वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ३८६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७८ |
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| ततो धुन्धुर्दैविकायाः प्राचीने पापनाशने ।<br>भार्गवेन्द्रेण शुक्रेण वाजिमेधाय दीक्षितः ॥ ३८<br><br>सदस्या ऋत्विजश्चापि तत्रासन् भार्गवा द्विजाः ।<br>शुक्रस्यानुमते ब्रह्मन् शुक्रशिष्याश्च पण्डिताः ॥ ३९<br><br>यज्ञभागभुजस्तत्र स्वर्भानुप्रमुखा मुने ।<br>कृताश्चासुरनाथेन शुक्रस्यानुमतेऽसुराः ॥ ४०<br><br>ततः प्रवृत्तो यज्ञस्तु समुत्सृष्टस्तथा हयः ।<br>हयस्यानुययौ श्रीमानसिलोमा महासुरः ॥ ४१ | बाद भार्गवश्रेष्ठ शुक्राचार्यने पापोंका नाश करनेवाले देविकाके प्राचीन तटपर अश्वमेधयज्ञके (अनुष्ठानके) लिये धुन्धुको दीक्षित किया। ब्रह्मन्! शुक्राचार्यकी अनुमतिसे उनके शिष्य तथा भार्गव-गोत्रीय विद्वान् ब्राह्मण उस यज्ञमें सदस्य एवं ऋत्विक् बने। मुने! शुक्राचार्यकी अनुमतिसे दैत्यस्वामीने स्वर्भानु आदि असुरोंको (देवोंके स्थानपर) यज्ञभागका रक्षक और भोक्ता बनाया। उसके बाद यज्ञ आरम्भ हुआ और (दिग्विजय-सूचक) अश्व छोड़ा गया। असिलोमा नामका विराट् दैत्य घोड़ेके पीछे (उसकी रक्षाके लिये) चला॥ ३७–४१॥ | | ततोऽग्निधूमेन मही सशैला<br>व्याप्ता दिशः खं विदिशश्च पूर्णाः ।<br>तेनोग्रगन्धेन दिवस्पृशेन<br>मरुद्ववौ ब्रह्मलोके महर्षे ॥ ४२<br><br>तं गन्धमाघ्राय सुरा विषण्णा<br>जानन्त धुन्धुं हयमेधदीक्षितम् ।<br>ततः शरण्यं शरणं जनार्दनं<br>जग्मुः सशक्रा जगतः परायणम् ॥ ४३<br><br>प्रणम्य वरदं देवं पद्मनाभं जनार्दनम् ।<br>प्रोचुः सर्वे सुरगणा भयगद्गदया गिरा ॥ ४४<br><br>भगवन् देवदेवेश चराचरपरायण ।<br>विज्ञप्तिः श्रूयतां विष्णो सुराणामार्तिनाशन ॥ ४५ | महर्षे! उसके बाद यज्ञके धुएँसे पहाड़ोंके साथ पृथ्वी, आकाश, दिशाएँ और विदिशाएँ भर गयीं। आकाशमें फैले उस उत्कट सुगन्धवाले धुएँसे मिली हुई वायु ब्रह्मलोकमें बहने लगी। उस गन्धको सूँघकर देवगण उदास हो गये। उन्हें यह पता चल गया कि धुन्धुने अश्वमेधकी दीक्षा ग्रहण की है (और यज्ञानुष्ठान कर रहा है)। उसके बाद वे इन्द्रसहित संसारके आश्रय और शरण देनेवाले भगवान् जनार्दनकी शरणमें गये। कमलनालको धारण करनेवाले वरदानी जनार्दन देवको प्रणाम कर सभी देवोंने भयसे विकल वाणीमें कहा—देवोंके दुःखको दूर करनेवाले तथा चर और अचरके कल्याण करनेमें नित्य उद्यत रहनेवाले देवाधिदेव विष्णो! आप हमारा निवेदन सुनें—॥ ४२–४५॥ | | धुन्धुनामासुरपतिर्बलवान् वरबृंहितः ।<br>सर्वान् सुरान् विनिर्जित्य त्रैलोक्यमहरद् बलिः ॥ ४६<br><br>ऋते पिनाकिनो देवात् त्राताऽस्मान् न यतो हरे ।<br>अतो विवृद्धिगमगद् यथा व्याधिरुपेक्षितः ॥ ४७<br><br>साम्प्रतं ब्रह्मलोकस्थानपि जेतुं समुद्यतः ।<br>शुक्रस्य मतमास्थाय सोऽश्वमेधाय दीक्षितः ॥ ४८<br><br>शतं क्रतूनामिष्ट्वासौ ब्रह्मलोकं महासुरः ।<br>आरोढुमिच्छति वशी विजेतुं त्रिदशानपि ॥ ४९ | धुन्धु नामका बलवान् दैत्यपति शंकरसे वर प्राप्त कर लेनेके कारण बढ़ गया है। उस बलवान्ने सभी देवोंको पराजितकर (उनसे) त्रिलोकी (-के अधिकार)-को छीन लिया है। हरे! पिनाक धारण करनेवाले शंकरके सिवा हम देवोंका कोई रक्षक न होनेसे वह असुर उपेक्षित रोगकी तरह (बहुत) बढ़ गया है। इस समय वह ब्रह्मलोकमें शरण लिये हुए रहनेपर भी हमलोगोंको (फिर) जीतनेके लिये तैयार होकर शुक्राचार्यके मतके अनुसार अश्वमेधयज्ञमें दीक्षित हो गया है। वह दैत्य (धुन्धु) सौ अश्वमेधयज्ञ करके देवताओंपर विजय पानेके लिये ब्रह्मलोकमें आक्रमण करना चाहता है। |