भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

पृष्ठ 405, कुल 489 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 405

अध्याय ७९ ] पुरूरवाको रूपकी प्राप्ति और उसी सन्दर्भमें प्रेत और वणिक्‌की भेंट [ ३९५

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
स चापि हि वणिक्पुत्रो निजमालयमाव्रजत्।<br>श्रवणद्वादशीं कृत्वा कालधर्ममुपेयिवान्॥ ७३<br><br>गन्धर्वलोके सुचिरं भोगान् भुक्त्वा सुदुर्लभान्।<br>मानुष्यं जन्ममासाद्य स बभौ शाकले विराट्॥ ७४वह वणिक्पुत्र भी अपने घर चला गया और श्रवणद्वादशीका (यथोचित रीतिसे) (व्रत) पालन करते हुए वह भी समय आनेपर स्वर्गीय हो गया। गन्धर्वलोकमें चिरकालतक अत्यन्त दुर्लभ भोगोंका उपभोग करनेके बाद मनुष्य-जन्म प्राप्त कर वह शाकलपुरीका सम्राट् बना॥ ७३-७४॥
स्वधर्मकर्मवृत्तिस्थः श्रवणद्वादशीरतः।<br>कालधर्ममवाप्यासौ गुह्यकावासमाश्रयत्॥ ७५<br><br>तत्रोष्य सुचिरं कालं भोगान् भुक्त्वाऽथ कामतः।<br>मर्त्यलोकमनुप्राप्य राजन्यतनयोऽभवत्॥ ७६<br><br>तत्रापि क्षत्रवृत्तिस्थो दानभोगरतो वशी।<br>गोग्रहेऽरिगणाञ्जित्वा कालधर्ममुपेयिवान्।<br>शक्रलोकं स सम्प्राप्य देवैः सर्वैः सुपूजितः॥ ७७<br><br>पुण्यक्षयात् परिभ्रष्टः शाकले सोऽभवद् द्विजः।<br>ततो विकटरूपोऽसौ सर्वशास्त्रार्थपारगः॥ ७८अपने धर्म तथा कर्ममें स्थित रहता हुआ वह श्रवणद्वादशी (व्रत)-में रत रहता रहा। (समय आनेपर) मृत्युके बाद उसने गुह्यकोंका लोक प्राप्त कर लिया। वहाँ बहुत कालतक ठहरकर और इच्छानुकूल भाँति-भाँतिके भोग्य पदार्थोंका भोग करनेके बाद वह मृत्युलोकमें आकर राजपुत्र बना। वहाँ भी क्षत्रिय-वृत्तिसे निर्वाह करते हुए वह दान और भोगमें लगा रहा। गौओंके अपहरणमें उसने शत्रुओंको जीतकर कालधर्म (मृत्यु)-को प्राप्त हुआ। फिर वह इन्द्रलोकमें गया और सभी देवोंसे पूजित हुआ। पुण्यका क्षय होनेसे 'क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति'—नियमसे स्वर्गच्युत होकर वह फिर शाकल देशमें ब्राह्मण हुआ। उसका रूप तो अत्यन्त विद्रूप (भयङ्कर) था, परंतु वह (विद्यासे) सम्पूर्ण शास्त्रोंमें पारङ्गत था॥ ७५-७८॥
विवाहयद् द्विजसुतां रूपेणानुपमां द्विज।<br>साऽवमेने च भर्त्तारं सुशीलमपि भामिनी॥ ७९<br><br>विरूपमिति मन्वाना ततः सोऽभूत् सुदुःखितः।<br>ततो निर्वेदसंयुक्तो गत्वाश्रमपदं महत्॥ ८०<br><br>इरावत्यास्तटे श्रीमान् रूपधारिणमासदत्।<br>तमाराध्य जगन्नाथं नक्षत्रपुरुषेण हि॥ ८१<br><br>सुरूपतामवाप्याग्र्यां तस्मिन्नेव च जन्मनि।<br>ततः प्रियोऽभूद् भार्याया भोगवांश्चाभवद् वशी।<br>श्रवणद्वादशीभक्तः पूर्वाभ्यासादजायत॥ ८२<br><br>एवं पुराऽसौ द्विजपुङ्गवस्तु<br>कुरूपरूपो भगवत्प्रसादात्।<br>अनङ्गरूपप्रतिमो बभूव<br>मृतश्च राजा स पुरूरवाऽभूत्॥ ८३द्विज! उसने अनुपम सुन्दरी ब्राह्मण-कन्यासे विवाह किया। वह ललना (अपने) अत्यन्त शीलवान् पतिको भी कुरूप मानकर निरादर करती रहती। इससे वह बहुत दुःखित हो गया। उसके बाद ग्लानिसे भरकर वह इरावतीके तीरपर स्थित महान् आश्रममें पहुँचा और नक्षत्र-पुरुषके द्वारा स्थापित सुन्दर रूप धारण करनेवाले जगन्नाथ भगवान्‌की आराधना की। इस प्रकार उसी जन्ममें परम सुन्दर रूप प्राप्त कर वह अपनी भार्याका प्यारा एवं ऐश्वर्यसे सम्पन्न हो गया। पूर्वके अभ्याससे संयत रहनेवाला वह श्रवणद्वादशीका भक्त बना रहा। इस प्रकार पहले कुरूप रहनेपर भी भगवान्‌की कृपासे वह श्रेष्ठ ब्राह्मण कामदेवके समान सुन्दर रूपवाला हो गया और स्वर्गीय होकर दूसरे जन्ममें राजा पुरूरवा हुआ॥ ७९-८३॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें उन्नासीवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ७९ ॥