वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| अध्याय ७७ ] | प्रह्लादसे अदितिके गर्भमें विष्णुके प्रविष्ट होनेकी बात जानकर बलिको विष्णुको दुर्वचन | ३७९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| बलिरुवाच<br>तात निस्तेजसो दैत्याः केन जातास्तु हेतुना।<br>कथ्यतां परमज्ञोऽसि शुभाशुभविशारद॥ ३ | बलिने कहा— तात! आप यह बतलानेकी कृपा करें कि दानव किस कारणसे निस्तेज हो गये हैं? शुभ और अशुभके जाननेवाले आप महान् ज्ञानी हैं॥ ३॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>तत्पौत्रवचनं श्रुत्वा मुहूर्तं ध्यानमास्थितः।<br>किमर्थं तेजसो हानिरिति कस्मादतीव च॥ ४<br>स ज्ञात्वा वासुदेवोत्थं भयं दैत्येष्वनुत्तमम्।<br>चिन्तयामास योगात्मा क्व विष्णुः साम्प्रतं स्थितः॥ ५<br>अधो नाभेः स पातालान् सप्त संचिन्त्य नारद।<br>नाभेरूपरि भूरादींल्लोकांश्चर्तुमियाद् वशी॥ ६<br>भूमिं स पङ्कजाकारां तन्मध्ये पङ्कजाकृतिम्।<br>मेरुं ददर्श शैलेन्द्रं शातकौम्भं महर्द्धिमत्॥ ७<br>तस्योपरि महापुर्यस्त्वष्टौ लोकपतींस्तथा।<br>तेषामुपरि वैराजीं ददृशे ब्रह्मणः पुरीम्॥ ८ | पुलस्त्यजी बोले— अपने पौत्र (बलि)-के उस वचनको सुनकर (दानवोंके) तेजकी अत्यधिक हानि क्यों और किससे हुई है—(यह जाननेके लिये) प्रह्लादने क्षणभर ध्यान किया और दैत्योंके लिये वासुदेवद्वारा उत्पन्न हुए अतुलनीय भयको जानकर उन योगात्माने यह सोचा कि इस समय विष्णु कहाँपर स्थित हैं? नारदजी! नाभिके नीचेके स्थानमें सात पातालोंका चिन्तन करनेके बाद (सातों पातालोंमें पता लगानेके बाद) सभीको अपने वशमें करनेवाले वे नाभिके ऊपर भूः आदि लोकमें देखनेके लिये (पता लगानेके लिये) पहुँचे। उन्होंने कमलके आकारकी भूमि और उसके बीच महान् समृद्धिसे सम्पन्न सुवर्णमय कमलके आकार-जैसे पर्वतश्रेष्ठ मेरुको देखा। उसके ऊपर महापुरियोंमें आठ लोक-पति तथा उनके ऊपर ब्रह्माकी वैराजपुरीको देखा॥ ४–८॥ |
| तदधस्तान्महापुण्यमाश्रमं सुरपूजितम्।<br>देवमातुः स ददृशे मृगपक्षिगणैर्वृतम्॥ ९<br>तां दृष्ट्वा देवजननीं सर्वतेजोऽधिकां मुने।<br>विवेश दानवपतिरन्वेष्टुं मधुसूदनम्॥ १०<br>स दृष्ट्वाऽङ्गजगन्नाथं माधवं वामनाकृतिम्।<br>सर्वभूतवरेण्यं तं देवमातुरथोदरे॥ ११<br>तं दृष्ट्वा पुण्डरीकाक्षं शङ्खचक्रगदाधरम्।<br>सुरासुरगणैः सर्वैः सर्वतो व्याप्तविग्रहम्॥ १२<br>तेनैव क्रमयोगेन दृष्ट्वा वामनतां गतम्।<br>दैत्यतेजोहरं विष्णुं प्रकृतिस्थोऽभवत् ततः॥ १३<br>अथोवाच महाबुद्धिर्विरोचनसुतं बलिम्।<br>प्रह्लादो मधुरं वाक्यं प्रणम्य मधुसूदनम्॥ १४ | उसके नीचे उन्होंने महान् पुण्यसे युक्त देवताओंसे पूजित तथा पशु-पक्षियोंसे भरे देवमाता अदितिके आश्रमको देखा। मुने! समस्त तेजोंसे भी अधिक तेजस्विनी उस देवमाता अदितिको देखकर दानवपति प्रह्लादने मधुसूदनको ढूँढ़नेके लिये (उनके उदरमें) प्रवेश किया। उन्होंने सभी प्राणियोंमें श्रेष्ठ वामनके रूपमें उन जगत्पति माधवको देवमाताके उदरमें देखकर सारे सुरों और असुरोंसे चारों ओर व्याप्त शरीरवाले शङ्ख, चक्र एवं गदा धारण करनेवाले उन पुण्डरीकनयन भगवान्को देखा। उसी योगके क्रममें वामनरूपको प्राप्त हुए दैत्योंके तेजको हरण करनेवाले विष्णुको जानकर वे प्रकृति-भावमें स्थित हो गये। उसके बाद मधुसूदनको प्रणाम कर महाबुद्धिमान् प्रह्लादने विरोचनपुत्र बलिसे मधुर वचन कहा॥ ९—१४॥ |
| प्रह्लाद उवाच<br>श्रूयतां सर्वमाख्यास्ये यतो वो भयमागतम्।<br>येन निस्तेजसो दैत्या जाता दैत्येन्द्र हेतुना॥ १५<br>भवता निर्जिता देवाः सेन्द्ररुद्रार्कपावकाः।<br>प्रयाताः शरणं देवं हरिं त्रिभुवनेश्वरम्॥ १६ | प्रह्लादने कहा— दैत्येन्द्र! आपलोगोंको जिससे भय प्राप्त हुआ है और जिस कारण दैत्यगण तेजसे रहित हो गये हैं, वह सब मैं कहता हूँ, सुनो। आपके द्वारा जीते गये इन्द्रसहित रुद्र, सूर्य तथा अग्नि आदि देवता |