वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ३९० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७९ |
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उन्नासीवाँ अध्याय
पुरूरवाको रूपकी प्राप्ति और उसी सन्दर्भमें प्रेत और वणिक्की भेंट तथा परस्पर वृत्तान्तका कहना एवं श्रवण-द्वादशीका माहात्म्य, गयामें श्राद्ध करनेसे प्रेत-योनिसे मुक्ति और पुरूरवाको सुरूपकी प्राप्ति
| पुलस्त्य उवाच | पुलस्त्यजी बोले— |
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| कालिन्दीसलिले स्नात्वा पूजयित्वा त्रिविक्रमम्।<br>उपोष्या रजनीमेकां लिङ्गभेदं गिरिं ययौ॥ १<br><br>तत्र स्नात्वा च विमले भवं दृष्ट्वा च भक्तितः।<br>उपोष्या रजनीमेकां तीर्थं केदारमाव्रजत्॥ २<br><br>तत्र स्नात्वाऽर्च्य चेशानं माधवं चाप्यभेदतः।<br>उषित्वा वासरान् सप्त कुब्जाम्रं प्रजगाम ह॥ ३<br><br>ततः सुतीर्थे स्नात्वा च सोपवासी जितेन्द्रियः।<br>हृषीकेशं समभ्यर्च्य ययौ बदरिकाश्रमम्॥ ४ | यमुनाजलमें स्नानकर प्रह्लादने त्रिविक्रम भगवान्की पूजा की। एक रात उपवास करनेके बाद (फिर) वे लिङ्गभेद नामक पर्वतपर चले गये। वहाँ विमल जलमें स्नानकर उन्होंने भक्तिसे भगवान् शंकरका दर्शन किया; एवं वहाँ भी एक रात निवासकर केदार नामके तीर्थमें गये। वहाँ स्नान करनेके बाद (उन्होंने) अभेदबुद्धिसे शिव एवं विष्णुका पूजन किया, (वहाँ) सात दिनोंतक रहकर कुब्जाम्रमें चले गये। उसके बाद उस सुन्दर तीर्थमें स्नानकर उपवास करनेवाले इन्द्रियजयी (प्रह्लाद) हृषीकेशका अर्चनकर बदरिकाश्रम चले गये॥ १–४॥ |
| तत्रोष्य नारायणमर्च्य भक्त्या<br>स्नात्वाऽथ विद्वान् स सरस्वतीजले।<br>वराहतीर्थे गरुडासनं स<br>दृष्ट्वाऽथ सम्पूज्य सुभक्तिमांश्च॥ ५<br><br>भद्रकर्णे ततो गत्वा जयेशं शशिशेखरम्।<br>दृष्ट्वा सम्पूज्य च शिवं विपाशामभितो ययौ॥ ६<br><br>तस्यां स्नात्वा समभ्यर्च्य देवदेवं द्विजप्रियम्।<br>उपवासी इरावत्यां ददर्श परमेश्वरम्॥ ७<br><br>यमाराध्य द्विजश्रेष्ठ शाकले वै पुरूरवाः।<br>समवाप परं रूपमैश्वर्यं च सुदुर्लभम्॥ ८<br><br>कुष्ठरोगाभिभूतश्च यं समाराध्य वै भृगुः।<br>आरोग्यमतुलं प्राप सन्तानमपि चाक्षयम्॥ ९ | वहाँ रहते हुए सरस्वतीके जलमें स्नानकर उन विद्वान् (प्रह्लादजी)-ने नारायणका पूजन किया। फिर अत्यन्त भक्तिके साथ उन्होंने वराहतीर्थमें गरुडासन विष्णुका दर्शन और पूजन किया। वहाँसे भद्रकर्णमें पहुँचकर जयेश शशिशेखर शिवका दर्शन तथा पूजन करके बादमें विपाशाकी ओर चले गये। उस विपाशामें स्नानके बाद द्विजप्रिय देवाधिदेवका अर्चन कर (प्रह्लाद) उपवास करते हुए इरावतीकी ओर चले गये। द्विजोत्तम! (उन्होंने) वहाँ उन भगवान्का दर्शन किया, जिनकी शाकलमें आराधना करनेसे (पहले) पुरूरवाको उत्तम रूप एवं सुदुर्लभ ऐश्वर्य प्राप्त हुआ था। कुष्ठरोगसे अभिभूत भृगुने उन परमेश्वरकी आराधना करके अतुलनीय नीरोगता और अक्षय सन्तान प्राप्त की थी॥ ५–९॥ |
| नारद उवाच<br>कथं पुरूरवा विष्णुमाराध्य द्विजसत्तम।<br>विरूपत्वं समुत्सृज्य रूपं प्राप श्रिया सह॥ १० | नारदने पूछा— द्विजोत्तम! पुरूरवाने विष्णुकी आराधना करनेके बाद विरूपताको छोड़कर ऐश्वर्यके साथ सुदुर्लभ सुन्दर रूप कैसे प्राप्त किया?॥ १०॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>श्रूयतां कथयिष्यामि कथां पापप्रणाशिनीम्।<br>पूर्वं त्रेतायुगस्यादौ यथावृत्तं तपोधन॥ ११ | पुलस्त्यजी बोले— तपोधन! सुनिये; मैं प्राचीन कालमें त्रेतायुगके आदिमें घटित, पापको नष्ट करनेवाली कथा |