वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ३८२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७७ | | :--- | :--- |
| तस्माद् राज्यम्प्रति विभो न ज्वरं कर्तुमर्हसि।<br>अवश्यं भाविनो ह्यर्था न विनश्यन्ति कर्हिचित्॥ ४६<br>पुत्रमित्रकलत्रार्थे राज्यभोगधनाय च।<br>आगमे निर्गमे प्राज्ञो न विषादं समाचरेत्॥ ४७<br>यथा यथा समायान्ति पूर्वक Check कर्मविधानतः।<br>सुखदुःखानि दैत्येन्द्र नरस्तानी सहेत् तथा॥ ४८<br><br>आपदामागमं दृष्ट्वा न विषण्णो भवेद् वशी।<br>सम्पदं च सुविस्तीर्णां प्राप्य नोऽधृतिमान् भवेत्॥ ४९<br><br>धनक्षये न मुह्यन्ति न हृष्यन्ति धनागमे।<br>धीराः कार्येषु च सदा भवन्ति पुरुषोत्तमाः॥ ५०<br><br>एवं विदित्वा दैत्येन्द्र न विषादं कथंचन।<br>कर्तुमर्हसि विद्वांस्त्वं पण्डितो नावसीदति॥ ५१<br>तथाऽन्यच्च महाबाहो हितं शृणु महार्थकम्।<br>भवतोऽथ तथाऽन्येषां श्रुत्वा तच्च समाचर॥ ५२<br>शरण्यं शरणं गच्छ तमेव पुरुषोत्तमम्।<br>स ते त्राता भयादस्माद् दानवेन्द्र भविष्यति॥ ५३<br>ये संश्रिता हरिमन्तनादिमध्यं<br>विष्णुं चराचरगुरुं हरिमीशितारम्।<br>संसारगर्तपतितस्य करावलम्बं<br>नूनं न ते भुवि नरा ज्वरिनो भवन्ति॥ ५४<br>तन्मना दानवश्रेष्ठ तद्भक्तश्च भवाधुना।<br>स एष भवतः श्रेयो विधास्यति जनार्दनः॥ ५५<br>अहं च पापोपशमार्थमीश-<br>माराध्य यास्ये प्रतितीर्थयात्राम्।<br>विमुक्तपापश्च ततो गमिष्ये<br>यत्राच्युतो लोकपतिर्नृसिंहः॥ ५६ | गया था। इसलिये विभो ! राज्यके लिये कष्ट मत करो। अवश्यम्भावी विषय कभी भी विनष्ट नहीं होते। बुद्धिमान् व्यक्तिको पुत्र, मित्र, पत्नी, राज्यभोग और धनके आने तथा जानेपर चिन्तित नहीं होना चाहिये॥ ४४–४७॥<br><br>दैत्येन्द्र ! पूर्वजन्ममें किये हुए कर्मोंके विधानसे जैसे-जैसे सुख और दुःख आते हैं, मनुष्यको उसी प्रकार उनको सहन कर लेना चाहिये। संयम करनेवाले व्यक्तिको आपत्तियोंका आगमन देखकर पीड़ित नहीं होना चाहिये एवं अत्यन्त अधिक सम्पत्तिको देखकर धीरता नहीं खो देनी चाहिये। उत्तम पुरुष धनके नष्ट होनेपर चिन्ता एवं धनकी प्राप्ति होनेपर हर्ष नहीं करते। वे कर्तव्य कर्मके प्रति सदा धीर बने रहते हैं। दैत्येन्द्र ! इस प्रकार जानकर तुम्हें किसी प्रकारका शोक नहीं करना चाहिये; तुम विद्वान् हो! विद्वान् व्यक्ति दुःखी नहीं होते॥ ४८–५१॥<br><br>महाबाहो! तुम अपने लिये तथा अन्योंके लिये महान् अर्थपूर्ण एवं कल्याणकर (वचन) सुनो और सुनकर वैसा ही करो। दानवेन्द्र ! तुम उन्हीं शरणागतकी रक्षा करनेवाले पुरुषोत्तमकी शरणमें जाओ। वे ही इस भयसे तुम्हारी रक्षा करेंगे। आदि, मध्य और अन्तसे हीन, चर और अचरके गुरु, संसाररूपी गर्तमें गिरे हुओंके लिये हाथका आश्रय देनेवाले एवं सबके नियन्ता हरि विष्णुकी शरणमें जानेवाले मनुष्य निश्चय ही संसारमें संतप्त नहीं होते। दानवश्रेष्ठ! अब तुम अपना मन उन्हींमें लगाकर उनके भक्त बनो। वे जनार्दन ही तुम्हारा कल्याण करेंगे। मैं भी पापके विनाशके लिये ईश्वरकी आराधनाकर तीर्थयात्रा करने जाऊँगा और पापसे विमुक्त होकर मैं वहाँ जाऊँगा, जहाँ लोकपति अच्युत नृसिंह हैं॥ ५२–५६॥ | | <center>पुलस्त्य उवाच</center><br>इत्येवमाश्वास्य बलिं महात्मा<br>संस्मृत्य योगाधिपतिं च विष्णुम्।<br>आमन्त्र्य सर्वान् दनुयूथपालान्<br>जगाम कर्तुं त्वथ तीर्थयात्राम्॥ ५७ | पुलस्त्यजी बोले— इस प्रकार बलिको आश्वासन देनेके बाद महात्मा (प्रह्लाद)-ने योगके अधिपति विष्णुका स्मरण किया और दानवसमूहोंके पालकोंसे अनुमति लेकर तीर्थयात्रा करने चले गये॥ ५७॥ |
<center>॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें सतहत्तरवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ७७ ॥</center>