वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ३८० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७७ |
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| स तेषामभयं दत्त्वा शक्रादीनां जगद्गुरुः।<br>अवतीर्णो महाबाहुरदित्या जठरे हरिः॥ १७<br><br>हृतानि वस्तेन बले तेजांसीति मतिर्मम।<br>नालं तमो विषहितुं स्थातुं सूर्योदयं बले॥ १८ | त्रिभुवनके स्वामी देव हरिकी शरणमें गये। वे लोकगुरु महाबाहु हरि इन्द्र आदि देवताओंको अभय देकर अदितिके उदरमें अवतीर्ण हुए हैं। बले! मेरा ऐसा विचार है कि उन्होंने तुम लोगोंके तेजको हरण कर लिया है। बले! (जैसे कि) सूर्योदयके होते ही अन्धकार ठहर नहीं सकता है॥ १५–१८॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>प्रह्लादवचनं श्रुत्वा क्रोधप्रस्फुरिताधरः।<br>प्रह्लादमाहाथ बलिर्भाविकर्मप्रचोदितः॥ १९ | पुलस्त्यजी बोले— प्रह्लादके वचनको सुनकर क्रोधसे ओठ फड़कड़ाते हुए बलिने होनहारसे प्रेरित होकर प्रह्लादसे कहा॥ १९॥ | | बलिरुवाच<br>तात कोऽयं हरिर्नाम यतो नो भयमागतम्।<br>सन्ति मे शतशो दैत्या वासुदेवबलाधिकाः॥ २०<br>सहस्रशो यैरमराः सेन्द्ररुद्राग्निमारुताः।<br>निर्जित्य त्याजिताः स्वर्गं भग्नदर्पा रणाजिरे॥ २१<br>ये सूर्यस्थाद् वेगाच्चक्रं कृष्टं महाजवम्।<br>स विप्रचित्तिर्बलवान् मम सैन्यपुरस्सरः॥ २२<br>अयःशङ्कुः शिवः शम्भुरसिलोमा विलोमकृत्।<br>त्रिशिरा मकराक्षश्च वृषपर्वा नतेक्षणः॥ २३<br>एते चान्ये च बलिनो नानायुधविशारदाः।<br>येषामेकैकशो विष्णुः कलां नार्हति षोडशीम्॥ २४ | बलिने कहा— तात! ये हरि कौन हैं जिनके कारण हमें भय प्राप्त हुआ है? हमारे पास वासुदेवसे अधिक बलवान् सैकड़ों दैत्य हैं। उन लोगोंने इन्द्रसहित रुद्र, अग्नि तथा वायु आदि हजारों देवोंको युद्धमें जीतकर उनके अहंकारको नष्ट किया एवं उन्हें स्वर्गसे खदेड़ दिया। वह बलशाली विप्रचित्ति मेरी सेनाका अगुआ है, जिसने धावा बोलकर सूर्यके रथसे महान् तीव्रगामी चक्रको खींच लिया था। अयःशङ्कु, शिव, शम्भु, असिलोमा, विलोमकृत्, त्रिशिरा, मकराक्ष, वृषपर्वा एवं नतेक्षण—ये तथा अन्य बहुत-से भाँति-भाँतिके आयुधोंको चलानेमें निपुण बलवान् (दैत्य मेरे सहायक हैं,) जिनमें हर एककी सोलहवीं कलाके भी समान विष्णु नहीं हैं॥ २०–२४॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>पौत्रस्यैतद् वचः श्रुत्वा प्रह्लादः क्रोधमूर्च्छितः।<br>धिग्धिगित्याह स बलिं वैकुण्ठाक्षेपवादिनम्॥ २५<br>धिक् त्वां पापसमाचारं दुष्टबुद्धिं सुबालिशम्।<br>हरिं निन्दयतो जिह्वा कथं न पतिता तव॥ २६<br>शोच्यस्त्वमसि दुर्बुद्धे निन्दनीयश्च साधुभिः।<br>यत् त्रैलोक्यगुरुं विष्णुमभिनिन्दसि दुर्मते॥ २७<br>शोच्यश्चास्मि न संदेहो येन जातः पिता तव।<br>यस्य त्वं कर्कशः पुत्रो जातो देवावमान्यकः॥ २८ | पुलस्त्यने कहा— पौत्रके इस वचनको सुनकर अत्यन्त कुपित हुए उन प्रह्लादने विष्णुकी निन्दा करनेवाले बलिसे कहा—पापकर्मा दुष्टबुद्धि तुम मूर्खको धिक्कार है। विष्णुकी निन्दा करते हुए तुम्हारी जीभ क्यों नहीं गिर गयी? दुर्बुद्धे! दुर्मते! तुम शोक करने लायक और सज्जनोंद्वारा निन्दा किये जाने योग्य हो। क्योंकि तुम तीनों लोकोंके गुरु विष्णुकी निन्दा कर रहे हो। निस्सन्देह मैं भी शोक किये जाने लायक हूँ, जिसने तुम्हारे उस पिताको जन्म दिया, जिससे तुम देवताओंकी निन्दा करनेवाले तथा उग्र पुत्र हुए॥ २५–२८॥ | | भवान् किल विजानाति तथा चामी महासुराः।<br>यथा नान्यः प्रियः कश्चिन्मम तस्माज्जनार्दनात्॥ २९<br>जानन्नपि प्रियतरं प्राणेभ्योऽपि हरिं मम।<br>सर्वेश्वरेश्वरं देवं कथं निन्दितवानसि॥ ३०<br>गुरुः पूज्यस्तव पिता पूज्यस्तस्याप्यहं गुरुः।<br>ममापि पूज्यो भगवान् गुरुर्लोकगुरुर्हरिः॥ ३१ | निश्चय ही तुम और ये महासुर भी जानते हैं कि जनार्दनसे अधिक दूसरा कोई मेरा प्रिय नहीं है। विष्णु मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हैं, यह जानते हुए भी तुमने सर्वेश्वरेश्वर देवकी निन्दा किस प्रकार की? तुम्हारे पिता (तुम्हारे लिये) गुरु एवं पूजनीय हैं। उनका भी गुरु तथा पूजनीय मैं हूँ। लोकगुरु भगवान् विष्णु मेरे भी |