भारतकोश
संग्रह पर लौटें

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

| अध्याय ७८ ] | प्रह्लादकी तीर्थयात्रा, धुन्धु और वामन-प्रसङ्ग, धुन्धुका यज्ञानुष्ठान और वामनका प्रादुर्भाव | ३८७ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तस्मादकालहीनं तु चिन्तयस्व जगद्गुरो।<br>उपायं मखविध्वंसे येन स्याम सुनिर्वृताः॥ ५०इसलिये जगद्गुरो! आप उसके यज्ञको विध्वस्त करनेका उपाय बिना समय बिताये (तत्काल) सोचें, जिससे हमलोग निश्चिन्त हो सकें॥ ४६-५०॥
श्रुत्वा सुराणां वचनं भगवान् मधुसूदनः।<br>दत्त्वाऽभयं महाबाहुः प्रेषयामास साम्प्रतम्।<br>विसृज्य देवताः सर्वा ज्ञात्वाऽजेयं महासुरम्॥ ५१<br>बन्धनाय मतिं चक्रे धुन्धोर्धर्मध्वजस्य वै।<br>ततः कृत्वा स भगवान् वामनं रूपमीश्वरः॥ ५२<br>देहं त्यक्त्वा निरालम्बं काष्ठवद् देविकाजले।<br>क्षणान्मज्जंस्तथोन्मज्जन्मुक्तकेशो यदृच्छया॥ ५३<br>दृष्टोऽथ दैत्यपतिना दैत्यैश्चान्यैस्तथर्षिभिः।<br>ततः कर्म परित्यज्य यज्ञियं ब्राह्मणोत्तमाः॥ ५४<br>समुत्तारयितुं विप्राद्रावन्त समाकुलाः।<br>सदस्या यजमानश्च ऋत्विजोऽथ महौजसः॥ ५५<br>निमज्जमानमुज्जह्नुः सर्वे ते वामनं द्विजम्।<br>समुत्तार्य प्रसन्नास्ते प्रप्रच्छुः सर्व एव हि।<br>किमर्थं पतितोऽसीह केनाक्षिप्तोऽसि नो वद॥ ५६सभी देवताओंको अभयदान देकर उन महाबाहुने उन देवताओंको लौटा दिया और उस महान् धर्मध्वजी (धर्मके नामपर पाखण्ड रचनेवाले) दैत्य धुन्धुको अजेय समझकर उन्होंने (श्रीहरिने) उसे बाँधनेका विचार किया। उसके बाद भगवान् विष्णुने बौनाका रूप धर लिया और देविका नदीके जलमें (अपनी) देहको लकड़ीकी तरह निरालम्ब छोड़ दिया। खुले हुए केशोंवाले वे क्षणमात्रमें अपने-आप डूबने-उतराने लगे। उसके बाद दैत्यपतिने तथा अन्य दैत्यों एवं ऋषियोंने उन्हें देखा। उसके बाद व्याकुल होकर वे श्रेष्ठ ब्राह्मण यज्ञके सभी काम छोड़कर उस ब्राह्मणको निकालनेके लिये दौड़े। सभी सदस्य, यजमान एवं अति तेजस्वी ऋत्विजोंने डूबते हुए बौनाके आकारवाले ब्राह्मणको (नदीके जलसे बाहर) निकाला और उससे पूछा— हमें यह बतलाओ कि तुम यहाँ क्यों गिरे अथवा तुम्हें किसने फेंका?॥ ५१-५६॥
तेषामाकर्ण्य वचनं कम्पमानो मुहुर्मुहुः।<br>प्राह धुन्धुपुरोगांस्ताञ्छ्रूयतामत्र कारणम्॥ ५७<br>ब्राह्मणो गुणवानासीत् प्रभास इति विश्रुतः।<br>सर्वशास्त्रार्थवित् प्राज्ञो गोत्रतश्चापि वारुणः॥ ५८<br>तस्य पुत्रद्वयं जातं मन्दप्रज्ञं सुदुःखितम्।<br>तत्र ज्येष्ठो मम भ्राता कनीयानपरस्त्वहम्॥ ५९<br>नेत्रभास इति ख्यातो ज्येष्ठो भ्राता ममासुर।<br>मम नाम पिता चक्रे गतिभासेति कौतुकात्॥ ६०उसने उनके वचनको सुनकर बार-बार काँपते हुए धुन्धु आदिसे कहा—आपलोग इसका कारण सुनें। वरुण-गोत्रमें उत्पन्न प्रभास नामके एक ब्राह्मण थे। वे सभी शास्त्रोंके तात्पर्यको जाननेवाले और बुद्धिमान् थे। उनके दो पुत्र उत्पन्न हुए। वे दोनों ही अल्पबुद्धि और अत्यन्त दुःखग्रस्त थे। उनमें मेरा भाई बड़ा और मैं छोटा हूँ। अये दैत्य! मेरा बड़ा भाई 'नेत्रभास' नामसे प्रसिद्ध है। मेरे पिताने कौतूहलवश मेरा नाम 'गतिभास' रख दिया॥ ५७-६०॥
रम्यश्चावसथो धुन्धो शुभ्रश्चासीत् पितुर्मम।<br>त्रिविष्टपगुणैर्युक्तश्चारुरूपो महासुर॥ ६१<br>ततः कालेन महता आवयोः स पिता मृतः।<br>तस्यौर्ध्वदेहिकं कृत्वा गृहमावां समागतौ॥ ६२<br>ततो मयोक्तः स भ्राता विभजाम गृहं वयम्।<br>तेनोक्तो नैव भवतो विद्यते भाग इत्यहम्॥ ६३<br>कुब्जवामनखञ्जानां क्लीबानां श्वित्रिणामपि।<br>उन्मत्तानां तथान्धानां धनभागो न विद्यते॥ ६४महासुर धुन्धो! मेरे पिताका निवास-स्थान सुन्दर, आनन्ददायक, स्वर्गीय गुणोंसे युक्त एवं मनोहर था। उसके बाद बहुत दिनोंके पश्चात् हम दोनोंके पिता स्वर्ग चले गये। उनकी दाह-संस्कारादि-श्राद्धक्रिया करके हम दोनों भाई घर आ गये। उसके बाद मैंने (अपने उन) बड़े भाईसे कहा—हम दोनों आपसमें घरका बँटवारा कर लें। उसने मुझसे कहा—तुम्हारा हिस्सा नहीं है; क्योंकि कुबड़े, बौने, लँगड़े, हिजड़े, चरकवाले, पागल और अन्धोंका धनमें हिस्सा नहीं होता है। उन्हें केवल सोने
३८८श्रीवामनपुराण[ अध्याय ७८
श्लोकअर्थ
शय्यासनस्थानमात्रं स्वेच्छयान्नभुजक्रिया।<br>एतावद् दीयते तेभ्यो नार्थभागहरा हि ते॥ ६५भरका स्थान तथा अपनी इच्छाके अनुसार अन्नभोगका अधिकार दिया जाता है। वे सम्पत्तिके भागी—अधिकारी नहीं होते॥ ६१—६५॥
एवमुक्ते मया सोक्तः किमर्थं पैतृकाद् गृहात्।<br>धनार्धभागमर्हामि नाहं न्यायेन केन वै॥ ६६<br>इत्युक्तवति वाक्येऽसौ भ्राता मे कोपसंयुतः।<br>समुत्क्षिप्याक्षिपन्नद्यामस्यां मामिति कारणात्॥ ६७<br>ममास्यां निम्नगायां तु मध्येन प्लवतो गतः।<br>कालः संवत्सराख्यस्तु युष्माभिरिह चोद्धृतः॥ ६८<br>के भवन्तोऽत्र सम्प्राप्ताः सस्नेहा बान्धवा इव।<br>कोऽयं च शक्रप्रतिमो दीक्षितो यो महाभुजः॥ ६९<br>तन्मे सर्वं समाख्यातं याथातथ्यं तपोधनाः।<br>महर्द्धिसंयुता यूयं सानुकम्पाश्च मे भृशम्॥ ७०ऐसा कहनेपर मैंने उससे कहा कि अपने पिताके घरके धनके आधे हिस्सेका अधिकारी मैं किस न्यायसे और क्यों नहीं हूँ? ऐसा अभिप्राय-पूर्ण वाक्य कहनेपर क्रोधमें आकर मेरे भाईने मुझे उठाकर इस नदीमें फेंक दिया। मुझे इस नदीमें तैरते हुए एक वर्षका समय बीत गया। (अब) आपलोगोंने यहाँ मेरा उद्धार किया है। प्रेमी बान्धवोंके समान यहाँ उपस्थित आपलोग कौन हैं तथा यज्ञके लिये दीक्षित इन्द्रके समान ये महाबलशाली कौन हैं? तपोधनो! आपलोग यह सब ठीक-ठीक मुझे बतलाइये। आपलोग महान् ऐश्वर्यशाली और मेरे ऊपर अत्यन्त अनुग्रह करनेवाले हैं॥ ६६—७०॥
तद् वामनवचः श्रुत्वा भार्गवा द्विजसत्तमाः।<br>प्रोचुर्वयं द्विजा ब्रह्मन् गोत्रतश्चापि भार्गवाः॥ ७१<br>असावपि महातेजा धुन्धुर्नाम महासुरः।<br>दाता भोक्ता विभक्ता च दीक्षितो यज्ञकर्मणि॥ ७२<br>इत्येवमुक्त्वा देवेशं वामनं भार्गवास्ततः।<br>प्रोचुर्दैत्यपतिं सर्वे वामनार्थकरं वचः॥ ७३<br>दीयतामस्य दैत्येन्द्र सर्वोपस्करसंयुतम्।<br>श्रीमदावसथं दास्यो रत्नानि विविधानि च॥ ७४<br>इति द्विजानां वचनं श्रुत्वा दैत्यपतिर्वचः।<br>प्राह द्विजेन्द्र ते दद्मि यावदिच्छसि वै धनम्॥ ७५वामनके उस वचनको सुनकर भार्गवकुलके श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने कहा—ब्रह्मन्! हमलोग भार्गव गोत्रवाले ब्राह्मण हैं। ये अति तेजस्वी दाता, भोक्ता और विभक्ता धुन्धु नामके महान् असुर हैं। ये यज्ञकर्ममें दीक्षित हुए हैं। देवेश वामनसे ऐसा कहकर सभी भार्गव-गोत्रीय (ब्राह्मणोंने) असुरस्वामी धुन्धुसे वामनके प्रयोजनको सिद्ध करनेवाला वचन कहा—दैत्येन्द्र! आप इन्हें सम्पूर्ण साज-सज्जासे पूर्ण सम्पत्तिसे सम्पन्न घर, दासियाँ और विविध प्रकारके रत्न (आदि) प्रदान करें। ब्राह्मणोंके उस वचनको सुनकर असुरराज धुन्धुने यह वचन कहा—द्विजेन्द्र! मैं आपको आपकी इच्छाके अनुकूल धन दूँगा॥ ७१—७५॥
दास्ये गृहं हिरण्यं च वाजिनः स्यन्दनान् गजान्।<br>प्रयच्छाम्यद्य भवतो व्रियतामीप्सितं विभो॥ ७६<br>तद्वाक्यं दानवपतेः श्रुत्वा देवोऽथ वामनः।<br>प्राहासुरपतिं धुन्धुं स्वार्थसिद्धिकरं वचः॥ ७७<br>सोदरेणापि हि भ्रात्रा ह्रियन्ते यस्य सम्पदः।<br>तस्याक्षमस्य यद्दत्तं किमन्यो न हरिष्यति॥ ७८विभो! आप अपने अभीष्ट पदार्थकी माँग करें। मैं आज आपको घर, सोना, घोड़े, रथ एवं हाथी प्रदान करूँगा। दैत्य-स्वामीके उस वाक्यको सुनकर (विप्ररूप धारण करनेवाले) भगवान् वामनने दानवपति धुन्धुसे अपने स्वार्थको साधनेवाला वचन कहा—सहोदर भाईने जिसकी (पैतृक) सम्पत्तिको ले लिया उस असमर्थको जो कुछ मिलेगा उसे क्या कोई दूसरा नहीं छीन लेगा?

अध्याय ७८ ] प्रह्लादकी तीर्थयात्रा, धुन्धु और वामन-प्रसङ्ग, धुन्धुका यज्ञानुष्ठान और वामनका प्रादुर्भाव ३८९

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
दासीदासांश्च भृत्यांश्च गृहं रत्ने परिच्छदम्।<br>समर्थेषु द्विजेन्द्रेषु प्रयच्छस्व महाभुज॥ ७९<br>मम प्रमाणमालोक्य मामकं च पदत्रयम्।<br>सम्प्रयच्छस्व दैत्येन्द्र नाधिकं रक्षितुं क्षमः॥ ८०महाबाहो! आप दिये हुएकी रक्षा करनेमें समर्थ श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको दासी, दास, नौकर, घर, रत्न और अच्छे वस्त्र दें। दैत्येन्द्र! मुझे तो मेरा परिमाण देखकर (केवल) तीन पग (भूमि) ही दे दें। (इससे) अधिककी रक्षा करनेमें मैं समर्थ नहीं हूँ॥ ७९-८०॥
इत्येवमुक्ते वचने महात्मना<br>विहस्य दैत्याधिपतिः स ऋत्विजः।<br>प्रादाद् द्विजेन्द्राय पदत्रयं तदा<br>यदा स नान्यं प्रगृहाण किंचित्॥ ८१<br>क्रमत्रयं तावदवेक्ष्य दत्तं<br>महासुरेन्द्रेण विभुर्यशस्वी।<br>चक्रे ततो लङ्घयितुं त्रिलोकीं<br>त्रिविक्रमं रूपमनन्तशक्तिः॥ ८२<br>कृत्वा च रूपं दितिजांश्च हत्वा<br>प्रणम्य चर्षीन् प्रथमक्रमेण।<br>महीं महीध्रैः सहितां सहार्णवां<br>जहार रत्नाकरपत्तनैर्युताम्॥ ८३उन (विप्र वामन) महात्माके ऐसा वचन कहनेपर, जब उन्होंने और कुछ ग्रहण नहीं किया तब ऋत्विजोंसहित दानवपतिने हँसकर उन द्विजेन्द्रको तीन पग (भूमि) प्रदान कर दी। महान् असुरेन्द्रद्वारा तीन पग भूमि प्रदान की हुई देखकर अनन्त शक्तिवाले यशस्वी एवं विभु वामन भगवान्ने तीनों लोकोंको नाप लेनेके लिये त्रिविक्रम (विराट्) रूप धारण कर लिया। (विशाल) रूप धर लेनेके बाद उन्होंने दैत्योंका वध कर ऋषियोंको प्रणाम किया और प्रथम पादन्यासमें ही पर्वत, सागर, रत्नोंकी खान एवं नगरोंसे युक्त पृथ्वीको नापकर ले लिया॥ ८१-८३॥
भुवं सनाकं त्रिदशाधिवासं<br>सोमार्कऋक्षैरभिमण्डितं नभः।<br>देवो द्वितीयेन जहार वेगात्<br>क्रमेण देवप्रियमीप्सुरीश्वरः॥ ८४<br>क्रमं तृतीयं न यदाऽस्य पूरितं<br>तदाऽतिकोपाद् दनुपुङ्गवस्य।<br>पपात पृष्ठे भगवांस्त्रिविक्रमो<br>मेरुप्रमाणेण तु विग्रहेण॥ ८५<br>पतता वासुदेवेन दानवोपरि नारद।<br>त्रिंशद्योजनसाहस्त्री भूमेर्गर्ता दृढीकृता॥ ८६देवताओंका प्रिय करनेकी इच्छावाले भगवान् वामनदेवने द्वितीय पगसे तुरंत ही देवताओंके निवास—स्वर्गके साथ ही भुवर्लोक, चन्द्र, सूर्य एवं नक्षत्रोंसे मण्डित आकाशको भी ग्रहण कर लिया। उनका तृतीय पादक्रम जब पूरा नहीं हुआ तो अत्यन्त क्रोधसे भगवान् त्रिविक्रम मेरुके समान शरीरसे दानवश्रेष्ठकी पीठपर गिर पड़े। नारदजी! वासुदेवके दानवके ऊपर गिरनेसे भूमिमें हजार योजनका सुदृढ़ गड्ढा बन गया॥ ८४-८६॥
ततो दैत्यं समुत्पाट्य तस्यां प्रक्षिप्य वेगतः।<br>अवर्षत् सिकतावृष्ट्या तां गर्तामपूरयत्॥ ८७<br>ततः स्वर्गं सहस्राक्षो वासुदेवप्रसादतः।<br>सुराश्च सर्वे त्रैलोक्यमवापुर्निरुपद्रवाः॥ ८८<br>भगवानपि दैत्येन्द्रं प्रक्षिप्य सिकतार्णवे।<br>कालिन्द्या रूपमाधाय तत्रैवान्तरधीयत॥ ८९<br>एवं पुरा विष्णुरभूच्च वामनो<br>धुन्धुं विजेतुं च त्रिविक्रमोऽभूत्।<br>यस्मिन् स दैत्येन्द्रसुतो जगाम<br>महाश्रमे पुण्ययुतो महर्षे॥ ९०उसके बाद उन्होंने दैत्यको उठाकर जोरसे उसमें फेंक दिया और बालुकी बरसासे उस गड्ढेको भर दिया। उसके बाद वासुदेवकी कृपासे इन्द्रने स्वर्ग पा लिया और उपद्रवोंसे रहित सम्पूर्ण देवोंको त्रिलोकीकी प्राप्ति हो गयी। कालिन्दी भी अपना स्वरूप धारणकर वहीं अन्तर्हित हो गयी। प्राचीन कालमें इस प्रकार धुन्धुको जीतनेके लिये विष्णु भगवान् वामन तथा (उसके बाद) त्रिविक्रम बने। महर्षि नारदजी! वह पुण्यात्मा दैत्येन्द्रपुत्र प्रह्लाद (तीर्थयात्राके प्रसङ्गमें) उसी आश्रममें गया॥ ८७-९०॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें अठहत्तरवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ७८॥

३९०श्रीवामनपुराण[ अध्याय ७९

उन्नासीवाँ अध्याय

पुरूरवाको रूपकी प्राप्ति और उसी सन्दर्भमें प्रेत और वणिक्‌की भेंट तथा परस्पर वृत्तान्तका कहना एवं श्रवण-द्वादशीका माहात्म्य, गयामें श्राद्ध करनेसे प्रेत-योनिसे मुक्ति और पुरूरवाको सुरूपकी प्राप्ति

पुलस्त्य उवाचपुलस्त्यजी बोले—
कालिन्दीसलिले स्नात्वा पूजयित्वा त्रिविक्रमम्।<br>उपोष्या रजनीमेकां लिङ्गभेदं गिरिं ययौ॥ १<br><br>तत्र स्नात्वा च विमले भवं दृष्ट्वा च भक्तितः।<br>उपोष्या रजनीमेकां तीर्थं केदारमाव्रजत्॥ २<br><br>तत्र स्नात्वाऽर्च्य चेशानं माधवं चाप्यभेदतः।<br>उषित्वा वासरान् सप्त कुब्जाम्रं प्रजगाम ह॥ ३<br><br>ततः सुतीर्थे स्नात्वा च सोपवासी जितेन्द्रियः।<br>हृषीकेशं समभ्यर्च्य ययौ बदरिकाश्रमम्॥ ४यमुनाजलमें स्नानकर प्रह्लादने त्रिविक्रम भगवान्‌की पूजा की। एक रात उपवास करनेके बाद (फिर) वे लिङ्गभेद नामक पर्वतपर चले गये। वहाँ विमल जलमें स्नानकर उन्होंने भक्तिसे भगवान् शंकरका दर्शन किया; एवं वहाँ भी एक रात निवासकर केदार नामके तीर्थमें गये। वहाँ स्नान करनेके बाद (उन्होंने) अभेदबुद्धिसे शिव एवं विष्णुका पूजन किया, (वहाँ) सात दिनोंतक रहकर कुब्जाम्रमें चले गये। उसके बाद उस सुन्दर तीर्थमें स्नानकर उपवास करनेवाले इन्द्रियजयी (प्रह्लाद) हृषीकेशका अर्चनकर बदरिकाश्रम चले गये॥ १–४॥
तत्रोष्य नारायणमर्च्य भक्त्या<br>स्नात्वाऽथ विद्वान् स सरस्वतीजले।<br>वराहतीर्थे गरुडासनं स<br>दृष्ट्वाऽथ सम्पूज्य सुभक्तिमांश्च॥ ५<br><br>भद्रकर्णे ततो गत्वा जयेशं शशिशेखरम्।<br>दृष्ट्वा सम्पूज्य च शिवं विपाशामभितो ययौ॥ ६<br><br>तस्यां स्नात्वा समभ्यर्च्य देवदेवं द्विजप्रियम्।<br>उपवासी इरावत्यां ददर्श परमेश्वरम्॥ ७<br><br>यमाराध्य द्विजश्रेष्ठ शाकले वै पुरूरवाः।<br>समवाप परं रूपमैश्वर्यं च सुदुर्लभम्॥ ८<br><br>कुष्ठरोगाभिभूतश्च यं समाराध्य वै भृगुः।<br>आरोग्यमतुलं प्राप सन्तानमपि चाक्षयम्॥ ९वहाँ रहते हुए सरस्वतीके जलमें स्नानकर उन विद्वान् (प्रह्लादजी)-ने नारायणका पूजन किया। फिर अत्यन्त भक्तिके साथ उन्होंने वराहतीर्थमें गरुडासन विष्णुका दर्शन और पूजन किया। वहाँसे भद्रकर्णमें पहुँचकर जयेश शशिशेखर शिवका दर्शन तथा पूजन करके बादमें विपाशाकी ओर चले गये। उस विपाशामें स्नानके बाद द्विजप्रिय देवाधिदेवका अर्चन कर (प्रह्लाद) उपवास करते हुए इरावतीकी ओर चले गये। द्विजोत्तम! (उन्होंने) वहाँ उन भगवान्‌का दर्शन किया, जिनकी शाकलमें आराधना करनेसे (पहले) पुरूरवाको उत्तम रूप एवं सुदुर्लभ ऐश्वर्य प्राप्त हुआ था। कुष्ठरोगसे अभिभूत भृगुने उन परमेश्वरकी आराधना करके अतुलनीय नीरोगता और अक्षय सन्तान प्राप्त की थी॥ ५–९॥
नारद उवाच<br>कथं पुरूरवा विष्णुमाराध्य द्विजसत्तम।<br>विरूपत्वं समुत्सृज्य रूपं प्राप श्रिया सह॥ १०नारदने पूछा— द्विजोत्तम! पुरूरवाने विष्णुकी आराधना करनेके बाद विरूपताको छोड़कर ऐश्वर्यके साथ सुदुर्लभ सुन्दर रूप कैसे प्राप्त किया?॥ १०॥
पुलस्त्य उवाच<br>श्रूयतां कथयिष्यामि कथां पापप्रणाशिनीम्।<br>पूर्वं त्रेतायुगस्यादौ यथावृत्तं तपोधन॥ ११पुलस्त्यजी बोले— तपोधन! सुनिये; मैं प्राचीन कालमें त्रेतायुगके आदिमें घटित, पापको नष्ट करनेवाली कथा

अध्याय ७९ ] पुरूरवाको रूपकी प्राप्ति और उसी सन्दर्भमें प्रेत और वणिक्‌की भेंट [ ३९१

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मद्रदेश इति ख्यातो देशो वै ब्रह्मणः सुत।<br>शाकलं नाम नगरं ख्यातं स्थानीयमुत्तमम्॥ १२<br>तस्मिन् विपणिवृत्तिस्थः सुधर्माख्योऽभवद् वणिक्।<br>धनाढ्यो गुणवान् भोगी नानाशास्त्रविशारदः॥ १३<br>स त्वेकदा निजाद् राष्ट्रात् सुराष्ट्रं गन्तुमुद्यतः।<br>सार्थेन महता युक्तो नानाविपणपण्यवान्॥ १४<br>गच्छतः पथि तस्याथ मरुभूमौ कलिप्रिय।<br>अभवद् दस्युतो रात्रौ अवस्कन्दोऽतिदुःसहः॥ १५कहता हूँ। ब्रह्मपुत्र! प्रसिद्ध मद्रदेशमें शाकल नामसे प्रसिद्ध उत्तम नगर है। वहाँ सुधर्मा नामका एक धनी, गुणशाली, भोगी एवं नाना शास्त्रोंमें निपुण व्यापारी रहता था। एक समय वह अपने देशसे सुराष्ट्र जानेको तैयार हुआ। कलिप्रिय! अनेक बेंची जानेवाली वस्तुओंसे युक्त व्यापारियोंके भारी समुदायके साथ जाते समय मार्गमें मरुभूमिमें रातमें (उसके ऊपर) डाकुओंका अत्यन्त उग्र असहनीय आक्रमण हुआ॥ ११—१५॥
ततः स हृतसर्वस्वो वणिग्दुःखसमन्वितः।<br>असहायो मरौ तस्मिंश्चचारोन्मत्तवद् वशी॥ १६<br>चरता तदरण्यं वै दुःखान्क्रान्तेन नारद।<br>आत्मा इव शमीवृक्षो मरावासादितः शुभः॥ १७<br>तं मृगैः पक्षिभिश्चैवं हीनं दृष्ट्वा शमीतरुम्।<br>श्रान्तः क्षुत्तृत्परीतात्मा तस्याधः समुपाविशत्॥ १८<br>सुप्तश्चापि सुविश्रान्तो मध्याह्ने पुनरुत्थितः।<br>सम्पश्यदथायान्तं प्रेतं प्रेतशतैर्वृतम्॥ १९उसके बाद सब कुछ लुट जानेसे दुखी हुआ वह असहाय वणिक् मरुभूमिमें पागलकी भाँति इधर-उधर घूमने लगा। नारदजी! दुःखसे ग्रसित होकर उस वनमें घूमते हुए उसे मरुभूमिमें अपने जनके समान एक सुन्दर शमीका वृक्ष मिला। थका तथा भूख-प्याससे अभिभूत हुआ वह वणिक् उस शमीवृक्षको पशु-पक्षियोंसे रहित देखकर उसके नीचे बैठ गया और सो गया तथा पूर्ण विश्राम कर दोपहरको जगा। उसके बाद उसने सैकड़ों प्रेतोंसे घिरे एक प्रेतको आते हुए देखा॥ १६—१९॥
उद्वाह्यन्तमथान्येन प्रेतेन प्रेतनायकम्।<br>पिण्डाशिभिश्च पुरतो धावद्भी रूक्षविग्रहैः॥ २०<br>अथाजगाम प्रेतोऽसौ पर्यटित्वा वनानि च।<br>उपागम्य शमीमूले वणिक्पुत्रं ददर्श सः॥ २१<br>स्वागतेनाभिवाद्यैनं समाभाष्य परस्परम्।<br>सुखोपविष्टश्छायायां पृष्टाकुशलमाप्तवान्॥ २२<br>ततः प्रेताधिपतिना पृष्टः स तु वणिक्सखः।<br>कुत आगम्यते ब्रूहि क्व साधो वा गमिष्यसि॥ २३प्रेतनायकको एक दूसरा प्रेत ढो रहा था और आगे रूखे शरीरवाले प्रेत दौड़ रहे थे। वनोंमें घूमनेके बाद वह प्रेत लौट रहा था। शमीवृक्षके नीचे आकर उसने वणिक्पुत्रको देखा। स्वागतके साथ उसे अभिवादन किया। फिर (दोनोंने) परस्पर वार्तालाप किया। इसके बाद वह प्रेत छायामें सुखपूर्वक बैठ गया और उसने उससे कुशल पूछी और जानी। उसके बाद प्रेताधिपतिने वणिक्-बन्धुसे पूछा—साधो! यह बतलाओ कि तुम कहाँसे आ रहे हो और कहाँ जाओगे?॥ २०—२३॥
कथं चेदं महारण्यं मृगपक्षिविवर्जितम्।<br>समापन्नोऽसि भद्रं ते सर्वमाख्यातुमर्हसि॥ २४<br><br>एवं प्रेताधिपतिना वणिक् पृष्टः समासतः।<br>सर्वमाख्यातवान् ब्रह्मन् स्वदेशधनविच्युतिम्॥ २५<br><br>तस्य श्रुत्वा स वृत्तान्तं तस्य दुःखेन दुःखितः।<br>वणिक्पुत्रं ततः प्राह प्रेतपालः स्वबन्धुवत्॥ २६<br><br>एवं गतेऽपि मा शोकं कर्तुमर्हसि सुव्रत।<br>भूयोऽप्यर्थाः भविष्यन्ति यदि भाग्यबलं तव॥ २७तुम्हारा कल्याण हो। मुझे यह बताओ कि पशु एवं पक्षियोंसे रहित इस बड़े जंगलमें तुम कैसे आये?<br>(पुलस्त्यजी कहते हैं—) ब्रह्मन्! प्रेतराजके इस प्रकार पूछनेपर वणिक्ने थोड़ेमें उसे अपने देशका एवं धन-नाशका पूरा विवरण कह सुनाया। उसका पूरा वृत्तान्त सुन लेनेके बाद उसके दुःखसे दुखी होकर प्रेतपालने अपने बन्धुके समान (उसे मानते हुए) उस वणिक्-पुत्रसे कहा—सुव्रत! ऐसा होनेपर भी तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये। यदि तुम्हारा भाग्य प्रबल होगा तो धन फिर हो जायगा॥ २४—२७॥

३१२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७१

संस्कृतहिन्दी अनुवाद
भाग्यक्षयेऽर्थाः क्षीयन्ते भवन्त्यभ्युदये पुनः।<br>क्षीणस्यास्य शरीरस्य चिन्तया नोदयो भवेत्॥ २८<br><br>इत्युच्चार्य समाहूय स्वान् भृत्यान् वाक्यमब्रवीत्।<br>अद्यातिथिरयं पूज्यः सदैव स्वजनो मम॥ २९<br><br>अस्मिन् दृष्टे वणिक्पुत्रे यथा स्वजनदर्शनम्।<br>अस्मिन् समागते प्रेताः प्रीतिर्जाता ममातुला॥ ३०<br><br>एवं हि वदतस्तस्य मृत्पात्रं सुदृढं नवम्।<br>दध्योदनेन सम्पूर्णमाजगाम यथेप्सितम्॥ ३१<br><br>तथा नवा च सुदृढा सम्पूर्णा परमाम्भसा।<br>वारिधानी च सम्प्राप्ता प्रेतानामग्रतः स्थिता॥ ३२(देखो,) भाग्यके क्षय होनेपर धनोंका क्षय हो जाता है और फिर भाग्योदय हो जानेपर पुनः धन प्राप्त हो जाते हैं। चिन्तासे क्षीण हुए शरीरका उत्थान (वृद्धि) नहीं होता। ऐसा कहकर उसने अपने सेवकोंको बुलाया और उनसे कहा—मेरे अपने जनके समान इस अतिथिका सब प्रकारसे सत्कार करो। प्रेतो! स्वजनदर्शनके समान ही मुझे इस वणिक्पुत्रका दर्शन हुआ है। इसके मिलनेसे मुझे अत्यधिक प्रीति प्राप्त हुई है। उसके ऐसा कहनेपर इच्छाभर (भोजन-योग्य) दही और भातसे भरा अत्यन्त दृढ़ एक नया मिट्टीका पात्र आ गया। इसी प्रकार निर्मल शीतल जलसे भरा एक पानीका पात्र भी उन प्रेतोंके सामने उपस्थित हो गया॥ २८—३२॥
तमागतं ससलिलमन्नं वीक्ष्य महामतिः।<br>प्राहोत्तिष्ठ वणिक्पुत्र त्वमाह्निकमुपाचर॥ ३३<br><br>ततस्तु वारिधान्यास्तौ सलिलेन विधानतः।<br>कृताह्निकावुभौ जातौ वणिक् प्रेतपतिस्तथा॥ ३४<br><br>ततो वणिक्सुतायादौ दध्योदनमथेच्छया।<br>दत्त्वा तेभ्यश्च सर्वेभ्यः प्रेतेभ्यो व्यददात् ततः॥ ३५<br><br>भुक्तवत्सु च सर्वेषु कामतोऽम्भसि सेविते।<br>अनन्तरं स बुभुजे प्रेतपालो वराशनम्॥ ३६उस अन्न एवं जलको प्रस्तुत हुए देखकर महामति प्रेतने कहा—वणिक्पुत्र! तुम उठो एवं दैनिक (नित्य) कृत्य करो। उसके बाद वणिक् एवं प्रेतपति—दोनोंने घड़ेके जलसे विधिपूर्वक नित्य-क्रिया सम्पन्न की। उसके बाद (प्रेतपतिने) पहले वणिक्पुत्रको पर्याप्त दही और भात दिया और तब उन प्रेतोंको दिया। सभीके इच्छाभर भोजन एवं जलपान करनेके बाद प्रेतनायकने उत्तम भोजन किया॥ ३३—३६॥
प्रकामवृप्ते प्रेते च वारिधान्योदनं तथा।<br>अन्तर्धानमगाद् ब्रह्मन् वणिक्पुत्रस्य पश्यतः॥ ३७<br><br>ततस्तदद्भुततमं दृष्ट्वा स मतिमान् वणिक्।<br>पप्रच्छ तं प्रेतपालं कौतूहलमना वशी॥ ३८<br><br>अरण्ये निर्जने साधो कुतोऽन्नस्य समुद्भवः।<br>कुतश्च वारिधानीयं सम्पूर्णा परमाम्भसा॥ ३९<br><br>तथामी तव ये भृत्यास्त्वत्तस्ते वर्णतः कृशाः।<br>भवानपि च तेजस्वी किंचित्पुष्टवपुः शुभः॥ ४०<br><br>शुक्लवस्त्रपरीधानो बहूनां परिपालकः।<br>सर्वमेतन्ममाचक्ष्व को भवान् का शमी त्वियम्॥ ४१(पुलस्त्यजी कहते हैं कि) ब्रह्मन्! प्रेतके भलीभाँति तृप्त हो जानेपर वणिक्पुत्रके देखते-ही-देखते जलपात्र और ओदन आँखोंसे ओझल हो गये। तब उस अत्यन्त ही आश्चर्यजनक दृश्यको देखकर उस बुद्धिमान् संयमी वणिक्ने उत्सुकतापूर्वक उस प्रेतपतिसे पूछा—साधो! इस निर्जन वनमें अन्न एवं उत्तम जलसे भरा घड़ा कहाँसे आ गया? अपेक्षाकृत तुम्हारे वर्णकी दृष्टिसे दुबले ये तुम्हारे भृत्य कौन हैं? कुछ हृष्ट-पुष्ट शरीरवाले सुन्दर, तेजसे सम्पन्न और शुक्लवस्त्रधारी (हमारे-जैसे) बहुतोंकी परिरक्षा करनेवाले आप भी कौन हैं? आप मुझे यह सम्पूर्ण विवरण बतलाएँ कि आप कौन हैं एवं यह शमीवृक्ष कौन है?॥ ३७—४१॥
इत्थं वणिक्सुतवचः श्रुत्वासौ प्रेतनायकः।<br>शशंस सर्वमस्याद्यं यथावृत्तं पुरातनम्॥ ४२<br><br>अहमासं पुरा विप्रः शाकले नगरोत्तमे।<br>सोमशर्मेति विख्यातो बहुलागर्भसम्भवः॥ ४३वणिक्पुत्रके ऐसे वचनको सुनकर उस प्रेतनायकने उससे सारे पुराने वृत्तान्तको कहा। (उसने कहा—) प्राचीन कालमें उत्तम शाकल नामके श्रेष्ठ नगरमें बहुलाके गर्भसे उत्पन्न हुआ मैं सोमशर्मा—इस नामसे

| अध्याय ७९ ] | पुरूरवाको रूपकी प्राप्ति और उसी सन्दर्भमें प्रेत और वणिककी भेंट | ३९३ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ममास्ति च वणिक् श्रीमान् प्रातिवेश्यो महाधनः।<br>स तु सोमश्रवा नाम विष्णुभक्तो महायशाः॥ ४४<br><br>सोऽहं कदर्यो मूढात्मा धनेऽपि सति दुर्मतिः।<br>न ददामि द्विजातिभ्यो न चाश्नाम्यन्नमुत्तमम्॥ ४५प्रसिद्ध ब्राह्मण था। मेरा एक पड़ोसी बहुत धनवान्, लक्ष्मीवान् वणिक् था, जिसका नाम था सोमश्रवा। वह महान् यशस्वी और विष्णुका भक्त था। मैं कृपण एवं दुर्मति था। अतः धन होते हुए भी न तो ब्राह्मणोंको दान करता था और न अच्छे अन्नका भोजन ही करता था॥ ४२–४५॥
प्रमादाद् यदि भुञ्जामि दधिक्षीरघृतान्वितम्।<br>ततो रात्रौ नृभिर्घोरैस्ताड्यते मम विग्रहः॥ ४६<br><br>प्रातर्भवति मे घोरा मृत्युतुल्या विषूचिका।<br>न च कश्चिन्ममाभ्यासे तत्र तिष्ठति बान्धवः॥ ४७<br><br>कथं कथमपि प्राणा मया सम्प्रति धारिताः।<br>एवमेतादृशः पापी निवसाम्यतिनिर्घृणः॥ ४८<br><br>सौवीरतिलपिण्याकसक्तुशाकादिभोजनैः ।<br>क्षपयामि कदन्नाद्यैरात्मानं कालयापनैः॥ ४९यदि मैं कभी भूलसे दही, दूध एवं घीसे युक्त पदार्थ भोजन कर लेता था तो रात्रिमें भयङ्कर मनुष्य मेरे शरीरको पीड़ित करते थे। प्रातःकाल मुझे मरणके समान (कष्ट देनेवाली) भयङ्कर विषूचिका (हैजा) हो जाया करती थी। उस समय मेरे पास कोई भी बन्धु नहीं रहता था। मैं किसी-किसी प्रकार अपने प्राणोंको धारण करता था। इस प्रकार मैं अति निर्लज्ज पापयुक्त जीवन बिताता रहा। बेर, तिलपिण्याक, सत्तू, शाकादि एवं बुरे अन्नों (मोटे अन्न—) कोदो, साँवा आदिको खाकर समय बिताते हुए मैं स्वयंको दुर्बल कर रहा था॥ ४६–४९॥
एवं तत्रासतो मह्यं महान् कालोऽभ्यगादथ।<br>श्रवणद्वादशी नाम मासि भाद्रपदेऽभवत्॥ ५०<br><br>ततो नागरिको लोको गतः स्नातुं हि सङ्गमम्।<br>इरावत्या नड्वलाया ब्रह्मक्षत्रपुरस्सरः॥ ५१<br><br>प्रातिवेश्यप्रसङ्गेन तत्राप्यनुगतोऽस्म्यहम्।<br>कृतोपवासः शुचिमानेकादश्यां यतव्रतः॥ ५२<br><br>ततः सङ्गमतोयेन वारिधानीं दृढां नवाम्।<br>सम्पूर्णां वस्तुसंवीतां छत्रोपानहसंयुताम्॥ ५३<br><br>मृत्पात्रमपि मिष्टस्य पूर्णं दध्योदनस्य ह।<br>प्रदत्तं ब्राह्मणेन्द्राय शुचये ज्ञानधर्मिणे॥ ५४मुझे वहाँ इस ढंगसे रहते हुए बहुत समय बीत गया। (एक बार) भाद्रपदमासमें श्रवणद्वादशीकी तिथि आयी। तब ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि नागरिक लोग इरावती और नड्वला नदियोंके संगममें स्नान करनेके लिये गये। पड़ोसी होनेके कारण मैं भी उनके पीछे-पीछे चला गया। एकादशीके दिन मैंने व्रत रहकर पवित्रतासे उपवास किया। उसके बाद मैंने अनेक वस्तुओं—छाता, जूता और साथ ही सङ्गमके जलसे भरा नवीन दृढ़ जलपात्र एवं मिष्टान्न, दधि तथा ओदनसे पूर्ण मिट्टीका पात्र ज्ञानी, धार्मिक, पवित्र, श्रेष्ठ ब्राह्मणको प्रदान किया॥ ५०–५४॥
तदेव जीवतो दत्तं मया दानं वणिक्सुत।<br>वर्षाणां सप्ततीनां वै नान्यद् दत्तं हि किंचन॥ ५५<br><br>मृतः प्रेतत्वमापन्नो दत्त्वा प्रेतान्नमेव हि।<br>अमी चादत्तदानास्तु मदन्नेनोपजीविनः॥ ५६<br><br>एतत्ते कारणं प्रोक्तं यत्तदन्नं मयाम्भसा।<br>दत्तं तदिदमायाति मध्याह्नेऽपि दिने दिने॥ ५७<br><br>यावन्नाहं च भुञ्जामि न तावत् क्षयमेति वै।<br>मयि भुक्ते च पीते च सर्वमन्तर्हितं भवेत्॥ ५८वणिक्पुत्र! मैंने अपने सत्तर वर्षोंके (पूरे) जीवनमें (केवल) वही दान दिया था। इसके सिवा अन्य कुछ भी नहीं दान किया। प्रेतान्न दान करके मृत्युके बाद मैं प्रेत हो गया। मेरे अन्नसे जीवन धारण करनेवाले इन लोगोंने भी दान कभी नहीं किया है। मैंने तुम्हें वह कारण बतलाया जिससे मेरे द्वारा दिये गये अन्न-जल प्रतिदिन दोपहरके समय (मेरे समीप) आ जाते हैं। जबतक मैं नहीं खाता, तबतक उनका क्षय नहीं होता। मेरे खाने और पीनेके बाद सभी कुछ अदृश्य हो जाता है॥ ५५–५८॥

| ३९४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७९ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
यच्छातातपत्रमददं सोऽयं जातः शमीतरुः।<br>उपानद्युगले दत्ते प्रेतो मे वाहनोऽभवत्॥ ५९<br><br>इयं तवोक्ता धर्मज्ञ मया कीनाशतात्मनः।<br>श्रवणद्वादशीपुण्यं तवोक्तं पुण्यवर्धनम्॥ ६०<br><br>इत्येवमुक्ते वचने वणिक्पुत्रोऽब्रवीद् वचः।<br>यन्मया तात कर्त्तव्यं तदनुज्ञातुमर्हसि॥ ६१<br><br>तत् तस्य वचनं श्रुत्वा वणिक्पुत्रस्य नारद।<br>प्रेतपालो वचः प्राह स्वार्थसिद्धिकरं ततः॥ ६२मैंने जो छाताका दान किया था, वही इस शमीवृक्षके रूपमें उत्पन्न हुआ है। एक जोड़ा जूताका दान करनेसे प्रेत मेरा वाहन बना है। धर्मज्ञ! अपने प्रेतत्व-प्राप्तिका यह समस्त विवरण मैंने तुमसे कह सुनाया तथा परम पवित्र और पुण्यको बढ़ानेवाली श्रवणद्वादशीका भी वर्णन कर दिया। प्रेतके ऐसा कहनेपर वणिक्पुत्रने कहा—तात! मुझे जो करना हो उसकी आज्ञा दें। (पुलस्त्यजी कहते हैं कि) नारदजी! वणिक्पुत्रका वह वचन सुनकर प्रेतपति अपनी स्वार्थसिद्धिकी बात कहने लगा—॥ ५९—६२॥
यत् त्वया तात कर्त्तव्यं मद्धितार्थं महामते।<br>कथयिष्यामि तत् सम्यक् तव श्रेयस्करं मम॥ ६३<br><br>गयायां तीर्थजुष्टायां स्नात्वा शौचसमन्वितः।<br>मम नाम समुद्दिश्य पिण्डनिर्वपणं कुरु॥ ६४<br><br>तत्र पिण्डप्रदानेन प्रेतभावादहं सखे।<br>मुक्तस्तु सर्वदातॄणां यास्यामि सहलोकताम्॥ ६५<br><br>यथेयं द्वादशी पुण्या मासि प्रौष्ठपदे सिता।<br>बुधश्रवणसंयुक्ता साऽतिश्रेयस्करी स्मृता॥ ६६महामते! मेरे हितके लिये तुम्हें करने योग्य कर्म मैं बतलाता हूँ। उसे अच्छी तरह सम्पन्न कर लेनेसे तुम्हारा और मेरा (दोनोंका) कल्याण होगा। (देखो,) गया-तीर्थमें (जाकर और) स्नानसे पवित्र होकर मेरे नाम (उद्देश्य)-से तुम पिण्डदान करो। सखे! वहाँ पिण्डदान करनेसे मैं प्रेतभावसे मुक्त होकर सर्वस्व दान करनेवालोंको मिलनेवाले लोकको प्राप्त कर लूँगा। भाद्रपदमासके शुक्लपक्षकी बुधवार एवं श्रवण नक्षत्रसे युक्त पुण्य बढ़ानेवाली अत्यन्त माङ्गलिक यह द्वादशी (तिथि) कही गयी है॥ ६३—६६॥
इत्येवमुक्त्वा वणिजं प्रेतराजोऽनुगैःसह।<br>स्वनामानि यथान्यायं सम्यगाख्यातवाञ्छुचिः॥ ६७<br><br>प्रेतस्कन्धे समारोप्य त्याजितो मरुमण्डलम्।<br>रम्येऽथ शूरसेनाख्ये देशे प्राप्तः स वै वणिक्॥ ६८<br><br>स्वकर्मधर्मयोगेन धनमुच्चावचं बहु।<br>उपार्जयित्वा प्रययौ गयाशीर्षमनुत्तमम्॥ ६९<br><br>पिण्डनिर्वपणं तत्र प्रेतानामनुपूर्वशः।<br>चकार स्वपितॄणां च दायादानामनन्तरम्॥ ७०वणिक्से ऐसा कहकर प्रेतराजने अपने अनुचरोंसहित पवित्रतापूर्वक यथोचित क्रमसे अपने (पितरोंके) नामोंको बताया। उसे प्रेतके कन्धेपर चढ़ाकर मरु-भूमिसे बाहर छोड़ दिया गया। इस प्रकार वह वणिक् शूरसेन नामके सुन्दर देशमें पहुँच गया। अपने कर्म तथा धर्मसे उसने अधिक मात्रामें उत्कृष्ट एवं हीन धन उपार्जित कर लिया। उसके बाद वह उत्तम गयाशीर्ष नामके तीर्थमें गया। वहाँ क्रमशः प्रेतोंके उद्देश्यसे पिण्डदान करनेके बाद उसने अपने पितरों एवं दायादोंको भी पिण्डदान किया॥ ६७-७०॥
आत्मनश्च महाबुद्धिर्महाबोध्यं तिलैर्विना।<br>पिण्डनिर्वपणं चक्रे तथान्यानपि गोत्रजान्॥ ७१<br><br>एवं प्रदत्तेष्वथ वै पिण्डेषु प्रेतभावतः।<br>विमुक्तास्ते द्विज प्रेता ब्रह्मलोकं ततो गताः॥ ७२उस महाबुद्धि (वणिक्)-ने अपने लिये तिलसे रहित महाबोध्य नामका पिण्डदान किया। उसके बाद अन्य गोत्रोंमें उत्पन्न हुओंके उद्देश्यसे भी पिण्डदान किया। द्विज! इस प्रकार पिण्डदान करनेपर वे प्रेत प्रेत-योनिसे मुक्त होकर ब्रह्मलोकको चले गये।

अध्याय ७९ ] पुरूरवाको रूपकी प्राप्ति और उसी सन्दर्भमें प्रेत और वणिक्‌की भेंट [ ३९५

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
स चापि हि वणिक्पुत्रो निजमालयमाव्रजत्।<br>श्रवणद्वादशीं कृत्वा कालधर्ममुपेयिवान्॥ ७३<br><br>गन्धर्वलोके सुचिरं भोगान् भुक्त्वा सुदुर्लभान्।<br>मानुष्यं जन्ममासाद्य स बभौ शाकले विराट्॥ ७४वह वणिक्पुत्र भी अपने घर चला गया और श्रवणद्वादशीका (यथोचित रीतिसे) (व्रत) पालन करते हुए वह भी समय आनेपर स्वर्गीय हो गया। गन्धर्वलोकमें चिरकालतक अत्यन्त दुर्लभ भोगोंका उपभोग करनेके बाद मनुष्य-जन्म प्राप्त कर वह शाकलपुरीका सम्राट् बना॥ ७३-७४॥
स्वधर्मकर्मवृत्तिस्थः श्रवणद्वादशीरतः।<br>कालधर्ममवाप्यासौ गुह्यकावासमाश्रयत्॥ ७५<br><br>तत्रोष्य सुचिरं कालं भोगान् भुक्त्वाऽथ कामतः।<br>मर्त्यलोकमनुप्राप्य राजन्यतनयोऽभवत्॥ ७६<br><br>तत्रापि क्षत्रवृत्तिस्थो दानभोगरतो वशी।<br>गोग्रहेऽरिगणाञ्जित्वा कालधर्ममुपेयिवान्।<br>शक्रलोकं स सम्प्राप्य देवैः सर्वैः सुपूजितः॥ ७७<br><br>पुण्यक्षयात् परिभ्रष्टः शाकले सोऽभवद् द्विजः।<br>ततो विकटरूपोऽसौ सर्वशास्त्रार्थपारगः॥ ७८अपने धर्म तथा कर्ममें स्थित रहता हुआ वह श्रवणद्वादशी (व्रत)-में रत रहता रहा। (समय आनेपर) मृत्युके बाद उसने गुह्यकोंका लोक प्राप्त कर लिया। वहाँ बहुत कालतक ठहरकर और इच्छानुकूल भाँति-भाँतिके भोग्य पदार्थोंका भोग करनेके बाद वह मृत्युलोकमें आकर राजपुत्र बना। वहाँ भी क्षत्रिय-वृत्तिसे निर्वाह करते हुए वह दान और भोगमें लगा रहा। गौओंके अपहरणमें उसने शत्रुओंको जीतकर कालधर्म (मृत्यु)-को प्राप्त हुआ। फिर वह इन्द्रलोकमें गया और सभी देवोंसे पूजित हुआ। पुण्यका क्षय होनेसे 'क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति'—नियमसे स्वर्गच्युत होकर वह फिर शाकल देशमें ब्राह्मण हुआ। उसका रूप तो अत्यन्त विद्रूप (भयङ्कर) था, परंतु वह (विद्यासे) सम्पूर्ण शास्त्रोंमें पारङ्गत था॥ ७५-७८॥
विवाहयद् द्विजसुतां रूपेणानुपमां द्विज।<br>साऽवमेने च भर्त्तारं सुशीलमपि भामिनी॥ ७९<br><br>विरूपमिति मन्वाना ततः सोऽभूत् सुदुःखितः।<br>ततो निर्वेदसंयुक्तो गत्वाश्रमपदं महत्॥ ८०<br><br>इरावत्यास्तटे श्रीमान् रूपधारिणमासदत्।<br>तमाराध्य जगन्नाथं नक्षत्रपुरुषेण हि॥ ८१<br><br>सुरूपतामवाप्याग्र्यां तस्मिन्नेव च जन्मनि।<br>ततः प्रियोऽभूद् भार्याया भोगवांश्चाभवद् वशी।<br>श्रवणद्वादशीभक्तः पूर्वाभ्यासादजायत॥ ८२<br><br>एवं पुराऽसौ द्विजपुङ्गवस्तु<br>कुरूपरूपो भगवत्प्रसादात्।<br>अनङ्गरूपप्रतिमो बभूव<br>मृतश्च राजा स पुरूरवाऽभूत्॥ ८३द्विज! उसने अनुपम सुन्दरी ब्राह्मण-कन्यासे विवाह किया। वह ललना (अपने) अत्यन्त शीलवान् पतिको भी कुरूप मानकर निरादर करती रहती। इससे वह बहुत दुःखित हो गया। उसके बाद ग्लानिसे भरकर वह इरावतीके तीरपर स्थित महान् आश्रममें पहुँचा और नक्षत्र-पुरुषके द्वारा स्थापित सुन्दर रूप धारण करनेवाले जगन्नाथ भगवान्‌की आराधना की। इस प्रकार उसी जन्ममें परम सुन्दर रूप प्राप्त कर वह अपनी भार्याका प्यारा एवं ऐश्वर्यसे सम्पन्न हो गया। पूर्वके अभ्याससे संयत रहनेवाला वह श्रवणद्वादशीका भक्त बना रहा। इस प्रकार पहले कुरूप रहनेपर भी भगवान्‌की कृपासे वह श्रेष्ठ ब्राह्मण कामदेवके समान सुन्दर रूपवाला हो गया और स्वर्गीय होकर दूसरे जन्ममें राजा पुरूरवा हुआ॥ ७९-८३॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें उन्नासीवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ७९ ॥

३९६श्रीवामनपुराण[ अध्याय ८०

अस्सीवाँ अध्याय

नक्षत्र-पुरुषके वर्णन-प्रसङ्गमें नक्षत्र-पुरुषकी पूजाका विधान और नक्षत्र-पुरुषके व्रतका माहात्म्य

संस्कृतहिन्दी
नारद उवाच<br>पुरूरवा द्विजश्रेष्ठ यथा देवं श्रियः पतिम्।<br>नक्षत्रपुरुषाख्येन आराधयत तद् वद॥ १नारदजीने पूछा— द्विजश्रेष्ठ! पुरूरवाने नक्षत्र-पुरुष नामक व्रतके द्वारा लक्ष्मीपति वासुदेवकी जिस विधिसे आराधना की थी, उसे कहिये॥ १॥
पुलस्त्य उवाच<br>श्रूयतां कथयिष्यामि नक्षत्रपुरुषव्रतम्।<br>नक्षत्राङ्गानि देवस्य यानि यानीह नारद॥ २<br><br>मूलर्क्षं चरणौ विष्णोर्जङ्घे द्वे रोहिणी स्मृते।<br>द्वे जानुनी तथाश्विन्यौ संस्थिते रूपधारिणः॥ ३<br><br>आषाढे द्वे द्वयं चौर्वोर्गुह्यस्थं फाल्गुनीद्वयम्।<br>कटिसंस्थाः कृत्तिकाश्चैव वासुदेवस्य संस्थिताः॥ ४<br><br>प्रौष्ठपद्याद्वयं पार्श्वे कुक्षिभ्यां रेवती स्थिता।<br>उरःसंस्था त्वनुराधा श्रविष्ठा पृष्ठसंस्थिता॥ ५पुलस्त्यजी बोले— नारदजी! मैं नक्षत्र-पुरुष-व्रत एवं देवके सभी नक्षत्ररूपी अङ्गोंका वर्णन करता हूँ; आप सुनें—मूल नक्षत्र भगवान् विष्णुके दोनों चरणों, रोहिणी नक्षत्र दोनों जंघाओं एवं अश्विनी नक्षत्र दोनों घुटनोंका रूप धारण करके स्थित हैं। पूर्वाषाढ़ा और उत्तराषाढ़ा नामके दो नक्षत्र वासुदेवके दोनों ऊरुओंमें, पूर्वाफाल्गुनी तथा उत्तराफाल्गुनी नामवाले दोनों नक्षत्र गुह्य प्रदेशमें और कृत्तिका नक्षत्र कटि-भागमें स्थित है। पूर्वाभाद्रपदा तथा उत्तराभाद्रपदा भगवान्‌के दोनों पाश्र्वोंमें, रेवती दोनों कुक्षियोंमें, अनुराधा हृदयमें तथा धनिष्ठा नक्षत्र पृष्ठदेशमें स्थित है॥ २-५॥
विशाखा भुजयोर्हस्तः करद्वयमुदाहृतम्।<br>पुनर्वसुस्तथाङ्गुल्यो नखाः सार्पस्तथोच्यते॥ ६<br><br>ग्रीवास्थिता तथा ज्येष्ठा श्रवणं कर्णयोः स्थितम्।<br>मुखसंस्थस्तथा पुष्यः स्वातिर्दन्ताः प्रकीर्तिताः॥ ७<br><br>हनू द्वे वारुणश्चोक्तो नासा पैत्र उदाहृतः।<br>मृगशीर्षं नयनयो रूपधारिणि तिष्ठति॥ ८<br><br>चित्रा चैव ललाटे तु भरणी तु तथा शिरः।<br>शिरोरुहस्था चैवार्द्रा नक्षत्राङ्गमिदं हरेः॥ ९दोनों भुजाओंके स्थानमें विशाखा नक्षत्र है। हस्त नक्षत्रको भगवान्‌का दोनों हाथ कहा गया है। पुनर्वसु नक्षत्र भगवान्‌की अंगुलियाँ और आश्लेषा नक्षत्र उनके नख हैं। ग्रीवामें ज्येष्ठा, दोनों कानोंमें श्रवण तथा मुखमें पुष्य नक्षत्र स्थित है। दाँतोंको स्वाति नक्षत्र कहा गया है। शतभिषा नक्षत्र दोनों हनुएँ तथा मघाको नासिका कहा गया है। (नक्षत्रोंका) रूप धारण करनेवाले भगवान्‌के दोनों नेत्रोंमें मृगशिरा नक्षत्रका निवास है। चित्रा ललाटमें, भरणी सिरमें तथा आर्द्रा नक्षत्र केशमें रहता है। भगवान् विष्णुका यह नक्षत्र-शरीर है॥ ६-९॥
विधानं सम्प्रवक्ष्यामि यथायोगेन नारद।<br>सम्पूजितो हरिः कामान् विदधाति यथेप्सितान्॥ १०नारदजी! अब मैं उस व्रतके विधानका वर्णन करूँगा, जिस व्रतसे नियमपूर्वक आराधित होनेपर भगवान् विष्णु इच्छित फल प्रदान करते हैं।

| अध्याय ८० ] | नक्षत्र-पुरुषके वर्णन-प्रसङ्गमें नक्षत्र-पुरुषकी पूजाका विधान | ३९७ | | :--- | :--- |

| चैत्रमासे सिताष्टम्यां यदा मूलगतः शशी।<br>तदा तु भगवत्पादौ पूजयेत् तु विधानतः।<br>नक्षत्रसंनिधौ दद्याद् विप्रेन्द्राय च भोजनम्॥ ११<br><br>जानुनी चाश्विनीयोगे पूजयेदथ भक्तितः।<br>दोहदे च हविष्यान्नं पूर्ववद् द्विजभोजनम्॥ १२<br><br>आषाढाभ्यां तथा द्वाभ्यां द्वा ऊरू पूजयेद् बुधः।<br>सलिलं शिशिरं तत्र दोहदे च प्रकीर्तितम्॥ १३ | चैत्रमासके शुक्लपक्षकी अष्टमी तिथिमें चन्द्रमाके मूल नक्षत्रमें स्थित होनेपर भगवान्‌के दोनों पैरोंकी विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिये। नक्षत्रकी संनिधिमें ब्राह्मणको भोजन कराना चाहिये। अश्विनी नक्षत्रके योगमें श्रद्धापूर्वक भगवान्‌के दोनों घुटनोंकी अर्चना करनी चाहिये एवं 'दोहद' में (यात्रा-दोषकी शान्तिके लिये खाये-पिये जानेवाले निश्चित पदार्थमें) हविष्यान्न समर्पित करना एवं पूर्ववत् ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। विद्वान् मनुष्य पूर्वाषाढ़ तथा उत्तराषाढ़के योगमें विष्णुके दोनों ऊरुओंकी पूजा करे। (इसमें देय) दोहदमें शीतल जलका विधान है॥ १०—१३॥ | | फाल्गुनीद्वितीये गुह्यं पूजनीयं विचक्षणैः।<br>दोहदे च पयो गव्यं देयं च द्विजभोजनम्॥ १४<br><br>कृत्तिकासु कटिः पूज्या सोपवासो जितेन्द्रियः।<br>देयं च दोहदं विष्णोः सुगन्धकुसुमोदकम्॥ १५<br><br>पार्श्वे भाद्रपदायुग्मे पूजयित्वा विधानतः।<br>गुडं सलेहकं दद्याद् दोहदे देवकीर्तितम्॥ १६<br><br>द्वे कुक्षी रेवतीयोगे दोहदे मुद्गमोदकाः।<br>अनुराधासु जठरं षष्टिकान्नं च दोहदे॥ १७ | [अनुक्रान्त विधानमें पुलस्त्यजी कहते हैं—] विद्वान् पुरुष दोनों फाल्गुनी नक्षत्रोंमें भगवान्‌के गुह्य-देशकी पूजा करे। दोहदके लिये दूध और घी दे और ब्राह्मण-भोजन कराये। कृत्तिका नक्षत्रमें उपवासपूर्वक जितेन्द्रिय रहकर भगवान्‌के कटि-देशकी अर्चना करे और सुगन्धित कुसुमसे युक्त जलका 'दोहद' दान करे। दोनों भाद्रपदाओंमें कहे हुए विधानसे भगवान्‌की दोनों बगलोंकी अर्चना करके 'दोहद' में देवद्वारा कथित—शास्त्रानुमोदित चाटनेवाली वस्तुसे युक्त गुड़ देना चाहिये। रेवती नक्षत्रके योगमें भगवान्‌की दोनों कुक्षियोंकी पूजाके बाद दोहदमें मूँगके लड्डू प्रदान करने चाहिये। अनुराधा नक्षत्रमें उदरकी पूजा करके दोहदमें साठीका चावल देना चाहिये॥ १४—१७॥ | | श्रविष्ठायां तथा पृष्ठं शालिभक्तं च दोहदे।<br>भुजयुग्मं विशाखासु दोहदे परमोदनम्॥ १८<br><br>हस्ते हस्तौ तथा पूज्यौ यावकं दोहदे स्मृतम्।<br>पुनर्वसावङ्गुलीश्च पटोलस्तत्र दोहदे॥ १९<br><br>आश्लेषासु नखान् पूज्य दोहदे तित्तिरामिषम्।<br>ज्येष्ठायां पूजयेद् ग्रीवां दोहदे तिलमोदकम्॥ २०<br><br>श्रवणे श्रवणौ पूज्यौ दधिभक्तं च दोहदे।<br>पुष्ये मुखं पूजयेत दोहदे घृतपायसम्॥ २१ | धनिष्ठा नक्षत्रमें पृष्ठकी पूजा करके दोहदमें शालिका भात देना चाहिये। विशाखा नक्षत्रमें भगवान्‌की दोनों भुजाओंकी पूजा कर दोहदमें उत्तम अन्न देना चाहिये। हस्त नक्षत्रमें भगवान्‌के दोनों करोंकी पूजा करके दोहदमें जौसे बना पकवान्न देना चाहिये। पुनर्वसु नक्षत्रमें अंगुलियोंकी पूजा करके दोहदमें रेशमी वस्त्र या परवल प्रदान करना चाहिये। आश्लेषा नक्षत्रमें नखकी पूजा कर दोहदमें तित्तिरकी आकृति प्रदान करे। ज्येष्ठा में ग्रीवाकी पूजा करके दोहदमें तिलका लड्डू प्रदान करे। श्रवण नक्षत्रमें दोनों कानोंकी पूजा करके दोहदमें दही और भात प्रदान करे। पुष्य नक्षत्रमें मुखकी पूजा करे और दोहदमें घी मिला हुआ पायस प्रदान करे॥ १८—२१॥ | | स्वातियोगे च दशना दोहदे तिलशष्कुली।<br>दातव्या केशवप्रीतै ब्राह्मणस्य च भोजनम्॥ २२ | स्वाति नक्षत्रके योगमें भगवान्‌के दाँतोंका पूजन करके तिल और शष्कुली (पूड़ी)-का दोहद दे एवं केशवको प्रसन्न करनेके लिये ब्राह्मणको भोजन कराये। |

| ३९८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ८० | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
हनू शतभिषायोगे पूजयेच्च प्रयत्नतः।<br>प्रियङ्गुरक्तशाल्यन्नं दोहदं मधुविद्विषः॥ २३<br><br>मघासु नासिका पूज्या मधु दद्याच्च दोहदे।<br>मृगोत्तमाङ्गे नयने मृगमांसं च दोहदे॥ २४<br><br>चित्रायोगे ललाटं च दोहदे चारुभोजनम्।<br>भरणीषु शिरः पूज्यं चारु भक्तं च दोहदे॥ २५शतभिषा नक्षत्रमें प्रयत्नपूर्वक भगवान्‌के ठुड्डीकी पूजा करे और विष्णुको अत्यन्त प्रिय लगनेवाला प्रियङ्गु (कँगनी) एवं लाल चावलका दोहद दे। मघामें नासिकाकी पूजा करनी चाहिये एवं दोहदमें मधु देना चाहिये। मृगशिरा नक्षत्रमें मस्तकमें स्थित दोनों नेत्रोंकी पूजा करके दोहदमें मृगके मानका फलका गूदा देना चाहिये। चित्रा नक्षत्रके योगमें ललाटकी पूजा करके दोहदमें सुन्दर भोजन देना चाहिये। भरणी नक्षत्रमें सिरकी पूजा करनी चाहिये और दोहदमें सुन्दर भात प्रदान करना चाहिये॥ २२—२५॥
सम्प्पूजनीया विद्वद्भिद्रार्द्रायोगे शिरोरुहाः।<br>विप्रांश्च भोजयेद् भक्त्या दोहदे च गुडार्द्रकम्॥ २६<br><br>नक्षत्रयोगेष्वेतेषु सम्पूज्य जगतः पतिम्।<br>पारिते दक्षिणां दद्यात् स्त्रीपुंसोश्चारुवाससी॥ २७<br><br>छत्रोपानत् श्वेतयुगं सप्तधान्यानि काञ्चनम्।<br>घृतपात्रं च मतिमान् ब्राह्मणाय निवेदयेत्॥ २८<br><br>प्रतिनक्षत्रयोगेन पूजनीया द्विजातयः।<br>नक्षत्रमय एवैष पुरुषः शाश्वतो मतः॥ २९आर्द्राके योगमें विद्वान् लोगोंको (भगवान्‌के) केशोंकी पूजा करनी चाहिये और श्रद्धापूर्वक ब्राह्मणोंको भोजन कराना तथा दोहदमें गुड़ एवं अदरखका दान करना चाहिये। इन नक्षत्रोंके योगोंमें जगत्पति (विष्णु)-की पूजा करनेके बाद पारणकर स्त्री और पुरुषके लिये दो सुन्दर वस्त्र दे। बुद्धिमान् पुरुष ब्राह्मणको सफेद छाता, एक जोड़ा जूता, सप्तधान्य, स्वर्ण एवं घीसे भरे पात्रका दान करे। प्रत्येक नक्षत्रके योगमें ब्राह्मणोंकी पूजा करनी चाहिये। यही नक्षत्रमय नित्य सनातन पुरुष माने गये हैं॥ २६—२९॥
नक्षत्रपुरुषाख्यं हि व्रतानामुत्तमं व्रतम्।<br>पूर्वं कृतं हि भृगुणा सर्वपातकनाशनम्॥ ३०<br><br>अङ्गोपाङ्गानि देवर्षे पूजयित्वा जगद्गुरोः।<br>सुरूपण्यभिजायन्ते प्रत्यङ्गाङ्गानि चैव हि॥ ३१<br><br>सप्तजन्मकृतं पापं कुलसंगागतं च यत्।<br>पितृमातृसमुत्थं च तत्सर्वं हन्ति केशवः॥ ३२<br><br>सर्वाणि भद्रण्याप्नोति शरीरारोग्यमुत्तमम्।<br>अनन्तां मनसः प्रीतिं रूपं चातीव शोभनम्॥ ३३नक्षत्र-पुरुष नामका व्रत सभी व्रतोंमें श्रेष्ठ है। प्राचीन समयमें भृगुने समस्त पापोंके विनाश करनेवाले इस व्रतको किया था। देवर्षे! भगवान्‌के अङ्गों और उपाङ्गोंकी पूजा करनेसे मनुष्यके सभी अङ्ग-प्रत्यङ्ग सुन्दर होते हैं। सात जन्मोंमें (अपने स्वयंके) किये हुए, कुलक्रमसे प्राप्त एवं माता-पिताके कारण प्राप्त पापों—सब प्रकारके पापोंको केशव पूर्णतया नष्ट कर देते हैं; और इस प्रकार भगवान्‌का पूजन करनेसे समस्त प्रकारके कल्याण प्राप्त होते हैं; शरीर उत्तम आरोग्यसे सम्पन्न होता है, मनमें अनन्त प्रसन्नता प्राप्त होती है और अत्यन्त सुन्दर रूप भी प्राप्त हो जाता है॥ ३०—३३॥
वाङ्माधुर्यं तथा कान्तिं यच्चान्यदभिवाञ्छितम्।<br>ददाति नक्षत्रपुमान् पूजितस्तु जनार्दनः॥ ३४<br><br>उपोष्या सम्यगेतेषु क्रमेणर्क्षेषु नारद।<br>अरुन्धती महाभागा ख्यातिमग्र्यां जगाम ह॥ ३५<br><br>आदित्यस्तनयार्थाय नक्षत्राङ्गं जनार्दनम्।<br>सम्पूजयित्वा गोविन्दं रेवन्तं पुत्रमाप्तवान्॥ ३६इस प्रकार पूजित होनेपर नक्षत्र-पुरुष जनार्दन भगवान् मधुर वाणी, कान्ति तथा अन्य मनोऽभिलषित पदार्थ प्रदान करते हैं। नारदजी! इन नक्षत्रोंके योगमें क्रमशः उपवासकर महाभाग्यशालिनी अरुन्धतीने उत्तम प्रसिद्धि प्राप्त की थी। आदित्यने पुत्रकी इच्छासे नक्षत्र-पुरुष जनार्दनकी अर्चनाकर रेवन्त-नामक पुत्र प्राप्त किया था।
अध्याय ८१ ]प्रह्लादकी आनुक्रमिक तीर्थयात्राका वर्णन और जलोद्भव आख्यान३९९

| रम्भा रूपमवापाग्र्यं वाङ्माधुर्यं च मेनका।<br>कान्तिं विधुरवापाग्र्यां राज्यं राजा पुरूरवाः ॥ ३७<br><br>एवं विधानतो ब्रह्मन्नक्षत्राङ्गो जनार्दनः।<br>पूजितो रूपधारी यैस्तैः प्राप्ता तु सुकामिता ॥ ३८<br><br>एतत् तवोक्तं परमं पवित्रं<br>धन्यं यशस्यं शुभरूपदायि।<br>नक्षत्रपुंसः परमं विधान<br>शृणुष्व पुण्यामिह तीर्थयात्राम् ॥ ३९ | (नक्षत्राङ्ग जनार्दनकी पूजा करके) रम्भाने श्रेष्ठ रूप, मेनकाने वाणीकी मधुरता, चन्द्रने उत्तम कान्ति तथा पुरूरवाने राज्य प्राप्त किया था। [पुलस्त्यजी कहते हैं कि] ब्रह्मन्! इस प्रकार जिसने नक्षत्राङ्ग-रूपधारी जनार्दनकी पूजा की, उसने अपने मनोरथोंकी भलीभाँति पूर्ति कर ली। मैंने आपसे भगवान् नक्षत्र-पुरुषके परम पवित्र धन देनेवाले, कीर्ति बढ़ानेवाले और सुन्दर रूपको देनेवाले व्रतके विधानका वर्णन कर दिया। अब पवित्र तीर्थयात्राका वर्णन सुनिये॥ ३४—३९॥ |

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें अस्सीवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ८०॥


इक्यासीवाँ अध्याय

प्रह्लादकी आनुक्रमिक तीर्थयात्राका वर्णन और जलोद्भवका आख्यान

| पुलस्त्य उवाच<br><br>इरावतीमनुप्राप्य पुण्यां तामृषिकन्यकाम्।<br>स्नात्वा सम्पूजयामास चैत्राष्टम्यां जनार्दनम् ॥ १<br><br>नक्षत्रपुरुषं चीर्त्वा व्रतं पुण्यप्रदं शुचिः।<br>जगाम स कुरुक्षेत्रं प्रह्लादो दानवेश्वरः ॥ २<br><br>ऐरावतेन मन्त्रेण चक्रतीर्थं सुदर्शनम्।<br>उपामन्त्र्य ततः सस्नौ वेदोक्तविधिना मुने ॥ ३<br><br>उपोष्य क्षणदां भक्त्या पूजयित्वा कुरुध्वजम्।<br>कृतशौचो जगामाथ द्रष्टुं पुरुषकेसरिम् ॥ ४<br><br>स्नात्वा तु देविकायां च नृसिंहं प्रतिपूज्य च।<br>तत्रोष्य रजनीमेकां गोकर्णं दानवो ययौ ॥ ५<br><br>तस्मिन् स्नात्वा तथा प्राचीं पूज्येशं विश्वकर्म्मिणम्।<br>प्राचीने चापरे दैत्यो द्रष्टुं कामेश्वरं ययौ ॥ ६<br><br>तत्र स्नात्वा च दृष्ट्वा च पूजयित्वा च शङ्करम्।<br>द्रष्टुं ययौ च प्रह्लादः पुण्डरीकं महाम्भसि ॥ ७ | पुलस्त्यजी बोले— (नारदजी!) प्रह्लादने परम पवित्र ऋषिकन्या उस इरावती नदीके पास जाकर स्नान किया और चैत्रमासकी अष्टमी तिथिमें जनार्दनकी पूजा की। वहाँ पवित्र पुण्यदायक नक्षत्र-पुरुषके व्रतका अनुष्ठान कर दानवेश्वर प्रह्लाद कुरुक्षेत्र चले गये। मुने! उन्होंने ऐरावत-मन्त्रसे सुदर्शनचक्र तीर्थका आवाहन करके वेद-विहित विधिसे स्नान किया। वहाँ एक रात्रि निवास कर श्रद्धासे कुरुध्वजका पूजन किया और शौचाचारसे शुद्ध होकर नृसिंहका दर्शन करनेके लिये चले गये॥ १—४॥<br><br>दानव (प्रह्लाद)-ने वहाँ देविकामें स्नान कर नृसिंहकी पूजा की और एक रात वहाँ निवासकर गोकर्ण-तीर्थ चले गये। वहाँ प्राची (पूज्य-पूजकके मध्य स्थान)-में स्नान कर पहले उन्होंने विश्वकर्मा भगवान्‌की पूजा की। उसके बाद दूसरे प्राचीन (परकोटा या चहारदीवारी)-में कामेश्वरका दर्शन करनेके लिये गये। वहाँ स्नान करनेके बाद शंकरभगवान्‌का दर्शन और पूजनकर प्रह्लाद श्रेष्ठ जलमें स्थित पुण्डरीकका दर्शन करने चले गये। |

| ४०० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ८१ | | :--- | :--- |

| तत्र स्नात्वा च दृष्ट्वा च संतर्प्य पितृदेवताः।<br>पुण्डरीकं च सम्पूज्य उवास दिवसत्रयम्॥ ८<br><br>विशाखयूपे तदनु दृष्ट्वा देवं तथाजितम्।<br>स्नात्वा तथा कृष्णतीर्थे त्रिरात्रं न्यवसच्छुचिः॥ ९ | वहाँ भी स्नानकर उन्होंने पितरोंका तर्पण और पुण्डरीकका दर्शन-पूजन किया। तीन दिनोंतक वहाँ निवास किया। उसके बाद विशाखयूपमें देव अजितका दर्शनकर उन्होंने कृष्णतीर्थमें स्नान किया और तीन रात्रितक वहाँ भी पवित्रतापूर्वक निवास किया॥ ५–९॥ | | ततो हंसपदे हंसं दृष्ट्वा सम्पूज्य चेश्वरम्।<br>जगामासौ पयोष्णायामखण्डं द्रष्टुमीश्वरम्॥ १०<br><br>स्नात्वा पयोष्ण्याः सलिले पूज्याखण्डं जगत्पतिम्।<br>द्रष्टुं जगाम मतिमान् वितस्तायां कुमारिलम्॥ ११<br><br>तत्र स्नात्वाऽर्च्य देवेशं बालखिल्यैर्मरीचिपैः।<br>आराध्यमानं यद्यत्र कृतं पापप्रणाशनम्॥ १२<br><br>यत्र सा सुरभिर्देवी स्वसुतां कपिलां शुभाम्।<br>देवप्रीत्यर्थमसृजद्धितार्थं जगतस्तथा॥ १३ | उसके बाद हंसपदमें भगवान् हंसका दर्शन एवं पूजन कर वे पयोष्णीके समीपमें अखण्डेश्वरका दर्शन करने चले गये। पयोष्णीके जलमें स्नानकर उन्होंने जगत्पति अखण्डेश्वरकी पूजा की। उसके बाद बुद्धिमान् (प्रह्लादजी) वितस्तामें कुमारिलके दर्शनार्थ चले गये। वहाँ स्नान करनेके पश्चात् (सूर्यकी) किरणोंका पान करनेवाले बालखिल्योंसे आराधित किये जा रहे पापोंको नष्ट करनेवाले देवेशका पूजन किया। जहाँ देवी सुरभिने देवकी प्रीति एवं जगत्की भलाईके लिये अपनी पुत्री कल्याणी कपिलाका त्याग किया था॥ १०–१३॥ | | तत्र देवह्रदे स्नात्वा शम्भुं सम्पूज्य भक्तितः।<br>विधिवद्दधि च प्राश्य मणिमन्तं ततो ययौ॥ १४<br><br>तत्र तीर्थवरे स्नात्वा प्राजापत्ये महामतिः।<br>ददर्श शम्भुं ब्रह्माणं देवेशं च प्रजापतिम्॥ १५<br><br>विधानतस्तु तान् देवान् पूजयित्वा तपोधन।<br>षड्रात्रं तत्र च स्थित्वा जगाम मधुनन्दिनीम्॥ १६<br><br>मधुमत्सलिले स्नात्वा दैवं चक्रधरं हरम्।<br>शूलबाहुं च गोविन्दं ददर्श दनुपुङ्गवः॥ १७ | वहाँ देवह्रदमें स्नानकर उन्होंने भक्तिपूर्वक शंभुका पूजन किया और विधिपूर्वक दही खानेके बाद मणिमन्-तीर्थमें गये। प्रजापतिके उस उत्तम तीर्थमें स्नानकर महामति (प्रह्लाद)-ने शंकर, ब्रह्मा एवं देवेश प्रजापतिका दर्शन किया। (पुलस्त्यजी कहते हैं—) तपोधन! विधिपूर्वक उन देवोंका पूजन करनेके बाद वहाँ छः रात्रियोंतक निवासकर (वे) मधुनन्दिनीमें चले गये। मधुमत्के जलमें स्नानकर दानवश्रेष्ठ (प्रह्लाद)-ने चक्रधारी शिव और शूलधारी गोविन्दका दर्शन किया॥ १४–१७॥ | | नारद उवाच<br>किमर्थं भगवान् शम्भुर्धारयाथ सुदर्शनम्।<br>शूलं तथा वासुदेवो ममैतद् ब्रूहि पृच्छतः॥ १८ | नारदजीने पूछा— मुझ प्रश्नकर्त्ताको आप (कृपया) यह बतलाइये कि भगवान् शिवने सुदर्शन और वासुदेवने शूल क्यों धारण किया था?॥ १८॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>श्रूयतां कथयिष्यामि कथामेतां पुरातनीम्।<br>कथयामास यां विष्णुर्भविष्यमनवे पुरा॥ १९ | पुलस्त्यजी बोले— (नारदजी!) सुनिये; मैं इस पुरानी कथाको कहता हूँ। पहले समयमें इसे भगवान् विष्णुने भावी मनुसे कहा था। | | जलोद्भवो नाम महासुरेन्द्रो<br>घोरं स तप्त्वा तप उग्रवीर्यः।<br>आराधयामास विरञ्चिमारात्<br>स तस्य तुष्टो वरदो बभूव॥ २० | जलोद्भव नामका एक महान् दैत्यपति था। उस शक्तिशाली दैत्यने घोर तपकर परिश्रमसे ब्रह्माकी आराधना की। संतुष्ट होकर ब्रह्माने उसे वर दिया कि | | देवासुराणामजयो महाहवे<br>निजैश्च शस्त्रैरमरैरवध्यः।<br>ब्रह्मर्षिशापैश्च निरीप्सितार्थो<br>जले च वह्नौ स्वगुणोपहर्ता॥ २१ | युद्धमें उसे देवता एवं दैत्य नहीं जीत सकेंगे। देवोंके अपने शस्त्रोंसे भी उसका वध नहीं हो सकेगा। ब्रह्मर्षि (जनों)-के शापोंका भी उसके ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा और जल एवं अग्निका भी प्रभाव नहीं होगा। |

| अध्याय ८१ ] | प्रह्लादकी आनुक्रमिक तीर्थयात्राका वर्णन और जलोद्भव आख्यान | ४०१ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एवम्प्रभावो दनुपुङ्गवोऽसौ<br>देवान् महर्षीन् नृपतीन् समग्रान्।<br>आबाधमानो विचचार भूम्यां<br>सर्वाः क्रिया नाशयदुग्रमूर्तिः॥ २२इस प्रकारका प्रभावशाली वह दनुश्रेष्ठ सभी देवताओं, महर्षियों और राजाओंको कष्ट पहुँचाता हुआ पृथ्वीपर विचरण करने लगा। (फिर तो) उस क्रूरने समस्त कर्मोंका विनाश कर दिया॥ १९—२२॥
ततोऽमरा भूमिभवाः सभूपाः<br>जग्मुः शरण्यं हरिमीशितारम्।<br>तैश्चापि सार्द्धं भगवाञ्जगाम<br>हिमालयं यत्र हरस्त्रिनेत्रः॥ २३<br>सम्मन्त्र्य देवर्षिहितं च कार्यं<br>मतिं च कृत्वा निधनाय शत्रोः।<br>निजायुधानां च विपर्ययं तौ<br>देवाधिपौ चक्रतुरुग्रकर्म्मिणौ॥ २४<br>ततश्चासौ दानवो विष्णुशर्वौ<br>समायातौ तज्जिघांसू सुरेशौ।<br>मत्वाऽजेयौ शत्रुभिर्घोररूपौ<br>भयात्तोये निम्नगायां विवेश॥ २५<br>ज्ञात्वा प्रनष्टं त्रिदिवेन्द्रशत्रुं<br>नदीं विशालां मधुमत्सुपुण्याम्।<br>द्वयोः सशस्रौ तटयोर्हरीशौ<br>प्रच्छन्नमूर्ती सहसा बभूवतुः॥ २६उसके बाद पृथ्वीपर आविर्भूत हुए देवगण राजाओंके साथ शरण देनेवाले एवं (सबके) नियामक विष्णुकी शरणमें गये। भगवान् भी उन सभीके साथ हिमालयपर गये, जहाँ त्रिनेत्र हर अवस्थित थे। देवता और ऋषियोंके कल्याणकारी कार्यकी मन्त्रणा करनेके बाद शत्रुको मारनेका निश्चय कर उन दोनों उग्रकर्मी देवाधिपोंने अपने आयुधोंका परिवर्तन कर लिया। फिर मारनेकी इच्छासे आ रहे देवाधिप शंकर एवं विष्णुको देखकर और उन भयंकर मूर्तिधारियोंको शत्रुओंसे अजेय जानकर वह दानव भयसे नदीके जलमें पैठ गया। देवशत्रुको पुण्यशालिनी मधुमती विशाला नदीमें उसे छिपा हुआ जानकर शस्त्रसहित शंकर और विष्णु सहसा नदीके दोनों तटोंपर छिप गये॥ २३—२६॥
जलोद्भवश्चापि जलं विमुच्य<br>ज्ञात्वा गतौ शङ्करवासुदेवौ।<br>दिशस्समीक्ष्य भयकातराक्षो<br>दुर्गं हिमाद्रिं च तदारुरोह॥ २७शंकर और वासुदेवको गया हुआ जानकर जलोद्भव भी जलसे बाहर निकला तथा भयसे चञ्चल नेत्रोंसे दिशाओंमें (इधर-उधर) देखकर दुर्गम हिमालय पर्वतपर चढ़ गया।
महीध्रशृङ्गोपरि विष्णुशम्भू<br>चञ्चूर्यमाणं स्वरिपुं च दृष्ट्वा।<br>वेगादुभौ दुद्रुवतुः सशस्रौ<br>विष्णुस्त्रिशूली गिरिशश्च चक्री॥ २८पर्वतकी चोटीपर अपने शत्रुको विचरण करते हुए देखकर त्रिशूलधारी विष्णु एवं चक्रधारी शिव शस्त्र लिये हुए तुरंत दौड़ पड़े।
ताभ्यां स दृष्टस्त्रिदशोत्तमभ्यां<br>चक्रेण शूलेन च भिन्नदेहः।<br>पपात शैलात् तपनीयवर्णो<br>यथाऽन्तरिक्षाद् विमला च तारा॥ २९उन सुरोत्तमोंने उसे देखकर चक्र और शूलसे उसके शरीरका भेदन कर दिया। वह सुवर्णके समान कान्तिवाला अन्तरिक्षसे गिरनेवाले विमल तारेके समान पर्वतसे गिर पड़ा।
एवं त्रिशूलं च दधार विष्णु-<br>श्चक्रं त्रिनेत्रोऽप्यरिसूदनार्थम्।<br>यत्राघहन्त्री ह्यभवद् वितस्ता<br>हराङ्घ्रिपाताच्छिशिराचलात्तु ॥ ३०इस प्रकार शत्रुके विनाशके लिये विष्णुने त्रिशूल तथा शंकरने चक्र धारण किया था। जहाँ शंकरका चरण गिरा था, उस हिमालय पर्वतसे पापविनाशिनी वितस्ता उत्पन्न हुई।
तत्प्राप्य तीर्थं त्रिदशाधिपाभ्यां<br>पूजां च कृत्वा हरिशङ्कराभ्याम्।<br>उपोष्य भक्त्या हिमवन्तमागाद्<br>द्रष्टुं गिरीशं शिवविष्णुगुप्तम्॥ ३१उस तीर्थमें पहुँचकर प्रह्लादने उन विष्णु एवं शंकर—इन दोनों देवोंकी अर्चा की तथा भक्तिसे वहाँ निवास कर वे शिव एवं विष्णुसे रक्षित गिरिराज हिमालयका दर्शन करने चले गये।
४०२श्रीवामनपुराण[ अध्याय ८२
तं समभ्यर्च्य विधिवद् दत्त्वा दानं द्विजातिषु।<br>विस्तृते हिमवत्पादे भृगुतुङ्गं जगाम सः॥ ३२<br><br>यत्रेश्वरो देववरस्य विष्णोः<br>प्रादाद्रथाङ्गप्रवरायुधं वै।<br>येन प्रचिच्छेद त्रिधैव शङ्करं<br>जिज्ञासमानोऽस्त्रबलं महात्मा॥ ३३प्रह्लाद वहाँ विधिके अनुसार उसकी पूजा करनेके बाद ब्राह्मणोंको दान देकर हिमालयके विस्तृत चरणमें (उपत्यकामें विद्यमान) भृगुतुङ्गतीर्थमें गये। वहाँ भगवान् शंभुने देवश्रेष्ठ विष्णुको श्रेष्ठ अस्त्र दिया था। उस अस्त्र-चक्रके बलको जाननेकी इच्छासे उन महात्माने उससे शंकरको तीन टुकड़ोंमें काट दिया था॥ २७—३३॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें इक्यासीवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ८१॥


बयासीवाँ अध्याय

चक्रदानके कथा-प्रसङ्गमें उपमन्यु तथा श्रीदामाका वृत्तान्त, शिवद्वारा विष्णुको चक्र देना, हरका विरूपाक्ष हो जाना और श्रीदाम-वध

नारद उवाच
नारद उवाच<br>भगवँल्लोकनाथाय विष्णवे विषमेक्षणः।<br>किमर्थमायुधं चक्रं दत्तवाँल्लोकपूजितम्॥ १नारदजीने पूछा— भगवन्! तीन नेत्रोंवाले शंकरने जगत्पति विष्णुको समस्त लोकोंमें पूजित चक्र नामका आयुध क्यों दिया था?॥ १॥
पुलस्त्य उवाच<br>शृणुष्वावहितो भूत्वा कथामेतां पुरातनीम्।<br>चक्रप्रदानसम्बद्धां शिवमाहात्म्यवर्धिनीम्॥ २<br><br>आसीद् द्विजातिप्रवरो वेदवेदाङ्गपारगः।<br>गृहाश्रमी महाभागो वीतमन्युरिति स्मृतः॥ ३<br><br>तस्यात्रेयी महाभागा भार्यासीच्छीलसम्मता।<br>पतिव्रता पतिप्राणा धर्मशीलेति विश्रुता॥ ४<br><br>तस्यामस्य महर्षेस्तु ऋतुकालाभिगामिनः।<br>सम्बभूव सुतः श्रीमान् उपमन्युरिति स्मृतः॥ ५पुलस्त्यजी बोले— (नारदजी!) आप चक्रके प्रदान करनेसे सम्बद्ध और शिवकी महिमाको बढ़ानेवाली इस प्राचीन कथाको सावधान होकर सुनिये—वेद-वेदाङ्ग-पारङ्गत, गृहस्थ और महाभाग्यशाली वीतमन्यु नामके एक श्रेष्ठ ब्राह्मण थे। उनकी महाभाग्यशालिनी, शीलसे सम्पन्न, पतिव्रता एवं पतिमें ही अपने प्राणोंको निहित किये रहनेवाली आत्रेयी नामकी पत्नी थी। वह धर्मशीला नामसे प्रसिद्ध थी। ऋतुकालमें ही उसके साथ समागम करनेवाले उन महर्षिके उससे उपमन्यु नामका एक सुन्दर पुत्र उत्पन्न हुआ॥ २—५॥
तं माता मुनिशार्दूल शालिपिष्टरसेन वै।<br>पोषयामास वदती क्षीरमेतत् सुदुर्गता॥ ६मुनिश्रेष्ठ! अत्यन्त दरिद्रतासे जर्जर हुई उसकी माता पिसे हुए चावलके जलको यह दूध है—ऐसा कहकर उससे उस (पुत्र)-का पालन करती थी।

अध्याय ८२] चक्रदानके कथा-प्रसङ्गमें उपमन्यु तथा श्रीदामाका वृत्तान्त, शिवद्वारा विष्णुको चक्र देना ४०३

संस्कृतहिन्दी
सोऽजानानोऽथ क्षीरस्य स्वादुतां पय इत्यथ।<br>सम्भावनामप्यकरोच्छालिपिष्टरसेऽपि हि॥ ७<br><br>स त्वेकदा समं पित्रा कुत्रचिद् द्विजवेश्मनि।<br>क्षीरौदनं च बुभुजे सुस्वादु प्राणपुष्टिदम्॥ ८<br><br>स लब्ध्वानुपमं स्वादं क्षीरस्य ऋषिदारकः।<br>मात्रा दत्तं द्वितीयेऽह्नि नादत्ते पिष्टवारि तत्॥ ९दूधके स्वादसे अपरिचित होनेके कारण वह पिसे चावलके रस (जल)-में ही दूधकी संभावना करता था। एक दिन उसने अपने पिताके साथ किसी ब्राह्मणके घर प्राणको स्वस्थ बनानेवाली मधुर खीरका भोजन किया। ऋषिके उस पुत्रने दूधके अद्भुत स्वादको पाकर दूसरे दिन माताके द्वारा दिये गये पिसे हुए चावलके उस रसको ग्रहण नहीं किया॥ ६—९॥
रुरोदाथ ततो बाल्यात् पयोऽर्थी चातको यथा।<br>तं माता रुदती प्राह बाष्पगद्गदया गिरा॥ १०<br><br>उमापतौ पशुपतौ शूलधारिणि शङ्करे।<br>अप्रसन्ने विरूपाक्षे कुतः क्षीरेण भोजनम्॥ ११<br><br>यदीच्छसि पयो भोक्तुं सद्यः पुष्टिकंर सुत।<br>तदाराधय देवेशं विरूपाक्षं त्रिशूलिनम्॥ १२<br><br>तस्मिंस्तुष्टे जगद्धात्रि सर्वकल्याणदायिनि।<br>प्राप्यतेऽमृतपायित्वं किं पुनः क्षीरभोजनम्॥ १३उसके बाद दूध चाहनेवाला वह बालक बचपनके कारण प्यासे चातककी भाँति रोने लगा। रोती हुई माताने आँखोंमें आँसू भरे गद्गद वाणीमें उससे कहा—शूल धारण करनेवाले पार्वतीपति पशुपति विरूपाक्ष शंकरके असंतुष्ट रहते दूधसे मिला भोजन कहाँसे प्राप्त हो सकता है? पुत्र! यदि तुम तत्काल स्वास्थ्यकर दूध पीना चाहते हो तो त्रिशूल धारण करनेवाले विरूपाक्ष महादेवकी सेवा करो। संसारके आधार, सभी प्रकारसे कल्याण करनेवाले उन शंकरके संतुष्ट होनेपर अमृत पीनेको मिल सकता है, दूध पीनेकी तो बात ही क्या है॥ १०—१३॥
तन्मातुर्वचनं श्रुत्वा वीतमन्युसुतोऽब्रवीत्।<br>कोऽयं विरूपाक्ष इति त्वयाराध्यस्तु कीर्तितः॥ १४<br><br>ततः सुतं धर्मशीला धर्माढ्यं वाक्यमब्रवीत्।<br>योऽयं विरूपाक्ष इति श्रूयतां कथयामि ते॥ १५<br><br>आसीन्महासुरपतिः श्रीदाम इति विश्रुतः।<br>तेनाक्रम्य जगत्सर्वं श्रीर्नीता स्ववशं पुरा॥ १६<br><br>निःश्रीकास्तु त्रयो लोकाः कृतास्तेन दुरात्मना।<br>श्रीवत्सं वासुदेवस्य हर्तुमैच्छन्महाबलः॥ १७माताके उस वचनको सुनकर वीतमन्युके पुत्रने कहा—आप जिनकी सेवा-पूजा करनेको कहती हैं, वे विरूपाक्ष कौन हैं? उसके बाद धर्मशीलने पुत्रसे धर्मसे युक्त वचन कहा—(बेटा!) सुनो, मैं तुम्हें बतलाती हूँ कि ये विरूपाक्ष कौन हैं? प्राचीन कालमें श्रीदामा नामसे विख्यात एक महान् असुरोंका राजा था। उसने सारे संसारको अपने अधीन करके लक्ष्मीको अपने वशमें कर लिया। (सारे विश्वपर अपना अधिकार जमा लिया।) (फिर तो) उस दुष्टात्माने तीनों लोकोंको ही श्रीसे रहित कर दिया। उसके बाद उस महाबलशाली असुरने वासुदेवके श्रीवत्सको छीन लेनेकी कामना की॥ १४—१७॥
तमस्य दुष्टं भगवानभिप्रायं जनार्दनः।<br>ज्ञात्वा तस्य वधाकाङ्क्षी महेश्वरमुपागमत्॥ १८<br><br>एतस्मिन्नन्तरे शम्भुर्योंगमूर्तिधरोऽव्ययः।<br>तस्थौ हिमाचलप्रस्थमाश्रित्य श्लक्ष्णभूतलम्॥ १९<br><br>अथाभ्येत्य जगन्नाथं सहस्रशिरसं विभुम्।<br>आराधयामास हरिः स्वयमात्मानमात्मना॥ २०उसकी उस दूषित इच्छाको जानकर भगवान् जनार्दन उसके मारनेकी इच्छासे महेश्वरके पास गये। उस समय योगमूर्तिके धारण करनेवाले अविनाशी शंकर हिमालयकी ऊँची चोटीके चिकने भूतलपर स्थित थे। उसके बाद सहस्रशीर्षा सर्वसमर्थ जगन्नाथजीके पास जाकर विष्णुने अपने द्वारा स्वयं अपनी ही अर्चना की।
४०४श्रीवामनपुराण[ अध्याय ८२

| साग्रं वर्षसहस्रं तु पादाङ्गुष्ठेन तस्थिवान्।<br>गृणंस्तत्परमं ब्रह्म योगिज्ञेयमलक्षणम्॥ २१<br><br>ततः प्रीतः प्रभुः प्रादाद् विष्णवे परमं वरम्।<br>प्रत्यक्षं तेजसं श्रीमान् दिव्यं चक्रं सुदर्शनम्॥ २२<br>तद् दत्त्वा देवदेवाय सर्वभूतभयप्रदम्।<br>कालचक्रनिभं चक्रं शङ्करो विष्णुमब्रवीत्॥ २३<br>वरायुधोऽयं देवेश सर्वायुधनिबर्हणः।<br>सुदर्शनो द्वादशारः षण्णाभिर्द्वियुगो जवी॥ २४<br>आरासंस्थास्त्वमी चास्य देवा मासाश्च राशयः।<br>शिष्टानां रक्षणार्थाय संस्थिता ऋतवश्च षट्॥ २५<br>अग्निः सोमस्तथा मित्रो वरुणोऽथ शचीपतिः।<br>इन्द्राग्नी चाप्यथो विश्वे प्रजापतय एव च॥ २६<br>हनूमांश्चाथ बलवान् देवो धन्वन्तरिस्तथा।<br>तपश्चैव तपस्यश्च द्वादशैते प्रतिष्ठिताः।<br>चैत्राद्याः फाल्गुनान्ताश्च मासास्तत्र प्रतिष्ठिताः॥ २७ | योगियोंद्वारा जाननेयोग्य उस अव्यक्त परम ब्रह्मका जप करते हुए वे एक हजार वर्षसे अधिक समयतक पैरके अँगूठेपर खड़े रहे॥ १८—२१॥<br><br>उसके बाद श्रीमान् महादेवने संतुष्ट होकर विष्णुको परमश्रेष्ठ प्रत्यक्ष तेजसे युक्त दिव्य सुदर्शनचक्र प्रदान किया। सभी प्राणियोंके लिये भयदायक कालचक्रके समान वह चक्र देवाधिदेव विष्णुको देकर शंकरने उनसे कहा—देवेश! बारह अरों, छः नाभियों एवं दो युगोंसे युक्त तीव्रगतिशील और समस्त आयुधोंका नाश करनेवाला सुदर्शन नामका यह श्रेष्ठ आयुध है। सज्जनोंकी रक्षा करनेके लिये इसके अरोंमें देवता, मास, राशियाँ, छः ऋतुएँ, अग्नि, सोम, मित्र, वरुण, शचीपति इन्द्र, अग्नि, विश्वेदेव, प्रजापति, बलवान् हनूमान्, धन्वन्तरि देव, तप एवं तपस्या—ये तथा चैत्रसे लेकर फाल्गुनतकके बारह महीने प्रतिष्ठित हैं॥ २२—२७॥ | | त्वमेवमाधाय विभो वरायुधं<br>शत्रुं सुराणां जहि मा विशङ्किथाः।<br>अमोघ एषोऽमरराजपूजितो<br>धृतो मया नेत्रगतस्तपोबलात्॥ २८<br>इत्युक्तः शम्भुना विष्णुः भवं वचनमब्रवीत्।<br>कथं शम्भो विजानीयाममोघो मोघ एव वा॥ २९<br>यद्यमोघो विभो चक्रः सर्वत्राप्रतिघस्तव।<br>जिज्ञासार्थं तवैवेह प्रक्षेप्स्यामि प्रतीच्छ भोः॥ ३०<br>तद्वाक्यं वासुदेवस्य निशम्यैवाह पिनाकधृक्।<br>यद्येवं प्रक्षिपस्वेति निर्विशङ्केन चेतसा॥ ३१ | विभो! आप इस श्रेष्ठ आयुधको ले करके निर्भीक होकर देवोंके शत्रुको संहार करें। मैंने असुर-राजसे आराधित इस अमोघ आयुधको तपके बलसे अपने नेत्रमें स्थित कर लिया था। शम्भुके इस प्रकार कहनेपर विष्णुने शंकरसे यह वचन कहा—शम्भो! मुझे यह कैसे मालूम होगा कि यह अस्त्र अमोघ या मोघ है? विभो! यदि आपका यह चक्र अमोघ तथा सर्वत्र बिना किसी बाधाके निरन्तर गतिशील है तो इसको जाननेके लिये मैं आपके ही ऊपर इसे चलाता हूँ। आप इसे स्वीकार करें। वासुदेवके उस वचनको सुनकर पिनाकधारीने कहा—यदि ऐसा है तो निश्चिन्त होकर मेरे ऊपर इसे चलाइये॥ २८—३१॥ | | तन्महेशानवचनं श्रुत्वा विष्णुः सुदर्शनम्।<br>मुमोच तेजो जिज्ञासुः शङ्करम्प्रति वेगवान्॥ ३२<br>मुरारिकरविभ्रष्टं चक्रमभ्येत्य शूलिनम्।<br>त्रिधा चकार विश्वेशं यज्ञेशं यज्ञयाजकम्॥ ३३<br>हरं हरिस्त्रिधाभूतं दृष्ट्वा कृत्तं महाभुजः।<br>व्रीडोपप्लुतदेहस्तु प्रणिपातपरोऽभवत्॥ ३४<br>पादप्रणामावनतं वीक्ष्य दामोदरं भवः।<br>प्राह प्रीतिपरः श्रीमानुत्तिष्ठेति पुनः पुनः॥ ३५ | महेशके उस वचनको सुनकर विष्णुने सुदर्शनके तेजको जाननेकी अभिलाषासे उसे वेगसे शंकरके ऊपर चलाया। विष्णुके हाथसे छोड़ा गया वह चक्र शंकरके निकट गया और उन्हें काटकर विश्वेश, यज्ञेश तथा यज्ञयाजकके रूपमें तीन भागोंमें अलग कर दिया। शंकरको तीन खण्डोंमें कटा हुआ देखकर महाबाहु विष्णु संकुचित हो गये। वे (शंकरको) प्रणाम करने लगे। चरणोंमें प्रणत हुए दामोदरको देखकर श्रीमान् भव (शंकर)-ने प्रसन्नतापूर्वक बार-बार 'उठो-उठो' कहते हुए (यह) कहा—॥ ३२—३५॥ |

अध्याय ८२] चक्रदानके कथा-प्रसङ्गमें उपमन्यु तथा श्रीदामाका वृत्तान्त, शिवद्वारा विष्णुको चक्र देना ४०५

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
प्राकृतोऽयं महाबाहो विकारश्चक्रनेमिना।<br>निकृत्तो न स्वभावो मे सोऽच्छेद्योऽदाह्य एव च॥ ३६॥<br><br>तद्यदेतानि चक्रेण त्रीणि भागानि केशव।<br>कृतानि तानि पुण्यानि भविष्यन्ति न संशयः॥ ३७॥<br><br>हिरण्याक्षः स्मृतो ह्येकः सुवर्णाक्षस्तथा परः।<br>तृतीयश्च विरूपाक्षस्त्रयोऽमी पुण्यदा नृणाम्॥ ३८॥<br><br>उत्तिष्ठ गच्छस्व विभो निहन्तुममरादनम्।<br>श्रीदाम्नि निहते विष्णो नन्दयिष्यन्ति देवताः॥ ३९॥<br><br>इत्येवमुक्तो भगवान् हरेण गरुडध्वजः।<br>गत्वा सुरगिरिप्रस्थं श्रीदामानं ददर्श ह॥ ४०॥<br><br>तं दृष्ट्वा देवदर्पघ्नं दैत्यं देववरो हरिः।<br>मुमोच चक्रं वेगाढ्यं हतोऽसीति ब्रुवन्मुहुः॥ ४१॥महाबाहो! चक्रकी नेमिद्वारा मेरा यह प्राकृत विकार ही काटा गया है। इसके द्वारा मेरा स्वभाव नहीं क्षत हुआ है। वह तो अच्छेद्य एवं अदाह्य है। केशव! चक्रद्वारा किये गये ये तीनों अंश निस्सन्देह पुण्य प्रदान करनेवाले होंगे। एक अंश हिरण्याक्ष नामधारी, दूसरा सुवर्णाक्ष नामधारी और तीसरा विरूपाक्ष नामका होगा। ये तीनों अंश मनुष्योंके लिये पुण्यप्रदाता होंगे। विभो! उठिये और देव-शत्रुका वध करनेके लिये जाइये। विष्णो! श्रीदामाके वध किये जानेपर देवता प्रसन्न होंगे। शंकरके इस प्रकार कहनेपर भगवान् गरुडध्वजने पर्वतकी ऊँची चोटीपर जाकर श्रीदामाको देखा। देवताओंके दर्पका विनाश करनेवाले उस दैत्यको देखकर देव-श्रेष्ठ विष्णुने बार-बार (यह लो) 'तुम मारे गये' ऐसा कहते हुए तीव्र गतिसे चक्र चलाया॥ ३६—४१॥
ततस्तु तेनाप्रतिपौरुषेण<br>चक्रेण दैत्यस्य शिरो निकृत्तम्।<br>संछिन्नशीर्षो निपपात शैलाद्<br>वज्राहतं शैलशिरो यथैव॥ ४२॥<br><br>तस्मिन् हते देवरिपौ मुरारि-<br>रीशं समाराध्य विरूपनेत्रम्।<br>लब्ध्वा च चक्रं प्रवरं महायुधं<br>जगाम देवो निलयं पयोनिधिम्॥ ४३॥<br><br>सोऽयं पुत्र विरूपाक्षो देवदेवो महेश्वरः।<br>तमाराधय चेत् साधो क्षीरेणेच्छसि भोजनम्॥ ४४॥<br><br>तन्मातुर्वचनं श्रुत्वा वीतमन्युसुतो बली।<br>तमाराध्य विरूपाक्षं प्राप्तः क्षीरेण भोजनम्॥ ४५॥<br><br>एवं तवोक्तं परमं पवित्रं<br>संछेदनं शर्वतनोः पुरा वै।<br>तत्तीर्थवर्यं स महासुरो वै<br>समाससादाथ सुपुण्यहेतोः॥ ४६॥फिर तो अनुपम पौरुषवाले उस चक्रने दैत्यका मस्तक काट डाला। मस्तक कट जानेपर दैत्य पर्वतके ऊपरसे इस प्रकार गिरा जैसे वज्रसे आहत होकर पर्वतकी ऊँची चोटी गिरती है। उस देव-शत्रुके मारे जानेपर मुरारिने विरूपाक्ष शंकरकी आराधना की और चक्ररूपी श्रेष्ठ महायुध लेकर वे देव क्षीरसागरमें स्थित अपने गृहको चले गये। [वीतमन्युकी धर्मशीला पत्नी आत्रेयी कहती हैं—] पुत्र! ये वही देव-देव महेश्वर विरूपाक्ष हैं। साधो! यदि तुम दूधके साथ भोजन करना चाहते हो तो उनकी सेवा-पूजा करो। माताके उस वचनको सुनकर वीतमन्युके बलवान् पुत्रने उन विरूपाक्ष शंकरकी आराधनाकर दुग्धसे युक्त भोजन प्राप्त किया। [पुलस्त्यजी कहते हैं—] इस प्रकार प्राचीन कालमें घटित हुई शंकरके शरीर-छेदनसे सम्बद्ध परम पवित्र कथाको मैंने तुमसे कहा। उसी श्रेष्ठ तीर्थमें वे महान् असुर प्रह्लाद सुन्दर पुण्य-प्राप्तिके लिये गये॥ ४२—४६॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें बयासीवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ८२ ॥

४०६श्रीवामनपुराण[ अध्याय ८३ ]
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तिरासीवाँ अध्याय

प्रह्लादकी अनुक्रमागत तीर्थ-यात्रामें अनेक तीर्थोंका महत्त्व

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पुलस्त्य उवाचपुलस्त्यजी बोले—
तस्मिंस्तीर्थवरे स्नात्वा दृष्ट्वा देवं त्रिलोचनम्।<br>पूजयित्वा सुवर्णाक्षं नैमिषं प्रययौ ततः॥ १<br>तत्र तीर्थसहस्राणि त्रिंशत्पापहराणि च।<br>गोमत्याः काञ्चनाक्ष्याश्च गुरुदायाश्च मध्यतः॥ २<br>तेषु स्नात्वार्च्य देवेशं पीतवाससमच्युतम्।<br>ऋषीनपि च सम्पूज्य नैमिषारण्यवासिनः॥ ३<br>देवदेवं तथेशानं सम्पूज्य विधिना ततः।<br>गयायां गोपतिं द्रष्टुं जगाम स महासुरः॥ ४प्रह्लादने उस उत्तम तीर्थमें स्नान कर त्रिनयन महादेवका दर्शन किया और सुवर्णाक्षकी पूजाकर वे नैमिषारण्य चले गये। वहाँ गोमती, काञ्चनाक्षी और गुरुदाके मध्यमें पाप-नाश करनेवाले तीस हजार तीर्थ हैं। उनमें स्नानकर उन्होंने पीताम्बर धारण करनेवाले देवेश्वर अच्युतकी पूजा की। नैमिषारण्यमें रहनेवाले ऋषियोंकी पूजा करनेके पश्चात् देवाधिदेव महेशका विधिपूर्वक पूजन कर वे महासुर गोपतिका दर्शन करनेके लिये गयातीर्थमें चले गये॥ १–४॥
तत्र ब्रह्मध्वजे स्नात्वा कृत्वा चास्य प्रदक्षिणाम्।<br>पिण्डनिर्वपणं पुण्यं पितॄणां स चकार ह॥ ५<br>उदपाने तथा स्नात्वा तत्राभ्यर्च्य पितॄन् वशी।<br>गदापाणिं समभ्यर्च्य गोपतिं चापि शङ्करम्॥ ६<br>इन्द्रतीर्थे तथा स्नात्वा संतर्प्य पितृदेवताः।<br>महानदीजले स्नात्वा सरयूमाजगाम सः॥ ७<br>तस्यां स्नात्वा समभ्यर्च्य गोप्रतारे कुशेशयम्।<br>उपोष्य रजनीमेकां विरजां नगरीं ययौ॥ ८वहाँ ब्रह्मध्वजमें स्नान और उसकी प्रदक्षिणा कर उन्होंने पितरोंके निमित्त पवित्र पिण्डदान किया। (फिर) उदपानमें स्नानकर जितेन्द्रिय (प्रह्लाद)-ने पितरों, गदापाणि (विष्णु) एवं गोपति शंकरकी पूजा की। इन्द्रतीर्थमें (भी) स्नानकर उन्होंने पितरों एवं देवोंका तर्पण किया तथा महानदीके जलमें स्नानकर वे सरयूके समीप पहुँचे। उसमें स्नानकर उन्होंने गोप्रतारमें कुशेशयकी पूजा की एवं वहाँ एक रात्रि निवास कर वे विरजा नगरीमें गये॥ ५–८॥
स्नात्वा विरजसे तीर्थे दत्त्वा पिण्डं पितॄंस्तथा।<br>दर्शनार्थं ययौ श्रीमानजितं पुरुषोत्तमम्॥ ९<br>तं दृष्ट्वा पुण्डरीकाक्षमक्षरं परमं शुचिः।<br>षड्रात्रमुष्य तत्रैव महेन्द्रं दक्षिणं ययौ॥ १०<br>तत्र देववरं शम्भुमर्द्धनारीश्वरं हरम्।<br>दृष्ट्वार्च्य सम्पूज्य पितॄन् महेन्द्रं चोत्तरं गतः॥ ११<br>तत्र देववरं शम्भुं गोपालं सोमपायिनम्।<br>दृष्ट्वा स्नात्वा सोमतीर्थे सह्याचलमुपागतः॥ १२विरजातीर्थमें स्नान करनेके बाद पितरोंको पिण्डदान कर वे श्रीमान् पुरुषोत्तम अजितका दर्शन करने चले गये। वे निष्पाप प्रह्लाद अविनाशी पुण्डरीकाक्षका दर्शन करनेके पश्चात् छः रातोंतक वहाँ निवासकर दक्षिण दिशामें स्थित महेन्द्रपर्वतपर चले गये। (वे) वहाँ देवश्रेष्ठ अर्धनारीश्वर महादेवका दर्शन तथा पूजनकर पितरोंकी अर्चना करके उत्तर दिशाकी ओर चले गये। वहाँ देववर शम्भु और सोमपायी गोपालका दर्शन करनेके पश्चात् सोमतीर्थमें स्नानकर वे सह्याचलपर गये॥ ९–१२॥
तत्र स्नात्वा महोदक्यां वैकुण्ठं चार्च्य भक्तितः।<br>सुरान् पितॄन् समभ्यर्च्य पारियात्रं गिरि गतः॥ १३वहाँ महोदकीमें स्नान करनेके बाद श्रद्धापूर्वक विष्णु, देवताओं एवं पितरोंका पूजन कर वे पारियात्रपर्वतपर चले गये।
तत्र स्नात्वा लाङ्गुलिन्यां पूजयित्वाऽपराजितम्।<br>कशेरुदेशं चाभ्येत्य विश्वरूपं ददर्श सः॥ १४वहाँ लाङ्गलिनीमें स्नान करनेके बाद उन्होंने अपराजितका पूजन किया और कशेरुदेशमें जाकर विश्वरूपका दर्शन किया।