वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ८२] चक्रदानके कथा-प्रसङ्गमें उपमन्यु तथा श्रीदामाका वृत्तान्त, शिवद्वारा विष्णुको चक्र देना ४०५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| प्राकृतोऽयं महाबाहो विकारश्चक्रनेमिना।<br>निकृत्तो न स्वभावो मे सोऽच्छेद्योऽदाह्य एव च॥ ३६॥<br><br>तद्यदेतानि चक्रेण त्रीणि भागानि केशव।<br>कृतानि तानि पुण्यानि भविष्यन्ति न संशयः॥ ३७॥<br><br>हिरण्याक्षः स्मृतो ह्येकः सुवर्णाक्षस्तथा परः।<br>तृतीयश्च विरूपाक्षस्त्रयोऽमी पुण्यदा नृणाम्॥ ३८॥<br><br>उत्तिष्ठ गच्छस्व विभो निहन्तुममरादनम्।<br>श्रीदाम्नि निहते विष्णो नन्दयिष्यन्ति देवताः॥ ३९॥<br><br>इत्येवमुक्तो भगवान् हरेण गरुडध्वजः।<br>गत्वा सुरगिरिप्रस्थं श्रीदामानं ददर्श ह॥ ४०॥<br><br>तं दृष्ट्वा देवदर्पघ्नं दैत्यं देववरो हरिः।<br>मुमोच चक्रं वेगाढ्यं हतोऽसीति ब्रुवन्मुहुः॥ ४१॥ | महाबाहो! चक्रकी नेमिद्वारा मेरा यह प्राकृत विकार ही काटा गया है। इसके द्वारा मेरा स्वभाव नहीं क्षत हुआ है। वह तो अच्छेद्य एवं अदाह्य है। केशव! चक्रद्वारा किये गये ये तीनों अंश निस्सन्देह पुण्य प्रदान करनेवाले होंगे। एक अंश हिरण्याक्ष नामधारी, दूसरा सुवर्णाक्ष नामधारी और तीसरा विरूपाक्ष नामका होगा। ये तीनों अंश मनुष्योंके लिये पुण्यप्रदाता होंगे। विभो! उठिये और देव-शत्रुका वध करनेके लिये जाइये। विष्णो! श्रीदामाके वध किये जानेपर देवता प्रसन्न होंगे। शंकरके इस प्रकार कहनेपर भगवान् गरुडध्वजने पर्वतकी ऊँची चोटीपर जाकर श्रीदामाको देखा। देवताओंके दर्पका विनाश करनेवाले उस दैत्यको देखकर देव-श्रेष्ठ विष्णुने बार-बार (यह लो) 'तुम मारे गये' ऐसा कहते हुए तीव्र गतिसे चक्र चलाया॥ ३६—४१॥ |
| ततस्तु तेनाप्रतिपौरुषेण<br>चक्रेण दैत्यस्य शिरो निकृत्तम्।<br>संछिन्नशीर्षो निपपात शैलाद्<br>वज्राहतं शैलशिरो यथैव॥ ४२॥<br><br>तस्मिन् हते देवरिपौ मुरारि-<br>रीशं समाराध्य विरूपनेत्रम्।<br>लब्ध्वा च चक्रं प्रवरं महायुधं<br>जगाम देवो निलयं पयोनिधिम्॥ ४३॥<br><br>सोऽयं पुत्र विरूपाक्षो देवदेवो महेश्वरः।<br>तमाराधय चेत् साधो क्षीरेणेच्छसि भोजनम्॥ ४४॥<br><br>तन्मातुर्वचनं श्रुत्वा वीतमन्युसुतो बली।<br>तमाराध्य विरूपाक्षं प्राप्तः क्षीरेण भोजनम्॥ ४५॥<br><br>एवं तवोक्तं परमं पवित्रं<br>संछेदनं शर्वतनोः पुरा वै।<br>तत्तीर्थवर्यं स महासुरो वै<br>समाससादाथ सुपुण्यहेतोः॥ ४६॥ | फिर तो अनुपम पौरुषवाले उस चक्रने दैत्यका मस्तक काट डाला। मस्तक कट जानेपर दैत्य पर्वतके ऊपरसे इस प्रकार गिरा जैसे वज्रसे आहत होकर पर्वतकी ऊँची चोटी गिरती है। उस देव-शत्रुके मारे जानेपर मुरारिने विरूपाक्ष शंकरकी आराधना की और चक्ररूपी श्रेष्ठ महायुध लेकर वे देव क्षीरसागरमें स्थित अपने गृहको चले गये। [वीतमन्युकी धर्मशीला पत्नी आत्रेयी कहती हैं—] पुत्र! ये वही देव-देव महेश्वर विरूपाक्ष हैं। साधो! यदि तुम दूधके साथ भोजन करना चाहते हो तो उनकी सेवा-पूजा करो। माताके उस वचनको सुनकर वीतमन्युके बलवान् पुत्रने उन विरूपाक्ष शंकरकी आराधनाकर दुग्धसे युक्त भोजन प्राप्त किया। [पुलस्त्यजी कहते हैं—] इस प्रकार प्राचीन कालमें घटित हुई शंकरके शरीर-छेदनसे सम्बद्ध परम पवित्र कथाको मैंने तुमसे कहा। उसी श्रेष्ठ तीर्थमें वे महान् असुर प्रह्लाद सुन्दर पुण्य-प्राप्तिके लिये गये॥ ४२—४६॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें बयासीवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ८२ ॥