भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

पृष्ठ 395, कुल 489 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 395

अध्याय ७८ ] प्रह्लादकी तीर्थयात्रा, धुन्धु और वामन-प्रसङ्ग, धुन्धुका यज्ञानुष्ठान और वामनका प्रादुर्भाव ३८५

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ततोऽपरो योजनकोटिभिस्तु<br>त्रिंशद्भिरादित्यसहस्रदीप्तिः ।<br>सत्याभिधानो भगवन्निवासो<br>वरप्रदोऽभूद् भवतो हि योऽसौ ॥ २४<br>यस्य वेदध्वनिं श्रुत्वा विकसन्ति सुरादयः ।<br>संकोचमसुरा यान्ति ये च तेषां सधर्मिणः ॥ २५<br>तस्मान्मा त्वं महाबाहो मतिमेतां समादधः ।<br>वैराजभुवनं धुन्धो दुरारोहं सदा नृभिः ॥ २६<br>तेषां वचनमाकर्ण्य धुन्धुः प्रोवाच दानवान् ।<br>गन्तुकामः स सदनं ब्रह्मणो जेतुमीश्वरान् ॥ २७उसके बाद तीस करोड़ योजनकी दूरीपर हजारों सूर्योंके समान प्रदीप्त 'सत्य'नामका लोक है। वह लोक उन्हीं भगवान्‌का निवास-स्थल है, जिन्होंने आपको वर दिया था। जिनकी वेदध्वनि सुनकर देवता आदि विकसित हो जाते हैं तथा दैत्य और उनके समान धर्मवाले संकुचित (म्लान) हो जाते हैं। अतः महाबाहु धुन्धो! आप ऐसी बुद्धि न करें; क्योंकि ब्रह्मलोक मनुष्यों (एवं दैत्यों)-के लिये सदैव अगम्य है। उनकी बात सुनकर (भी) देवोंको जीतनेके लिये ब्रह्मलोक जानेकी इच्छावाले धुन्धुने दानवोंसे (फिर) कहा— ॥ २४-२७ ॥
कथं तु कर्मणा केन गम्यते दानवर्षभाः ।<br>कथं तत्र सहस्राक्षः सम्प्राप्तः सह दैवतैः ॥ २८<br>ते धुन्धुना दानवेन्द्राः पृष्टाः प्रोचुर्वचोऽधिपम् ।<br>कर्म तन्न वयं विद्मः शुक्रस्तद् वेत्त्यसंशयम् ॥ २९<br>दैत्यानां वचनं श्रुत्वा धुन्धुर्दैत्यपुरोहितम् ।<br>पप्रच्छ शुक्रं किं कर्म कृत्वा ब्रह्मस्रदोगतिः ॥ ३०<br>ततोऽस्मै कथयामास दैत्याचार्यः कलिप्रिय ।<br>शक्रस्य चरितं श्रीमान् पुरा वृत्ररिपोः किल ॥ ३१<br>शक्रः शतं तु पुण्यानां क्रतूनामयजत् पुरा ।<br>दैत्येन्द्र वाजिमेधानां तेन ब्रह्मसदो गतः ॥ ३२दानवश्रेष्ठो! वहाँ कैसे और किस कर्मसे जाया जा सकता है ? इन्द्र देवोंके साथ वहाँ कैसे पहुँचे ? धुन्धुके पूछनेपर उन श्रेष्ठ दानवोंने कहा—हमलोग उस कर्मको तो नहीं जानते, किंतु शुक्राचार्य उसको निःसंदेह जानते हैं। दैत्योंका वचन सुनकर धुन्धुने दैत्योंके पुरोहित शुक्राचार्यजीसे पूछा—(आचार्यजी!) किस कर्मको करनेसे ब्रह्मलोकमें जाया जा सकता है? (पुलस्त्यजी कहते हैं—) कलिप्रिय! उसके बाद दैत्योंके गुरु श्रीमान् शुक्राचार्यने उससे वृत्रशत्रु इन्द्रका चरित कहा। उन्होंने कहा—दैत्येन्द्र! पहले समयमें इन्द्रने सौ पवित्र अश्वमेध-यज्ञ किये थे। इसीसे वे ब्रह्मलोक गये ॥ २८-३२ ॥
तद्वाक्यं दानवपतिः श्रुत्वा शुक्रस्य वीर्यवान् ।<br>यष्टुं तुरगमेधानां चकार मतिमुत्तमाम् ॥<br>अथामन्त्र्यासुरगुरुं दानवांश्चाप्यनुत्तमान् ॥ ३३<br>प्रोवाच यक्ष्येऽहं यज्ञैरश्वमेधैः सदक्षिणैः ।<br>तदागच्छध्वमवनीं गच्छामो वसुधाधिपान् ॥ ३४<br>विजित्य हयमेधान् वै यथाकामगुणान्वितान् ।<br>आहूयन्तां च निधयस्त्वाज्ञाप्यन्तां च गुह्यकाः ॥ ३५<br>आमन्त्र्यन्तां च ऋषयः प्रयामो देविकातटम् ।<br>सा हि पुण्या सरिच्छ्रेष्ठा सर्वसिद्धिकरी शुभा ।<br>स्थानं प्राचीनमासाद्य वाजिमेधान् यजामहे ॥ ३६शुक्राचार्यके उस वाक्यको सुनकर बलवान् दानवपतिने अश्वमेधयज्ञ करनेकी उत्कट इच्छा की। उसके बाद दैत्योंके गुरुको और अच्छे दैत्योंको बुलाकर उसने कहा—मैं दक्षिणासहित अश्वमेधयज्ञोंका अनुष्ठान करूँगा। इसलिये आओ, हमलोग पृथ्वीपर चलें और राजाओंको जीतकर इच्छानुकूल सामग्री एवं विधिसे पूर्ण अश्वमेधोंका अनुष्ठान करें। निधियोंको बुलाओ एवं गुह्यकोंको आदेश दे दो और ऋषियोंको आमन्त्रित करो। हमलोग देविकाके तटपर चलें। वह पुनीत उत्तम नदी कल्याणदायिनी तथा सर्वसिद्धिकारिणी है। उस प्राचीन स्थानपर पहुँचकर हम अश्वमेधयज्ञ करेंगे ॥ ३३-३६ ॥
इत्थं सुरारेर्वचनं निशम्यासुरयाजकः ।<br>बाढमित्यब्रवीद्धुन्धो निधयः संदिदेश सः ॥ ३७देवोंके शत्रु धुन्धुके उस वचनको सुनकर दैत्योंके यज्ञ करानेवाले शुक्राचार्यने 'ठीक है'—ऐसा कहा और प्रसन्नतापूर्वक उन्होंने निधियोंको आदेश दे दिया। उसके