वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ३९६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ८० |
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अस्सीवाँ अध्याय
नक्षत्र-पुरुषके वर्णन-प्रसङ्गमें नक्षत्र-पुरुषकी पूजाका विधान और नक्षत्र-पुरुषके व्रतका माहात्म्य
| संस्कृत | हिन्दी |
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| नारद उवाच<br>पुरूरवा द्विजश्रेष्ठ यथा देवं श्रियः पतिम्।<br>नक्षत्रपुरुषाख्येन आराधयत तद् वद॥ १ | नारदजीने पूछा— द्विजश्रेष्ठ! पुरूरवाने नक्षत्र-पुरुष नामक व्रतके द्वारा लक्ष्मीपति वासुदेवकी जिस विधिसे आराधना की थी, उसे कहिये॥ १॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>श्रूयतां कथयिष्यामि नक्षत्रपुरुषव्रतम्।<br>नक्षत्राङ्गानि देवस्य यानि यानीह नारद॥ २<br><br>मूलर्क्षं चरणौ विष्णोर्जङ्घे द्वे रोहिणी स्मृते।<br>द्वे जानुनी तथाश्विन्यौ संस्थिते रूपधारिणः॥ ३<br><br>आषाढे द्वे द्वयं चौर्वोर्गुह्यस्थं फाल्गुनीद्वयम्।<br>कटिसंस्थाः कृत्तिकाश्चैव वासुदेवस्य संस्थिताः॥ ४<br><br>प्रौष्ठपद्याद्वयं पार्श्वे कुक्षिभ्यां रेवती स्थिता।<br>उरःसंस्था त्वनुराधा श्रविष्ठा पृष्ठसंस्थिता॥ ५ | पुलस्त्यजी बोले— नारदजी! मैं नक्षत्र-पुरुष-व्रत एवं देवके सभी नक्षत्ररूपी अङ्गोंका वर्णन करता हूँ; आप सुनें—मूल नक्षत्र भगवान् विष्णुके दोनों चरणों, रोहिणी नक्षत्र दोनों जंघाओं एवं अश्विनी नक्षत्र दोनों घुटनोंका रूप धारण करके स्थित हैं। पूर्वाषाढ़ा और उत्तराषाढ़ा नामके दो नक्षत्र वासुदेवके दोनों ऊरुओंमें, पूर्वाफाल्गुनी तथा उत्तराफाल्गुनी नामवाले दोनों नक्षत्र गुह्य प्रदेशमें और कृत्तिका नक्षत्र कटि-भागमें स्थित है। पूर्वाभाद्रपदा तथा उत्तराभाद्रपदा भगवान्के दोनों पाश्र्वोंमें, रेवती दोनों कुक्षियोंमें, अनुराधा हृदयमें तथा धनिष्ठा नक्षत्र पृष्ठदेशमें स्थित है॥ २-५॥ |
| विशाखा भुजयोर्हस्तः करद्वयमुदाहृतम्।<br>पुनर्वसुस्तथाङ्गुल्यो नखाः सार्पस्तथोच्यते॥ ६<br><br>ग्रीवास्थिता तथा ज्येष्ठा श्रवणं कर्णयोः स्थितम्।<br>मुखसंस्थस्तथा पुष्यः स्वातिर्दन्ताः प्रकीर्तिताः॥ ७<br><br>हनू द्वे वारुणश्चोक्तो नासा पैत्र उदाहृतः।<br>मृगशीर्षं नयनयो रूपधारिणि तिष्ठति॥ ८<br><br>चित्रा चैव ललाटे तु भरणी तु तथा शिरः।<br>शिरोरुहस्था चैवार्द्रा नक्षत्राङ्गमिदं हरेः॥ ९ | दोनों भुजाओंके स्थानमें विशाखा नक्षत्र है। हस्त नक्षत्रको भगवान्का दोनों हाथ कहा गया है। पुनर्वसु नक्षत्र भगवान्की अंगुलियाँ और आश्लेषा नक्षत्र उनके नख हैं। ग्रीवामें ज्येष्ठा, दोनों कानोंमें श्रवण तथा मुखमें पुष्य नक्षत्र स्थित है। दाँतोंको स्वाति नक्षत्र कहा गया है। शतभिषा नक्षत्र दोनों हनुएँ तथा मघाको नासिका कहा गया है। (नक्षत्रोंका) रूप धारण करनेवाले भगवान्के दोनों नेत्रोंमें मृगशिरा नक्षत्रका निवास है। चित्रा ललाटमें, भरणी सिरमें तथा आर्द्रा नक्षत्र केशमें रहता है। भगवान् विष्णुका यह नक्षत्र-शरीर है॥ ६-९॥ |
| विधानं सम्प्रवक्ष्यामि यथायोगेन नारद।<br>सम्पूजितो हरिः कामान् विदधाति यथेप्सितान्॥ १० | नारदजी! अब मैं उस व्रतके विधानका वर्णन करूँगा, जिस व्रतसे नियमपूर्वक आराधित होनेपर भगवान् विष्णु इच्छित फल प्रदान करते हैं। |