वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ३८४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७८ |
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| तत्कथं पूर्वकालेऽपि विभुरासीत् त्रिविक्रमः।<br>कस्य वा बन्धनं विष्णुः कृतवांस्तच्च मे वद ॥ ११ | विष्णु पहले समयमें भी कैसे त्रिविक्रम हुए थे और (उस समय) उन्होंने किसका बन्धन किया था—यह मुझे बतलाइये ॥ १०-११॥ |
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| पुलस्त्य उवाच | **पुलस्त्यजी बोले—**नारदजी! वे त्रिविक्रम भगवान् |
| श्रूयतां कथयिष्यामि योऽयं प्रोक्तस्त्रिविक्रमः।<br>यस्मिन् काले सम्बभूव यं च वञ्चितवानसौ ॥ १२ | कौन हैं, कब हुए और उन्होंने किसको ठगा ? यह सब जो आपने पूछा है उसे मैं कहता हूँ; आप सुनिये—दनुके |
| आसीद् धुन्धुरिति ख्यातः कश्यपस्यौरसः सुतः।<br>दनुगर्भसमुद्भूतो महाबलपराक्रमः ॥ १३ | गर्भसे उत्पन्न अत्यन्त बलवान् एवं पराक्रमी धुन्धु नामसे प्रसिद्ध कश्यपका एक औरस पुत्र था। नारदजी! |
| स समाराध्य वरदं ब्रह्माणं तपसाऽसुरः।<br>अवध्यत्वं सुरैः सेन्द्रैः प्रार्थयत् स तु नारद ॥ १४ | उस दैत्यने तपस्यासे वरदानी ब्रह्माकी आराधना करके उनसे इन्द्र आदि देवताओंसे (अपनेको) अवध्य होनेकी याचना की। (उसकी) तपस्यासे प्रसन्न होकर |
| तद् वरं तस्य च प्रादात् तपसा पङ्कजोद्भवः।<br>परितुष्टः स च बली निर्जगाम त्रिविष्टपम् ॥ १५ | कमल-योनि ब्रह्माजीने उसे वह (वाञ्छित) वर दे दिया। उसके बाद वह बलवान् धुन्धु स्वर्गमें चला गया। |
| चतुर्थस्य कलेरादौ जित्वा देवान् सवासवान्।<br>धुन्धुः शक्रत्वमकरोद्धिरण्यकशिपौ सति ॥ १६ | चतुर्थ कलियुगके आदिमें हिरण्यकशिपुके वर्तमान रहते समय धुन्धु इन्द्रसहित देवोंको जीतकर स्वयं इन्द्र बन गया। |
| तस्मिन् काले स बलवान् हिरण्यकशिपुस्ततः।<br>चचार मन्दरगिरौ दैत्यं धुन्धुं समाश्रितः ॥ १७ | उस समय धुन्धुका आश्रय लेकर बलवान् दैत्य हिरण्यकशिपु मन्दरपर्वतपर (स्वच्छन्दतासे) विचरण कर रहा था। |
| ततोऽसुरा यथा कामं विहरन्ति त्रिविष्टपे।<br>ब्रह्मलोके च त्रिदशाः संस्थिता दुःखसंयुताः ॥ १८ | दैत्यगण भी स्वच्छन्दतासे स्वर्गमें विचरण करने लगे। (इससे) सभी देवता दुखी होकर ब्रह्मलोकमें जाकर रहने लगे ॥ १२–१८ ॥ |
| ततोऽमरान् ब्रह्मसदो निवासिनः<br>श्रुत्वाऽथ धुन्धुर्दितिजानुवाच।<br>व्रजाम दैत्या वयमग्रजस्य<br>सदो विजेतुं त्रिदशान् सशक्रान् ॥ १९ | तब देवताओंका ब्रह्मलोकमें रहना सुनकर धुन्धुने दैत्योंसे कहा—दैत्यो! इन्द्रसहित देवोंको जीतनेके लिये हमलोग (अब) ब्रह्मलोक चलें। धुन्धुका वचन सुनकर |
| ते धुन्धुवाक्यं तु निशम्य दैत्याः<br>प्रोचुर्न नो विद्यति लोकपाल।<br>गतिर्यया याम पितामहाजिरं<br>सुदुर्गमोऽयं परतो हि मार्गः ॥ २० | उन दैत्योंने कहा—लोकपाल! हमलोगोंमें वह गति नहीं है, जिससे पितामह (ब्रह्मा)-के लोकमें जा सकें। (वहाँका) मार्ग बहुत दूर एवं बीहड़ है। |
| इतः सहस्रैर्बहुयोजनाख्यै-<br>र्लोको महर्नाम महर्षिजुष्टः।<br>येषां हि दृष्ट्याऽर्पणचोदितेन<br>दह्यन्ति दैत्याः सहसेक्षितेन ॥ २१ | यहाँसे हजारों योजन दूर महर्षियोंसे सेवित 'मह' नामका लोक है। उन ऋषियोंकी सहसा दृष्टि पड़ते ही समस्त दैत्य जल जाते हैं। |
| ततोऽपरो योजनकोटिना वै<br>लोको जनो नाम वसन्ति यत्र।<br>गोमातरोऽस्मासु विनाशकारि<br>यासां रजोऽपीह महासुरेन्द्र ॥ २२ | उससे भी आगे कोटि योजन दूर 'जन' नामक एक लोक है जहाँ गोमाताएँ रहती हैं! महासुरेन्द्र! उनकी धूलि भी हमलोगोंका विनाश कर सकती है। |
| ततोऽपरो योजनकोटिभिस्तु<br>षड्भिस्तपो नाम तपस्विजुष्टः।<br>तिष्ठन्ति यत्रासुर साध्यवर्या<br>येषां हि निःश्वासमरुत् त्वसह्यः ॥ २३ | उसके बाद छः करोड़ योजनकी दूरीपर तपस्वियोंसे भरा 'तप' लोक है। असुरराज! वहाँ श्रेष्ठ साध्यगण रहते हैं। उनका निःश्वास-वायु असहनीय है ॥ १९–२३ ॥ |