वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ३७६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७६ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| चक्रे जगत्पापविनष्टिमग्र्यां<br>संदर्शनप्राशनमज्जनेन ॥ १८ | पान एवं मज्जन करनेसे जगत्के पापोंको विनष्ट करती है। |
| तत्र शक्रः समभ्येत्य महानद्यास्तटेऽद्भुते।<br>आराधनाय देवस्य कृत्वाश्रममवस्थितः ॥ १९<br>प्रातःस्नायी त्वधःशायी एकभुक्तस्त्वयाचितः।<br>तपस्तेपे सहस्राक्षः स्तुवन् देवं गदाधरम् ॥ २०<br>तस्यैवं तप्यतः सम्यग्जितसर्वेन्द्रियस्य हि।<br>कामक्रोधविहीनस्य साग्रः संवत्सरो गतः ॥ २१<br>ततो गदाधरः प्रीतो वासवं प्राह नारद।<br>गच्छ प्रीतोऽस्मि भवतो मुक्तपापोऽसि साम्प्रतम् ॥ २२ | विष्णुकी आराधना करनेके लिये इन्द्र वहाँ महानदीके विचित्र तटपर गये और आश्रम बनाकर रहने लगे। वे प्रातःकाल स्नान, भूमिपर शयन एवं बिना माँगे मिले हुए पदार्थसे एक समय भोजन करते हुए गदाधारी देवकी स्तुति करते हुए तपस्या करने लगे। सर्वथा जितेन्द्रिय एवं काम-क्रोधादिसे रहित होकर इस प्रकार तपस्या करते हुए उनका एक वर्ष बीत गया। नारदजी! उसके बाद गदा धारण करनेवाले विष्णुने प्रसन्न होकर इन्द्रसे कहा—जाओ, मैं प्रसन्न हूँ; अब तुम पापसे मुक्त हो गये हो ॥ १७–२२ ॥ |
| निजं राज्यं च देवेश प्राप्स्यसे नचिरादिव।<br>यतिष्यामि तथा शक्र भावि श्रेयो यथा तव ॥ २३<br>इत्येवमुक्तोऽथ गदाधरेण<br>विसर्जितः स्नाप्य मनोहरायाम्।<br>स्नातस्य देवस्य तदैनसो नरा-<br>स्तं प्रोचुरस्माननुशासयस्व ॥ २४<br>प्रोवाच तान् भीषणकर्मकारान्<br>नाम्ना पुलिन्दान् मम पापसम्भवाः।<br>वसध्वमेवान्तरमद्रिमुख्ययो-<br>र्हिमाद्रिकालिञ्जरयोः पुलिन्दाः ॥ २५<br>इत्येवमुक्त्वा सुरराट् पुलिन्दान्<br>विमुक्तपापोऽमरसिद्धयक्षैः।<br>सम्पूज्यमानोऽनुजगाम चाश्रमं<br>मातुस्तदा धर्मनिवासमीड्यम् ॥ २६ | देवेश! (अब) तुम शीघ्र ही अपना राज्य प्राप्त कर लोगे। इन्द्र! जैसे तुम्हारा आगेका श्रेय (कल्याण) होगा, वैसा ही मैं प्रयत्न करूँगा। गदाधर श्रीविष्णुने ऐसा कहनेके बाद इन्द्रको मनोहरा नदीमें स्नान कराकर बिदा कर दिया। इन्द्रके स्नान कर लेनेपर उनके पाप-पुरुषोंने उनसे कहा—हमें अनुशासित कीजिये। (इन्द्रने) उन भयंकर कर्म करनेवाले लोगोंसे कहा—मेरे पापसे उत्पन्न तुम लोग पुलिन्द कहे जाओगे। तुम लोग हिमालय एवं कालिञ्जर नामके दोनों श्रेष्ठ पर्वतोंके बीचकी भूमिमें निवास करो। पुलिन्दोंसे ऐसा कहनेके पश्चात् पापसे मुक्त हुए सुरराज देवों, सिद्धों एवं यक्षोंसे पूजित होते हुए माताके धर्मके आश्रयरूप पूज्य आश्रममें चले गये ॥ २३–२६ ॥ |
| दृष्ट्वाऽदितिं मूर्ध्नि कृताञ्जलिस्तु<br>विनम्रमौलिः समुपाजगाम।<br>प्रणम्य पादौ कमलोदराभौ<br>निवेदयामास तपस्तदात्मनः ॥ २७<br>पप्रच्छ सा कारणमीश्वरं त-<br>माघ्राय चालिङ्ग्य सहस्रदृष्ट्या।<br>स चाचचक्षे बलिना रणे जयं<br>तदात्मनो देवगणैश्च सार्धम् ॥ २८<br>श्रुत्वैव सा शोकपरप्लुताङ्गी<br>ज्ञात्वा जितं दैत्यसुतैः सुतं तम्।<br>दुःखान्विता देवमनाद्यमीड्यं<br>जगाम विष्णुं शरणं वरेण्यम् ॥ २९ | अदितिका दर्शन कर हाथ जोड़ तथा सिर झुकाकर इन्द्र उनके समीप आये एवं उनके कमलकी कान्तिवाले चरणोंमें प्रणाम करनेके बाद उन्होंने अपनी तपस्याका वर्णन किया। उन (अदिति)-ने अश्रुपूर्ण दृष्टिसे (इन्द्रको) सूँघा एवं उनको गले लगाकर (तपस्याका कारण) पूछा। इन्द्रने बलिद्वारा देवोंसहित अपने पराजित होनेका पूरा समाचार कह सुनाया। यह सुननेके बाद अपने उस पुत्रको दितिके पुत्रोंद्वारा पराजित जान शोकसे भर गयीं एवं दुःखसे दुखी होकर (अदिति) वरेण्य एवं अनादि देव विष्णुकी शरणमें गयीं ॥ २७–२९ ॥ |
| नारद उवाच<br>कस्मिन् जनित्री सुरसत्तमानां<br>स्थाने हृषीकेशमनन्तमाद्यम्।<br>चराचरस्य प्रभवं पुराण-<br>माराधयामास शुभे वद त्वम् ॥ ३० | नारदने कहा (पूछा)—(कृपया) आप यह बतलाइये कि देवोंकी माता अदितिने किस शुभ स्थानपर अनादि, अनन्त, चर और अचरके उत्पन्न करनेवाले एवं पुरातन हृषीकेशकी आराधना की ? ॥ ३० ॥ |