वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| ३८२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७७ | | :--- | :--- |
| तस्माद् राज्यम्प्रति विभो न ज्वरं कर्तुमर्हसि।<br>अवश्यं भाविनो ह्यर्था न विनश्यन्ति कर्हिचित्॥ ४६<br>पुत्रमित्रकलत्रार्थे राज्यभोगधनाय च।<br>आगमे निर्गमे प्राज्ञो न विषादं समाचरेत्॥ ४७<br>यथा यथा समायान्ति पूर्वक Check कर्मविधानतः।<br>सुखदुःखानि दैत्येन्द्र नरस्तानी सहेत् तथा॥ ४८<br><br>आपदामागमं दृष्ट्वा न विषण्णो भवेद् वशी।<br>सम्पदं च सुविस्तीर्णां प्राप्य नोऽधृतिमान् भवेत्॥ ४९<br><br>धनक्षये न मुह्यन्ति न हृष्यन्ति धनागमे।<br>धीराः कार्येषु च सदा भवन्ति पुरुषोत्तमाः॥ ५०<br><br>एवं विदित्वा दैत्येन्द्र न विषादं कथंचन।<br>कर्तुमर्हसि विद्वांस्त्वं पण्डितो नावसीदति॥ ५१<br>तथाऽन्यच्च महाबाहो हितं शृणु महार्थकम्।<br>भवतोऽथ तथाऽन्येषां श्रुत्वा तच्च समाचर॥ ५२<br>शरण्यं शरणं गच्छ तमेव पुरुषोत्तमम्।<br>स ते त्राता भयादस्माद् दानवेन्द्र भविष्यति॥ ५३<br>ये संश्रिता हरिमन्तनादिमध्यं<br>विष्णुं चराचरगुरुं हरिमीशितारम्।<br>संसारगर्तपतितस्य करावलम्बं<br>नूनं न ते भुवि नरा ज्वरिनो भवन्ति॥ ५४<br>तन्मना दानवश्रेष्ठ तद्भक्तश्च भवाधुना।<br>स एष भवतः श्रेयो विधास्यति जनार्दनः॥ ५५<br>अहं च पापोपशमार्थमीश-<br>माराध्य यास्ये प्रतितीर्थयात्राम्।<br>विमुक्तपापश्च ततो गमिष्ये<br>यत्राच्युतो लोकपतिर्नृसिंहः॥ ५६ | गया था। इसलिये विभो ! राज्यके लिये कष्ट मत करो। अवश्यम्भावी विषय कभी भी विनष्ट नहीं होते। बुद्धिमान् व्यक्तिको पुत्र, मित्र, पत्नी, राज्यभोग और धनके आने तथा जानेपर चिन्तित नहीं होना चाहिये॥ ४४–४७॥<br><br>दैत्येन्द्र ! पूर्वजन्ममें किये हुए कर्मोंके विधानसे जैसे-जैसे सुख और दुःख आते हैं, मनुष्यको उसी प्रकार उनको सहन कर लेना चाहिये। संयम करनेवाले व्यक्तिको आपत्तियोंका आगमन देखकर पीड़ित नहीं होना चाहिये एवं अत्यन्त अधिक सम्पत्तिको देखकर धीरता नहीं खो देनी चाहिये। उत्तम पुरुष धनके नष्ट होनेपर चिन्ता एवं धनकी प्राप्ति होनेपर हर्ष नहीं करते। वे कर्तव्य कर्मके प्रति सदा धीर बने रहते हैं। दैत्येन्द्र ! इस प्रकार जानकर तुम्हें किसी प्रकारका शोक नहीं करना चाहिये; तुम विद्वान् हो! विद्वान् व्यक्ति दुःखी नहीं होते॥ ४८–५१॥<br><br>महाबाहो! तुम अपने लिये तथा अन्योंके लिये महान् अर्थपूर्ण एवं कल्याणकर (वचन) सुनो और सुनकर वैसा ही करो। दानवेन्द्र ! तुम उन्हीं शरणागतकी रक्षा करनेवाले पुरुषोत्तमकी शरणमें जाओ। वे ही इस भयसे तुम्हारी रक्षा करेंगे। आदि, मध्य और अन्तसे हीन, चर और अचरके गुरु, संसाररूपी गर्तमें गिरे हुओंके लिये हाथका आश्रय देनेवाले एवं सबके नियन्ता हरि विष्णुकी शरणमें जानेवाले मनुष्य निश्चय ही संसारमें संतप्त नहीं होते। दानवश्रेष्ठ! अब तुम अपना मन उन्हींमें लगाकर उनके भक्त बनो। वे जनार्दन ही तुम्हारा कल्याण करेंगे। मैं भी पापके विनाशके लिये ईश्वरकी आराधनाकर तीर्थयात्रा करने जाऊँगा और पापसे विमुक्त होकर मैं वहाँ जाऊँगा, जहाँ लोकपति अच्युत नृसिंह हैं॥ ५२–५६॥ | | <center>पुलस्त्य उवाच</center><br>इत्येवमाश्वास्य बलिं महात्मा<br>संस्मृत्य योगाधिपतिं च विष्णुम्।<br>आमन्त्र्य सर्वान् दनुयूथपालान्<br>जगाम कर्तुं त्वथ तीर्थयात्राम्॥ ५७ | पुलस्त्यजी बोले— इस प्रकार बलिको आश्वासन देनेके बाद महात्मा (प्रह्लाद)-ने योगके अधिपति विष्णुका स्मरण किया और दानवसमूहोंके पालकोंसे अनुमति लेकर तीर्थयात्रा करने चले गये॥ ५७॥ |
<center>॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें सतहत्तरवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ७७ ॥</center>अध्याय ७८ ] प्रह्लादकी तीर्थयात्रा, धुन्धु और वामन-प्रसङ्ग, धुन्धुका यज्ञानुष्ठान और वामनका प्रादुर्भाव [ ३८३
अठहत्तरवाँ अध्याय
प्रह्लादकी तीर्थयात्रा, धुन्धु और वामन-प्रसङ्ग, धुन्धुका यज्ञानुष्ठान, वामनका प्रादुर्भाव और उनके लिये दान देनेका धुन्धुका निश्चय, वामनका त्रिविक्रम होना और धुन्धुका वध
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नारद उवाच<br>कानि तीर्थानि विप्रेन्द्र प्रह्लादोऽनुजगाम ह।<br>प्रह्लादतीर्थयात्रां मे सम्यगाख्यातुमर्हसि॥ १ | नारदने कहा (पूछा)— श्रेष्ठ विप्र! प्रह्लाद (क्रमशः) किन-किन तीर्थोंमें गये। कृपया आप मुझसे प्रह्लादकी तीर्थयात्राका भलीभाँति वर्णन कीजिये॥ १॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>शृणुष्व कथयिष्यामि पापपङ्कप्रणाशिनीम्।<br>प्रह्लादतीर्थयात्रां ते शुद्धपुण्यप्रदायिनीम्॥ २<br>संत्यज्य मेरुं कनकाचलेन्द्रं<br>तीर्थं जगामामरसंघजुष्टम्।<br>ख्यातं पृथिव्यां शुभदं हि मानसं<br>यत्र स्थितो मत्स्यवपुः सुरेशः॥ ३<br>तस्मिंस्तीर्थवरे स्नात्वा संतर्प्य पितृदेवताः।<br>सम्पूज्य च जगन्नाथमच्युतं श्रुतिभिर्युतम्॥ ४<br>उपोष्य भूयः सम्पूज्य देवर्षिपितृमानवान्।<br>जगाम कच्छपं द्रष्टुं कौशिक्यां पापनाशनम्॥ ५<br>तस्यां स्नात्वा महानद्यां सम्पूज्य च जगत्पतिम्।<br>समुपोष्य शुचिर्भूत्वा दत्त्वा विप्रेषु दक्षिणाम्॥ ६<br>नमस्कृत्य जगन्नाथमथो कूर्मवपुर्धरम्।<br>ततो जगाम कृष्णाख्यं द्रष्टुं वाजिमुखं प्रभुम्।<br>तत्र देवह्रदे स्नात्वा तर्पयित्वा पितॄन् सुरान्॥ ७<br>सम्पूज्य हयशीर्षं च जगाम गजसाह्वयम्।<br>तत्र देवं जगन्नाथं गोविन्दं चक्रपाणिनम्॥ ८<br>स्नात्वा सम्पूज्य विधिवज्जगाम यमुनां नदीम्।<br>तस्यां स्नातः शुचिर्भूत्वा संतर्प्यर्षिसुरान् पितॄन्।<br>ददर्श देवदेवेशं लोकनाथं त्रिविक्रमम्॥ ९ | पुलस्त्यजी बोले— नारदजी! सुनिये; मैं आपसे पापरूपी कीचड़को नष्ट करनेवाली एवं पवित्र पुण्यको देनेवाली प्रह्लादकी तीर्थयात्राको कहता हूँ। सुवर्णमय श्रेष्ठ मेरु पर्वतको छोड़कर वे (सबसे पहले) देवोंसे सेवित (और) पृथ्वीमें प्रसिद्ध कल्याणदायी मानसतीर्थमें गये, जहाँ मत्स्यशरीरधारी (मत्स्यावतारी) देवाधिदेव निवास करते हैं। उस उत्तम तीर्थमें स्नान और पितृ-देव-तर्पण कर उन्होंने वेद-मन्त्रोंसे अच्युत भगवान् विश्वेशका पूजन किया। फिर वहाँ उपवास रहकर देवों, ऋषियों, पितरों और मनुष्योंकी (यथायोग्य) पूजा कर कौशिकीमें (अवस्थित) पापका नाश करनेवाले भगवान् कच्छपका दर्शन करने गये। उस महानदीमें स्नान करनेके बाद उन्होंने जगत्स्वामी भगवान्की पूजा की और उपवास (व्रत) करके पवित्र होकर ब्राह्मणोंको दक्षिणा दी। उसके बाद कच्छपावतार जगन्नाथ भगवान्को नमस्कार कर वे वहाँसे कृष्ण नामके अश्वमुख भगवान्का दर्शन करने चले गये। वहाँ उन्होंने देवह्रदमें स्नानकर देवों एवं पितरोंका तर्पण किया और हयग्रीव भगवान्का अर्चन कर वे हस्तिनापुर चले गये। वहाँ स्नान करनेके बाद चक्रपाणि विश्वपति गोविन्ददेवकी विधिसे पूजा करनेके बाद वे यमुना नदीके पास पहुँच गये। उसमें स्नान करके पवित्र होकर उन्होंने ऋषियों, पितरों और देवोंका तर्पण किया तथा देवोंके देव जगन्नाथ त्रिविक्रम (वामन भगवान्)-का दर्शन किया॥ २—९॥ |
| नारद उवाच<br>साम्प्रतं भगवान् विष्णुस्त्रैलोक्याक्रमणं वपुः।<br>करिष्यति जगत्स्वामी बलेर्बन्धनमीश्वरः॥ १० | नारदजीने पूछा— इस समय जगत्स्वामी भगवान् विष्णु तीनों लोकोंको आक्रान्त करनेवाला (विशालतम्) देह धारण करेंगे और बलिको बाँधेंगे तो वे भगवान् |
| ३८४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७८ |
|---|
| तत्कथं पूर्वकालेऽपि विभुरासीत् त्रिविक्रमः।<br>कस्य वा बन्धनं विष्णुः कृतवांस्तच्च मे वद ॥ ११ | विष्णु पहले समयमें भी कैसे त्रिविक्रम हुए थे और (उस समय) उन्होंने किसका बन्धन किया था—यह मुझे बतलाइये ॥ १०-११॥ |
|---|---|
| पुलस्त्य उवाच | **पुलस्त्यजी बोले—**नारदजी! वे त्रिविक्रम भगवान् |
| श्रूयतां कथयिष्यामि योऽयं प्रोक्तस्त्रिविक्रमः।<br>यस्मिन् काले सम्बभूव यं च वञ्चितवानसौ ॥ १२ | कौन हैं, कब हुए और उन्होंने किसको ठगा ? यह सब जो आपने पूछा है उसे मैं कहता हूँ; आप सुनिये—दनुके |
| आसीद् धुन्धुरिति ख्यातः कश्यपस्यौरसः सुतः।<br>दनुगर्भसमुद्भूतो महाबलपराक्रमः ॥ १३ | गर्भसे उत्पन्न अत्यन्त बलवान् एवं पराक्रमी धुन्धु नामसे प्रसिद्ध कश्यपका एक औरस पुत्र था। नारदजी! |
| स समाराध्य वरदं ब्रह्माणं तपसाऽसुरः।<br>अवध्यत्वं सुरैः सेन्द्रैः प्रार्थयत् स तु नारद ॥ १४ | उस दैत्यने तपस्यासे वरदानी ब्रह्माकी आराधना करके उनसे इन्द्र आदि देवताओंसे (अपनेको) अवध्य होनेकी याचना की। (उसकी) तपस्यासे प्रसन्न होकर |
| तद् वरं तस्य च प्रादात् तपसा पङ्कजोद्भवः।<br>परितुष्टः स च बली निर्जगाम त्रिविष्टपम् ॥ १५ | कमल-योनि ब्रह्माजीने उसे वह (वाञ्छित) वर दे दिया। उसके बाद वह बलवान् धुन्धु स्वर्गमें चला गया। |
| चतुर्थस्य कलेरादौ जित्वा देवान् सवासवान्।<br>धुन्धुः शक्रत्वमकरोद्धिरण्यकशिपौ सति ॥ १६ | चतुर्थ कलियुगके आदिमें हिरण्यकशिपुके वर्तमान रहते समय धुन्धु इन्द्रसहित देवोंको जीतकर स्वयं इन्द्र बन गया। |
| तस्मिन् काले स बलवान् हिरण्यकशिपुस्ततः।<br>चचार मन्दरगिरौ दैत्यं धुन्धुं समाश्रितः ॥ १७ | उस समय धुन्धुका आश्रय लेकर बलवान् दैत्य हिरण्यकशिपु मन्दरपर्वतपर (स्वच्छन्दतासे) विचरण कर रहा था। |
| ततोऽसुरा यथा कामं विहरन्ति त्रिविष्टपे।<br>ब्रह्मलोके च त्रिदशाः संस्थिता दुःखसंयुताः ॥ १८ | दैत्यगण भी स्वच्छन्दतासे स्वर्गमें विचरण करने लगे। (इससे) सभी देवता दुखी होकर ब्रह्मलोकमें जाकर रहने लगे ॥ १२–१८ ॥ |
| ततोऽमरान् ब्रह्मसदो निवासिनः<br>श्रुत्वाऽथ धुन्धुर्दितिजानुवाच।<br>व्रजाम दैत्या वयमग्रजस्य<br>सदो विजेतुं त्रिदशान् सशक्रान् ॥ १९ | तब देवताओंका ब्रह्मलोकमें रहना सुनकर धुन्धुने दैत्योंसे कहा—दैत्यो! इन्द्रसहित देवोंको जीतनेके लिये हमलोग (अब) ब्रह्मलोक चलें। धुन्धुका वचन सुनकर |
| ते धुन्धुवाक्यं तु निशम्य दैत्याः<br>प्रोचुर्न नो विद्यति लोकपाल।<br>गतिर्यया याम पितामहाजिरं<br>सुदुर्गमोऽयं परतो हि मार्गः ॥ २० | उन दैत्योंने कहा—लोकपाल! हमलोगोंमें वह गति नहीं है, जिससे पितामह (ब्रह्मा)-के लोकमें जा सकें। (वहाँका) मार्ग बहुत दूर एवं बीहड़ है। |
| इतः सहस्रैर्बहुयोजनाख्यै-<br>र्लोको महर्नाम महर्षिजुष्टः।<br>येषां हि दृष्ट्याऽर्पणचोदितेन<br>दह्यन्ति दैत्याः सहसेक्षितेन ॥ २१ | यहाँसे हजारों योजन दूर महर्षियोंसे सेवित 'मह' नामका लोक है। उन ऋषियोंकी सहसा दृष्टि पड़ते ही समस्त दैत्य जल जाते हैं। |
| ततोऽपरो योजनकोटिना वै<br>लोको जनो नाम वसन्ति यत्र।<br>गोमातरोऽस्मासु विनाशकारि<br>यासां रजोऽपीह महासुरेन्द्र ॥ २२ | उससे भी आगे कोटि योजन दूर 'जन' नामक एक लोक है जहाँ गोमाताएँ रहती हैं! महासुरेन्द्र! उनकी धूलि भी हमलोगोंका विनाश कर सकती है। |
| ततोऽपरो योजनकोटिभिस्तु<br>षड्भिस्तपो नाम तपस्विजुष्टः।<br>तिष्ठन्ति यत्रासुर साध्यवर्या<br>येषां हि निःश्वासमरुत् त्वसह्यः ॥ २३ | उसके बाद छः करोड़ योजनकी दूरीपर तपस्वियोंसे भरा 'तप' लोक है। असुरराज! वहाँ श्रेष्ठ साध्यगण रहते हैं। उनका निःश्वास-वायु असहनीय है ॥ १९–२३ ॥ |
अध्याय ७८ ] प्रह्लादकी तीर्थयात्रा, धुन्धु और वामन-प्रसङ्ग, धुन्धुका यज्ञानुष्ठान और वामनका प्रादुर्भाव ३८५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ततोऽपरो योजनकोटिभिस्तु<br>त्रिंशद्भिरादित्यसहस्रदीप्तिः ।<br>सत्याभिधानो भगवन्निवासो<br>वरप्रदोऽभूद् भवतो हि योऽसौ ॥ २४<br>यस्य वेदध्वनिं श्रुत्वा विकसन्ति सुरादयः ।<br>संकोचमसुरा यान्ति ये च तेषां सधर्मिणः ॥ २५<br>तस्मान्मा त्वं महाबाहो मतिमेतां समादधः ।<br>वैराजभुवनं धुन्धो दुरारोहं सदा नृभिः ॥ २६<br>तेषां वचनमाकर्ण्य धुन्धुः प्रोवाच दानवान् ।<br>गन्तुकामः स सदनं ब्रह्मणो जेतुमीश्वरान् ॥ २७ | उसके बाद तीस करोड़ योजनकी दूरीपर हजारों सूर्योंके समान प्रदीप्त 'सत्य'नामका लोक है। वह लोक उन्हीं भगवान्का निवास-स्थल है, जिन्होंने आपको वर दिया था। जिनकी वेदध्वनि सुनकर देवता आदि विकसित हो जाते हैं तथा दैत्य और उनके समान धर्मवाले संकुचित (म्लान) हो जाते हैं। अतः महाबाहु धुन्धो! आप ऐसी बुद्धि न करें; क्योंकि ब्रह्मलोक मनुष्यों (एवं दैत्यों)-के लिये सदैव अगम्य है। उनकी बात सुनकर (भी) देवोंको जीतनेके लिये ब्रह्मलोक जानेकी इच्छावाले धुन्धुने दानवोंसे (फिर) कहा— ॥ २४-२७ ॥ |
| कथं तु कर्मणा केन गम्यते दानवर्षभाः ।<br>कथं तत्र सहस्राक्षः सम्प्राप्तः सह दैवतैः ॥ २८<br>ते धुन्धुना दानवेन्द्राः पृष्टाः प्रोचुर्वचोऽधिपम् ।<br>कर्म तन्न वयं विद्मः शुक्रस्तद् वेत्त्यसंशयम् ॥ २९<br>दैत्यानां वचनं श्रुत्वा धुन्धुर्दैत्यपुरोहितम् ।<br>पप्रच्छ शुक्रं किं कर्म कृत्वा ब्रह्मस्रदोगतिः ॥ ३०<br>ततोऽस्मै कथयामास दैत्याचार्यः कलिप्रिय ।<br>शक्रस्य चरितं श्रीमान् पुरा वृत्ररिपोः किल ॥ ३१<br>शक्रः शतं तु पुण्यानां क्रतूनामयजत् पुरा ।<br>दैत्येन्द्र वाजिमेधानां तेन ब्रह्मसदो गतः ॥ ३२ | दानवश्रेष्ठो! वहाँ कैसे और किस कर्मसे जाया जा सकता है ? इन्द्र देवोंके साथ वहाँ कैसे पहुँचे ? धुन्धुके पूछनेपर उन श्रेष्ठ दानवोंने कहा—हमलोग उस कर्मको तो नहीं जानते, किंतु शुक्राचार्य उसको निःसंदेह जानते हैं। दैत्योंका वचन सुनकर धुन्धुने दैत्योंके पुरोहित शुक्राचार्यजीसे पूछा—(आचार्यजी!) किस कर्मको करनेसे ब्रह्मलोकमें जाया जा सकता है? (पुलस्त्यजी कहते हैं—) कलिप्रिय! उसके बाद दैत्योंके गुरु श्रीमान् शुक्राचार्यने उससे वृत्रशत्रु इन्द्रका चरित कहा। उन्होंने कहा—दैत्येन्द्र! पहले समयमें इन्द्रने सौ पवित्र अश्वमेध-यज्ञ किये थे। इसीसे वे ब्रह्मलोक गये ॥ २८-३२ ॥ |
| तद्वाक्यं दानवपतिः श्रुत्वा शुक्रस्य वीर्यवान् ।<br>यष्टुं तुरगमेधानां चकार मतिमुत्तमाम् ॥<br>अथामन्त्र्यासुरगुरुं दानवांश्चाप्यनुत्तमान् ॥ ३३<br>प्रोवाच यक्ष्येऽहं यज्ञैरश्वमेधैः सदक्षिणैः ।<br>तदागच्छध्वमवनीं गच्छामो वसुधाधिपान् ॥ ३४<br>विजित्य हयमेधान् वै यथाकामगुणान्वितान् ।<br>आहूयन्तां च निधयस्त्वाज्ञाप्यन्तां च गुह्यकाः ॥ ३५<br>आमन्त्र्यन्तां च ऋषयः प्रयामो देविकातटम् ।<br>सा हि पुण्या सरिच्छ्रेष्ठा सर्वसिद्धिकरी शुभा ।<br>स्थानं प्राचीनमासाद्य वाजिमेधान् यजामहे ॥ ३६ | शुक्राचार्यके उस वाक्यको सुनकर बलवान् दानवपतिने अश्वमेधयज्ञ करनेकी उत्कट इच्छा की। उसके बाद दैत्योंके गुरुको और अच्छे दैत्योंको बुलाकर उसने कहा—मैं दक्षिणासहित अश्वमेधयज्ञोंका अनुष्ठान करूँगा। इसलिये आओ, हमलोग पृथ्वीपर चलें और राजाओंको जीतकर इच्छानुकूल सामग्री एवं विधिसे पूर्ण अश्वमेधोंका अनुष्ठान करें। निधियोंको बुलाओ एवं गुह्यकोंको आदेश दे दो और ऋषियोंको आमन्त्रित करो। हमलोग देविकाके तटपर चलें। वह पुनीत उत्तम नदी कल्याणदायिनी तथा सर्वसिद्धिकारिणी है। उस प्राचीन स्थानपर पहुँचकर हम अश्वमेधयज्ञ करेंगे ॥ ३३-३६ ॥ |
| इत्थं सुरारेर्वचनं निशम्यासुरयाजकः ।<br>बाढमित्यब्रवीद्धुन्धो निधयः संदिदेश सः ॥ ३७ | देवोंके शत्रु धुन्धुके उस वचनको सुनकर दैत्योंके यज्ञ करानेवाले शुक्राचार्यने 'ठीक है'—ऐसा कहा और प्रसन्नतापूर्वक उन्होंने निधियोंको आदेश दे दिया। उसके |
| ३८६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७८ |
|---|
| ततो धुन्धुर्दैविकायाः प्राचीने पापनाशने ।<br>भार्गवेन्द्रेण शुक्रेण वाजिमेधाय दीक्षितः ॥ ३८<br><br>सदस्या ऋत्विजश्चापि तत्रासन् भार्गवा द्विजाः ।<br>शुक्रस्यानुमते ब्रह्मन् शुक्रशिष्याश्च पण्डिताः ॥ ३९<br><br>यज्ञभागभुजस्तत्र स्वर्भानुप्रमुखा मुने ।<br>कृताश्चासुरनाथेन शुक्रस्यानुमतेऽसुराः ॥ ४०<br><br>ततः प्रवृत्तो यज्ञस्तु समुत्सृष्टस्तथा हयः ।<br>हयस्यानुययौ श्रीमानसिलोमा महासुरः ॥ ४१ | बाद भार्गवश्रेष्ठ शुक्राचार्यने पापोंका नाश करनेवाले देविकाके प्राचीन तटपर अश्वमेधयज्ञके (अनुष्ठानके) लिये धुन्धुको दीक्षित किया। ब्रह्मन्! शुक्राचार्यकी अनुमतिसे उनके शिष्य तथा भार्गव-गोत्रीय विद्वान् ब्राह्मण उस यज्ञमें सदस्य एवं ऋत्विक् बने। मुने! शुक्राचार्यकी अनुमतिसे दैत्यस्वामीने स्वर्भानु आदि असुरोंको (देवोंके स्थानपर) यज्ञभागका रक्षक और भोक्ता बनाया। उसके बाद यज्ञ आरम्भ हुआ और (दिग्विजय-सूचक) अश्व छोड़ा गया। असिलोमा नामका विराट् दैत्य घोड़ेके पीछे (उसकी रक्षाके लिये) चला॥ ३७–४१॥ | | ततोऽग्निधूमेन मही सशैला<br>व्याप्ता दिशः खं विदिशश्च पूर्णाः ।<br>तेनोग्रगन्धेन दिवस्पृशेन<br>मरुद्ववौ ब्रह्मलोके महर्षे ॥ ४२<br><br>तं गन्धमाघ्राय सुरा विषण्णा<br>जानन्त धुन्धुं हयमेधदीक्षितम् ।<br>ततः शरण्यं शरणं जनार्दनं<br>जग्मुः सशक्रा जगतः परायणम् ॥ ४३<br><br>प्रणम्य वरदं देवं पद्मनाभं जनार्दनम् ।<br>प्रोचुः सर्वे सुरगणा भयगद्गदया गिरा ॥ ४४<br><br>भगवन् देवदेवेश चराचरपरायण ।<br>विज्ञप्तिः श्रूयतां विष्णो सुराणामार्तिनाशन ॥ ४५ | महर्षे! उसके बाद यज्ञके धुएँसे पहाड़ोंके साथ पृथ्वी, आकाश, दिशाएँ और विदिशाएँ भर गयीं। आकाशमें फैले उस उत्कट सुगन्धवाले धुएँसे मिली हुई वायु ब्रह्मलोकमें बहने लगी। उस गन्धको सूँघकर देवगण उदास हो गये। उन्हें यह पता चल गया कि धुन्धुने अश्वमेधकी दीक्षा ग्रहण की है (और यज्ञानुष्ठान कर रहा है)। उसके बाद वे इन्द्रसहित संसारके आश्रय और शरण देनेवाले भगवान् जनार्दनकी शरणमें गये। कमलनालको धारण करनेवाले वरदानी जनार्दन देवको प्रणाम कर सभी देवोंने भयसे विकल वाणीमें कहा—देवोंके दुःखको दूर करनेवाले तथा चर और अचरके कल्याण करनेमें नित्य उद्यत रहनेवाले देवाधिदेव विष्णो! आप हमारा निवेदन सुनें—॥ ४२–४५॥ | | धुन्धुनामासुरपतिर्बलवान् वरबृंहितः ।<br>सर्वान् सुरान् विनिर्जित्य त्रैलोक्यमहरद् बलिः ॥ ४६<br><br>ऋते पिनाकिनो देवात् त्राताऽस्मान् न यतो हरे ।<br>अतो विवृद्धिगमगद् यथा व्याधिरुपेक्षितः ॥ ४७<br><br>साम्प्रतं ब्रह्मलोकस्थानपि जेतुं समुद्यतः ।<br>शुक्रस्य मतमास्थाय सोऽश्वमेधाय दीक्षितः ॥ ४८<br><br>शतं क्रतूनामिष्ट्वासौ ब्रह्मलोकं महासुरः ।<br>आरोढुमिच्छति वशी विजेतुं त्रिदशानपि ॥ ४९ | धुन्धु नामका बलवान् दैत्यपति शंकरसे वर प्राप्त कर लेनेके कारण बढ़ गया है। उस बलवान्ने सभी देवोंको पराजितकर (उनसे) त्रिलोकी (-के अधिकार)-को छीन लिया है। हरे! पिनाक धारण करनेवाले शंकरके सिवा हम देवोंका कोई रक्षक न होनेसे वह असुर उपेक्षित रोगकी तरह (बहुत) बढ़ गया है। इस समय वह ब्रह्मलोकमें शरण लिये हुए रहनेपर भी हमलोगोंको (फिर) जीतनेके लिये तैयार होकर शुक्राचार्यके मतके अनुसार अश्वमेधयज्ञमें दीक्षित हो गया है। वह दैत्य (धुन्धु) सौ अश्वमेधयज्ञ करके देवताओंपर विजय पानेके लिये ब्रह्मलोकमें आक्रमण करना चाहता है। |
| अध्याय ७८ ] | प्रह्लादकी तीर्थयात्रा, धुन्धु और वामन-प्रसङ्ग, धुन्धुका यज्ञानुष्ठान और वामनका प्रादुर्भाव | ३८७ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तस्मादकालहीनं तु चिन्तयस्व जगद्गुरो।<br>उपायं मखविध्वंसे येन स्याम सुनिर्वृताः॥ ५० | इसलिये जगद्गुरो! आप उसके यज्ञको विध्वस्त करनेका उपाय बिना समय बिताये (तत्काल) सोचें, जिससे हमलोग निश्चिन्त हो सकें॥ ४६-५०॥ |
| श्रुत्वा सुराणां वचनं भगवान् मधुसूदनः।<br>दत्त्वाऽभयं महाबाहुः प्रेषयामास साम्प्रतम्।<br>विसृज्य देवताः सर्वा ज्ञात्वाऽजेयं महासुरम्॥ ५१<br>बन्धनाय मतिं चक्रे धुन्धोर्धर्मध्वजस्य वै।<br>ततः कृत्वा स भगवान् वामनं रूपमीश्वरः॥ ५२<br>देहं त्यक्त्वा निरालम्बं काष्ठवद् देविकाजले।<br>क्षणान्मज्जंस्तथोन्मज्जन्मुक्तकेशो यदृच्छया॥ ५३<br>दृष्टोऽथ दैत्यपतिना दैत्यैश्चान्यैस्तथर्षिभिः।<br>ततः कर्म परित्यज्य यज्ञियं ब्राह्मणोत्तमाः॥ ५४<br>समुत्तारयितुं विप्राद्रावन्त समाकुलाः।<br>सदस्या यजमानश्च ऋत्विजोऽथ महौजसः॥ ५५<br>निमज्जमानमुज्जह्नुः सर्वे ते वामनं द्विजम्।<br>समुत्तार्य प्रसन्नास्ते प्रप्रच्छुः सर्व एव हि।<br>किमर्थं पतितोऽसीह केनाक्षिप्तोऽसि नो वद॥ ५६ | सभी देवताओंको अभयदान देकर उन महाबाहुने उन देवताओंको लौटा दिया और उस महान् धर्मध्वजी (धर्मके नामपर पाखण्ड रचनेवाले) दैत्य धुन्धुको अजेय समझकर उन्होंने (श्रीहरिने) उसे बाँधनेका विचार किया। उसके बाद भगवान् विष्णुने बौनाका रूप धर लिया और देविका नदीके जलमें (अपनी) देहको लकड़ीकी तरह निरालम्ब छोड़ दिया। खुले हुए केशोंवाले वे क्षणमात्रमें अपने-आप डूबने-उतराने लगे। उसके बाद दैत्यपतिने तथा अन्य दैत्यों एवं ऋषियोंने उन्हें देखा। उसके बाद व्याकुल होकर वे श्रेष्ठ ब्राह्मण यज्ञके सभी काम छोड़कर उस ब्राह्मणको निकालनेके लिये दौड़े। सभी सदस्य, यजमान एवं अति तेजस्वी ऋत्विजोंने डूबते हुए बौनाके आकारवाले ब्राह्मणको (नदीके जलसे बाहर) निकाला और उससे पूछा— हमें यह बतलाओ कि तुम यहाँ क्यों गिरे अथवा तुम्हें किसने फेंका?॥ ५१-५६॥ |
| तेषामाकर्ण्य वचनं कम्पमानो मुहुर्मुहुः।<br>प्राह धुन्धुपुरोगांस्ताञ्छ्रूयतामत्र कारणम्॥ ५७<br>ब्राह्मणो गुणवानासीत् प्रभास इति विश्रुतः।<br>सर्वशास्त्रार्थवित् प्राज्ञो गोत्रतश्चापि वारुणः॥ ५८<br>तस्य पुत्रद्वयं जातं मन्दप्रज्ञं सुदुःखितम्।<br>तत्र ज्येष्ठो मम भ्राता कनीयानपरस्त्वहम्॥ ५९<br>नेत्रभास इति ख्यातो ज्येष्ठो भ्राता ममासुर।<br>मम नाम पिता चक्रे गतिभासेति कौतुकात्॥ ६० | उसने उनके वचनको सुनकर बार-बार काँपते हुए धुन्धु आदिसे कहा—आपलोग इसका कारण सुनें। वरुण-गोत्रमें उत्पन्न प्रभास नामके एक ब्राह्मण थे। वे सभी शास्त्रोंके तात्पर्यको जाननेवाले और बुद्धिमान् थे। उनके दो पुत्र उत्पन्न हुए। वे दोनों ही अल्पबुद्धि और अत्यन्त दुःखग्रस्त थे। उनमें मेरा भाई बड़ा और मैं छोटा हूँ। अये दैत्य! मेरा बड़ा भाई 'नेत्रभास' नामसे प्रसिद्ध है। मेरे पिताने कौतूहलवश मेरा नाम 'गतिभास' रख दिया॥ ५७-६०॥ |
| रम्यश्चावसथो धुन्धो शुभ्रश्चासीत् पितुर्मम।<br>त्रिविष्टपगुणैर्युक्तश्चारुरूपो महासुर॥ ६१<br>ततः कालेन महता आवयोः स पिता मृतः।<br>तस्यौर्ध्वदेहिकं कृत्वा गृहमावां समागतौ॥ ६२<br>ततो मयोक्तः स भ्राता विभजाम गृहं वयम्।<br>तेनोक्तो नैव भवतो विद्यते भाग इत्यहम्॥ ६३<br>कुब्जवामनखञ्जानां क्लीबानां श्वित्रिणामपि।<br>उन्मत्तानां तथान्धानां धनभागो न विद्यते॥ ६४ | महासुर धुन्धो! मेरे पिताका निवास-स्थान सुन्दर, आनन्ददायक, स्वर्गीय गुणोंसे युक्त एवं मनोहर था। उसके बाद बहुत दिनोंके पश्चात् हम दोनोंके पिता स्वर्ग चले गये। उनकी दाह-संस्कारादि-श्राद्धक्रिया करके हम दोनों भाई घर आ गये। उसके बाद मैंने (अपने उन) बड़े भाईसे कहा—हम दोनों आपसमें घरका बँटवारा कर लें। उसने मुझसे कहा—तुम्हारा हिस्सा नहीं है; क्योंकि कुबड़े, बौने, लँगड़े, हिजड़े, चरकवाले, पागल और अन्धोंका धनमें हिस्सा नहीं होता है। उन्हें केवल सोने |
| ३८८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७८ |
|---|
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| शय्यासनस्थानमात्रं स्वेच्छयान्नभुजक्रिया।<br>एतावद् दीयते तेभ्यो नार्थभागहरा हि ते॥ ६५ | भरका स्थान तथा अपनी इच्छाके अनुसार अन्नभोगका अधिकार दिया जाता है। वे सम्पत्तिके भागी—अधिकारी नहीं होते॥ ६१—६५॥ |
| एवमुक्ते मया सोक्तः किमर्थं पैतृकाद् गृहात्।<br>धनार्धभागमर्हामि नाहं न्यायेन केन वै॥ ६६<br>इत्युक्तवति वाक्येऽसौ भ्राता मे कोपसंयुतः।<br>समुत्क्षिप्याक्षिपन्नद्यामस्यां मामिति कारणात्॥ ६७<br>ममास्यां निम्नगायां तु मध्येन प्लवतो गतः।<br>कालः संवत्सराख्यस्तु युष्माभिरिह चोद्धृतः॥ ६८<br>के भवन्तोऽत्र सम्प्राप्ताः सस्नेहा बान्धवा इव।<br>कोऽयं च शक्रप्रतिमो दीक्षितो यो महाभुजः॥ ६९<br>तन्मे सर्वं समाख्यातं याथातथ्यं तपोधनाः।<br>महर्द्धिसंयुता यूयं सानुकम्पाश्च मे भृशम्॥ ७० | ऐसा कहनेपर मैंने उससे कहा कि अपने पिताके घरके धनके आधे हिस्सेका अधिकारी मैं किस न्यायसे और क्यों नहीं हूँ? ऐसा अभिप्राय-पूर्ण वाक्य कहनेपर क्रोधमें आकर मेरे भाईने मुझे उठाकर इस नदीमें फेंक दिया। मुझे इस नदीमें तैरते हुए एक वर्षका समय बीत गया। (अब) आपलोगोंने यहाँ मेरा उद्धार किया है। प्रेमी बान्धवोंके समान यहाँ उपस्थित आपलोग कौन हैं तथा यज्ञके लिये दीक्षित इन्द्रके समान ये महाबलशाली कौन हैं? तपोधनो! आपलोग यह सब ठीक-ठीक मुझे बतलाइये। आपलोग महान् ऐश्वर्यशाली और मेरे ऊपर अत्यन्त अनुग्रह करनेवाले हैं॥ ६६—७०॥ |
| तद् वामनवचः श्रुत्वा भार्गवा द्विजसत्तमाः।<br>प्रोचुर्वयं द्विजा ब्रह्मन् गोत्रतश्चापि भार्गवाः॥ ७१<br>असावपि महातेजा धुन्धुर्नाम महासुरः।<br>दाता भोक्ता विभक्ता च दीक्षितो यज्ञकर्मणि॥ ७२<br>इत्येवमुक्त्वा देवेशं वामनं भार्गवास्ततः।<br>प्रोचुर्दैत्यपतिं सर्वे वामनार्थकरं वचः॥ ७३<br>दीयतामस्य दैत्येन्द्र सर्वोपस्करसंयुतम्।<br>श्रीमदावसथं दास्यो रत्नानि विविधानि च॥ ७४<br>इति द्विजानां वचनं श्रुत्वा दैत्यपतिर्वचः।<br>प्राह द्विजेन्द्र ते दद्मि यावदिच्छसि वै धनम्॥ ७५ | वामनके उस वचनको सुनकर भार्गवकुलके श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने कहा—ब्रह्मन्! हमलोग भार्गव गोत्रवाले ब्राह्मण हैं। ये अति तेजस्वी दाता, भोक्ता और विभक्ता धुन्धु नामके महान् असुर हैं। ये यज्ञकर्ममें दीक्षित हुए हैं। देवेश वामनसे ऐसा कहकर सभी भार्गव-गोत्रीय (ब्राह्मणोंने) असुरस्वामी धुन्धुसे वामनके प्रयोजनको सिद्ध करनेवाला वचन कहा—दैत्येन्द्र! आप इन्हें सम्पूर्ण साज-सज्जासे पूर्ण सम्पत्तिसे सम्पन्न घर, दासियाँ और विविध प्रकारके रत्न (आदि) प्रदान करें। ब्राह्मणोंके उस वचनको सुनकर असुरराज धुन्धुने यह वचन कहा—द्विजेन्द्र! मैं आपको आपकी इच्छाके अनुकूल धन दूँगा॥ ७१—७५॥ |
| दास्ये गृहं हिरण्यं च वाजिनः स्यन्दनान् गजान्।<br>प्रयच्छाम्यद्य भवतो व्रियतामीप्सितं विभो॥ ७६<br>तद्वाक्यं दानवपतेः श्रुत्वा देवोऽथ वामनः।<br>प्राहासुरपतिं धुन्धुं स्वार्थसिद्धिकरं वचः॥ ७७<br>सोदरेणापि हि भ्रात्रा ह्रियन्ते यस्य सम्पदः।<br>तस्याक्षमस्य यद्दत्तं किमन्यो न हरिष्यति॥ ७८ | विभो! आप अपने अभीष्ट पदार्थकी माँग करें। मैं आज आपको घर, सोना, घोड़े, रथ एवं हाथी प्रदान करूँगा। दैत्य-स्वामीके उस वाक्यको सुनकर (विप्ररूप धारण करनेवाले) भगवान् वामनने दानवपति धुन्धुसे अपने स्वार्थको साधनेवाला वचन कहा—सहोदर भाईने जिसकी (पैतृक) सम्पत्तिको ले लिया उस असमर्थको जो कुछ मिलेगा उसे क्या कोई दूसरा नहीं छीन लेगा? |
अध्याय ७८ ] प्रह्लादकी तीर्थयात्रा, धुन्धु और वामन-प्रसङ्ग, धुन्धुका यज्ञानुष्ठान और वामनका प्रादुर्भाव ३८९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| दासीदासांश्च भृत्यांश्च गृहं रत्ने परिच्छदम्।<br>समर्थेषु द्विजेन्द्रेषु प्रयच्छस्व महाभुज॥ ७९<br>मम प्रमाणमालोक्य मामकं च पदत्रयम्।<br>सम्प्रयच्छस्व दैत्येन्द्र नाधिकं रक्षितुं क्षमः॥ ८० | महाबाहो! आप दिये हुएकी रक्षा करनेमें समर्थ श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको दासी, दास, नौकर, घर, रत्न और अच्छे वस्त्र दें। दैत्येन्द्र! मुझे तो मेरा परिमाण देखकर (केवल) तीन पग (भूमि) ही दे दें। (इससे) अधिककी रक्षा करनेमें मैं समर्थ नहीं हूँ॥ ७९-८०॥ |
| इत्येवमुक्ते वचने महात्मना<br>विहस्य दैत्याधिपतिः स ऋत्विजः।<br>प्रादाद् द्विजेन्द्राय पदत्रयं तदा<br>यदा स नान्यं प्रगृहाण किंचित्॥ ८१<br>क्रमत्रयं तावदवेक्ष्य दत्तं<br>महासुरेन्द्रेण विभुर्यशस्वी।<br>चक्रे ततो लङ्घयितुं त्रिलोकीं<br>त्रिविक्रमं रूपमनन्तशक्तिः॥ ८२<br>कृत्वा च रूपं दितिजांश्च हत्वा<br>प्रणम्य चर्षीन् प्रथमक्रमेण।<br>महीं महीध्रैः सहितां सहार्णवां<br>जहार रत्नाकरपत्तनैर्युताम्॥ ८३ | उन (विप्र वामन) महात्माके ऐसा वचन कहनेपर, जब उन्होंने और कुछ ग्रहण नहीं किया तब ऋत्विजोंसहित दानवपतिने हँसकर उन द्विजेन्द्रको तीन पग (भूमि) प्रदान कर दी। महान् असुरेन्द्रद्वारा तीन पग भूमि प्रदान की हुई देखकर अनन्त शक्तिवाले यशस्वी एवं विभु वामन भगवान्ने तीनों लोकोंको नाप लेनेके लिये त्रिविक्रम (विराट्) रूप धारण कर लिया। (विशाल) रूप धर लेनेके बाद उन्होंने दैत्योंका वध कर ऋषियोंको प्रणाम किया और प्रथम पादन्यासमें ही पर्वत, सागर, रत्नोंकी खान एवं नगरोंसे युक्त पृथ्वीको नापकर ले लिया॥ ८१-८३॥ |
| भुवं सनाकं त्रिदशाधिवासं<br>सोमार्कऋक्षैरभिमण्डितं नभः।<br>देवो द्वितीयेन जहार वेगात्<br>क्रमेण देवप्रियमीप्सुरीश्वरः॥ ८४<br>क्रमं तृतीयं न यदाऽस्य पूरितं<br>तदाऽतिकोपाद् दनुपुङ्गवस्य।<br>पपात पृष्ठे भगवांस्त्रिविक्रमो<br>मेरुप्रमाणेण तु विग्रहेण॥ ८५<br>पतता वासुदेवेन दानवोपरि नारद।<br>त्रिंशद्योजनसाहस्त्री भूमेर्गर्ता दृढीकृता॥ ८६ | देवताओंका प्रिय करनेकी इच्छावाले भगवान् वामनदेवने द्वितीय पगसे तुरंत ही देवताओंके निवास—स्वर्गके साथ ही भुवर्लोक, चन्द्र, सूर्य एवं नक्षत्रोंसे मण्डित आकाशको भी ग्रहण कर लिया। उनका तृतीय पादक्रम जब पूरा नहीं हुआ तो अत्यन्त क्रोधसे भगवान् त्रिविक्रम मेरुके समान शरीरसे दानवश्रेष्ठकी पीठपर गिर पड़े। नारदजी! वासुदेवके दानवके ऊपर गिरनेसे भूमिमें हजार योजनका सुदृढ़ गड्ढा बन गया॥ ८४-८६॥ |
| ततो दैत्यं समुत्पाट्य तस्यां प्रक्षिप्य वेगतः।<br>अवर्षत् सिकतावृष्ट्या तां गर्तामपूरयत्॥ ८७<br>ततः स्वर्गं सहस्राक्षो वासुदेवप्रसादतः।<br>सुराश्च सर्वे त्रैलोक्यमवापुर्निरुपद्रवाः॥ ८८<br>भगवानपि दैत्येन्द्रं प्रक्षिप्य सिकतार्णवे।<br>कालिन्द्या रूपमाधाय तत्रैवान्तरधीयत॥ ८९<br>एवं पुरा विष्णुरभूच्च वामनो<br>धुन्धुं विजेतुं च त्रिविक्रमोऽभूत्।<br>यस्मिन् स दैत्येन्द्रसुतो जगाम<br>महाश्रमे पुण्ययुतो महर्षे॥ ९० | उसके बाद उन्होंने दैत्यको उठाकर जोरसे उसमें फेंक दिया और बालुकी बरसासे उस गड्ढेको भर दिया। उसके बाद वासुदेवकी कृपासे इन्द्रने स्वर्ग पा लिया और उपद्रवोंसे रहित सम्पूर्ण देवोंको त्रिलोकीकी प्राप्ति हो गयी। कालिन्दी भी अपना स्वरूप धारणकर वहीं अन्तर्हित हो गयी। प्राचीन कालमें इस प्रकार धुन्धुको जीतनेके लिये विष्णु भगवान् वामन तथा (उसके बाद) त्रिविक्रम बने। महर्षि नारदजी! वह पुण्यात्मा दैत्येन्द्रपुत्र प्रह्लाद (तीर्थयात्राके प्रसङ्गमें) उसी आश्रममें गया॥ ८७-९०॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें अठहत्तरवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ७८॥
| ३९० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७९ |
|---|
उन्नासीवाँ अध्याय
पुरूरवाको रूपकी प्राप्ति और उसी सन्दर्भमें प्रेत और वणिक्की भेंट तथा परस्पर वृत्तान्तका कहना एवं श्रवण-द्वादशीका माहात्म्य, गयामें श्राद्ध करनेसे प्रेत-योनिसे मुक्ति और पुरूरवाको सुरूपकी प्राप्ति
| पुलस्त्य उवाच | पुलस्त्यजी बोले— |
|---|---|
| कालिन्दीसलिले स्नात्वा पूजयित्वा त्रिविक्रमम्।<br>उपोष्या रजनीमेकां लिङ्गभेदं गिरिं ययौ॥ १<br><br>तत्र स्नात्वा च विमले भवं दृष्ट्वा च भक्तितः।<br>उपोष्या रजनीमेकां तीर्थं केदारमाव्रजत्॥ २<br><br>तत्र स्नात्वाऽर्च्य चेशानं माधवं चाप्यभेदतः।<br>उषित्वा वासरान् सप्त कुब्जाम्रं प्रजगाम ह॥ ३<br><br>ततः सुतीर्थे स्नात्वा च सोपवासी जितेन्द्रियः।<br>हृषीकेशं समभ्यर्च्य ययौ बदरिकाश्रमम्॥ ४ | यमुनाजलमें स्नानकर प्रह्लादने त्रिविक्रम भगवान्की पूजा की। एक रात उपवास करनेके बाद (फिर) वे लिङ्गभेद नामक पर्वतपर चले गये। वहाँ विमल जलमें स्नानकर उन्होंने भक्तिसे भगवान् शंकरका दर्शन किया; एवं वहाँ भी एक रात निवासकर केदार नामके तीर्थमें गये। वहाँ स्नान करनेके बाद (उन्होंने) अभेदबुद्धिसे शिव एवं विष्णुका पूजन किया, (वहाँ) सात दिनोंतक रहकर कुब्जाम्रमें चले गये। उसके बाद उस सुन्दर तीर्थमें स्नानकर उपवास करनेवाले इन्द्रियजयी (प्रह्लाद) हृषीकेशका अर्चनकर बदरिकाश्रम चले गये॥ १–४॥ |
| तत्रोष्य नारायणमर्च्य भक्त्या<br>स्नात्वाऽथ विद्वान् स सरस्वतीजले।<br>वराहतीर्थे गरुडासनं स<br>दृष्ट्वाऽथ सम्पूज्य सुभक्तिमांश्च॥ ५<br><br>भद्रकर्णे ततो गत्वा जयेशं शशिशेखरम्।<br>दृष्ट्वा सम्पूज्य च शिवं विपाशामभितो ययौ॥ ६<br><br>तस्यां स्नात्वा समभ्यर्च्य देवदेवं द्विजप्रियम्।<br>उपवासी इरावत्यां ददर्श परमेश्वरम्॥ ७<br><br>यमाराध्य द्विजश्रेष्ठ शाकले वै पुरूरवाः।<br>समवाप परं रूपमैश्वर्यं च सुदुर्लभम्॥ ८<br><br>कुष्ठरोगाभिभूतश्च यं समाराध्य वै भृगुः।<br>आरोग्यमतुलं प्राप सन्तानमपि चाक्षयम्॥ ९ | वहाँ रहते हुए सरस्वतीके जलमें स्नानकर उन विद्वान् (प्रह्लादजी)-ने नारायणका पूजन किया। फिर अत्यन्त भक्तिके साथ उन्होंने वराहतीर्थमें गरुडासन विष्णुका दर्शन और पूजन किया। वहाँसे भद्रकर्णमें पहुँचकर जयेश शशिशेखर शिवका दर्शन तथा पूजन करके बादमें विपाशाकी ओर चले गये। उस विपाशामें स्नानके बाद द्विजप्रिय देवाधिदेवका अर्चन कर (प्रह्लाद) उपवास करते हुए इरावतीकी ओर चले गये। द्विजोत्तम! (उन्होंने) वहाँ उन भगवान्का दर्शन किया, जिनकी शाकलमें आराधना करनेसे (पहले) पुरूरवाको उत्तम रूप एवं सुदुर्लभ ऐश्वर्य प्राप्त हुआ था। कुष्ठरोगसे अभिभूत भृगुने उन परमेश्वरकी आराधना करके अतुलनीय नीरोगता और अक्षय सन्तान प्राप्त की थी॥ ५–९॥ |
| नारद उवाच<br>कथं पुरूरवा विष्णुमाराध्य द्विजसत्तम।<br>विरूपत्वं समुत्सृज्य रूपं प्राप श्रिया सह॥ १० | नारदने पूछा— द्विजोत्तम! पुरूरवाने विष्णुकी आराधना करनेके बाद विरूपताको छोड़कर ऐश्वर्यके साथ सुदुर्लभ सुन्दर रूप कैसे प्राप्त किया?॥ १०॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>श्रूयतां कथयिष्यामि कथां पापप्रणाशिनीम्।<br>पूर्वं त्रेतायुगस्यादौ यथावृत्तं तपोधन॥ ११ | पुलस्त्यजी बोले— तपोधन! सुनिये; मैं प्राचीन कालमें त्रेतायुगके आदिमें घटित, पापको नष्ट करनेवाली कथा |
अध्याय ७९ ] पुरूरवाको रूपकी प्राप्ति और उसी सन्दर्भमें प्रेत और वणिक्की भेंट [ ३९१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मद्रदेश इति ख्यातो देशो वै ब्रह्मणः सुत।<br>शाकलं नाम नगरं ख्यातं स्थानीयमुत्तमम्॥ १२<br>तस्मिन् विपणिवृत्तिस्थः सुधर्माख्योऽभवद् वणिक्।<br>धनाढ्यो गुणवान् भोगी नानाशास्त्रविशारदः॥ १३<br>स त्वेकदा निजाद् राष्ट्रात् सुराष्ट्रं गन्तुमुद्यतः।<br>सार्थेन महता युक्तो नानाविपणपण्यवान्॥ १४<br>गच्छतः पथि तस्याथ मरुभूमौ कलिप्रिय।<br>अभवद् दस्युतो रात्रौ अवस्कन्दोऽतिदुःसहः॥ १५ | कहता हूँ। ब्रह्मपुत्र! प्रसिद्ध मद्रदेशमें शाकल नामसे प्रसिद्ध उत्तम नगर है। वहाँ सुधर्मा नामका एक धनी, गुणशाली, भोगी एवं नाना शास्त्रोंमें निपुण व्यापारी रहता था। एक समय वह अपने देशसे सुराष्ट्र जानेको तैयार हुआ। कलिप्रिय! अनेक बेंची जानेवाली वस्तुओंसे युक्त व्यापारियोंके भारी समुदायके साथ जाते समय मार्गमें मरुभूमिमें रातमें (उसके ऊपर) डाकुओंका अत्यन्त उग्र असहनीय आक्रमण हुआ॥ ११—१५॥ |
| ततः स हृतसर्वस्वो वणिग्दुःखसमन्वितः।<br>असहायो मरौ तस्मिंश्चचारोन्मत्तवद् वशी॥ १६<br>चरता तदरण्यं वै दुःखान्क्रान्तेन नारद।<br>आत्मा इव शमीवृक्षो मरावासादितः शुभः॥ १७<br>तं मृगैः पक्षिभिश्चैवं हीनं दृष्ट्वा शमीतरुम्।<br>श्रान्तः क्षुत्तृत्परीतात्मा तस्याधः समुपाविशत्॥ १८<br>सुप्तश्चापि सुविश्रान्तो मध्याह्ने पुनरुत्थितः।<br>सम्पश्यदथायान्तं प्रेतं प्रेतशतैर्वृतम्॥ १९ | उसके बाद सब कुछ लुट जानेसे दुखी हुआ वह असहाय वणिक् मरुभूमिमें पागलकी भाँति इधर-उधर घूमने लगा। नारदजी! दुःखसे ग्रसित होकर उस वनमें घूमते हुए उसे मरुभूमिमें अपने जनके समान एक सुन्दर शमीका वृक्ष मिला। थका तथा भूख-प्याससे अभिभूत हुआ वह वणिक् उस शमीवृक्षको पशु-पक्षियोंसे रहित देखकर उसके नीचे बैठ गया और सो गया तथा पूर्ण विश्राम कर दोपहरको जगा। उसके बाद उसने सैकड़ों प्रेतोंसे घिरे एक प्रेतको आते हुए देखा॥ १६—१९॥ |
| उद्वाह्यन्तमथान्येन प्रेतेन प्रेतनायकम्।<br>पिण्डाशिभिश्च पुरतो धावद्भी रूक्षविग्रहैः॥ २०<br>अथाजगाम प्रेतोऽसौ पर्यटित्वा वनानि च।<br>उपागम्य शमीमूले वणिक्पुत्रं ददर्श सः॥ २१<br>स्वागतेनाभिवाद्यैनं समाभाष्य परस्परम्।<br>सुखोपविष्टश्छायायां पृष्टाकुशलमाप्तवान्॥ २२<br>ततः प्रेताधिपतिना पृष्टः स तु वणिक्सखः।<br>कुत आगम्यते ब्रूहि क्व साधो वा गमिष्यसि॥ २३ | प्रेतनायकको एक दूसरा प्रेत ढो रहा था और आगे रूखे शरीरवाले प्रेत दौड़ रहे थे। वनोंमें घूमनेके बाद वह प्रेत लौट रहा था। शमीवृक्षके नीचे आकर उसने वणिक्पुत्रको देखा। स्वागतके साथ उसे अभिवादन किया। फिर (दोनोंने) परस्पर वार्तालाप किया। इसके बाद वह प्रेत छायामें सुखपूर्वक बैठ गया और उसने उससे कुशल पूछी और जानी। उसके बाद प्रेताधिपतिने वणिक्-बन्धुसे पूछा—साधो! यह बतलाओ कि तुम कहाँसे आ रहे हो और कहाँ जाओगे?॥ २०—२३॥ |
| कथं चेदं महारण्यं मृगपक्षिविवर्जितम्।<br>समापन्नोऽसि भद्रं ते सर्वमाख्यातुमर्हसि॥ २४<br><br>एवं प्रेताधिपतिना वणिक् पृष्टः समासतः।<br>सर्वमाख्यातवान् ब्रह्मन् स्वदेशधनविच्युतिम्॥ २५<br><br>तस्य श्रुत्वा स वृत्तान्तं तस्य दुःखेन दुःखितः।<br>वणिक्पुत्रं ततः प्राह प्रेतपालः स्वबन्धुवत्॥ २६<br><br>एवं गतेऽपि मा शोकं कर्तुमर्हसि सुव्रत।<br>भूयोऽप्यर्थाः भविष्यन्ति यदि भाग्यबलं तव॥ २७ | तुम्हारा कल्याण हो। मुझे यह बताओ कि पशु एवं पक्षियोंसे रहित इस बड़े जंगलमें तुम कैसे आये?<br>(पुलस्त्यजी कहते हैं—) ब्रह्मन्! प्रेतराजके इस प्रकार पूछनेपर वणिक्ने थोड़ेमें उसे अपने देशका एवं धन-नाशका पूरा विवरण कह सुनाया। उसका पूरा वृत्तान्त सुन लेनेके बाद उसके दुःखसे दुखी होकर प्रेतपालने अपने बन्धुके समान (उसे मानते हुए) उस वणिक्-पुत्रसे कहा—सुव्रत! ऐसा होनेपर भी तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये। यदि तुम्हारा भाग्य प्रबल होगा तो धन फिर हो जायगा॥ २४—२७॥ |
३१२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७१
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| भाग्यक्षयेऽर्थाः क्षीयन्ते भवन्त्यभ्युदये पुनः।<br>क्षीणस्यास्य शरीरस्य चिन्तया नोदयो भवेत्॥ २८<br><br>इत्युच्चार्य समाहूय स्वान् भृत्यान् वाक्यमब्रवीत्।<br>अद्यातिथिरयं पूज्यः सदैव स्वजनो मम॥ २९<br><br>अस्मिन् दृष्टे वणिक्पुत्रे यथा स्वजनदर्शनम्।<br>अस्मिन् समागते प्रेताः प्रीतिर्जाता ममातुला॥ ३०<br><br>एवं हि वदतस्तस्य मृत्पात्रं सुदृढं नवम्।<br>दध्योदनेन सम्पूर्णमाजगाम यथेप्सितम्॥ ३१<br><br>तथा नवा च सुदृढा सम्पूर्णा परमाम्भसा।<br>वारिधानी च सम्प्राप्ता प्रेतानामग्रतः स्थिता॥ ३२ | (देखो,) भाग्यके क्षय होनेपर धनोंका क्षय हो जाता है और फिर भाग्योदय हो जानेपर पुनः धन प्राप्त हो जाते हैं। चिन्तासे क्षीण हुए शरीरका उत्थान (वृद्धि) नहीं होता। ऐसा कहकर उसने अपने सेवकोंको बुलाया और उनसे कहा—मेरे अपने जनके समान इस अतिथिका सब प्रकारसे सत्कार करो। प्रेतो! स्वजनदर्शनके समान ही मुझे इस वणिक्पुत्रका दर्शन हुआ है। इसके मिलनेसे मुझे अत्यधिक प्रीति प्राप्त हुई है। उसके ऐसा कहनेपर इच्छाभर (भोजन-योग्य) दही और भातसे भरा अत्यन्त दृढ़ एक नया मिट्टीका पात्र आ गया। इसी प्रकार निर्मल शीतल जलसे भरा एक पानीका पात्र भी उन प्रेतोंके सामने उपस्थित हो गया॥ २८—३२॥ |
| तमागतं ससलिलमन्नं वीक्ष्य महामतिः।<br>प्राहोत्तिष्ठ वणिक्पुत्र त्वमाह्निकमुपाचर॥ ३३<br><br>ततस्तु वारिधान्यास्तौ सलिलेन विधानतः।<br>कृताह्निकावुभौ जातौ वणिक् प्रेतपतिस्तथा॥ ३४<br><br>ततो वणिक्सुतायादौ दध्योदनमथेच्छया।<br>दत्त्वा तेभ्यश्च सर्वेभ्यः प्रेतेभ्यो व्यददात् ततः॥ ३५<br><br>भुक्तवत्सु च सर्वेषु कामतोऽम्भसि सेविते।<br>अनन्तरं स बुभुजे प्रेतपालो वराशनम्॥ ३६ | उस अन्न एवं जलको प्रस्तुत हुए देखकर महामति प्रेतने कहा—वणिक्पुत्र! तुम उठो एवं दैनिक (नित्य) कृत्य करो। उसके बाद वणिक् एवं प्रेतपति—दोनोंने घड़ेके जलसे विधिपूर्वक नित्य-क्रिया सम्पन्न की। उसके बाद (प्रेतपतिने) पहले वणिक्पुत्रको पर्याप्त दही और भात दिया और तब उन प्रेतोंको दिया। सभीके इच्छाभर भोजन एवं जलपान करनेके बाद प्रेतनायकने उत्तम भोजन किया॥ ३३—३६॥ |
| प्रकामवृप्ते प्रेते च वारिधान्योदनं तथा।<br>अन्तर्धानमगाद् ब्रह्मन् वणिक्पुत्रस्य पश्यतः॥ ३७<br><br>ततस्तदद्भुततमं दृष्ट्वा स मतिमान् वणिक्।<br>पप्रच्छ तं प्रेतपालं कौतूहलमना वशी॥ ३८<br><br>अरण्ये निर्जने साधो कुतोऽन्नस्य समुद्भवः।<br>कुतश्च वारिधानीयं सम्पूर्णा परमाम्भसा॥ ३९<br><br>तथामी तव ये भृत्यास्त्वत्तस्ते वर्णतः कृशाः।<br>भवानपि च तेजस्वी किंचित्पुष्टवपुः शुभः॥ ४०<br><br>शुक्लवस्त्रपरीधानो बहूनां परिपालकः।<br>सर्वमेतन्ममाचक्ष्व को भवान् का शमी त्वियम्॥ ४१ | (पुलस्त्यजी कहते हैं कि) ब्रह्मन्! प्रेतके भलीभाँति तृप्त हो जानेपर वणिक्पुत्रके देखते-ही-देखते जलपात्र और ओदन आँखोंसे ओझल हो गये। तब उस अत्यन्त ही आश्चर्यजनक दृश्यको देखकर उस बुद्धिमान् संयमी वणिक्ने उत्सुकतापूर्वक उस प्रेतपतिसे पूछा—साधो! इस निर्जन वनमें अन्न एवं उत्तम जलसे भरा घड़ा कहाँसे आ गया? अपेक्षाकृत तुम्हारे वर्णकी दृष्टिसे दुबले ये तुम्हारे भृत्य कौन हैं? कुछ हृष्ट-पुष्ट शरीरवाले सुन्दर, तेजसे सम्पन्न और शुक्लवस्त्रधारी (हमारे-जैसे) बहुतोंकी परिरक्षा करनेवाले आप भी कौन हैं? आप मुझे यह सम्पूर्ण विवरण बतलाएँ कि आप कौन हैं एवं यह शमीवृक्ष कौन है?॥ ३७—४१॥ |
| इत्थं वणिक्सुतवचः श्रुत्वासौ प्रेतनायकः।<br>शशंस सर्वमस्याद्यं यथावृत्तं पुरातनम्॥ ४२<br><br>अहमासं पुरा विप्रः शाकले नगरोत्तमे।<br>सोमशर्मेति विख्यातो बहुलागर्भसम्भवः॥ ४३ | वणिक्पुत्रके ऐसे वचनको सुनकर उस प्रेतनायकने उससे सारे पुराने वृत्तान्तको कहा। (उसने कहा—) प्राचीन कालमें उत्तम शाकल नामके श्रेष्ठ नगरमें बहुलाके गर्भसे उत्पन्न हुआ मैं सोमशर्मा—इस नामसे |
| अध्याय ७९ ] | पुरूरवाको रूपकी प्राप्ति और उसी सन्दर्भमें प्रेत और वणिककी भेंट | ३९३ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ममास्ति च वणिक् श्रीमान् प्रातिवेश्यो महाधनः।<br>स तु सोमश्रवा नाम विष्णुभक्तो महायशाः॥ ४४<br><br>सोऽहं कदर्यो मूढात्मा धनेऽपि सति दुर्मतिः।<br>न ददामि द्विजातिभ्यो न चाश्नाम्यन्नमुत्तमम्॥ ४५ | प्रसिद्ध ब्राह्मण था। मेरा एक पड़ोसी बहुत धनवान्, लक्ष्मीवान् वणिक् था, जिसका नाम था सोमश्रवा। वह महान् यशस्वी और विष्णुका भक्त था। मैं कृपण एवं दुर्मति था। अतः धन होते हुए भी न तो ब्राह्मणोंको दान करता था और न अच्छे अन्नका भोजन ही करता था॥ ४२–४५॥ |
| प्रमादाद् यदि भुञ्जामि दधिक्षीरघृतान्वितम्।<br>ततो रात्रौ नृभिर्घोरैस्ताड्यते मम विग्रहः॥ ४६<br><br>प्रातर्भवति मे घोरा मृत्युतुल्या विषूचिका।<br>न च कश्चिन्ममाभ्यासे तत्र तिष्ठति बान्धवः॥ ४७<br><br>कथं कथमपि प्राणा मया सम्प्रति धारिताः।<br>एवमेतादृशः पापी निवसाम्यतिनिर्घृणः॥ ४८<br><br>सौवीरतिलपिण्याकसक्तुशाकादिभोजनैः ।<br>क्षपयामि कदन्नाद्यैरात्मानं कालयापनैः॥ ४९ | यदि मैं कभी भूलसे दही, दूध एवं घीसे युक्त पदार्थ भोजन कर लेता था तो रात्रिमें भयङ्कर मनुष्य मेरे शरीरको पीड़ित करते थे। प्रातःकाल मुझे मरणके समान (कष्ट देनेवाली) भयङ्कर विषूचिका (हैजा) हो जाया करती थी। उस समय मेरे पास कोई भी बन्धु नहीं रहता था। मैं किसी-किसी प्रकार अपने प्राणोंको धारण करता था। इस प्रकार मैं अति निर्लज्ज पापयुक्त जीवन बिताता रहा। बेर, तिलपिण्याक, सत्तू, शाकादि एवं बुरे अन्नों (मोटे अन्न—) कोदो, साँवा आदिको खाकर समय बिताते हुए मैं स्वयंको दुर्बल कर रहा था॥ ४६–४९॥ |
| एवं तत्रासतो मह्यं महान् कालोऽभ्यगादथ।<br>श्रवणद्वादशी नाम मासि भाद्रपदेऽभवत्॥ ५०<br><br>ततो नागरिको लोको गतः स्नातुं हि सङ्गमम्।<br>इरावत्या नड्वलाया ब्रह्मक्षत्रपुरस्सरः॥ ५१<br><br>प्रातिवेश्यप्रसङ्गेन तत्राप्यनुगतोऽस्म्यहम्।<br>कृतोपवासः शुचिमानेकादश्यां यतव्रतः॥ ५२<br><br>ततः सङ्गमतोयेन वारिधानीं दृढां नवाम्।<br>सम्पूर्णां वस्तुसंवीतां छत्रोपानहसंयुताम्॥ ५३<br><br>मृत्पात्रमपि मिष्टस्य पूर्णं दध्योदनस्य ह।<br>प्रदत्तं ब्राह्मणेन्द्राय शुचये ज्ञानधर्मिणे॥ ५४ | मुझे वहाँ इस ढंगसे रहते हुए बहुत समय बीत गया। (एक बार) भाद्रपदमासमें श्रवणद्वादशीकी तिथि आयी। तब ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि नागरिक लोग इरावती और नड्वला नदियोंके संगममें स्नान करनेके लिये गये। पड़ोसी होनेके कारण मैं भी उनके पीछे-पीछे चला गया। एकादशीके दिन मैंने व्रत रहकर पवित्रतासे उपवास किया। उसके बाद मैंने अनेक वस्तुओं—छाता, जूता और साथ ही सङ्गमके जलसे भरा नवीन दृढ़ जलपात्र एवं मिष्टान्न, दधि तथा ओदनसे पूर्ण मिट्टीका पात्र ज्ञानी, धार्मिक, पवित्र, श्रेष्ठ ब्राह्मणको प्रदान किया॥ ५०–५४॥ |
| तदेव जीवतो दत्तं मया दानं वणिक्सुत।<br>वर्षाणां सप्ततीनां वै नान्यद् दत्तं हि किंचन॥ ५५<br><br>मृतः प्रेतत्वमापन्नो दत्त्वा प्रेतान्नमेव हि।<br>अमी चादत्तदानास्तु मदन्नेनोपजीविनः॥ ५६<br><br>एतत्ते कारणं प्रोक्तं यत्तदन्नं मयाम्भसा।<br>दत्तं तदिदमायाति मध्याह्नेऽपि दिने दिने॥ ५७<br><br>यावन्नाहं च भुञ्जामि न तावत् क्षयमेति वै।<br>मयि भुक्ते च पीते च सर्वमन्तर्हितं भवेत्॥ ५८ | वणिक्पुत्र! मैंने अपने सत्तर वर्षोंके (पूरे) जीवनमें (केवल) वही दान दिया था। इसके सिवा अन्य कुछ भी नहीं दान किया। प्रेतान्न दान करके मृत्युके बाद मैं प्रेत हो गया। मेरे अन्नसे जीवन धारण करनेवाले इन लोगोंने भी दान कभी नहीं किया है। मैंने तुम्हें वह कारण बतलाया जिससे मेरे द्वारा दिये गये अन्न-जल प्रतिदिन दोपहरके समय (मेरे समीप) आ जाते हैं। जबतक मैं नहीं खाता, तबतक उनका क्षय नहीं होता। मेरे खाने और पीनेके बाद सभी कुछ अदृश्य हो जाता है॥ ५५–५८॥ |
| ३९४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७९ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यच्छातातपत्रमददं सोऽयं जातः शमीतरुः।<br>उपानद्युगले दत्ते प्रेतो मे वाहनोऽभवत्॥ ५९<br><br>इयं तवोक्ता धर्मज्ञ मया कीनाशतात्मनः।<br>श्रवणद्वादशीपुण्यं तवोक्तं पुण्यवर्धनम्॥ ६०<br><br>इत्येवमुक्ते वचने वणिक्पुत्रोऽब्रवीद् वचः।<br>यन्मया तात कर्त्तव्यं तदनुज्ञातुमर्हसि॥ ६१<br><br>तत् तस्य वचनं श्रुत्वा वणिक्पुत्रस्य नारद।<br>प्रेतपालो वचः प्राह स्वार्थसिद्धिकरं ततः॥ ६२ | मैंने जो छाताका दान किया था, वही इस शमीवृक्षके रूपमें उत्पन्न हुआ है। एक जोड़ा जूताका दान करनेसे प्रेत मेरा वाहन बना है। धर्मज्ञ! अपने प्रेतत्व-प्राप्तिका यह समस्त विवरण मैंने तुमसे कह सुनाया तथा परम पवित्र और पुण्यको बढ़ानेवाली श्रवणद्वादशीका भी वर्णन कर दिया। प्रेतके ऐसा कहनेपर वणिक्पुत्रने कहा—तात! मुझे जो करना हो उसकी आज्ञा दें। (पुलस्त्यजी कहते हैं कि) नारदजी! वणिक्पुत्रका वह वचन सुनकर प्रेतपति अपनी स्वार्थसिद्धिकी बात कहने लगा—॥ ५९—६२॥ |
| यत् त्वया तात कर्त्तव्यं मद्धितार्थं महामते।<br>कथयिष्यामि तत् सम्यक् तव श्रेयस्करं मम॥ ६३<br><br>गयायां तीर्थजुष्टायां स्नात्वा शौचसमन्वितः।<br>मम नाम समुद्दिश्य पिण्डनिर्वपणं कुरु॥ ६४<br><br>तत्र पिण्डप्रदानेन प्रेतभावादहं सखे।<br>मुक्तस्तु सर्वदातॄणां यास्यामि सहलोकताम्॥ ६५<br><br>यथेयं द्वादशी पुण्या मासि प्रौष्ठपदे सिता।<br>बुधश्रवणसंयुक्ता साऽतिश्रेयस्करी स्मृता॥ ६६ | महामते! मेरे हितके लिये तुम्हें करने योग्य कर्म मैं बतलाता हूँ। उसे अच्छी तरह सम्पन्न कर लेनेसे तुम्हारा और मेरा (दोनोंका) कल्याण होगा। (देखो,) गया-तीर्थमें (जाकर और) स्नानसे पवित्र होकर मेरे नाम (उद्देश्य)-से तुम पिण्डदान करो। सखे! वहाँ पिण्डदान करनेसे मैं प्रेतभावसे मुक्त होकर सर्वस्व दान करनेवालोंको मिलनेवाले लोकको प्राप्त कर लूँगा। भाद्रपदमासके शुक्लपक्षकी बुधवार एवं श्रवण नक्षत्रसे युक्त पुण्य बढ़ानेवाली अत्यन्त माङ्गलिक यह द्वादशी (तिथि) कही गयी है॥ ६३—६६॥ |
| इत्येवमुक्त्वा वणिजं प्रेतराजोऽनुगैःसह।<br>स्वनामानि यथान्यायं सम्यगाख्यातवाञ्छुचिः॥ ६७<br><br>प्रेतस्कन्धे समारोप्य त्याजितो मरुमण्डलम्।<br>रम्येऽथ शूरसेनाख्ये देशे प्राप्तः स वै वणिक्॥ ६८<br><br>स्वकर्मधर्मयोगेन धनमुच्चावचं बहु।<br>उपार्जयित्वा प्रययौ गयाशीर्षमनुत्तमम्॥ ६९<br><br>पिण्डनिर्वपणं तत्र प्रेतानामनुपूर्वशः।<br>चकार स्वपितॄणां च दायादानामनन्तरम्॥ ७० | वणिक्से ऐसा कहकर प्रेतराजने अपने अनुचरोंसहित पवित्रतापूर्वक यथोचित क्रमसे अपने (पितरोंके) नामोंको बताया। उसे प्रेतके कन्धेपर चढ़ाकर मरु-भूमिसे बाहर छोड़ दिया गया। इस प्रकार वह वणिक् शूरसेन नामके सुन्दर देशमें पहुँच गया। अपने कर्म तथा धर्मसे उसने अधिक मात्रामें उत्कृष्ट एवं हीन धन उपार्जित कर लिया। उसके बाद वह उत्तम गयाशीर्ष नामके तीर्थमें गया। वहाँ क्रमशः प्रेतोंके उद्देश्यसे पिण्डदान करनेके बाद उसने अपने पितरों एवं दायादोंको भी पिण्डदान किया॥ ६७-७०॥ |
| आत्मनश्च महाबुद्धिर्महाबोध्यं तिलैर्विना।<br>पिण्डनिर्वपणं चक्रे तथान्यानपि गोत्रजान्॥ ७१<br><br>एवं प्रदत्तेष्वथ वै पिण्डेषु प्रेतभावतः।<br>विमुक्तास्ते द्विज प्रेता ब्रह्मलोकं ततो गताः॥ ७२ | उस महाबुद्धि (वणिक्)-ने अपने लिये तिलसे रहित महाबोध्य नामका पिण्डदान किया। उसके बाद अन्य गोत्रोंमें उत्पन्न हुओंके उद्देश्यसे भी पिण्डदान किया। द्विज! इस प्रकार पिण्डदान करनेपर वे प्रेत प्रेत-योनिसे मुक्त होकर ब्रह्मलोकको चले गये। |
अध्याय ७९ ] पुरूरवाको रूपकी प्राप्ति और उसी सन्दर्भमें प्रेत और वणिक्की भेंट [ ३९५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| स चापि हि वणिक्पुत्रो निजमालयमाव्रजत्।<br>श्रवणद्वादशीं कृत्वा कालधर्ममुपेयिवान्॥ ७३<br><br>गन्धर्वलोके सुचिरं भोगान् भुक्त्वा सुदुर्लभान्।<br>मानुष्यं जन्ममासाद्य स बभौ शाकले विराट्॥ ७४ | वह वणिक्पुत्र भी अपने घर चला गया और श्रवणद्वादशीका (यथोचित रीतिसे) (व्रत) पालन करते हुए वह भी समय आनेपर स्वर्गीय हो गया। गन्धर्वलोकमें चिरकालतक अत्यन्त दुर्लभ भोगोंका उपभोग करनेके बाद मनुष्य-जन्म प्राप्त कर वह शाकलपुरीका सम्राट् बना॥ ७३-७४॥ |
| स्वधर्मकर्मवृत्तिस्थः श्रवणद्वादशीरतः।<br>कालधर्ममवाप्यासौ गुह्यकावासमाश्रयत्॥ ७५<br><br>तत्रोष्य सुचिरं कालं भोगान् भुक्त्वाऽथ कामतः।<br>मर्त्यलोकमनुप्राप्य राजन्यतनयोऽभवत्॥ ७६<br><br>तत्रापि क्षत्रवृत्तिस्थो दानभोगरतो वशी।<br>गोग्रहेऽरिगणाञ्जित्वा कालधर्ममुपेयिवान्।<br>शक्रलोकं स सम्प्राप्य देवैः सर्वैः सुपूजितः॥ ७७<br><br>पुण्यक्षयात् परिभ्रष्टः शाकले सोऽभवद् द्विजः।<br>ततो विकटरूपोऽसौ सर्वशास्त्रार्थपारगः॥ ७८ | अपने धर्म तथा कर्ममें स्थित रहता हुआ वह श्रवणद्वादशी (व्रत)-में रत रहता रहा। (समय आनेपर) मृत्युके बाद उसने गुह्यकोंका लोक प्राप्त कर लिया। वहाँ बहुत कालतक ठहरकर और इच्छानुकूल भाँति-भाँतिके भोग्य पदार्थोंका भोग करनेके बाद वह मृत्युलोकमें आकर राजपुत्र बना। वहाँ भी क्षत्रिय-वृत्तिसे निर्वाह करते हुए वह दान और भोगमें लगा रहा। गौओंके अपहरणमें उसने शत्रुओंको जीतकर कालधर्म (मृत्यु)-को प्राप्त हुआ। फिर वह इन्द्रलोकमें गया और सभी देवोंसे पूजित हुआ। पुण्यका क्षय होनेसे 'क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति'—नियमसे स्वर्गच्युत होकर वह फिर शाकल देशमें ब्राह्मण हुआ। उसका रूप तो अत्यन्त विद्रूप (भयङ्कर) था, परंतु वह (विद्यासे) सम्पूर्ण शास्त्रोंमें पारङ्गत था॥ ७५-७८॥ |
| विवाहयद् द्विजसुतां रूपेणानुपमां द्विज।<br>साऽवमेने च भर्त्तारं सुशीलमपि भामिनी॥ ७९<br><br>विरूपमिति मन्वाना ततः सोऽभूत् सुदुःखितः।<br>ततो निर्वेदसंयुक्तो गत्वाश्रमपदं महत्॥ ८०<br><br>इरावत्यास्तटे श्रीमान् रूपधारिणमासदत्।<br>तमाराध्य जगन्नाथं नक्षत्रपुरुषेण हि॥ ८१<br><br>सुरूपतामवाप्याग्र्यां तस्मिन्नेव च जन्मनि।<br>ततः प्रियोऽभूद् भार्याया भोगवांश्चाभवद् वशी।<br>श्रवणद्वादशीभक्तः पूर्वाभ्यासादजायत॥ ८२<br><br>एवं पुराऽसौ द्विजपुङ्गवस्तु<br>कुरूपरूपो भगवत्प्रसादात्।<br>अनङ्गरूपप्रतिमो बभूव<br>मृतश्च राजा स पुरूरवाऽभूत्॥ ८३ | द्विज! उसने अनुपम सुन्दरी ब्राह्मण-कन्यासे विवाह किया। वह ललना (अपने) अत्यन्त शीलवान् पतिको भी कुरूप मानकर निरादर करती रहती। इससे वह बहुत दुःखित हो गया। उसके बाद ग्लानिसे भरकर वह इरावतीके तीरपर स्थित महान् आश्रममें पहुँचा और नक्षत्र-पुरुषके द्वारा स्थापित सुन्दर रूप धारण करनेवाले जगन्नाथ भगवान्की आराधना की। इस प्रकार उसी जन्ममें परम सुन्दर रूप प्राप्त कर वह अपनी भार्याका प्यारा एवं ऐश्वर्यसे सम्पन्न हो गया। पूर्वके अभ्याससे संयत रहनेवाला वह श्रवणद्वादशीका भक्त बना रहा। इस प्रकार पहले कुरूप रहनेपर भी भगवान्की कृपासे वह श्रेष्ठ ब्राह्मण कामदेवके समान सुन्दर रूपवाला हो गया और स्वर्गीय होकर दूसरे जन्ममें राजा पुरूरवा हुआ॥ ७९-८३॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें उन्नासीवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ७९ ॥
| ३९६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ८० |
|---|
अस्सीवाँ अध्याय
नक्षत्र-पुरुषके वर्णन-प्रसङ्गमें नक्षत्र-पुरुषकी पूजाका विधान और नक्षत्र-पुरुषके व्रतका माहात्म्य
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| नारद उवाच<br>पुरूरवा द्विजश्रेष्ठ यथा देवं श्रियः पतिम्।<br>नक्षत्रपुरुषाख्येन आराधयत तद् वद॥ १ | नारदजीने पूछा— द्विजश्रेष्ठ! पुरूरवाने नक्षत्र-पुरुष नामक व्रतके द्वारा लक्ष्मीपति वासुदेवकी जिस विधिसे आराधना की थी, उसे कहिये॥ १॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>श्रूयतां कथयिष्यामि नक्षत्रपुरुषव्रतम्।<br>नक्षत्राङ्गानि देवस्य यानि यानीह नारद॥ २<br><br>मूलर्क्षं चरणौ विष्णोर्जङ्घे द्वे रोहिणी स्मृते।<br>द्वे जानुनी तथाश्विन्यौ संस्थिते रूपधारिणः॥ ३<br><br>आषाढे द्वे द्वयं चौर्वोर्गुह्यस्थं फाल्गुनीद्वयम्।<br>कटिसंस्थाः कृत्तिकाश्चैव वासुदेवस्य संस्थिताः॥ ४<br><br>प्रौष्ठपद्याद्वयं पार्श्वे कुक्षिभ्यां रेवती स्थिता।<br>उरःसंस्था त्वनुराधा श्रविष्ठा पृष्ठसंस्थिता॥ ५ | पुलस्त्यजी बोले— नारदजी! मैं नक्षत्र-पुरुष-व्रत एवं देवके सभी नक्षत्ररूपी अङ्गोंका वर्णन करता हूँ; आप सुनें—मूल नक्षत्र भगवान् विष्णुके दोनों चरणों, रोहिणी नक्षत्र दोनों जंघाओं एवं अश्विनी नक्षत्र दोनों घुटनोंका रूप धारण करके स्थित हैं। पूर्वाषाढ़ा और उत्तराषाढ़ा नामके दो नक्षत्र वासुदेवके दोनों ऊरुओंमें, पूर्वाफाल्गुनी तथा उत्तराफाल्गुनी नामवाले दोनों नक्षत्र गुह्य प्रदेशमें और कृत्तिका नक्षत्र कटि-भागमें स्थित है। पूर्वाभाद्रपदा तथा उत्तराभाद्रपदा भगवान्के दोनों पाश्र्वोंमें, रेवती दोनों कुक्षियोंमें, अनुराधा हृदयमें तथा धनिष्ठा नक्षत्र पृष्ठदेशमें स्थित है॥ २-५॥ |
| विशाखा भुजयोर्हस्तः करद्वयमुदाहृतम्।<br>पुनर्वसुस्तथाङ्गुल्यो नखाः सार्पस्तथोच्यते॥ ६<br><br>ग्रीवास्थिता तथा ज्येष्ठा श्रवणं कर्णयोः स्थितम्।<br>मुखसंस्थस्तथा पुष्यः स्वातिर्दन्ताः प्रकीर्तिताः॥ ७<br><br>हनू द्वे वारुणश्चोक्तो नासा पैत्र उदाहृतः।<br>मृगशीर्षं नयनयो रूपधारिणि तिष्ठति॥ ८<br><br>चित्रा चैव ललाटे तु भरणी तु तथा शिरः।<br>शिरोरुहस्था चैवार्द्रा नक्षत्राङ्गमिदं हरेः॥ ९ | दोनों भुजाओंके स्थानमें विशाखा नक्षत्र है। हस्त नक्षत्रको भगवान्का दोनों हाथ कहा गया है। पुनर्वसु नक्षत्र भगवान्की अंगुलियाँ और आश्लेषा नक्षत्र उनके नख हैं। ग्रीवामें ज्येष्ठा, दोनों कानोंमें श्रवण तथा मुखमें पुष्य नक्षत्र स्थित है। दाँतोंको स्वाति नक्षत्र कहा गया है। शतभिषा नक्षत्र दोनों हनुएँ तथा मघाको नासिका कहा गया है। (नक्षत्रोंका) रूप धारण करनेवाले भगवान्के दोनों नेत्रोंमें मृगशिरा नक्षत्रका निवास है। चित्रा ललाटमें, भरणी सिरमें तथा आर्द्रा नक्षत्र केशमें रहता है। भगवान् विष्णुका यह नक्षत्र-शरीर है॥ ६-९॥ |
| विधानं सम्प्रवक्ष्यामि यथायोगेन नारद।<br>सम्पूजितो हरिः कामान् विदधाति यथेप्सितान्॥ १० | नारदजी! अब मैं उस व्रतके विधानका वर्णन करूँगा, जिस व्रतसे नियमपूर्वक आराधित होनेपर भगवान् विष्णु इच्छित फल प्रदान करते हैं। |
| अध्याय ८० ] | नक्षत्र-पुरुषके वर्णन-प्रसङ्गमें नक्षत्र-पुरुषकी पूजाका विधान | ३९७ | | :--- | :--- |
| चैत्रमासे सिताष्टम्यां यदा मूलगतः शशी।<br>तदा तु भगवत्पादौ पूजयेत् तु विधानतः।<br>नक्षत्रसंनिधौ दद्याद् विप्रेन्द्राय च भोजनम्॥ ११<br><br>जानुनी चाश्विनीयोगे पूजयेदथ भक्तितः।<br>दोहदे च हविष्यान्नं पूर्ववद् द्विजभोजनम्॥ १२<br><br>आषाढाभ्यां तथा द्वाभ्यां द्वा ऊरू पूजयेद् बुधः।<br>सलिलं शिशिरं तत्र दोहदे च प्रकीर्तितम्॥ १३ | चैत्रमासके शुक्लपक्षकी अष्टमी तिथिमें चन्द्रमाके मूल नक्षत्रमें स्थित होनेपर भगवान्के दोनों पैरोंकी विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिये। नक्षत्रकी संनिधिमें ब्राह्मणको भोजन कराना चाहिये। अश्विनी नक्षत्रके योगमें श्रद्धापूर्वक भगवान्के दोनों घुटनोंकी अर्चना करनी चाहिये एवं 'दोहद' में (यात्रा-दोषकी शान्तिके लिये खाये-पिये जानेवाले निश्चित पदार्थमें) हविष्यान्न समर्पित करना एवं पूर्ववत् ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। विद्वान् मनुष्य पूर्वाषाढ़ तथा उत्तराषाढ़के योगमें विष्णुके दोनों ऊरुओंकी पूजा करे। (इसमें देय) दोहदमें शीतल जलका विधान है॥ १०—१३॥ | | फाल्गुनीद्वितीये गुह्यं पूजनीयं विचक्षणैः।<br>दोहदे च पयो गव्यं देयं च द्विजभोजनम्॥ १४<br><br>कृत्तिकासु कटिः पूज्या सोपवासो जितेन्द्रियः।<br>देयं च दोहदं विष्णोः सुगन्धकुसुमोदकम्॥ १५<br><br>पार्श्वे भाद्रपदायुग्मे पूजयित्वा विधानतः।<br>गुडं सलेहकं दद्याद् दोहदे देवकीर्तितम्॥ १६<br><br>द्वे कुक्षी रेवतीयोगे दोहदे मुद्गमोदकाः।<br>अनुराधासु जठरं षष्टिकान्नं च दोहदे॥ १७ | [अनुक्रान्त विधानमें पुलस्त्यजी कहते हैं—] विद्वान् पुरुष दोनों फाल्गुनी नक्षत्रोंमें भगवान्के गुह्य-देशकी पूजा करे। दोहदके लिये दूध और घी दे और ब्राह्मण-भोजन कराये। कृत्तिका नक्षत्रमें उपवासपूर्वक जितेन्द्रिय रहकर भगवान्के कटि-देशकी अर्चना करे और सुगन्धित कुसुमसे युक्त जलका 'दोहद' दान करे। दोनों भाद्रपदाओंमें कहे हुए विधानसे भगवान्की दोनों बगलोंकी अर्चना करके 'दोहद' में देवद्वारा कथित—शास्त्रानुमोदित चाटनेवाली वस्तुसे युक्त गुड़ देना चाहिये। रेवती नक्षत्रके योगमें भगवान्की दोनों कुक्षियोंकी पूजाके बाद दोहदमें मूँगके लड्डू प्रदान करने चाहिये। अनुराधा नक्षत्रमें उदरकी पूजा करके दोहदमें साठीका चावल देना चाहिये॥ १४—१७॥ | | श्रविष्ठायां तथा पृष्ठं शालिभक्तं च दोहदे।<br>भुजयुग्मं विशाखासु दोहदे परमोदनम्॥ १८<br><br>हस्ते हस्तौ तथा पूज्यौ यावकं दोहदे स्मृतम्।<br>पुनर्वसावङ्गुलीश्च पटोलस्तत्र दोहदे॥ १९<br><br>आश्लेषासु नखान् पूज्य दोहदे तित्तिरामिषम्।<br>ज्येष्ठायां पूजयेद् ग्रीवां दोहदे तिलमोदकम्॥ २०<br><br>श्रवणे श्रवणौ पूज्यौ दधिभक्तं च दोहदे।<br>पुष्ये मुखं पूजयेत दोहदे घृतपायसम्॥ २१ | धनिष्ठा नक्षत्रमें पृष्ठकी पूजा करके दोहदमें शालिका भात देना चाहिये। विशाखा नक्षत्रमें भगवान्की दोनों भुजाओंकी पूजा कर दोहदमें उत्तम अन्न देना चाहिये। हस्त नक्षत्रमें भगवान्के दोनों करोंकी पूजा करके दोहदमें जौसे बना पकवान्न देना चाहिये। पुनर्वसु नक्षत्रमें अंगुलियोंकी पूजा करके दोहदमें रेशमी वस्त्र या परवल प्रदान करना चाहिये। आश्लेषा नक्षत्रमें नखकी पूजा कर दोहदमें तित्तिरकी आकृति प्रदान करे। ज्येष्ठा में ग्रीवाकी पूजा करके दोहदमें तिलका लड्डू प्रदान करे। श्रवण नक्षत्रमें दोनों कानोंकी पूजा करके दोहदमें दही और भात प्रदान करे। पुष्य नक्षत्रमें मुखकी पूजा करे और दोहदमें घी मिला हुआ पायस प्रदान करे॥ १८—२१॥ | | स्वातियोगे च दशना दोहदे तिलशष्कुली।<br>दातव्या केशवप्रीतै ब्राह्मणस्य च भोजनम्॥ २२ | स्वाति नक्षत्रके योगमें भगवान्के दाँतोंका पूजन करके तिल और शष्कुली (पूड़ी)-का दोहद दे एवं केशवको प्रसन्न करनेके लिये ब्राह्मणको भोजन कराये। |
| ३९८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ८० | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| हनू शतभिषायोगे पूजयेच्च प्रयत्नतः।<br>प्रियङ्गुरक्तशाल्यन्नं दोहदं मधुविद्विषः॥ २३<br><br>मघासु नासिका पूज्या मधु दद्याच्च दोहदे।<br>मृगोत्तमाङ्गे नयने मृगमांसं च दोहदे॥ २४<br><br>चित्रायोगे ललाटं च दोहदे चारुभोजनम्।<br>भरणीषु शिरः पूज्यं चारु भक्तं च दोहदे॥ २५ | शतभिषा नक्षत्रमें प्रयत्नपूर्वक भगवान्के ठुड्डीकी पूजा करे और विष्णुको अत्यन्त प्रिय लगनेवाला प्रियङ्गु (कँगनी) एवं लाल चावलका दोहद दे। मघामें नासिकाकी पूजा करनी चाहिये एवं दोहदमें मधु देना चाहिये। मृगशिरा नक्षत्रमें मस्तकमें स्थित दोनों नेत्रोंकी पूजा करके दोहदमें मृगके मानका फलका गूदा देना चाहिये। चित्रा नक्षत्रके योगमें ललाटकी पूजा करके दोहदमें सुन्दर भोजन देना चाहिये। भरणी नक्षत्रमें सिरकी पूजा करनी चाहिये और दोहदमें सुन्दर भात प्रदान करना चाहिये॥ २२—२५॥ |
| सम्प्पूजनीया विद्वद्भिद्रार्द्रायोगे शिरोरुहाः।<br>विप्रांश्च भोजयेद् भक्त्या दोहदे च गुडार्द्रकम्॥ २६<br><br>नक्षत्रयोगेष्वेतेषु सम्पूज्य जगतः पतिम्।<br>पारिते दक्षिणां दद्यात् स्त्रीपुंसोश्चारुवाससी॥ २७<br><br>छत्रोपानत् श्वेतयुगं सप्तधान्यानि काञ्चनम्।<br>घृतपात्रं च मतिमान् ब्राह्मणाय निवेदयेत्॥ २८<br><br>प्रतिनक्षत्रयोगेन पूजनीया द्विजातयः।<br>नक्षत्रमय एवैष पुरुषः शाश्वतो मतः॥ २९ | आर्द्राके योगमें विद्वान् लोगोंको (भगवान्के) केशोंकी पूजा करनी चाहिये और श्रद्धापूर्वक ब्राह्मणोंको भोजन कराना तथा दोहदमें गुड़ एवं अदरखका दान करना चाहिये। इन नक्षत्रोंके योगोंमें जगत्पति (विष्णु)-की पूजा करनेके बाद पारणकर स्त्री और पुरुषके लिये दो सुन्दर वस्त्र दे। बुद्धिमान् पुरुष ब्राह्मणको सफेद छाता, एक जोड़ा जूता, सप्तधान्य, स्वर्ण एवं घीसे भरे पात्रका दान करे। प्रत्येक नक्षत्रके योगमें ब्राह्मणोंकी पूजा करनी चाहिये। यही नक्षत्रमय नित्य सनातन पुरुष माने गये हैं॥ २६—२९॥ |
| नक्षत्रपुरुषाख्यं हि व्रतानामुत्तमं व्रतम्।<br>पूर्वं कृतं हि भृगुणा सर्वपातकनाशनम्॥ ३०<br><br>अङ्गोपाङ्गानि देवर्षे पूजयित्वा जगद्गुरोः।<br>सुरूपण्यभिजायन्ते प्रत्यङ्गाङ्गानि चैव हि॥ ३१<br><br>सप्तजन्मकृतं पापं कुलसंगागतं च यत्।<br>पितृमातृसमुत्थं च तत्सर्वं हन्ति केशवः॥ ३२<br><br>सर्वाणि भद्रण्याप्नोति शरीरारोग्यमुत्तमम्।<br>अनन्तां मनसः प्रीतिं रूपं चातीव शोभनम्॥ ३३ | नक्षत्र-पुरुष नामका व्रत सभी व्रतोंमें श्रेष्ठ है। प्राचीन समयमें भृगुने समस्त पापोंके विनाश करनेवाले इस व्रतको किया था। देवर्षे! भगवान्के अङ्गों और उपाङ्गोंकी पूजा करनेसे मनुष्यके सभी अङ्ग-प्रत्यङ्ग सुन्दर होते हैं। सात जन्मोंमें (अपने स्वयंके) किये हुए, कुलक्रमसे प्राप्त एवं माता-पिताके कारण प्राप्त पापों—सब प्रकारके पापोंको केशव पूर्णतया नष्ट कर देते हैं; और इस प्रकार भगवान्का पूजन करनेसे समस्त प्रकारके कल्याण प्राप्त होते हैं; शरीर उत्तम आरोग्यसे सम्पन्न होता है, मनमें अनन्त प्रसन्नता प्राप्त होती है और अत्यन्त सुन्दर रूप भी प्राप्त हो जाता है॥ ३०—३३॥ |
| वाङ्माधुर्यं तथा कान्तिं यच्चान्यदभिवाञ्छितम्।<br>ददाति नक्षत्रपुमान् पूजितस्तु जनार्दनः॥ ३४<br><br>उपोष्या सम्यगेतेषु क्रमेणर्क्षेषु नारद।<br>अरुन्धती महाभागा ख्यातिमग्र्यां जगाम ह॥ ३५<br><br>आदित्यस्तनयार्थाय नक्षत्राङ्गं जनार्दनम्।<br>सम्पूजयित्वा गोविन्दं रेवन्तं पुत्रमाप्तवान्॥ ३६ | इस प्रकार पूजित होनेपर नक्षत्र-पुरुष जनार्दन भगवान् मधुर वाणी, कान्ति तथा अन्य मनोऽभिलषित पदार्थ प्रदान करते हैं। नारदजी! इन नक्षत्रोंके योगमें क्रमशः उपवासकर महाभाग्यशालिनी अरुन्धतीने उत्तम प्रसिद्धि प्राप्त की थी। आदित्यने पुत्रकी इच्छासे नक्षत्र-पुरुष जनार्दनकी अर्चनाकर रेवन्त-नामक पुत्र प्राप्त किया था। |
| अध्याय ८१ ] | प्रह्लादकी आनुक्रमिक तीर्थयात्राका वर्णन और जलोद्भव आख्यान | ३९९ |
|---|
| रम्भा रूपमवापाग्र्यं वाङ्माधुर्यं च मेनका।<br>कान्तिं विधुरवापाग्र्यां राज्यं राजा पुरूरवाः ॥ ३७<br><br>एवं विधानतो ब्रह्मन्नक्षत्राङ्गो जनार्दनः।<br>पूजितो रूपधारी यैस्तैः प्राप्ता तु सुकामिता ॥ ३८<br><br>एतत् तवोक्तं परमं पवित्रं<br>धन्यं यशस्यं शुभरूपदायि।<br>नक्षत्रपुंसः परमं विधान<br>शृणुष्व पुण्यामिह तीर्थयात्राम् ॥ ३९ | (नक्षत्राङ्ग जनार्दनकी पूजा करके) रम्भाने श्रेष्ठ रूप, मेनकाने वाणीकी मधुरता, चन्द्रने उत्तम कान्ति तथा पुरूरवाने राज्य प्राप्त किया था। [पुलस्त्यजी कहते हैं कि] ब्रह्मन्! इस प्रकार जिसने नक्षत्राङ्ग-रूपधारी जनार्दनकी पूजा की, उसने अपने मनोरथोंकी भलीभाँति पूर्ति कर ली। मैंने आपसे भगवान् नक्षत्र-पुरुषके परम पवित्र धन देनेवाले, कीर्ति बढ़ानेवाले और सुन्दर रूपको देनेवाले व्रतके विधानका वर्णन कर दिया। अब पवित्र तीर्थयात्राका वर्णन सुनिये॥ ३४—३९॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें अस्सीवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ८०॥
इक्यासीवाँ अध्याय
प्रह्लादकी आनुक्रमिक तीर्थयात्राका वर्णन और जलोद्भवका आख्यान
| पुलस्त्य उवाच<br><br>इरावतीमनुप्राप्य पुण्यां तामृषिकन्यकाम्।<br>स्नात्वा सम्पूजयामास चैत्राष्टम्यां जनार्दनम् ॥ १<br><br>नक्षत्रपुरुषं चीर्त्वा व्रतं पुण्यप्रदं शुचिः।<br>जगाम स कुरुक्षेत्रं प्रह्लादो दानवेश्वरः ॥ २<br><br>ऐरावतेन मन्त्रेण चक्रतीर्थं सुदर्शनम्।<br>उपामन्त्र्य ततः सस्नौ वेदोक्तविधिना मुने ॥ ३<br><br>उपोष्य क्षणदां भक्त्या पूजयित्वा कुरुध्वजम्।<br>कृतशौचो जगामाथ द्रष्टुं पुरुषकेसरिम् ॥ ४<br><br>स्नात्वा तु देविकायां च नृसिंहं प्रतिपूज्य च।<br>तत्रोष्य रजनीमेकां गोकर्णं दानवो ययौ ॥ ५<br><br>तस्मिन् स्नात्वा तथा प्राचीं पूज्येशं विश्वकर्म्मिणम्।<br>प्राचीने चापरे दैत्यो द्रष्टुं कामेश्वरं ययौ ॥ ६<br><br>तत्र स्नात्वा च दृष्ट्वा च पूजयित्वा च शङ्करम्।<br>द्रष्टुं ययौ च प्रह्लादः पुण्डरीकं महाम्भसि ॥ ७ | पुलस्त्यजी बोले— (नारदजी!) प्रह्लादने परम पवित्र ऋषिकन्या उस इरावती नदीके पास जाकर स्नान किया और चैत्रमासकी अष्टमी तिथिमें जनार्दनकी पूजा की। वहाँ पवित्र पुण्यदायक नक्षत्र-पुरुषके व्रतका अनुष्ठान कर दानवेश्वर प्रह्लाद कुरुक्षेत्र चले गये। मुने! उन्होंने ऐरावत-मन्त्रसे सुदर्शनचक्र तीर्थका आवाहन करके वेद-विहित विधिसे स्नान किया। वहाँ एक रात्रि निवास कर श्रद्धासे कुरुध्वजका पूजन किया और शौचाचारसे शुद्ध होकर नृसिंहका दर्शन करनेके लिये चले गये॥ १—४॥<br><br>दानव (प्रह्लाद)-ने वहाँ देविकामें स्नान कर नृसिंहकी पूजा की और एक रात वहाँ निवासकर गोकर्ण-तीर्थ चले गये। वहाँ प्राची (पूज्य-पूजकके मध्य स्थान)-में स्नान कर पहले उन्होंने विश्वकर्मा भगवान्की पूजा की। उसके बाद दूसरे प्राचीन (परकोटा या चहारदीवारी)-में कामेश्वरका दर्शन करनेके लिये गये। वहाँ स्नान करनेके बाद शंकरभगवान्का दर्शन और पूजनकर प्रह्लाद श्रेष्ठ जलमें स्थित पुण्डरीकका दर्शन करने चले गये। |
| ४०० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ८१ | | :--- | :--- |
| तत्र स्नात्वा च दृष्ट्वा च संतर्प्य पितृदेवताः।<br>पुण्डरीकं च सम्पूज्य उवास दिवसत्रयम्॥ ८<br><br>विशाखयूपे तदनु दृष्ट्वा देवं तथाजितम्।<br>स्नात्वा तथा कृष्णतीर्थे त्रिरात्रं न्यवसच्छुचिः॥ ९ | वहाँ भी स्नानकर उन्होंने पितरोंका तर्पण और पुण्डरीकका दर्शन-पूजन किया। तीन दिनोंतक वहाँ निवास किया। उसके बाद विशाखयूपमें देव अजितका दर्शनकर उन्होंने कृष्णतीर्थमें स्नान किया और तीन रात्रितक वहाँ भी पवित्रतापूर्वक निवास किया॥ ५–९॥ | | ततो हंसपदे हंसं दृष्ट्वा सम्पूज्य चेश्वरम्।<br>जगामासौ पयोष्णायामखण्डं द्रष्टुमीश्वरम्॥ १०<br><br>स्नात्वा पयोष्ण्याः सलिले पूज्याखण्डं जगत्पतिम्।<br>द्रष्टुं जगाम मतिमान् वितस्तायां कुमारिलम्॥ ११<br><br>तत्र स्नात्वाऽर्च्य देवेशं बालखिल्यैर्मरीचिपैः।<br>आराध्यमानं यद्यत्र कृतं पापप्रणाशनम्॥ १२<br><br>यत्र सा सुरभिर्देवी स्वसुतां कपिलां शुभाम्।<br>देवप्रीत्यर्थमसृजद्धितार्थं जगतस्तथा॥ १३ | उसके बाद हंसपदमें भगवान् हंसका दर्शन एवं पूजन कर वे पयोष्णीके समीपमें अखण्डेश्वरका दर्शन करने चले गये। पयोष्णीके जलमें स्नानकर उन्होंने जगत्पति अखण्डेश्वरकी पूजा की। उसके बाद बुद्धिमान् (प्रह्लादजी) वितस्तामें कुमारिलके दर्शनार्थ चले गये। वहाँ स्नान करनेके पश्चात् (सूर्यकी) किरणोंका पान करनेवाले बालखिल्योंसे आराधित किये जा रहे पापोंको नष्ट करनेवाले देवेशका पूजन किया। जहाँ देवी सुरभिने देवकी प्रीति एवं जगत्की भलाईके लिये अपनी पुत्री कल्याणी कपिलाका त्याग किया था॥ १०–१३॥ | | तत्र देवह्रदे स्नात्वा शम्भुं सम्पूज्य भक्तितः।<br>विधिवद्दधि च प्राश्य मणिमन्तं ततो ययौ॥ १४<br><br>तत्र तीर्थवरे स्नात्वा प्राजापत्ये महामतिः।<br>ददर्श शम्भुं ब्रह्माणं देवेशं च प्रजापतिम्॥ १५<br><br>विधानतस्तु तान् देवान् पूजयित्वा तपोधन।<br>षड्रात्रं तत्र च स्थित्वा जगाम मधुनन्दिनीम्॥ १६<br><br>मधुमत्सलिले स्नात्वा दैवं चक्रधरं हरम्।<br>शूलबाहुं च गोविन्दं ददर्श दनुपुङ्गवः॥ १७ | वहाँ देवह्रदमें स्नानकर उन्होंने भक्तिपूर्वक शंभुका पूजन किया और विधिपूर्वक दही खानेके बाद मणिमन्-तीर्थमें गये। प्रजापतिके उस उत्तम तीर्थमें स्नानकर महामति (प्रह्लाद)-ने शंकर, ब्रह्मा एवं देवेश प्रजापतिका दर्शन किया। (पुलस्त्यजी कहते हैं—) तपोधन! विधिपूर्वक उन देवोंका पूजन करनेके बाद वहाँ छः रात्रियोंतक निवासकर (वे) मधुनन्दिनीमें चले गये। मधुमत्के जलमें स्नानकर दानवश्रेष्ठ (प्रह्लाद)-ने चक्रधारी शिव और शूलधारी गोविन्दका दर्शन किया॥ १४–१७॥ | | नारद उवाच<br>किमर्थं भगवान् शम्भुर्धारयाथ सुदर्शनम्।<br>शूलं तथा वासुदेवो ममैतद् ब्रूहि पृच्छतः॥ १८ | नारदजीने पूछा— मुझ प्रश्नकर्त्ताको आप (कृपया) यह बतलाइये कि भगवान् शिवने सुदर्शन और वासुदेवने शूल क्यों धारण किया था?॥ १८॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>श्रूयतां कथयिष्यामि कथामेतां पुरातनीम्।<br>कथयामास यां विष्णुर्भविष्यमनवे पुरा॥ १९ | पुलस्त्यजी बोले— (नारदजी!) सुनिये; मैं इस पुरानी कथाको कहता हूँ। पहले समयमें इसे भगवान् विष्णुने भावी मनुसे कहा था। | | जलोद्भवो नाम महासुरेन्द्रो<br>घोरं स तप्त्वा तप उग्रवीर्यः।<br>आराधयामास विरञ्चिमारात्<br>स तस्य तुष्टो वरदो बभूव॥ २० | जलोद्भव नामका एक महान् दैत्यपति था। उस शक्तिशाली दैत्यने घोर तपकर परिश्रमसे ब्रह्माकी आराधना की। संतुष्ट होकर ब्रह्माने उसे वर दिया कि | | देवासुराणामजयो महाहवे<br>निजैश्च शस्त्रैरमरैरवध्यः।<br>ब्रह्मर्षिशापैश्च निरीप्सितार्थो<br>जले च वह्नौ स्वगुणोपहर्ता॥ २१ | युद्धमें उसे देवता एवं दैत्य नहीं जीत सकेंगे। देवोंके अपने शस्त्रोंसे भी उसका वध नहीं हो सकेगा। ब्रह्मर्षि (जनों)-के शापोंका भी उसके ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा और जल एवं अग्निका भी प्रभाव नहीं होगा। |
| अध्याय ८१ ] | प्रह्लादकी आनुक्रमिक तीर्थयात्राका वर्णन और जलोद्भव आख्यान | ४०१ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एवम्प्रभावो दनुपुङ्गवोऽसौ<br>देवान् महर्षीन् नृपतीन् समग्रान्।<br>आबाधमानो विचचार भूम्यां<br>सर्वाः क्रिया नाशयदुग्रमूर्तिः॥ २२ | इस प्रकारका प्रभावशाली वह दनुश्रेष्ठ सभी देवताओं, महर्षियों और राजाओंको कष्ट पहुँचाता हुआ पृथ्वीपर विचरण करने लगा। (फिर तो) उस क्रूरने समस्त कर्मोंका विनाश कर दिया॥ १९—२२॥ |
| ततोऽमरा भूमिभवाः सभूपाः<br>जग्मुः शरण्यं हरिमीशितारम्।<br>तैश्चापि सार्द्धं भगवाञ्जगाम<br>हिमालयं यत्र हरस्त्रिनेत्रः॥ २३<br>सम्मन्त्र्य देवर्षिहितं च कार्यं<br>मतिं च कृत्वा निधनाय शत्रोः।<br>निजायुधानां च विपर्ययं तौ<br>देवाधिपौ चक्रतुरुग्रकर्म्मिणौ॥ २४<br>ततश्चासौ दानवो विष्णुशर्वौ<br>समायातौ तज्जिघांसू सुरेशौ।<br>मत्वाऽजेयौ शत्रुभिर्घोररूपौ<br>भयात्तोये निम्नगायां विवेश॥ २५<br>ज्ञात्वा प्रनष्टं त्रिदिवेन्द्रशत्रुं<br>नदीं विशालां मधुमत्सुपुण्याम्।<br>द्वयोः सशस्रौ तटयोर्हरीशौ<br>प्रच्छन्नमूर्ती सहसा बभूवतुः॥ २६ | उसके बाद पृथ्वीपर आविर्भूत हुए देवगण राजाओंके साथ शरण देनेवाले एवं (सबके) नियामक विष्णुकी शरणमें गये। भगवान् भी उन सभीके साथ हिमालयपर गये, जहाँ त्रिनेत्र हर अवस्थित थे। देवता और ऋषियोंके कल्याणकारी कार्यकी मन्त्रणा करनेके बाद शत्रुको मारनेका निश्चय कर उन दोनों उग्रकर्मी देवाधिपोंने अपने आयुधोंका परिवर्तन कर लिया। फिर मारनेकी इच्छासे आ रहे देवाधिप शंकर एवं विष्णुको देखकर और उन भयंकर मूर्तिधारियोंको शत्रुओंसे अजेय जानकर वह दानव भयसे नदीके जलमें पैठ गया। देवशत्रुको पुण्यशालिनी मधुमती विशाला नदीमें उसे छिपा हुआ जानकर शस्त्रसहित शंकर और विष्णु सहसा नदीके दोनों तटोंपर छिप गये॥ २३—२६॥ |
| जलोद्भवश्चापि जलं विमुच्य<br>ज्ञात्वा गतौ शङ्करवासुदेवौ।<br>दिशस्समीक्ष्य भयकातराक्षो<br>दुर्गं हिमाद्रिं च तदारुरोह॥ २७ | शंकर और वासुदेवको गया हुआ जानकर जलोद्भव भी जलसे बाहर निकला तथा भयसे चञ्चल नेत्रोंसे दिशाओंमें (इधर-उधर) देखकर दुर्गम हिमालय पर्वतपर चढ़ गया। |
| महीध्रशृङ्गोपरि विष्णुशम्भू<br>चञ्चूर्यमाणं स्वरिपुं च दृष्ट्वा।<br>वेगादुभौ दुद्रुवतुः सशस्रौ<br>विष्णुस्त्रिशूली गिरिशश्च चक्री॥ २८ | पर्वतकी चोटीपर अपने शत्रुको विचरण करते हुए देखकर त्रिशूलधारी विष्णु एवं चक्रधारी शिव शस्त्र लिये हुए तुरंत दौड़ पड़े। |
| ताभ्यां स दृष्टस्त्रिदशोत्तमभ्यां<br>चक्रेण शूलेन च भिन्नदेहः।<br>पपात शैलात् तपनीयवर्णो<br>यथाऽन्तरिक्षाद् विमला च तारा॥ २९ | उन सुरोत्तमोंने उसे देखकर चक्र और शूलसे उसके शरीरका भेदन कर दिया। वह सुवर्णके समान कान्तिवाला अन्तरिक्षसे गिरनेवाले विमल तारेके समान पर्वतसे गिर पड़ा। |
| एवं त्रिशूलं च दधार विष्णु-<br>श्चक्रं त्रिनेत्रोऽप्यरिसूदनार्थम्।<br>यत्राघहन्त्री ह्यभवद् वितस्ता<br>हराङ्घ्रिपाताच्छिशिराचलात्तु ॥ ३० | इस प्रकार शत्रुके विनाशके लिये विष्णुने त्रिशूल तथा शंकरने चक्र धारण किया था। जहाँ शंकरका चरण गिरा था, उस हिमालय पर्वतसे पापविनाशिनी वितस्ता उत्पन्न हुई। |
| तत्प्राप्य तीर्थं त्रिदशाधिपाभ्यां<br>पूजां च कृत्वा हरिशङ्कराभ्याम्।<br>उपोष्य भक्त्या हिमवन्तमागाद्<br>द्रष्टुं गिरीशं शिवविष्णुगुप्तम्॥ ३१ | उस तीर्थमें पहुँचकर प्रह्लादने उन विष्णु एवं शंकर—इन दोनों देवोंकी अर्चा की तथा भक्तिसे वहाँ निवास कर वे शिव एवं विष्णुसे रक्षित गिरिराज हिमालयका दर्शन करने चले गये। |