भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३८८श्रीवामनपुराण[ अध्याय ७८
श्लोकअर्थ
शय्यासनस्थानमात्रं स्वेच्छयान्नभुजक्रिया।<br>एतावद् दीयते तेभ्यो नार्थभागहरा हि ते॥ ६५भरका स्थान तथा अपनी इच्छाके अनुसार अन्नभोगका अधिकार दिया जाता है। वे सम्पत्तिके भागी—अधिकारी नहीं होते॥ ६१—६५॥
एवमुक्ते मया सोक्तः किमर्थं पैतृकाद् गृहात्।<br>धनार्धभागमर्हामि नाहं न्यायेन केन वै॥ ६६<br>इत्युक्तवति वाक्येऽसौ भ्राता मे कोपसंयुतः।<br>समुत्क्षिप्याक्षिपन्नद्यामस्यां मामिति कारणात्॥ ६७<br>ममास्यां निम्नगायां तु मध्येन प्लवतो गतः।<br>कालः संवत्सराख्यस्तु युष्माभिरिह चोद्धृतः॥ ६८<br>के भवन्तोऽत्र सम्प्राप्ताः सस्नेहा बान्धवा इव।<br>कोऽयं च शक्रप्रतिमो दीक्षितो यो महाभुजः॥ ६९<br>तन्मे सर्वं समाख्यातं याथातथ्यं तपोधनाः।<br>महर्द्धिसंयुता यूयं सानुकम्पाश्च मे भृशम्॥ ७०ऐसा कहनेपर मैंने उससे कहा कि अपने पिताके घरके धनके आधे हिस्सेका अधिकारी मैं किस न्यायसे और क्यों नहीं हूँ? ऐसा अभिप्राय-पूर्ण वाक्य कहनेपर क्रोधमें आकर मेरे भाईने मुझे उठाकर इस नदीमें फेंक दिया। मुझे इस नदीमें तैरते हुए एक वर्षका समय बीत गया। (अब) आपलोगोंने यहाँ मेरा उद्धार किया है। प्रेमी बान्धवोंके समान यहाँ उपस्थित आपलोग कौन हैं तथा यज्ञके लिये दीक्षित इन्द्रके समान ये महाबलशाली कौन हैं? तपोधनो! आपलोग यह सब ठीक-ठीक मुझे बतलाइये। आपलोग महान् ऐश्वर्यशाली और मेरे ऊपर अत्यन्त अनुग्रह करनेवाले हैं॥ ६६—७०॥
तद् वामनवचः श्रुत्वा भार्गवा द्विजसत्तमाः।<br>प्रोचुर्वयं द्विजा ब्रह्मन् गोत्रतश्चापि भार्गवाः॥ ७१<br>असावपि महातेजा धुन्धुर्नाम महासुरः।<br>दाता भोक्ता विभक्ता च दीक्षितो यज्ञकर्मणि॥ ७२<br>इत्येवमुक्त्वा देवेशं वामनं भार्गवास्ततः।<br>प्रोचुर्दैत्यपतिं सर्वे वामनार्थकरं वचः॥ ७३<br>दीयतामस्य दैत्येन्द्र सर्वोपस्करसंयुतम्।<br>श्रीमदावसथं दास्यो रत्नानि विविधानि च॥ ७४<br>इति द्विजानां वचनं श्रुत्वा दैत्यपतिर्वचः।<br>प्राह द्विजेन्द्र ते दद्मि यावदिच्छसि वै धनम्॥ ७५वामनके उस वचनको सुनकर भार्गवकुलके श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने कहा—ब्रह्मन्! हमलोग भार्गव गोत्रवाले ब्राह्मण हैं। ये अति तेजस्वी दाता, भोक्ता और विभक्ता धुन्धु नामके महान् असुर हैं। ये यज्ञकर्ममें दीक्षित हुए हैं। देवेश वामनसे ऐसा कहकर सभी भार्गव-गोत्रीय (ब्राह्मणोंने) असुरस्वामी धुन्धुसे वामनके प्रयोजनको सिद्ध करनेवाला वचन कहा—दैत्येन्द्र! आप इन्हें सम्पूर्ण साज-सज्जासे पूर्ण सम्पत्तिसे सम्पन्न घर, दासियाँ और विविध प्रकारके रत्न (आदि) प्रदान करें। ब्राह्मणोंके उस वचनको सुनकर असुरराज धुन्धुने यह वचन कहा—द्विजेन्द्र! मैं आपको आपकी इच्छाके अनुकूल धन दूँगा॥ ७१—७५॥
दास्ये गृहं हिरण्यं च वाजिनः स्यन्दनान् गजान्।<br>प्रयच्छाम्यद्य भवतो व्रियतामीप्सितं विभो॥ ७६<br>तद्वाक्यं दानवपतेः श्रुत्वा देवोऽथ वामनः।<br>प्राहासुरपतिं धुन्धुं स्वार्थसिद्धिकरं वचः॥ ७७<br>सोदरेणापि हि भ्रात्रा ह्रियन्ते यस्य सम्पदः।<br>तस्याक्षमस्य यद्दत्तं किमन्यो न हरिष्यति॥ ७८विभो! आप अपने अभीष्ट पदार्थकी माँग करें। मैं आज आपको घर, सोना, घोड़े, रथ एवं हाथी प्रदान करूँगा। दैत्य-स्वामीके उस वाक्यको सुनकर (विप्ररूप धारण करनेवाले) भगवान् वामनने दानवपति धुन्धुसे अपने स्वार्थको साधनेवाला वचन कहा—सहोदर भाईने जिसकी (पैतृक) सम्पत्तिको ले लिया उस असमर्थको जो कुछ मिलेगा उसे क्या कोई दूसरा नहीं छीन लेगा?