भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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| अध्याय ७८ ] | प्रह्लादकी तीर्थयात्रा, धुन्धु और वामन-प्रसङ्ग, धुन्धुका यज्ञानुष्ठान और वामनका प्रादुर्भाव | ३८७ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तस्मादकालहीनं तु चिन्तयस्व जगद्गुरो।<br>उपायं मखविध्वंसे येन स्याम सुनिर्वृताः॥ ५०इसलिये जगद्गुरो! आप उसके यज्ञको विध्वस्त करनेका उपाय बिना समय बिताये (तत्काल) सोचें, जिससे हमलोग निश्चिन्त हो सकें॥ ४६-५०॥
श्रुत्वा सुराणां वचनं भगवान् मधुसूदनः।<br>दत्त्वाऽभयं महाबाहुः प्रेषयामास साम्प्रतम्।<br>विसृज्य देवताः सर्वा ज्ञात्वाऽजेयं महासुरम्॥ ५१<br>बन्धनाय मतिं चक्रे धुन्धोर्धर्मध्वजस्य वै।<br>ततः कृत्वा स भगवान् वामनं रूपमीश्वरः॥ ५२<br>देहं त्यक्त्वा निरालम्बं काष्ठवद् देविकाजले।<br>क्षणान्मज्जंस्तथोन्मज्जन्मुक्तकेशो यदृच्छया॥ ५३<br>दृष्टोऽथ दैत्यपतिना दैत्यैश्चान्यैस्तथर्षिभिः।<br>ततः कर्म परित्यज्य यज्ञियं ब्राह्मणोत्तमाः॥ ५४<br>समुत्तारयितुं विप्राद्रावन्त समाकुलाः।<br>सदस्या यजमानश्च ऋत्विजोऽथ महौजसः॥ ५५<br>निमज्जमानमुज्जह्नुः सर्वे ते वामनं द्विजम्।<br>समुत्तार्य प्रसन्नास्ते प्रप्रच्छुः सर्व एव हि।<br>किमर्थं पतितोऽसीह केनाक्षिप्तोऽसि नो वद॥ ५६सभी देवताओंको अभयदान देकर उन महाबाहुने उन देवताओंको लौटा दिया और उस महान् धर्मध्वजी (धर्मके नामपर पाखण्ड रचनेवाले) दैत्य धुन्धुको अजेय समझकर उन्होंने (श्रीहरिने) उसे बाँधनेका विचार किया। उसके बाद भगवान् विष्णुने बौनाका रूप धर लिया और देविका नदीके जलमें (अपनी) देहको लकड़ीकी तरह निरालम्ब छोड़ दिया। खुले हुए केशोंवाले वे क्षणमात्रमें अपने-आप डूबने-उतराने लगे। उसके बाद दैत्यपतिने तथा अन्य दैत्यों एवं ऋषियोंने उन्हें देखा। उसके बाद व्याकुल होकर वे श्रेष्ठ ब्राह्मण यज्ञके सभी काम छोड़कर उस ब्राह्मणको निकालनेके लिये दौड़े। सभी सदस्य, यजमान एवं अति तेजस्वी ऋत्विजोंने डूबते हुए बौनाके आकारवाले ब्राह्मणको (नदीके जलसे बाहर) निकाला और उससे पूछा— हमें यह बतलाओ कि तुम यहाँ क्यों गिरे अथवा तुम्हें किसने फेंका?॥ ५१-५६॥
तेषामाकर्ण्य वचनं कम्पमानो मुहुर्मुहुः।<br>प्राह धुन्धुपुरोगांस्ताञ्छ्रूयतामत्र कारणम्॥ ५७<br>ब्राह्मणो गुणवानासीत् प्रभास इति विश्रुतः।<br>सर्वशास्त्रार्थवित् प्राज्ञो गोत्रतश्चापि वारुणः॥ ५८<br>तस्य पुत्रद्वयं जातं मन्दप्रज्ञं सुदुःखितम्।<br>तत्र ज्येष्ठो मम भ्राता कनीयानपरस्त्वहम्॥ ५९<br>नेत्रभास इति ख्यातो ज्येष्ठो भ्राता ममासुर।<br>मम नाम पिता चक्रे गतिभासेति कौतुकात्॥ ६०उसने उनके वचनको सुनकर बार-बार काँपते हुए धुन्धु आदिसे कहा—आपलोग इसका कारण सुनें। वरुण-गोत्रमें उत्पन्न प्रभास नामके एक ब्राह्मण थे। वे सभी शास्त्रोंके तात्पर्यको जाननेवाले और बुद्धिमान् थे। उनके दो पुत्र उत्पन्न हुए। वे दोनों ही अल्पबुद्धि और अत्यन्त दुःखग्रस्त थे। उनमें मेरा भाई बड़ा और मैं छोटा हूँ। अये दैत्य! मेरा बड़ा भाई 'नेत्रभास' नामसे प्रसिद्ध है। मेरे पिताने कौतूहलवश मेरा नाम 'गतिभास' रख दिया॥ ५७-६०॥
रम्यश्चावसथो धुन्धो शुभ्रश्चासीत् पितुर्मम।<br>त्रिविष्टपगुणैर्युक्तश्चारुरूपो महासुर॥ ६१<br>ततः कालेन महता आवयोः स पिता मृतः।<br>तस्यौर्ध्वदेहिकं कृत्वा गृहमावां समागतौ॥ ६२<br>ततो मयोक्तः स भ्राता विभजाम गृहं वयम्।<br>तेनोक्तो नैव भवतो विद्यते भाग इत्यहम्॥ ६३<br>कुब्जवामनखञ्जानां क्लीबानां श्वित्रिणामपि।<br>उन्मत्तानां तथान्धानां धनभागो न विद्यते॥ ६४महासुर धुन्धो! मेरे पिताका निवास-स्थान सुन्दर, आनन्ददायक, स्वर्गीय गुणोंसे युक्त एवं मनोहर था। उसके बाद बहुत दिनोंके पश्चात् हम दोनोंके पिता स्वर्ग चले गये। उनकी दाह-संस्कारादि-श्राद्धक्रिया करके हम दोनों भाई घर आ गये। उसके बाद मैंने (अपने उन) बड़े भाईसे कहा—हम दोनों आपसमें घरका बँटवारा कर लें। उसने मुझसे कहा—तुम्हारा हिस्सा नहीं है; क्योंकि कुबड़े, बौने, लँगड़े, हिजड़े, चरकवाले, पागल और अन्धोंका धनमें हिस्सा नहीं होता है। उन्हें केवल सोने