भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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पृष्ठ 401

अध्याय ७९ ] पुरूरवाको रूपकी प्राप्ति और उसी सन्दर्भमें प्रेत और वणिक्‌की भेंट [ ३९१

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मद्रदेश इति ख्यातो देशो वै ब्रह्मणः सुत।<br>शाकलं नाम नगरं ख्यातं स्थानीयमुत्तमम्॥ १२<br>तस्मिन् विपणिवृत्तिस्थः सुधर्माख्योऽभवद् वणिक्।<br>धनाढ्यो गुणवान् भोगी नानाशास्त्रविशारदः॥ १३<br>स त्वेकदा निजाद् राष्ट्रात् सुराष्ट्रं गन्तुमुद्यतः।<br>सार्थेन महता युक्तो नानाविपणपण्यवान्॥ १४<br>गच्छतः पथि तस्याथ मरुभूमौ कलिप्रिय।<br>अभवद् दस्युतो रात्रौ अवस्कन्दोऽतिदुःसहः॥ १५कहता हूँ। ब्रह्मपुत्र! प्रसिद्ध मद्रदेशमें शाकल नामसे प्रसिद्ध उत्तम नगर है। वहाँ सुधर्मा नामका एक धनी, गुणशाली, भोगी एवं नाना शास्त्रोंमें निपुण व्यापारी रहता था। एक समय वह अपने देशसे सुराष्ट्र जानेको तैयार हुआ। कलिप्रिय! अनेक बेंची जानेवाली वस्तुओंसे युक्त व्यापारियोंके भारी समुदायके साथ जाते समय मार्गमें मरुभूमिमें रातमें (उसके ऊपर) डाकुओंका अत्यन्त उग्र असहनीय आक्रमण हुआ॥ ११—१५॥
ततः स हृतसर्वस्वो वणिग्दुःखसमन्वितः।<br>असहायो मरौ तस्मिंश्चचारोन्मत्तवद् वशी॥ १६<br>चरता तदरण्यं वै दुःखान्क्रान्तेन नारद।<br>आत्मा इव शमीवृक्षो मरावासादितः शुभः॥ १७<br>तं मृगैः पक्षिभिश्चैवं हीनं दृष्ट्वा शमीतरुम्।<br>श्रान्तः क्षुत्तृत्परीतात्मा तस्याधः समुपाविशत्॥ १८<br>सुप्तश्चापि सुविश्रान्तो मध्याह्ने पुनरुत्थितः।<br>सम्पश्यदथायान्तं प्रेतं प्रेतशतैर्वृतम्॥ १९उसके बाद सब कुछ लुट जानेसे दुखी हुआ वह असहाय वणिक् मरुभूमिमें पागलकी भाँति इधर-उधर घूमने लगा। नारदजी! दुःखसे ग्रसित होकर उस वनमें घूमते हुए उसे मरुभूमिमें अपने जनके समान एक सुन्दर शमीका वृक्ष मिला। थका तथा भूख-प्याससे अभिभूत हुआ वह वणिक् उस शमीवृक्षको पशु-पक्षियोंसे रहित देखकर उसके नीचे बैठ गया और सो गया तथा पूर्ण विश्राम कर दोपहरको जगा। उसके बाद उसने सैकड़ों प्रेतोंसे घिरे एक प्रेतको आते हुए देखा॥ १६—१९॥
उद्वाह्यन्तमथान्येन प्रेतेन प्रेतनायकम्।<br>पिण्डाशिभिश्च पुरतो धावद्भी रूक्षविग्रहैः॥ २०<br>अथाजगाम प्रेतोऽसौ पर्यटित्वा वनानि च।<br>उपागम्य शमीमूले वणिक्पुत्रं ददर्श सः॥ २१<br>स्वागतेनाभिवाद्यैनं समाभाष्य परस्परम्।<br>सुखोपविष्टश्छायायां पृष्टाकुशलमाप्तवान्॥ २२<br>ततः प्रेताधिपतिना पृष्टः स तु वणिक्सखः।<br>कुत आगम्यते ब्रूहि क्व साधो वा गमिष्यसि॥ २३प्रेतनायकको एक दूसरा प्रेत ढो रहा था और आगे रूखे शरीरवाले प्रेत दौड़ रहे थे। वनोंमें घूमनेके बाद वह प्रेत लौट रहा था। शमीवृक्षके नीचे आकर उसने वणिक्पुत्रको देखा। स्वागतके साथ उसे अभिवादन किया। फिर (दोनोंने) परस्पर वार्तालाप किया। इसके बाद वह प्रेत छायामें सुखपूर्वक बैठ गया और उसने उससे कुशल पूछी और जानी। उसके बाद प्रेताधिपतिने वणिक्-बन्धुसे पूछा—साधो! यह बतलाओ कि तुम कहाँसे आ रहे हो और कहाँ जाओगे?॥ २०—२३॥
कथं चेदं महारण्यं मृगपक्षिविवर्जितम्।<br>समापन्नोऽसि भद्रं ते सर्वमाख्यातुमर्हसि॥ २४<br><br>एवं प्रेताधिपतिना वणिक् पृष्टः समासतः।<br>सर्वमाख्यातवान् ब्रह्मन् स्वदेशधनविच्युतिम्॥ २५<br><br>तस्य श्रुत्वा स वृत्तान्तं तस्य दुःखेन दुःखितः।<br>वणिक्पुत्रं ततः प्राह प्रेतपालः स्वबन्धुवत्॥ २६<br><br>एवं गतेऽपि मा शोकं कर्तुमर्हसि सुव्रत।<br>भूयोऽप्यर्थाः भविष्यन्ति यदि भाग्यबलं तव॥ २७तुम्हारा कल्याण हो। मुझे यह बताओ कि पशु एवं पक्षियोंसे रहित इस बड़े जंगलमें तुम कैसे आये?<br>(पुलस्त्यजी कहते हैं—) ब्रह्मन्! प्रेतराजके इस प्रकार पूछनेपर वणिक्ने थोड़ेमें उसे अपने देशका एवं धन-नाशका पूरा विवरण कह सुनाया। उसका पूरा वृत्तान्त सुन लेनेके बाद उसके दुःखसे दुखी होकर प्रेतपालने अपने बन्धुके समान (उसे मानते हुए) उस वणिक्-पुत्रसे कहा—सुव्रत! ऐसा होनेपर भी तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये। यदि तुम्हारा भाग्य प्रबल होगा तो धन फिर हो जायगा॥ २४—२७॥
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