भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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अध्याय ७८ ] प्रह्लादकी तीर्थयात्रा, धुन्धु और वामन-प्रसङ्ग, धुन्धुका यज्ञानुष्ठान और वामनका प्रादुर्भाव ३८९

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
दासीदासांश्च भृत्यांश्च गृहं रत्ने परिच्छदम्।<br>समर्थेषु द्विजेन्द्रेषु प्रयच्छस्व महाभुज॥ ७९<br>मम प्रमाणमालोक्य मामकं च पदत्रयम्।<br>सम्प्रयच्छस्व दैत्येन्द्र नाधिकं रक्षितुं क्षमः॥ ८०महाबाहो! आप दिये हुएकी रक्षा करनेमें समर्थ श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको दासी, दास, नौकर, घर, रत्न और अच्छे वस्त्र दें। दैत्येन्द्र! मुझे तो मेरा परिमाण देखकर (केवल) तीन पग (भूमि) ही दे दें। (इससे) अधिककी रक्षा करनेमें मैं समर्थ नहीं हूँ॥ ७९-८०॥
इत्येवमुक्ते वचने महात्मना<br>विहस्य दैत्याधिपतिः स ऋत्विजः।<br>प्रादाद् द्विजेन्द्राय पदत्रयं तदा<br>यदा स नान्यं प्रगृहाण किंचित्॥ ८१<br>क्रमत्रयं तावदवेक्ष्य दत्तं<br>महासुरेन्द्रेण विभुर्यशस्वी।<br>चक्रे ततो लङ्घयितुं त्रिलोकीं<br>त्रिविक्रमं रूपमनन्तशक्तिः॥ ८२<br>कृत्वा च रूपं दितिजांश्च हत्वा<br>प्रणम्य चर्षीन् प्रथमक्रमेण।<br>महीं महीध्रैः सहितां सहार्णवां<br>जहार रत्नाकरपत्तनैर्युताम्॥ ८३उन (विप्र वामन) महात्माके ऐसा वचन कहनेपर, जब उन्होंने और कुछ ग्रहण नहीं किया तब ऋत्विजोंसहित दानवपतिने हँसकर उन द्विजेन्द्रको तीन पग (भूमि) प्रदान कर दी। महान् असुरेन्द्रद्वारा तीन पग भूमि प्रदान की हुई देखकर अनन्त शक्तिवाले यशस्वी एवं विभु वामन भगवान्ने तीनों लोकोंको नाप लेनेके लिये त्रिविक्रम (विराट्) रूप धारण कर लिया। (विशाल) रूप धर लेनेके बाद उन्होंने दैत्योंका वध कर ऋषियोंको प्रणाम किया और प्रथम पादन्यासमें ही पर्वत, सागर, रत्नोंकी खान एवं नगरोंसे युक्त पृथ्वीको नापकर ले लिया॥ ८१-८३॥
भुवं सनाकं त्रिदशाधिवासं<br>सोमार्कऋक्षैरभिमण्डितं नभः।<br>देवो द्वितीयेन जहार वेगात्<br>क्रमेण देवप्रियमीप्सुरीश्वरः॥ ८४<br>क्रमं तृतीयं न यदाऽस्य पूरितं<br>तदाऽतिकोपाद् दनुपुङ्गवस्य।<br>पपात पृष्ठे भगवांस्त्रिविक्रमो<br>मेरुप्रमाणेण तु विग्रहेण॥ ८५<br>पतता वासुदेवेन दानवोपरि नारद।<br>त्रिंशद्योजनसाहस्त्री भूमेर्गर्ता दृढीकृता॥ ८६देवताओंका प्रिय करनेकी इच्छावाले भगवान् वामनदेवने द्वितीय पगसे तुरंत ही देवताओंके निवास—स्वर्गके साथ ही भुवर्लोक, चन्द्र, सूर्य एवं नक्षत्रोंसे मण्डित आकाशको भी ग्रहण कर लिया। उनका तृतीय पादक्रम जब पूरा नहीं हुआ तो अत्यन्त क्रोधसे भगवान् त्रिविक्रम मेरुके समान शरीरसे दानवश्रेष्ठकी पीठपर गिर पड़े। नारदजी! वासुदेवके दानवके ऊपर गिरनेसे भूमिमें हजार योजनका सुदृढ़ गड्ढा बन गया॥ ८४-८६॥
ततो दैत्यं समुत्पाट्य तस्यां प्रक्षिप्य वेगतः।<br>अवर्षत् सिकतावृष्ट्या तां गर्तामपूरयत्॥ ८७<br>ततः स्वर्गं सहस्राक्षो वासुदेवप्रसादतः।<br>सुराश्च सर्वे त्रैलोक्यमवापुर्निरुपद्रवाः॥ ८८<br>भगवानपि दैत्येन्द्रं प्रक्षिप्य सिकतार्णवे।<br>कालिन्द्या रूपमाधाय तत्रैवान्तरधीयत॥ ८९<br>एवं पुरा विष्णुरभूच्च वामनो<br>धुन्धुं विजेतुं च त्रिविक्रमोऽभूत्।<br>यस्मिन् स दैत्येन्द्रसुतो जगाम<br>महाश्रमे पुण्ययुतो महर्षे॥ ९०उसके बाद उन्होंने दैत्यको उठाकर जोरसे उसमें फेंक दिया और बालुकी बरसासे उस गड्ढेको भर दिया। उसके बाद वासुदेवकी कृपासे इन्द्रने स्वर्ग पा लिया और उपद्रवोंसे रहित सम्पूर्ण देवोंको त्रिलोकीकी प्राप्ति हो गयी। कालिन्दी भी अपना स्वरूप धारणकर वहीं अन्तर्हित हो गयी। प्राचीन कालमें इस प्रकार धुन्धुको जीतनेके लिये विष्णु भगवान् वामन तथा (उसके बाद) त्रिविक्रम बने। महर्षि नारदजी! वह पुण्यात्मा दैत्येन्द्रपुत्र प्रह्लाद (तीर्थयात्राके प्रसङ्गमें) उसी आश्रममें गया॥ ८७-९०॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें अठहत्तरवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ७८॥