भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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| ३९८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ८० | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
हनू शतभिषायोगे पूजयेच्च प्रयत्नतः।<br>प्रियङ्गुरक्तशाल्यन्नं दोहदं मधुविद्विषः॥ २३<br><br>मघासु नासिका पूज्या मधु दद्याच्च दोहदे।<br>मृगोत्तमाङ्गे नयने मृगमांसं च दोहदे॥ २४<br><br>चित्रायोगे ललाटं च दोहदे चारुभोजनम्।<br>भरणीषु शिरः पूज्यं चारु भक्तं च दोहदे॥ २५शतभिषा नक्षत्रमें प्रयत्नपूर्वक भगवान्‌के ठुड्डीकी पूजा करे और विष्णुको अत्यन्त प्रिय लगनेवाला प्रियङ्गु (कँगनी) एवं लाल चावलका दोहद दे। मघामें नासिकाकी पूजा करनी चाहिये एवं दोहदमें मधु देना चाहिये। मृगशिरा नक्षत्रमें मस्तकमें स्थित दोनों नेत्रोंकी पूजा करके दोहदमें मृगके मानका फलका गूदा देना चाहिये। चित्रा नक्षत्रके योगमें ललाटकी पूजा करके दोहदमें सुन्दर भोजन देना चाहिये। भरणी नक्षत्रमें सिरकी पूजा करनी चाहिये और दोहदमें सुन्दर भात प्रदान करना चाहिये॥ २२—२५॥
सम्प्पूजनीया विद्वद्भिद्रार्द्रायोगे शिरोरुहाः।<br>विप्रांश्च भोजयेद् भक्त्या दोहदे च गुडार्द्रकम्॥ २६<br><br>नक्षत्रयोगेष्वेतेषु सम्पूज्य जगतः पतिम्।<br>पारिते दक्षिणां दद्यात् स्त्रीपुंसोश्चारुवाससी॥ २७<br><br>छत्रोपानत् श्वेतयुगं सप्तधान्यानि काञ्चनम्।<br>घृतपात्रं च मतिमान् ब्राह्मणाय निवेदयेत्॥ २८<br><br>प्रतिनक्षत्रयोगेन पूजनीया द्विजातयः।<br>नक्षत्रमय एवैष पुरुषः शाश्वतो मतः॥ २९आर्द्राके योगमें विद्वान् लोगोंको (भगवान्‌के) केशोंकी पूजा करनी चाहिये और श्रद्धापूर्वक ब्राह्मणोंको भोजन कराना तथा दोहदमें गुड़ एवं अदरखका दान करना चाहिये। इन नक्षत्रोंके योगोंमें जगत्पति (विष्णु)-की पूजा करनेके बाद पारणकर स्त्री और पुरुषके लिये दो सुन्दर वस्त्र दे। बुद्धिमान् पुरुष ब्राह्मणको सफेद छाता, एक जोड़ा जूता, सप्तधान्य, स्वर्ण एवं घीसे भरे पात्रका दान करे। प्रत्येक नक्षत्रके योगमें ब्राह्मणोंकी पूजा करनी चाहिये। यही नक्षत्रमय नित्य सनातन पुरुष माने गये हैं॥ २६—२९॥
नक्षत्रपुरुषाख्यं हि व्रतानामुत्तमं व्रतम्।<br>पूर्वं कृतं हि भृगुणा सर्वपातकनाशनम्॥ ३०<br><br>अङ्गोपाङ्गानि देवर्षे पूजयित्वा जगद्गुरोः।<br>सुरूपण्यभिजायन्ते प्रत्यङ्गाङ्गानि चैव हि॥ ३१<br><br>सप्तजन्मकृतं पापं कुलसंगागतं च यत्।<br>पितृमातृसमुत्थं च तत्सर्वं हन्ति केशवः॥ ३२<br><br>सर्वाणि भद्रण्याप्नोति शरीरारोग्यमुत्तमम्।<br>अनन्तां मनसः प्रीतिं रूपं चातीव शोभनम्॥ ३३नक्षत्र-पुरुष नामका व्रत सभी व्रतोंमें श्रेष्ठ है। प्राचीन समयमें भृगुने समस्त पापोंके विनाश करनेवाले इस व्रतको किया था। देवर्षे! भगवान्‌के अङ्गों और उपाङ्गोंकी पूजा करनेसे मनुष्यके सभी अङ्ग-प्रत्यङ्ग सुन्दर होते हैं। सात जन्मोंमें (अपने स्वयंके) किये हुए, कुलक्रमसे प्राप्त एवं माता-पिताके कारण प्राप्त पापों—सब प्रकारके पापोंको केशव पूर्णतया नष्ट कर देते हैं; और इस प्रकार भगवान्‌का पूजन करनेसे समस्त प्रकारके कल्याण प्राप्त होते हैं; शरीर उत्तम आरोग्यसे सम्पन्न होता है, मनमें अनन्त प्रसन्नता प्राप्त होती है और अत्यन्त सुन्दर रूप भी प्राप्त हो जाता है॥ ३०—३३॥
वाङ्माधुर्यं तथा कान्तिं यच्चान्यदभिवाञ्छितम्।<br>ददाति नक्षत्रपुमान् पूजितस्तु जनार्दनः॥ ३४<br><br>उपोष्या सम्यगेतेषु क्रमेणर्क्षेषु नारद।<br>अरुन्धती महाभागा ख्यातिमग्र्यां जगाम ह॥ ३५<br><br>आदित्यस्तनयार्थाय नक्षत्राङ्गं जनार्दनम्।<br>सम्पूजयित्वा गोविन्दं रेवन्तं पुत्रमाप्तवान्॥ ३६इस प्रकार पूजित होनेपर नक्षत्र-पुरुष जनार्दन भगवान् मधुर वाणी, कान्ति तथा अन्य मनोऽभिलषित पदार्थ प्रदान करते हैं। नारदजी! इन नक्षत्रोंके योगमें क्रमशः उपवासकर महाभाग्यशालिनी अरुन्धतीने उत्तम प्रसिद्धि प्राप्त की थी। आदित्यने पुत्रकी इच्छासे नक्षत्र-पुरुष जनार्दनकी अर्चनाकर रेवन्त-नामक पुत्र प्राप्त किया था।