वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 414, कुल 489 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४०४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ८२ |
|---|
| साग्रं वर्षसहस्रं तु पादाङ्गुष्ठेन तस्थिवान्।<br>गृणंस्तत्परमं ब्रह्म योगिज्ञेयमलक्षणम्॥ २१<br><br>ततः प्रीतः प्रभुः प्रादाद् विष्णवे परमं वरम्।<br>प्रत्यक्षं तेजसं श्रीमान् दिव्यं चक्रं सुदर्शनम्॥ २२<br>तद् दत्त्वा देवदेवाय सर्वभूतभयप्रदम्।<br>कालचक्रनिभं चक्रं शङ्करो विष्णुमब्रवीत्॥ २३<br>वरायुधोऽयं देवेश सर्वायुधनिबर्हणः।<br>सुदर्शनो द्वादशारः षण्णाभिर्द्वियुगो जवी॥ २४<br>आरासंस्थास्त्वमी चास्य देवा मासाश्च राशयः।<br>शिष्टानां रक्षणार्थाय संस्थिता ऋतवश्च षट्॥ २५<br>अग्निः सोमस्तथा मित्रो वरुणोऽथ शचीपतिः।<br>इन्द्राग्नी चाप्यथो विश्वे प्रजापतय एव च॥ २६<br>हनूमांश्चाथ बलवान् देवो धन्वन्तरिस्तथा।<br>तपश्चैव तपस्यश्च द्वादशैते प्रतिष्ठिताः।<br>चैत्राद्याः फाल्गुनान्ताश्च मासास्तत्र प्रतिष्ठिताः॥ २७ | योगियोंद्वारा जाननेयोग्य उस अव्यक्त परम ब्रह्मका जप करते हुए वे एक हजार वर्षसे अधिक समयतक पैरके अँगूठेपर खड़े रहे॥ १८—२१॥<br><br>उसके बाद श्रीमान् महादेवने संतुष्ट होकर विष्णुको परमश्रेष्ठ प्रत्यक्ष तेजसे युक्त दिव्य सुदर्शनचक्र प्रदान किया। सभी प्राणियोंके लिये भयदायक कालचक्रके समान वह चक्र देवाधिदेव विष्णुको देकर शंकरने उनसे कहा—देवेश! बारह अरों, छः नाभियों एवं दो युगोंसे युक्त तीव्रगतिशील और समस्त आयुधोंका नाश करनेवाला सुदर्शन नामका यह श्रेष्ठ आयुध है। सज्जनोंकी रक्षा करनेके लिये इसके अरोंमें देवता, मास, राशियाँ, छः ऋतुएँ, अग्नि, सोम, मित्र, वरुण, शचीपति इन्द्र, अग्नि, विश्वेदेव, प्रजापति, बलवान् हनूमान्, धन्वन्तरि देव, तप एवं तपस्या—ये तथा चैत्रसे लेकर फाल्गुनतकके बारह महीने प्रतिष्ठित हैं॥ २२—२७॥ | | त्वमेवमाधाय विभो वरायुधं<br>शत्रुं सुराणां जहि मा विशङ्किथाः।<br>अमोघ एषोऽमरराजपूजितो<br>धृतो मया नेत्रगतस्तपोबलात्॥ २८<br>इत्युक्तः शम्भुना विष्णुः भवं वचनमब्रवीत्।<br>कथं शम्भो विजानीयाममोघो मोघ एव वा॥ २९<br>यद्यमोघो विभो चक्रः सर्वत्राप्रतिघस्तव।<br>जिज्ञासार्थं तवैवेह प्रक्षेप्स्यामि प्रतीच्छ भोः॥ ३०<br>तद्वाक्यं वासुदेवस्य निशम्यैवाह पिनाकधृक्।<br>यद्येवं प्रक्षिपस्वेति निर्विशङ्केन चेतसा॥ ३१ | विभो! आप इस श्रेष्ठ आयुधको ले करके निर्भीक होकर देवोंके शत्रुको संहार करें। मैंने असुर-राजसे आराधित इस अमोघ आयुधको तपके बलसे अपने नेत्रमें स्थित कर लिया था। शम्भुके इस प्रकार कहनेपर विष्णुने शंकरसे यह वचन कहा—शम्भो! मुझे यह कैसे मालूम होगा कि यह अस्त्र अमोघ या मोघ है? विभो! यदि आपका यह चक्र अमोघ तथा सर्वत्र बिना किसी बाधाके निरन्तर गतिशील है तो इसको जाननेके लिये मैं आपके ही ऊपर इसे चलाता हूँ। आप इसे स्वीकार करें। वासुदेवके उस वचनको सुनकर पिनाकधारीने कहा—यदि ऐसा है तो निश्चिन्त होकर मेरे ऊपर इसे चलाइये॥ २८—३१॥ | | तन्महेशानवचनं श्रुत्वा विष्णुः सुदर्शनम्।<br>मुमोच तेजो जिज्ञासुः शङ्करम्प्रति वेगवान्॥ ३२<br>मुरारिकरविभ्रष्टं चक्रमभ्येत्य शूलिनम्।<br>त्रिधा चकार विश्वेशं यज्ञेशं यज्ञयाजकम्॥ ३३<br>हरं हरिस्त्रिधाभूतं दृष्ट्वा कृत्तं महाभुजः।<br>व्रीडोपप्लुतदेहस्तु प्रणिपातपरोऽभवत्॥ ३४<br>पादप्रणामावनतं वीक्ष्य दामोदरं भवः।<br>प्राह प्रीतिपरः श्रीमानुत्तिष्ठेति पुनः पुनः॥ ३५ | महेशके उस वचनको सुनकर विष्णुने सुदर्शनके तेजको जाननेकी अभिलाषासे उसे वेगसे शंकरके ऊपर चलाया। विष्णुके हाथसे छोड़ा गया वह चक्र शंकरके निकट गया और उन्हें काटकर विश्वेश, यज्ञेश तथा यज्ञयाजकके रूपमें तीन भागोंमें अलग कर दिया। शंकरको तीन खण्डोंमें कटा हुआ देखकर महाबाहु विष्णु संकुचित हो गये। वे (शंकरको) प्रणाम करने लगे। चरणोंमें प्रणत हुए दामोदरको देखकर श्रीमान् भव (शंकर)-ने प्रसन्नतापूर्वक बार-बार 'उठो-उठो' कहते हुए (यह) कहा—॥ ३२—३५॥ |