वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ३७८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७७ |
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| तद्वाक्यं वासुदेवस्य श्रुत्वा ब्रह्मन् सुरारणिः।<br>प्रोवाच जगतां योनिं वेपमाना पुनः पुनः॥ ४२<br><br>कथं त्वामुदरेणाहं वोढुं शक्ष्यामि दुर्धरम्।<br>यस्योदरे जगत्सर्वं वसते स्थाणुजङ्गमम्॥ ४३<br><br>कस्त्वां धारयितुं नाथ शक्तस्त्रैलोक्यधार्यसि।<br>यस्य सप्तार्णवाः कुक्षौ निवसन्ति सहाद्रिभिः॥ ४४<br><br>तस्माद् यथा सुरपतिः शक्रः स्यात् सुरराडिह।<br>यथा च न मम क्लेशस्तथा कुरु जनार्दन॥ ४५<br><br>विष्णुरुवाच<br>सत्यमेतन्महाभागे दुर्धरोऽस्मि सुरासुरैः।<br>तथापि सम्भविष्यामि अहं देव्युदरे तव॥ ४६<br><br>आत्मानं भुवनान् शैलांस्त्वाञ्च देवि सकश्यपाम्।<br>धारयिष्यामि योगेन मा विषादं कृथाऽम्बिके॥ ४७<br><br>तवोदरेऽहं दाक्षेयि सम्भविष्यामि वै यदा।<br>तदा निस्तेजसो दैत्याः सम्भविष्यन्त्यसंशयम्॥ ४८<br><br>इत्येवमुक्त्वा भगवान् विवेश<br>तस्याश्च भूयोऽरिगणप्रमर्दी।<br>स्वतेजसोंऽशेन विवेश देव्याः<br>तदोदरे शक्रहिताय विप्र॥ ४९ | [पुलस्त्यजी कहते हैं—] ब्रह्मन्! वासुदेवका वह वाक्य सुनकर बार-बार काँपती हुई देवोंकी माता अदितिने संसारको उत्पन्न करनेवाले विष्णुसे कहा—जिसके (विशाल) उदरमें स्थावर-जङ्गमात्मक समस्त संसार निवास करता है, ऐसे त्रिलोकीको धारण करनेवाले आपको मैं अपने उदरमें कैसे धारण कर सकूँगी? नाथ! आप तीनों लोकोंको धारण करनेवाले हैं। जिसकी कुक्षिमें पर्वतोंके साथ सातों समुद्र अवस्थित हैं ऐसे आपको कौन धारण कर सकता है? अतः हे जनार्दन! आप वैसा ही करें जिससे इन्द्र देवताओंके स्वामी बन जायें और मुझे भी कष्ट न हो॥ ४२—४५॥<br><br>**विष्णुने कहा—**महाभागे! यह सत्य है कि मैं देवों और दैत्योंसे धृत नहीं हो सकता, फिर भी हे देवि! मैं आपके उदरसे उत्पन्न होऊँगा। देवि! स्वयंको, (चौदहों) भुवनों, पर्वतों एवं कश्यपसहित आपको भी मैं योगद्वारा धारण करूँगा। मातः! आप विषाद न करें। दक्षात्मजे! जब मैं आपके उदरमें आऊँगा तब दैत्य निस्सन्देह तेजोहीन हो जायेंगे। [पुलस्त्यजी कहते हैं—] विप्र! ऐसा कहकर शत्रुओंके नाश करनेवाले भगवान् विष्णु इन्द्रकी भलाईके लिये अपने तेजके अंशमात्रसे उन देवीके उदरमें प्रविष्ट हो गये॥ ४६—४९॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें छिहत्तरवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ७६॥
सतहत्तरवाँ अध्याय
प्रह्लादसे अदितिके गर्भमें विष्णुके प्रविष्ट होनेकी बात जानकर बलिको विष्णुको दुर्वचन, प्रह्लादद्वारा बलिको शाप और अनुनय करनेपर उपदेश
| पुलस्त्य उवाच<br>देवमातुः स्थिते देवे उदरे वामनाकृतौ।<br>निस्तेजसोऽसुरा जाता यथोक्तं विश्वयोनिना॥ १<br>निस्तेजसोऽसुरान् दृष्ट्वा प्रह्लादं दानवेश्वरम्।<br>बलिर्दानवशार्दूल इदं वचनमब्रवीत्॥ २ | पुलस्त्यजी बोले—(नारदजी) संसारके उत्पन्न करनेवाले भगवान्के वचनानुसार देवमाता अदितिके गर्भमें वामनरूपमें देवके स्थित हो जानेपर असुर निस्तेज हो गये। असुरोंको निस्तेज देखकर दानवोंमें श्रेष्ठ बलिने दानवेश्वर प्रह्लादसे यह वचन कहा—॥ १-२॥ |