भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

पृष्ठ 387, कुल 489 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 387

अध्याय ७६ ] प्रायश्चित्त-हेतु इन्द्रकी तपस्या, माताके आश्रममें आना, अदितिकी तपस्या और वासुदेवकी स्तुति ३७७

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पुलस्त्य उवाच<br>सुरारणिः शक्रमवेक्ष्य दीनं<br>पराजितं दानवनायकेन।<br>सितेऽथ पक्षे मकरर्क्षगोऽर्के<br>घृतार्चिषः स्यादथ सप्तमेऽह्नि॥ ३१<br>दृष्ट्वैव देवं त्रिदशाधिपं तं<br>महोदये शक्रदिशारूढम्।<br>निराशना संयतवाक् सुचित्ता<br>तदोपतस्थे शरणं सुरेन्द्रम्॥ ३२**पुलस्त्यजी बोले—**दानव-नायकद्वारा पराजित हुए दीन बने इन्द्रको देखकर अदिति सूर्यके मकर-राशिमें स्थित हो जानेपर शुक्लपक्षकी सूर्य-सप्तमीके दिन उन सुरोंके स्वामी सूर्यदेवको महान् उदयाचलपर पूर्व दिशामें उगनेपर देखकर उपवास करती हुई वाणी एवं मनको संयत करके उन सुरेन्द्र (सूर्य)-की शरणमें गयीं॥ ३१-३२॥
अदितिरुवाच<br>जयस्व दिव्याम्बुजकोशचौर<br>जयस्व संसारतरोः कुठार।<br>जयस्व पापेन्धनजातवेद-<br>स्तमौघसंरोध नमो नमस्ते॥ ३३<br>नमोऽस्तु ते भास्कर दिव्यमूर्ते<br>त्रैलोक्यलक्ष्मीतिलकाय ते नमः।<br>त्वं कारणं सर्वचराचरस्य<br>नाथोऽसि मां पालय विश्वमूर्ते॥ ३४<br>त्वया जगन्नाथ जगन्मयेन<br>नाथेन शक्रो निजराज्यहानिम्।<br>अवाप्तवाञ् शत्रुपराभवं च<br>ततो भवन्तं शरणं प्रपन्ना॥ ३५<br>इत्येवमुक्त्वा सुरपूजितं सा<br>आलिख्य रक्तेन हि चन्दनेन।<br>सम्पूजयित्वा करवीरपुष्पैः<br>संधूप्य धूपैः कणमर्कभोज्यम्॥ ३६<br>निवेद्य चैवाज्ययुतं महार्ह-<br>मन्नं महेन्द्रस्य हिताय देवी।<br>स्तवेन पुण्येन च संस्तुवन्ती<br>स्थिता निराहारमथोपवासम्॥ ३७**अदितिने कहा—**हे दिव्य कमलकोशको अपनेमें छिपाकर रखनेवाले! आपकी जय हो। हे संसाररूपी वृक्षके कुठार! आपकी जय हो। हे पापरूपी इन्धनके लिये अग्नि! आपकी जय हो। हे अन्धकार (अज्ञान)-के समूहके विनाश करनेवाले! आपको बारम्बार नमस्कार है। हे भास्कर! हे दिव्यमूर्ते! आपको नमस्कार है। हे त्रैलोक्य-लक्ष्मीके स्वामिन्! आपको नमस्कार है। आप समस्त चर और अचर जगत्‌के कारण तथा स्वामी हैं। हे विश्वमूर्ते! आप मेरी रक्षा कीजिये। हे जगन्नाथ! जगन्मय आप स्वामीके ही कारण इन्द्रको अपने राज्यकी हानि एवं शत्रुसे पराभवकी भी प्राप्ति हुई है। अतः मैं आपकी शरणमें आयी हूँ। ऐसा कहनेके बाद रक्तचन्दनद्वारा देवोंसे पूजित सूर्यको चित्रितकर उन देवी (अदिति)-ने कनैंरके पुष्पोंसे उनका पूजन किया और धूपसे धूपित करनेके बाद महेन्द्रकी भलाईके लिये सूर्यके लिये घृतसे बने उत्तम अन्न अर्पित किया तथा निराहार रहकर पवित्र स्तोत्रोंसे स्तुति करती हुई (साधनामें) बैठी रहीं॥ ३३-३७॥
ततो द्वितीयेऽह्नि कृतप्रणामा<br>स्नात्वा विधानेन च पूजयित्वा।<br>दत्त्वा द्विजेभ्यः कणकं तिलाज्यं<br>ततोऽग्रतः सा प्रयता बभूव॥ ३८<br>ततः प्रीतोऽभवद् भानुर्घृतार्चिः सूर्यमण्डलात्।<br>विनिःसृत्याग्रतः स्थित्वा इदं वचनमब्रवीत्॥ ३९<br>व्रतेनानेन सुप्रीतस्तवाहं दक्षनन्दिनि।<br>प्राप्स्यसे दुर्लभं कामं मत्प्रसादान्न संशयः॥ ४०<br>राज्यं त्वत्तनयानां वै दास्ये देवि सुरारणि।<br>दानवान् ध्वंसयिष्यामि सम्भूयैवोदरे तव॥ ४१दूसरे दिन प्रणाम करनेके बाद विधिसे स्नान एवं पूजा करके उन्होंने ब्राह्मणोंको कणक, तिल एवं घृत प्रदान किया और उसके बाद वे और अधिक संयत रहने लगीं। इससे घृतार्चि भानु प्रसन्न हो गये। (वे) सूर्य-मण्डलसे निकले एवं अदितिके सामने खड़े होकर यह वचन बोले—दक्षनन्दिनि! तुम्हारे इस व्रतसे मैं बहुत प्रसन्न हूँ। अतः मेरी कृपासे तुम निःसन्देह मनोवाञ्छित दुर्लभ वस्तु प्राप्त करोगी। देवि! देवजननि! मैं तुम्हारा पुत्र होकर देवपुत्रोंको राज्य दूँगा और दानवोंका नाश करूँगा॥ ३८-४१॥