वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| अध्याय ८० ] | नक्षत्र-पुरुषके वर्णन-प्रसङ्गमें नक्षत्र-पुरुषकी पूजाका विधान | ३९७ | | :--- | :--- |
| चैत्रमासे सिताष्टम्यां यदा मूलगतः शशी।<br>तदा तु भगवत्पादौ पूजयेत् तु विधानतः।<br>नक्षत्रसंनिधौ दद्याद् विप्रेन्द्राय च भोजनम्॥ ११<br><br>जानुनी चाश्विनीयोगे पूजयेदथ भक्तितः।<br>दोहदे च हविष्यान्नं पूर्ववद् द्विजभोजनम्॥ १२<br><br>आषाढाभ्यां तथा द्वाभ्यां द्वा ऊरू पूजयेद् बुधः।<br>सलिलं शिशिरं तत्र दोहदे च प्रकीर्तितम्॥ १३ | चैत्रमासके शुक्लपक्षकी अष्टमी तिथिमें चन्द्रमाके मूल नक्षत्रमें स्थित होनेपर भगवान्के दोनों पैरोंकी विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिये। नक्षत्रकी संनिधिमें ब्राह्मणको भोजन कराना चाहिये। अश्विनी नक्षत्रके योगमें श्रद्धापूर्वक भगवान्के दोनों घुटनोंकी अर्चना करनी चाहिये एवं 'दोहद' में (यात्रा-दोषकी शान्तिके लिये खाये-पिये जानेवाले निश्चित पदार्थमें) हविष्यान्न समर्पित करना एवं पूर्ववत् ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। विद्वान् मनुष्य पूर्वाषाढ़ तथा उत्तराषाढ़के योगमें विष्णुके दोनों ऊरुओंकी पूजा करे। (इसमें देय) दोहदमें शीतल जलका विधान है॥ १०—१३॥ | | फाल्गुनीद्वितीये गुह्यं पूजनीयं विचक्षणैः।<br>दोहदे च पयो गव्यं देयं च द्विजभोजनम्॥ १४<br><br>कृत्तिकासु कटिः पूज्या सोपवासो जितेन्द्रियः।<br>देयं च दोहदं विष्णोः सुगन्धकुसुमोदकम्॥ १५<br><br>पार्श्वे भाद्रपदायुग्मे पूजयित्वा विधानतः।<br>गुडं सलेहकं दद्याद् दोहदे देवकीर्तितम्॥ १६<br><br>द्वे कुक्षी रेवतीयोगे दोहदे मुद्गमोदकाः।<br>अनुराधासु जठरं षष्टिकान्नं च दोहदे॥ १७ | [अनुक्रान्त विधानमें पुलस्त्यजी कहते हैं—] विद्वान् पुरुष दोनों फाल्गुनी नक्षत्रोंमें भगवान्के गुह्य-देशकी पूजा करे। दोहदके लिये दूध और घी दे और ब्राह्मण-भोजन कराये। कृत्तिका नक्षत्रमें उपवासपूर्वक जितेन्द्रिय रहकर भगवान्के कटि-देशकी अर्चना करे और सुगन्धित कुसुमसे युक्त जलका 'दोहद' दान करे। दोनों भाद्रपदाओंमें कहे हुए विधानसे भगवान्की दोनों बगलोंकी अर्चना करके 'दोहद' में देवद्वारा कथित—शास्त्रानुमोदित चाटनेवाली वस्तुसे युक्त गुड़ देना चाहिये। रेवती नक्षत्रके योगमें भगवान्की दोनों कुक्षियोंकी पूजाके बाद दोहदमें मूँगके लड्डू प्रदान करने चाहिये। अनुराधा नक्षत्रमें उदरकी पूजा करके दोहदमें साठीका चावल देना चाहिये॥ १४—१७॥ | | श्रविष्ठायां तथा पृष्ठं शालिभक्तं च दोहदे।<br>भुजयुग्मं विशाखासु दोहदे परमोदनम्॥ १८<br><br>हस्ते हस्तौ तथा पूज्यौ यावकं दोहदे स्मृतम्।<br>पुनर्वसावङ्गुलीश्च पटोलस्तत्र दोहदे॥ १९<br><br>आश्लेषासु नखान् पूज्य दोहदे तित्तिरामिषम्।<br>ज्येष्ठायां पूजयेद् ग्रीवां दोहदे तिलमोदकम्॥ २०<br><br>श्रवणे श्रवणौ पूज्यौ दधिभक्तं च दोहदे।<br>पुष्ये मुखं पूजयेत दोहदे घृतपायसम्॥ २१ | धनिष्ठा नक्षत्रमें पृष्ठकी पूजा करके दोहदमें शालिका भात देना चाहिये। विशाखा नक्षत्रमें भगवान्की दोनों भुजाओंकी पूजा कर दोहदमें उत्तम अन्न देना चाहिये। हस्त नक्षत्रमें भगवान्के दोनों करोंकी पूजा करके दोहदमें जौसे बना पकवान्न देना चाहिये। पुनर्वसु नक्षत्रमें अंगुलियोंकी पूजा करके दोहदमें रेशमी वस्त्र या परवल प्रदान करना चाहिये। आश्लेषा नक्षत्रमें नखकी पूजा कर दोहदमें तित्तिरकी आकृति प्रदान करे। ज्येष्ठा में ग्रीवाकी पूजा करके दोहदमें तिलका लड्डू प्रदान करे। श्रवण नक्षत्रमें दोनों कानोंकी पूजा करके दोहदमें दही और भात प्रदान करे। पुष्य नक्षत्रमें मुखकी पूजा करे और दोहदमें घी मिला हुआ पायस प्रदान करे॥ १८—२१॥ | | स्वातियोगे च दशना दोहदे तिलशष्कुली।<br>दातव्या केशवप्रीतै ब्राह्मणस्य च भोजनम्॥ २२ | स्वाति नक्षत्रके योगमें भगवान्के दाँतोंका पूजन करके तिल और शष्कुली (पूड़ी)-का दोहद दे एवं केशवको प्रसन्न करनेके लिये ब्राह्मणको भोजन कराये। |