वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ३९४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७९ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| यच्छातातपत्रमददं सोऽयं जातः शमीतरुः।<br>उपानद्युगले दत्ते प्रेतो मे वाहनोऽभवत्॥ ५९<br><br>इयं तवोक्ता धर्मज्ञ मया कीनाशतात्मनः।<br>श्रवणद्वादशीपुण्यं तवोक्तं पुण्यवर्धनम्॥ ६०<br><br>इत्येवमुक्ते वचने वणिक्पुत्रोऽब्रवीद् वचः।<br>यन्मया तात कर्त्तव्यं तदनुज्ञातुमर्हसि॥ ६१<br><br>तत् तस्य वचनं श्रुत्वा वणिक्पुत्रस्य नारद।<br>प्रेतपालो वचः प्राह स्वार्थसिद्धिकरं ततः॥ ६२ | मैंने जो छाताका दान किया था, वही इस शमीवृक्षके रूपमें उत्पन्न हुआ है। एक जोड़ा जूताका दान करनेसे प्रेत मेरा वाहन बना है। धर्मज्ञ! अपने प्रेतत्व-प्राप्तिका यह समस्त विवरण मैंने तुमसे कह सुनाया तथा परम पवित्र और पुण्यको बढ़ानेवाली श्रवणद्वादशीका भी वर्णन कर दिया। प्रेतके ऐसा कहनेपर वणिक्पुत्रने कहा—तात! मुझे जो करना हो उसकी आज्ञा दें। (पुलस्त्यजी कहते हैं कि) नारदजी! वणिक्पुत्रका वह वचन सुनकर प्रेतपति अपनी स्वार्थसिद्धिकी बात कहने लगा—॥ ५९—६२॥ |
| यत् त्वया तात कर्त्तव्यं मद्धितार्थं महामते।<br>कथयिष्यामि तत् सम्यक् तव श्रेयस्करं मम॥ ६३<br><br>गयायां तीर्थजुष्टायां स्नात्वा शौचसमन्वितः।<br>मम नाम समुद्दिश्य पिण्डनिर्वपणं कुरु॥ ६४<br><br>तत्र पिण्डप्रदानेन प्रेतभावादहं सखे।<br>मुक्तस्तु सर्वदातॄणां यास्यामि सहलोकताम्॥ ६५<br><br>यथेयं द्वादशी पुण्या मासि प्रौष्ठपदे सिता।<br>बुधश्रवणसंयुक्ता साऽतिश्रेयस्करी स्मृता॥ ६६ | महामते! मेरे हितके लिये तुम्हें करने योग्य कर्म मैं बतलाता हूँ। उसे अच्छी तरह सम्पन्न कर लेनेसे तुम्हारा और मेरा (दोनोंका) कल्याण होगा। (देखो,) गया-तीर्थमें (जाकर और) स्नानसे पवित्र होकर मेरे नाम (उद्देश्य)-से तुम पिण्डदान करो। सखे! वहाँ पिण्डदान करनेसे मैं प्रेतभावसे मुक्त होकर सर्वस्व दान करनेवालोंको मिलनेवाले लोकको प्राप्त कर लूँगा। भाद्रपदमासके शुक्लपक्षकी बुधवार एवं श्रवण नक्षत्रसे युक्त पुण्य बढ़ानेवाली अत्यन्त माङ्गलिक यह द्वादशी (तिथि) कही गयी है॥ ६३—६६॥ |
| इत्येवमुक्त्वा वणिजं प्रेतराजोऽनुगैःसह।<br>स्वनामानि यथान्यायं सम्यगाख्यातवाञ्छुचिः॥ ६७<br><br>प्रेतस्कन्धे समारोप्य त्याजितो मरुमण्डलम्।<br>रम्येऽथ शूरसेनाख्ये देशे प्राप्तः स वै वणिक्॥ ६८<br><br>स्वकर्मधर्मयोगेन धनमुच्चावचं बहु।<br>उपार्जयित्वा प्रययौ गयाशीर्षमनुत्तमम्॥ ६९<br><br>पिण्डनिर्वपणं तत्र प्रेतानामनुपूर्वशः।<br>चकार स्वपितॄणां च दायादानामनन्तरम्॥ ७० | वणिक्से ऐसा कहकर प्रेतराजने अपने अनुचरोंसहित पवित्रतापूर्वक यथोचित क्रमसे अपने (पितरोंके) नामोंको बताया। उसे प्रेतके कन्धेपर चढ़ाकर मरु-भूमिसे बाहर छोड़ दिया गया। इस प्रकार वह वणिक् शूरसेन नामके सुन्दर देशमें पहुँच गया। अपने कर्म तथा धर्मसे उसने अधिक मात्रामें उत्कृष्ट एवं हीन धन उपार्जित कर लिया। उसके बाद वह उत्तम गयाशीर्ष नामके तीर्थमें गया। वहाँ क्रमशः प्रेतोंके उद्देश्यसे पिण्डदान करनेके बाद उसने अपने पितरों एवं दायादोंको भी पिण्डदान किया॥ ६७-७०॥ |
| आत्मनश्च महाबुद्धिर्महाबोध्यं तिलैर्विना।<br>पिण्डनिर्वपणं चक्रे तथान्यानपि गोत्रजान्॥ ७१<br><br>एवं प्रदत्तेष्वथ वै पिण्डेषु प्रेतभावतः।<br>विमुक्तास्ते द्विज प्रेता ब्रह्मलोकं ततो गताः॥ ७२ | उस महाबुद्धि (वणिक्)-ने अपने लिये तिलसे रहित महाबोध्य नामका पिण्डदान किया। उसके बाद अन्य गोत्रोंमें उत्पन्न हुओंके उद्देश्यसे भी पिण्डदान किया। द्विज! इस प्रकार पिण्डदान करनेपर वे प्रेत प्रेत-योनिसे मुक्त होकर ब्रह्मलोकको चले गये। |