वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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३१२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७१
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| भाग्यक्षयेऽर्थाः क्षीयन्ते भवन्त्यभ्युदये पुनः।<br>क्षीणस्यास्य शरीरस्य चिन्तया नोदयो भवेत्॥ २८<br><br>इत्युच्चार्य समाहूय स्वान् भृत्यान् वाक्यमब्रवीत्।<br>अद्यातिथिरयं पूज्यः सदैव स्वजनो मम॥ २९<br><br>अस्मिन् दृष्टे वणिक्पुत्रे यथा स्वजनदर्शनम्।<br>अस्मिन् समागते प्रेताः प्रीतिर्जाता ममातुला॥ ३०<br><br>एवं हि वदतस्तस्य मृत्पात्रं सुदृढं नवम्।<br>दध्योदनेन सम्पूर्णमाजगाम यथेप्सितम्॥ ३१<br><br>तथा नवा च सुदृढा सम्पूर्णा परमाम्भसा।<br>वारिधानी च सम्प्राप्ता प्रेतानामग्रतः स्थिता॥ ३२ | (देखो,) भाग्यके क्षय होनेपर धनोंका क्षय हो जाता है और फिर भाग्योदय हो जानेपर पुनः धन प्राप्त हो जाते हैं। चिन्तासे क्षीण हुए शरीरका उत्थान (वृद्धि) नहीं होता। ऐसा कहकर उसने अपने सेवकोंको बुलाया और उनसे कहा—मेरे अपने जनके समान इस अतिथिका सब प्रकारसे सत्कार करो। प्रेतो! स्वजनदर्शनके समान ही मुझे इस वणिक्पुत्रका दर्शन हुआ है। इसके मिलनेसे मुझे अत्यधिक प्रीति प्राप्त हुई है। उसके ऐसा कहनेपर इच्छाभर (भोजन-योग्य) दही और भातसे भरा अत्यन्त दृढ़ एक नया मिट्टीका पात्र आ गया। इसी प्रकार निर्मल शीतल जलसे भरा एक पानीका पात्र भी उन प्रेतोंके सामने उपस्थित हो गया॥ २८—३२॥ |
| तमागतं ससलिलमन्नं वीक्ष्य महामतिः।<br>प्राहोत्तिष्ठ वणिक्पुत्र त्वमाह्निकमुपाचर॥ ३३<br><br>ततस्तु वारिधान्यास्तौ सलिलेन विधानतः।<br>कृताह्निकावुभौ जातौ वणिक् प्रेतपतिस्तथा॥ ३४<br><br>ततो वणिक्सुतायादौ दध्योदनमथेच्छया।<br>दत्त्वा तेभ्यश्च सर्वेभ्यः प्रेतेभ्यो व्यददात् ततः॥ ३५<br><br>भुक्तवत्सु च सर्वेषु कामतोऽम्भसि सेविते।<br>अनन्तरं स बुभुजे प्रेतपालो वराशनम्॥ ३६ | उस अन्न एवं जलको प्रस्तुत हुए देखकर महामति प्रेतने कहा—वणिक्पुत्र! तुम उठो एवं दैनिक (नित्य) कृत्य करो। उसके बाद वणिक् एवं प्रेतपति—दोनोंने घड़ेके जलसे विधिपूर्वक नित्य-क्रिया सम्पन्न की। उसके बाद (प्रेतपतिने) पहले वणिक्पुत्रको पर्याप्त दही और भात दिया और तब उन प्रेतोंको दिया। सभीके इच्छाभर भोजन एवं जलपान करनेके बाद प्रेतनायकने उत्तम भोजन किया॥ ३३—३६॥ |
| प्रकामवृप्ते प्रेते च वारिधान्योदनं तथा।<br>अन्तर्धानमगाद् ब्रह्मन् वणिक्पुत्रस्य पश्यतः॥ ३७<br><br>ततस्तदद्भुततमं दृष्ट्वा स मतिमान् वणिक्।<br>पप्रच्छ तं प्रेतपालं कौतूहलमना वशी॥ ३८<br><br>अरण्ये निर्जने साधो कुतोऽन्नस्य समुद्भवः।<br>कुतश्च वारिधानीयं सम्पूर्णा परमाम्भसा॥ ३९<br><br>तथामी तव ये भृत्यास्त्वत्तस्ते वर्णतः कृशाः।<br>भवानपि च तेजस्वी किंचित्पुष्टवपुः शुभः॥ ४०<br><br>शुक्लवस्त्रपरीधानो बहूनां परिपालकः।<br>सर्वमेतन्ममाचक्ष्व को भवान् का शमी त्वियम्॥ ४१ | (पुलस्त्यजी कहते हैं कि) ब्रह्मन्! प्रेतके भलीभाँति तृप्त हो जानेपर वणिक्पुत्रके देखते-ही-देखते जलपात्र और ओदन आँखोंसे ओझल हो गये। तब उस अत्यन्त ही आश्चर्यजनक दृश्यको देखकर उस बुद्धिमान् संयमी वणिक्ने उत्सुकतापूर्वक उस प्रेतपतिसे पूछा—साधो! इस निर्जन वनमें अन्न एवं उत्तम जलसे भरा घड़ा कहाँसे आ गया? अपेक्षाकृत तुम्हारे वर्णकी दृष्टिसे दुबले ये तुम्हारे भृत्य कौन हैं? कुछ हृष्ट-पुष्ट शरीरवाले सुन्दर, तेजसे सम्पन्न और शुक्लवस्त्रधारी (हमारे-जैसे) बहुतोंकी परिरक्षा करनेवाले आप भी कौन हैं? आप मुझे यह सम्पूर्ण विवरण बतलाएँ कि आप कौन हैं एवं यह शमीवृक्ष कौन है?॥ ३७—४१॥ |
| इत्थं वणिक्सुतवचः श्रुत्वासौ प्रेतनायकः।<br>शशंस सर्वमस्याद्यं यथावृत्तं पुरातनम्॥ ४२<br><br>अहमासं पुरा विप्रः शाकले नगरोत्तमे।<br>सोमशर्मेति विख्यातो बहुलागर्भसम्भवः॥ ४३ | वणिक्पुत्रके ऐसे वचनको सुनकर उस प्रेतनायकने उससे सारे पुराने वृत्तान्तको कहा। (उसने कहा—) प्राचीन कालमें उत्तम शाकल नामके श्रेष्ठ नगरमें बहुलाके गर्भसे उत्पन्न हुआ मैं सोमशर्मा—इस नामसे |