वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| अध्याय ७७ ] | प्रह्लादसे अदितिके गर्भमें विष्णुके प्रविष्ट होनेकी बात जानकर बलिका विष्णुको दुर्वचन | ३८१ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| गुरोर्गुरुगुरुर्मूढ पूज्यः पूज्यतमस्तव।<br>पूज्यं निन्दयते पाप कथं न पतितोऽस्यधः॥ ३२ | पूजनीय और गुरु हैं। मूढ़ पापिन्! गुरुके भी गुरु तुम्हारे लिये पूज्य एवं पूज्यतम हैं। तुम पूजनीयकी निन्दा करते हो, इसलिये तुम नीचे क्यों नहीं गिर गये॥ २९—३२॥ |
| शोचनीया दुराचारा दानवामी कृतास्त्वया।<br>येषां त्वं कर्कशो राजा वासुदेवस्य निन्दकः॥ ३३<br>यस्मात् पूज्योऽर्चनीयश्च भवता निन्दितो हरिः।<br>तस्मात् पापसमाचार राज्यनाशमवाप्नुहि॥ ३४<br>यथा नान्यत् प्रियतरं विद्यते मम केशवात्।<br>मनसा कर्मणा वाचा राज्यभ्रष्टस्तथा पत॥ ३५<br>यथा न तस्मादपरं व्यतिरिक्तं हि विद्यते।<br>चतुर्दशसु लोकेषु राज्यभ्रष्टस्तथा पत॥ ३६<br>सर्वेषामपि भूतानां नान्यल्लोके परायणम्।<br>यथा तथाऽनुपश्येयं भवन्तं राज्यविच्युतम्॥ ३७ | तुमने दुराचरण करनेवाले इन दानवोंको शोचनीय बना दिया। क्योंकि वासुदेवकी निन्दा करनेवाले कठोर-स्वभावके तुम इनके राजा हो। हे पापका आचरण करनेवाले! यतः तुमने पूजनीय एवं अर्चनीय विष्णुकी निन्दा की है, अतः तुम्हारे राज्यका विनाश होगा। क्योंकि मन, कर्म एवं वाणीसे मेरा केशवसे अधिक दूसरा कोई प्रिय नहीं है, अतः राज्यसे भ्रष्ट होकर तुम अधःपतित हो जाओ। क्योंकि चौदहों लोकोंमें उनसे भिन्न दूसरा कोई नहीं है, अतः राज्य-भ्रष्ट होकर तुम पतित हो जाओ; क्योंकि संसारमें सभी भूतोंका (वासुदेवके अतिरिक्त) दूसरा कोई आधार नहीं है, अतः मैं तुम्हें राज्यच्युत हुआ देखूँ॥ ३३—३७॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>एवमुच्चारिते वाक्ये बलिः सत्वरितस्तदा।<br>अवतीर्यासनाद् ब्रह्मन् कृताञ्जलिपुटो बली॥ ३८<br>शिरसा प्रणिपत्याह प्रसादं यातु मे गुरुः।<br>कृतापराधानपि हि क्षमन्ति गुरवः शिशून्॥ ३९<br>तत्साधु यदहं शप्तो भवता दानवेश्वर।<br>न बिभेमि परेभ्योऽहं न च राज्यपरिक्षयात्॥ ४०<br>नैव दुःखं मम विभो यदहं राज्यविच्युतः।<br>दुःखं कृतापराधत्वाद् भवतो मे महत्तरम्॥ ४१<br>तत् क्षम्यतां तात ममापराधो<br>बालोऽस्म्यनाथोऽस्मि सुदुर्मतिश्च।<br>कृतेऽपि दोषे गुरवः शिशूनां<br>क्षमन्ति दैन्यं समुपागतानाम्॥ ४२ | पुलस्त्यजी बोले— ब्रह्मन्! इस प्रकार कहे जानेपर बलशाली बलि शीघ्र ही आसनसे नीचे उतरा और हाथ जोड़कर उसने सिरसे झुककर प्रणाम कर कहा—गुरो! मेरे ऊपर आप प्रसन्न हों। बड़े लोग अपराध करनेपर भी बालकोंको क्षमा करते हैं। दानवेश्वर! आपका मुझे शाप देना ठीक है। मैं शत्रुओंसे तथा राज्यके विनाश होनेसे भयभीत नहीं हूँ। विभो! मुझे राज्यसे भ्रष्ट हो जानेका कष्ट भी नहीं है, परंतु आपका अपराध करनेका मुझे सबसे अधिक दुःख है। इसलिये तात! आप मेरे अपराधको क्षमा करें। मैं एक अनाथ दुर्बुद्धि शिशु हूँ। गुरुजन दोष करनेपर भी आर्त बने हुए बालकोंको क्षमा कर देते हैं॥ ३८–४२॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>स एवमुक्तो वचनं महात्मा<br>विमुक्तमोहो हरिपादभक्तः।<br>चिरं विचिन्त्याद्भुतमेतदित्थ-<br>मुवाच पौत्रं मधुरं वचोऽथ॥ ४३ | (फिर) पुलस्त्यजी बोले— इस प्रकारके वचन कहनेपर विष्णुके चरणोंमें श्रद्धा रखनेवाले ज्ञानी महात्मा (प्रह्लाद)-ने बहुत देरतक विचारकर पौत्रसे इस प्रकार अद्भुत एवं मधुर यह वचन कहा॥ ४३॥ |
| प्रह्लाद उवाच<br>तात मोहेन मे ज्ञानं विवेकश्च तिरस्कृतः।<br>येन सर्वगतं विष्णुं जानंस्त्वां शप्तवानहम्॥ ४४<br>नूनमेतेन भाव्यं वै भवतो येन दानव।<br>ममाविशन्महाबाहो विवेकप्रतिषेधकः॥ ४५ | प्रह्लादने कहा— तात! अज्ञानने मेरे ज्ञान एवं विवेकको ढक दिया था। इसीसे विष्णुको सर्वव्यापी जानते हुए भी मैंने तुम्हें शाप दे दिया। दानव! निश्चय ही तुम्हारी इस प्रकारकी होनहार थी। इसीसे विवेकका प्रतिबन्धक—विषय-वासनारूप अज्ञान मुझमें प्रवेश कर |