृद् वै ॥ १५<br>तथा पुरा दुर्जयतः सुरासुरैः<br>ख्यातो महामेध इति प्रसिद्धः।<br>यत्रास्य चक्रे भगवान् मुरारिः<br>वास्तव्यमव्यक्ततनुः खमूर्तिमत्।<br>ख्यातिं जगामाथ गदाधरेति<br>महाघवृक्षस्य शितः कुठारः ॥ १६ब्रह्मा, मरीचिपुत्र कश्यप एवं वसिष्ठके ऐसा कहनेपर सुरराज इन्द्र तेजीसे पृथ्वीतलपर आ गये। वे कालिञ्जर पर्वतके उत्तर, हिमाद्रिके दक्षिण, कुशस्थलके पूर्व एवं वसुपुरके पश्चिममें स्थित विख्यात पुण्य स्थानमें रहने लगे—जहाँ पहले राजा गयने दक्षिणाके साथ सौ अश्वमेधयज्ञ, ग्यारह सौ नरमेधयज्ञ तथा एक हजार राजसूययज्ञका अनुष्ठान किया था। उसी प्रकार पहले (उसने) जहाँपर सुरों एवं असुरोंसे कठिनाईसे किया जा सकनेवाला महामेध नामक प्रसिद्ध यज्ञ अनुष्ठित किया था और उसके लिये जहाँ आकाशस्वरूप अव्यक्तशरीरी मुरारि (विष्णु)-ने वहाँ निवास किया था। इसके बाद वे गदाधर नामसे प्रसिद्ध हुए, जो महान् अघरूपी वृक्षके लिये तीक्ष्ण कुठारस्वरूप हैं॥ १३-१६॥
यस्मिन् द्विजेन्द्राः श्रुतिशास्त्रवर्जिताः<br>समत्वमायान्ति पितामहेन।<br>सकृत् पितॄन् यत्र च सम्प्रपूज्य<br>भक्त्या त्वनन्येन हि चेतसैव।<br>फलं महामेधमखस्य मानवा<br>लभन्त्यनन्त्यं भगवत्प्रसादात् ॥ १७<br>महानदी यत्र सुरर्षिकन्या<br>जलापदेशाद्धिमशैलमेत्य ।जहाँ वेद-शास्त्रसे रहित होनेपर भी कुलीन श्रेष्ठ ब्राह्मण ब्रह्माकी समानता प्राप्त करते हैं एवं मनोयोगसे भक्तिसहित मनुष्य एक बार भी पितरोंका पूजन करके भगवान्‌के अनुग्रहसे महामेध नामक यज्ञका अनन्त फल प्राप्त कर लेते हैं, वहाँ देवर्षिकी कन्या श्रेष्ठ महानदी है, जो जलरूपसे हिमालयपर प्रवहमान होकर अपने दर्शन,