भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय ७८ ] प्रह्लादकी तीर्थयात्रा, धुन्धु और वामन-प्रसङ्ग, धुन्धुका यज्ञानुष्ठान और वामनका प्रादुर्भाव [ ३८३


अठहत्तरवाँ अध्याय

प्रह्लादकी तीर्थयात्रा, धुन्धु और वामन-प्रसङ्ग, धुन्धुका यज्ञानुष्ठान, वामनका प्रादुर्भाव और उनके लिये दान देनेका धुन्धुका निश्चय, वामनका त्रिविक्रम होना और धुन्धुका वध

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
नारद उवाच<br>कानि तीर्थानि विप्रेन्द्र प्रह्लादोऽनुजगाम ह।<br>प्रह्लादतीर्थयात्रां मे सम्यगाख्यातुमर्हसि॥ १नारदने कहा (पूछा)— श्रेष्ठ विप्र! प्रह्लाद (क्रमशः) किन-किन तीर्थोंमें गये। कृपया आप मुझसे प्रह्लादकी तीर्थयात्राका भलीभाँति वर्णन कीजिये॥ १॥
पुलस्त्य उवाच<br>शृणुष्व कथयिष्यामि पापपङ्कप्रणाशिनीम्।<br>प्रह्लादतीर्थयात्रां ते शुद्धपुण्यप्रदायिनीम्॥ २<br>संत्यज्य मेरुं कनकाचलेन्द्रं<br>तीर्थं जगामामरसंघजुष्टम्।<br>ख्यातं पृथिव्यां शुभदं हि मानसं<br>यत्र स्थितो मत्स्यवपुः सुरेशः॥ ३<br>तस्मिंस्तीर्थवरे स्नात्वा संतर्प्य पितृदेवताः।<br>सम्पूज्य च जगन्नाथमच्युतं श्रुतिभिर्युतम्॥ ४<br>उपोष्य भूयः सम्पूज्य देवर्षिपितृमानवान्।<br>जगाम कच्छपं द्रष्टुं कौशिक्यां पापनाशनम्॥ ५<br>तस्यां स्नात्वा महानद्यां सम्पूज्य च जगत्पतिम्।<br>समुपोष्य शुचिर्भूत्वा दत्त्वा विप्रेषु दक्षिणाम्॥ ६<br>नमस्कृत्य जगन्नाथमथो कूर्मवपुर्धरम्।<br>ततो जगाम कृष्णाख्यं द्रष्टुं वाजिमुखं प्रभुम्।<br>तत्र देवह्रदे स्नात्वा तर्पयित्वा पितॄन् सुरान्॥ ७<br>सम्पूज्य हयशीर्षं च जगाम गजसाह्वयम्।<br>तत्र देवं जगन्नाथं गोविन्दं चक्रपाणिनम्॥ ८<br>स्नात्वा सम्पूज्य विधिवज्जगाम यमुनां नदीम्।<br>तस्यां स्नातः शुचिर्भूत्वा संतर्प्यर्षिसुरान् पितॄन्।<br>ददर्श देवदेवेशं लोकनाथं त्रिविक्रमम्॥ ९पुलस्त्यजी बोले— नारदजी! सुनिये; मैं आपसे पापरूपी कीचड़को नष्ट करनेवाली एवं पवित्र पुण्यको देनेवाली प्रह्लादकी तीर्थयात्राको कहता हूँ। सुवर्णमय श्रेष्ठ मेरु पर्वतको छोड़कर वे (सबसे पहले) देवोंसे सेवित (और) पृथ्वीमें प्रसिद्ध कल्याणदायी मानसतीर्थमें गये, जहाँ मत्स्यशरीरधारी (मत्स्यावतारी) देवाधिदेव निवास करते हैं। उस उत्तम तीर्थमें स्नान और पितृ-देव-तर्पण कर उन्होंने वेद-मन्त्रोंसे अच्युत भगवान् विश्वेशका पूजन किया। फिर वहाँ उपवास रहकर देवों, ऋषियों, पितरों और मनुष्योंकी (यथायोग्य) पूजा कर कौशिकीमें (अवस्थित) पापका नाश करनेवाले भगवान् कच्छपका दर्शन करने गये। उस महानदीमें स्नान करनेके बाद उन्होंने जगत्स्वामी भगवान्की पूजा की और उपवास (व्रत) करके पवित्र होकर ब्राह्मणोंको दक्षिणा दी। उसके बाद कच्छपावतार जगन्नाथ भगवान्को नमस्कार कर वे वहाँसे कृष्ण नामके अश्वमुख भगवान्का दर्शन करने चले गये। वहाँ उन्होंने देवह्रदमें स्नानकर देवों एवं पितरोंका तर्पण किया और हयग्रीव भगवान्का अर्चन कर वे हस्तिनापुर चले गये। वहाँ स्नान करनेके बाद चक्रपाणि विश्वपति गोविन्ददेवकी विधिसे पूजा करनेके बाद वे यमुना नदीके पास पहुँच गये। उसमें स्नान करके पवित्र होकर उन्होंने ऋषियों, पितरों और देवोंका तर्पण किया तथा देवोंके देव जगन्नाथ त्रिविक्रम (वामन भगवान्)-का दर्शन किया॥ २—९॥
नारद उवाच<br>साम्प्रतं भगवान् विष्णुस्त्रैलोक्याक्रमणं वपुः।<br>करिष्यति जगत्स्वामी बलेर्बन्धनमीश्वरः॥ १०नारदजीने पूछा— इस समय जगत्स्वामी भगवान् विष्णु तीनों लोकोंको आक्रान्त करनेवाला (विशालतम्) देह धारण करेंगे और बलिको बाँधेंगे तो वे भगवान्