वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
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| अध्याय ७९ ] | पुरूरवाको रूपकी प्राप्ति और उसी सन्दर्भमें प्रेत और वणिककी भेंट | ३९३ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| ममास्ति च वणिक् श्रीमान् प्रातिवेश्यो महाधनः।<br>स तु सोमश्रवा नाम विष्णुभक्तो महायशाः॥ ४४<br><br>सोऽहं कदर्यो मूढात्मा धनेऽपि सति दुर्मतिः।<br>न ददामि द्विजातिभ्यो न चाश्नाम्यन्नमुत्तमम्॥ ४५ | प्रसिद्ध ब्राह्मण था। मेरा एक पड़ोसी बहुत धनवान्, लक्ष्मीवान् वणिक् था, जिसका नाम था सोमश्रवा। वह महान् यशस्वी और विष्णुका भक्त था। मैं कृपण एवं दुर्मति था। अतः धन होते हुए भी न तो ब्राह्मणोंको दान करता था और न अच्छे अन्नका भोजन ही करता था॥ ४२–४५॥ |
| प्रमादाद् यदि भुञ्जामि दधिक्षीरघृतान्वितम्।<br>ततो रात्रौ नृभिर्घोरैस्ताड्यते मम विग्रहः॥ ४६<br><br>प्रातर्भवति मे घोरा मृत्युतुल्या विषूचिका।<br>न च कश्चिन्ममाभ्यासे तत्र तिष्ठति बान्धवः॥ ४७<br><br>कथं कथमपि प्राणा मया सम्प्रति धारिताः।<br>एवमेतादृशः पापी निवसाम्यतिनिर्घृणः॥ ४८<br><br>सौवीरतिलपिण्याकसक्तुशाकादिभोजनैः ।<br>क्षपयामि कदन्नाद्यैरात्मानं कालयापनैः॥ ४९ | यदि मैं कभी भूलसे दही, दूध एवं घीसे युक्त पदार्थ भोजन कर लेता था तो रात्रिमें भयङ्कर मनुष्य मेरे शरीरको पीड़ित करते थे। प्रातःकाल मुझे मरणके समान (कष्ट देनेवाली) भयङ्कर विषूचिका (हैजा) हो जाया करती थी। उस समय मेरे पास कोई भी बन्धु नहीं रहता था। मैं किसी-किसी प्रकार अपने प्राणोंको धारण करता था। इस प्रकार मैं अति निर्लज्ज पापयुक्त जीवन बिताता रहा। बेर, तिलपिण्याक, सत्तू, शाकादि एवं बुरे अन्नों (मोटे अन्न—) कोदो, साँवा आदिको खाकर समय बिताते हुए मैं स्वयंको दुर्बल कर रहा था॥ ४६–४९॥ |
| एवं तत्रासतो मह्यं महान् कालोऽभ्यगादथ।<br>श्रवणद्वादशी नाम मासि भाद्रपदेऽभवत्॥ ५०<br><br>ततो नागरिको लोको गतः स्नातुं हि सङ्गमम्।<br>इरावत्या नड्वलाया ब्रह्मक्षत्रपुरस्सरः॥ ५१<br><br>प्रातिवेश्यप्रसङ्गेन तत्राप्यनुगतोऽस्म्यहम्।<br>कृतोपवासः शुचिमानेकादश्यां यतव्रतः॥ ५२<br><br>ततः सङ्गमतोयेन वारिधानीं दृढां नवाम्।<br>सम्पूर्णां वस्तुसंवीतां छत्रोपानहसंयुताम्॥ ५३<br><br>मृत्पात्रमपि मिष्टस्य पूर्णं दध्योदनस्य ह।<br>प्रदत्तं ब्राह्मणेन्द्राय शुचये ज्ञानधर्मिणे॥ ५४ | मुझे वहाँ इस ढंगसे रहते हुए बहुत समय बीत गया। (एक बार) भाद्रपदमासमें श्रवणद्वादशीकी तिथि आयी। तब ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि नागरिक लोग इरावती और नड्वला नदियोंके संगममें स्नान करनेके लिये गये। पड़ोसी होनेके कारण मैं भी उनके पीछे-पीछे चला गया। एकादशीके दिन मैंने व्रत रहकर पवित्रतासे उपवास किया। उसके बाद मैंने अनेक वस्तुओं—छाता, जूता और साथ ही सङ्गमके जलसे भरा नवीन दृढ़ जलपात्र एवं मिष्टान्न, दधि तथा ओदनसे पूर्ण मिट्टीका पात्र ज्ञानी, धार्मिक, पवित्र, श्रेष्ठ ब्राह्मणको प्रदान किया॥ ५०–५४॥ |
| तदेव जीवतो दत्तं मया दानं वणिक्सुत।<br>वर्षाणां सप्ततीनां वै नान्यद् दत्तं हि किंचन॥ ५५<br><br>मृतः प्रेतत्वमापन्नो दत्त्वा प्रेतान्नमेव हि।<br>अमी चादत्तदानास्तु मदन्नेनोपजीविनः॥ ५६<br><br>एतत्ते कारणं प्रोक्तं यत्तदन्नं मयाम्भसा।<br>दत्तं तदिदमायाति मध्याह्नेऽपि दिने दिने॥ ५७<br><br>यावन्नाहं च भुञ्जामि न तावत् क्षयमेति वै।<br>मयि भुक्ते च पीते च सर्वमन्तर्हितं भवेत्॥ ५८ | वणिक्पुत्र! मैंने अपने सत्तर वर्षोंके (पूरे) जीवनमें (केवल) वही दान दिया था। इसके सिवा अन्य कुछ भी नहीं दान किया। प्रेतान्न दान करके मृत्युके बाद मैं प्रेत हो गया। मेरे अन्नसे जीवन धारण करनेवाले इन लोगोंने भी दान कभी नहीं किया है। मैंने तुम्हें वह कारण बतलाया जिससे मेरे द्वारा दिये गये अन्न-जल प्रतिदिन दोपहरके समय (मेरे समीप) आ जाते हैं। जबतक मैं नहीं खाता, तबतक उनका क्षय नहीं होता। मेरे खाने और पीनेके बाद सभी कुछ अदृश्य हो जाता है॥ ५५–५८॥ |