वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
अध्याय ८३ ] प्रह्लादकी अनुक्रमागत तीर्थ-यात्रामें अनेक तीर्थोंका महत्त्व ४०७
| यत्र देववरः शम्भुर्गणानां तु सुपूजितम्।<br>विश्वरूपमथात्मानं दर्शयामास योगवित्॥ १५<br>तत्र मङ्कुणिकातोये स्नात्वाभ्यर्च्य महेश्वरम्।<br>जगामाद्रिं स सौगन्धिं प्रह्लादो मलयाचलम्॥ १६ | वहाँ योगवित् देववर शम्भुने गणोंसे पूजित अपना विश्वरूप प्रकट किया था; वहाँ मङ्कुणिकाके जलमें स्नान करनेके बाद महेश्वरका पूजनकर प्रह्लाद सुगन्धियुक्त मलयपर्वतपर गये॥ १३—१६॥ | | महाह्रदे ततः स्नात्वा पूजयित्वा च शङ्करम्।<br>ततो जगाम योगात्मा द्रष्टुं विन्ध्ये सदाशिवम्॥ १७ | उसके बाद महाह्रदमें स्नान करनेके पश्चात् शंकरकी पूजाकर योगात्मा प्रह्लाद सदाशिवका दर्शन करनेके लिये विन्ध्यपर्वतपर गये। | | ततो विपाशासलिले स्नात्वाभ्यर्च्य सदाशिवम्।<br>त्रिरात्रं समुपोष्याथ अवन्तीं नगरीं ययौ॥ १८ | उसके बाद विपाशाके जलमें उन्होंने स्नान किया और सदाशिवका पूजन किया। उसके पश्चात् तीन रातोंतक वहाँ निवास करके वे अवन्ती नगरीमें गये। | | तत्र शिप्राजले स्नात्वा विष्णुं सम्पूज्य भक्तितः।<br>श्मशानस्थं ददर्शाथ महाकालवपुर्धरम्॥ १९<br>तस्मिन् हि सर्वसत्त्वानां तेन रूपेण शङ्करः।<br>तामसं रूपमास्थाय संहारं कुरुते वशी॥ २० | वहाँ शिप्राके जलमें स्नान करनेके बाद श्रद्धापूर्वक विष्णुका पूजनकर उन्होंने श्मशानमें स्थित महाकाल-शरीरधारीका दर्शन किया। वहाँ उस रूपमें स्थित आत्मवशी शंकर तामसरूप धारण करके समस्त प्राणियोंका संहार करते हैं॥ १७—२०॥ | | तत्रस्थेन सुरेशेन श्वेतकिर्नाम भूपतिः।<br>रक्षितस्त्वन्तकं दग्ध्वा सर्वभूतापहारिणम्॥ २१ | वहाँपर स्थित हुए सुरेशने सर्वभूतापहारी (समस्त भूतोंका अपहरण करनेवाले) अन्तकको जलाकर श्वेतकि नामक राजाकी रक्षा की थी। | | तत्रातिहृष्टो वसति नित्यं शर्वः सहोमया।<br>वृतः प्रमथकोटीभिर्बहुभिस्त्रिदशार्चितः॥ २२ | करोड़ों गणोंसे घिरे हुए एवं देवोंसे पूजित भगवान् शंकर उमाके साथ अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक वहाँ नित्य निवास करते हैं। | | तं दृष्ट्वाथ महाकालं कालकालान्तकान्तकम्।<br>यमसंयमनं मृत्योर्मृत्युं चित्रविचित्रकम्॥ २३<br>श्मशाननिलयं शम्भुं भूतनाथं जगत्पतिम्।<br>पूजयित्वा शूलधरं जगाम निषधान् प्रति॥ २४ | उन कालोंके काल, अन्तकोंके अन्तक, यमोंके नियामक, मृत्युके मृत्यु, चित्रविचित्र श्मशानके वासी, भूतपति, जगत्पति, शूल धारण करनेवाले शंकरका दर्शन एवं पूजनकर वे निषधदेशकी ओर चले गये॥ २१—२४॥ | | तत्रामरेश्वरं देवं दृष्ट्वा सम्पूज्य भक्तितः।<br>महोदयं समभ्येत्य हयग्रीवं ददर्श सः॥ २५ | वहाँ श्रद्धापूर्वक अमरेश्वर देवका दर्शन एवं अर्चन करनेके बाद उन्होंने महोदयमें जाकर हयग्रीवका दर्शन किया। | | अश्वतीर्थे ततः स्नात्वा दृष्ट्वा च तुरगाननम्।<br>श्रीधरं चैव सम्पूज्य पञ्चालविषयं ययौ॥ २६ | उसके बाद अश्वतीर्थमें स्नान कर अश्वमुखका दर्शन तथा श्रीधरका अर्चन कर वे पाञ्चाल देशमें गये। | | तत्रेश्वरगुणैर्युक्तं पुत्रमर्थपतेरथ।<br>पाञ्चालिकं वशी दृष्ट्वा प्रयागं परतो ययौ॥ २७ | जितेन्द्रिय प्रह्लाद वहाँ ईश्वरीय गुणोंसे सम्पन्न धनपति कुबेरके पुत्र पाञ्चालिकका दर्शनकर प्रयाग चले गये। | | स्नात्वा सन्निहिते तीर्थे यामुने लोकविश्रुते।<br>दृष्ट्वा वटेश्वरं रुद्रं माधवं योगशायिनम्॥ २८<br>द्वावेव भक्तितः पूज्यौ पूजयित्वा महासुरः।<br>माघमासमथोपोष्या ततो वाराणसीं गतः॥ २९ | निकटमें रहनेवाले यमुनाके विख्यात तीर्थमें स्नान करनेके पश्चात् वटेश्वर रुद्र तथा योगशायी माधवका दर्शन एवं श्रद्धापूर्वक उन दोनों पूजनीयोंका अर्चन कर उन महासुरने माघमासमें वहाँ निवास किया। उसके बाद वे वाराणसी चले गये॥ २५—२९॥ | | ततोऽस्यां वरणायां च तीर्थेषु च पृथक् पृथक्।<br>सर्वपापहराह्येषु स्नात्वाऽर्च्य पितृदेवताः॥ ३०<br><br>प्रदक्षिणीकृत्य पुरीं पूज्याविमुक्तकेशवौ।<br>लोलं दिवाकरं दृष्ट्वा ततो मधुवनं ययौ॥ ३१ | उसके बाद समस्त पापोंका अपहरण करनेवाले असी और वरुणाके विभिन्न तीर्थोंमें स्नानके बाद पितरों एवं देवोंका अर्चनकर उन्होंने (वाराणसी) पुरीकी प्रदक्षिणा की। उसके बाद अविमुक्तेश्वर एवं केशवकी पूजा तथा लोलार्कका दर्शन करके वे मधुवन चले गये। |
| ४०८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ८३ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तत्र स्वयम्भुवं देवं ददर्शासुरसत्तमः।<br>तमभ्यर्च्य महातेजाः पुष्करारण्यमागमत्॥ ३२<br>तेषु त्रिष्वपि तीर्थेषु स्नात्वाऽर्च्य पितृदेवताः।<br>पुष्कराक्षमयोगन्धिं ब्रह्माणं चाप्यपूजयत्॥ ३३<br>ततो भूयः सरस्वत्यास्तीर्थे त्रैलोक्यविश्रुते।<br>कोटितीर्थे रुद्रकोटिं ददर्श वृषभध्वजम्॥ ३४ | महातेजस्वी असुरोत्तम प्रह्लाद वहाँ स्वयम्भू देवका दर्शन एवं पूजनकर पुष्करारण्यमें गये। उन तीनों तीर्थोंमें स्नान करनेके बाद पितरों एवं देवोंका पूजन कर उन्होंने अयोगन्धि, पुष्कराक्ष तथा ब्रह्माका अर्चन किया। उसके बाद उन्होंने कोटितीर्थमें सरस्वतीके तटपर स्थित लोकविख्यात रुद्रकोटि वृषभध्वजका दर्शन किया॥ ३०-३४॥ |
| नैमिषेया द्विजवरा मागधेयाः ससैन्धवाः।<br>धर्मारण्याः पौष्करेया दण्डकारण्यकास्तथा॥ ३५<br>चाम्पेया भारुकच्छेया देविकातीरगाश्च ये।<br>ते तत्र शङ्करं द्रष्टुं समायाता द्विजातयः॥ ३६<br>कोटिसंख्यास्तपःसिद्धा हरदर्शनलालसाः।<br>अहं पूर्वमहं पूर्वमित्येवं वादिनो मुने॥ ३७<br>तान् संक्षुब्धान् हरो दृष्ट्वा महर्षीन् दग्धकिल्बिषान्।<br>तेषामेवानुकम्पार्थं कोटिमूर्तिरभूद् भवः॥ ३८ | (कथा है कि प्राचीन समयमें) नैमिषारण्य, मगध, सिन्धुप्रदेश, धर्मारण्य, पुष्कर, दण्डकारण्य, चम्पा, भरुकच्छ एवं देविकाके तटपर रहनेवाले श्रेष्ठ ब्राह्मण वहाँ शंकरका दर्शन करने आये थे। मुने! शिवके दर्शनकी इच्छावाले करोड़ों सिद्ध तपस्वी 'मैं पहले दर्शन करूँगा', 'मैं पहले दर्शन करूँगा' इस प्रकारका विवाद करने लगे। उन निष्पाप महर्षियोंको विशेष अधीर हुआ देखकर शंकरने उनपर कृपाकर करोड़ों मूर्तियाँ धारण कर लीं॥ ३५-३८॥ |
| ततस्ते मुनयः प्रीताः सर्व एव महेश्वरम्।<br>सम्पूजयन्तस्तस्थुर्वै तीर्थं कृत्वा पृथक् पृथक्।<br>इत्येवं रुद्रकोटीति नाम्ना शम्भुरजायत॥ ३९<br>तं ददर्श महातेजाः प्रह्लादो भक्तिमान् वशी।<br>कोटितीर्थे ततः स्नात्वा तर्पयित्वा वसून् पितॄन्।<br>रुद्रकोटिं समभ्यर्च्य जगाम कुरुजाङ्गलम्॥ ४०<br>तत्र देववरं स्थाणुं शङ्करं पार्वतीप्रियम्।<br>सरस्वतीजले मग्नं ददर्श सुरपूजितम्॥ ४१<br>सारस्वतेऽम्भसि स्नात्वा स्थाणुं सम्पूज्य भक्तितः।<br>स्नात्वा दशाश्वमेधे च सम्पूज्य च सुरान् पितॄन्॥ ४२ | उसके बाद वे सभी मुनि हर्षपूर्वक अलग-अलग तीर्थ बनाकर महेश्वरकी पूजा करते हुए निवास करने लगे। इस प्रकार शम्भुका नाम रुद्रकोटि हुआ। महातेजस्वी श्रद्धालु जितेन्द्रिय प्रह्लादने उनका दर्शन किया एवं कोटितीर्थमें स्नानकर वसुओं तथा पितरोंका तर्पण किया। उसके बाद रुद्रकोटिका अर्चनकर वे कुरुजाङ्गलमें चले गये। उन्होंने वहाँ सरस्वतीके जलमें निमग्न हुए देवताओंसे पूजित स्थाणु-पार्वतीपति भगवान् शंकरका दर्शन किया। सरस्वतीके जलमें स्नानकर उन्होंने श्रद्धापूर्वक स्थाणुकी पूजा की तथा दशाश्वमेधमें स्नानकर देवों एवं पितरोंका अर्चन किया॥ ३९-४२॥ |
| सहस्रलिङ्गं सम्पूज्य स्नात्वा कन्याह्रदे शुचिः।<br>अभिवाद्य गुरुं शुक्रं सोमतीर्थं जगाम ह॥ ४३<br>तत्र स्नात्वाऽर्च्य च पितॄन् सोमं सम्पूज्य भक्तितः।<br>क्षीरिकावासमभ्येत्य स्नानं चक्रे महायशाः॥ ४४<br>प्रदक्षिणीकृत्य तरुं वरुणं चार्च्य बुद्धिमान्।<br>भूयः कुरुध्वजं दृष्ट्वा पद्माख्यां नगरीं गतः॥ ४५<br>तत्रार्च्य मित्रावरुणौ भास्करौ लोकपूजितौ।<br>कुमारधारामभ्येत्य ददर्श स्वामिनं वशी॥ ४६ | कन्याह्रदमें स्नान करनेके बाद पवित्र होकर उन्होंने सहस्रलिङ्गका अर्चन किया। इसके बाद (शुक्रतीर्थमें) गुरु शुक्राचार्यको प्रणामकर वे सोमतीर्थ चले गये। वहाँ स्नान करनेके बाद श्रद्धापूर्वक पितरों एवं सोमका अर्चन करके उन महायशस्वीने क्षीरिकावासमें जाकर स्नान किया। वहाँके वृक्षकी प्रदक्षिणाकर तथा वरुणकी पूजा करनेके पश्चात् बुद्धिमान् प्रह्लाद फिर कुरुध्वजका दर्शनकर पद्मा नामकी नगरीमें चले गये। वहाँ लोकपूजित तेजस्वी मित्रावरुणका पूजन करनेके बाद कुमारधारामें जाकर जितेन्द्रिय प्रह्लादने स्वामी कार्तिकेयका दर्शन किया। |
| अध्याय ८३ ] | प्रह्लादकी अनुक्रमागत तीर्थ-यात्रामें अनेक तीर्थोंका महत्त्व | ४०९ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| स्नात्वा कपिलधारायां संतर्प्यार्च्च पितॄन् सुरान्।<br>दृष्ट्वा स्कन्दं समभ्यर्च्य नर्मदायां जगाम ह॥ ४७<br>तस्यां स्नात्वा समभ्यर्च्य वासुदेवं श्रियः पतिम्।<br>जगाम भूधरं द्रष्टुं वाराहं चक्रधारिणम्॥ ४८ | कपिलधारामें स्नान करके पितृतर्पण, देवपूजन एवं स्कन्दका दर्शन तथा अर्चन कर वे नर्मदाके निकट गये। उसमें स्नान करके लक्ष्मीपति वासुदेवकी अर्चना कर वे चक्र धारण करनेवाले भूधर वाराहदेवका दर्शन करने गये॥ ४७-४८॥ |
| स्नात्वा कोकामुखे तीर्थे सम्पूज्य धरणीधरम्।<br>त्रिसौवर्णं महादेवमर्बुदेशं जगाम ह॥ ४९<br>तत्र नारीह्रदे स्नात्वा पूजयित्वा च शङ्करम्।<br>कालिञ्जरं समभेत्य नीलकण्ठं ददर्श सः॥ ५०<br>नीलतीर्थजले स्नात्वा पूजयित्वा ततः शिवम्।<br>जगाम सागरानूपे प्रभासे द्रष्टुमीश्वरम्॥ ५१<br>स्नात्वा च संगमे नद्याः सरस्वत्यार्णवस्य च।<br>सोमेश्वरं लोकपतिं ददर्श स कपर्दिनम्॥ ५२<br>यो दक्षशापनिर्दिग्धः क्षयी ताराधिपः शशी।<br>आप्यायितः शङ्करेण विष्णुना सकपर्दिना॥ ५३ | वे कोकामुखतीर्थमें स्नान और धरणीधरकी पूजा करके अर्बुददेशमें त्रिसौवर्ण महादेवके पास गये। वहाँ उन्होंने नारीह्रदमें स्नान और शंकरकी अर्चना करनेके बाद कालिंजरमें आकर नीलकण्ठका दर्शन किया। नीलतीर्थके जलमें स्नान करनेके बाद शिवका पूजन कर वे समुद्रके तटपर प्रभासतीर्थमें भगवान्का दर्शन करने गये। वहाँ उन्होंने सरस्वती नदी और सागरके संगममें स्नानकर लोकपति कपर्दी सोमेश्वरका दर्शन किया। कपर्दी शंकर एवं विष्णुने दक्षके शापसे दग्ध हुए एवं क्षयरोगसे ग्रसित ताराधिप चन्द्रमाको पूर्ण किया था॥ ४९-५३॥ |
| तावर्च्य देवप्रवरौ प्रजगाम महालयम्।<br>तत्र रुद्रं समभ्यर्च्य प्रजगामोत्तरान् कुरून्॥ ५४<br>पद्मनाभं स तत्रार्च्य सप्तगोदावरं ययौ।<br>तत्र स्नात्वाऽर्च्य विश्वेशं भीमं त्रैलोक्यवन्दितम्॥ ५५<br>गत्वा दारुवने श्रीमान् लिङ्गं स ददर्श ह।<br>तमर्च्य ब्राह्मणीं गत्वा स्नात्वाऽर्च्य त्रिदशेश्वरम्॥ ५६<br>प्लक्षावतरणं गत्वा श्रीनिवासमपूजयत्।<br>ततश्च कुण्डिनं गत्वा सम्पूज्य प्राणतृप्तिदम्॥ ५७<br>शूर्पारके चतुर्बाहुं पूजयित्वा विधानतः।<br>मागधारण्यमासाद्य ददर्श वसुधाधिपम्॥ ५८<br>तमर्चयित्वा विश्वेशं स जगाम प्रजामुखम्।<br>महातीर्थे ततः स्नात्वा वासुदेवं प्रणम्य च॥ ५९<br>शोणं सम्प्राप्य सम्पूज्य रुक्मवर्माणमीश्वरम्।<br>महाकोश्यां महादेवं हंसाख्यं भक्तिमानथ॥ ६०<br>पूजयित्वा जगामाथ सैन्धवारण्यमुत्तमम्।<br>तत्रेश्वरं सुनेत्राख्यं शङ्खशूलधरं गुरुम्।<br>पूजयित्वा महाबाहुः प्रजगाम त्रिविष्टपम्॥ ६१ | उन दोनों श्रेष्ठ देवोंका पूजनकर वे महालय गये; वहाँ रुद्रका पूजन कर वे उत्तरकुरु गये। वहाँ पद्मनाभका अर्चन कर वे सप्तगोदावरतीर्थमें गये। वहाँ स्नान करनेके बाद उन्होंने तीनों लोकोंसे वन्दित भीमविश्वेश्वरका पूजन किया। दारुवनमें जाकर श्रीमान् प्रह्लादने लिङ्गका दर्शन किया। उनकी पूजा करनेके पश्चात् ब्राह्मणी (नदी)-में जाकर उन्होंने स्नान और त्रिदशेश्वर महादेवकी अर्चना की। उसके बाद प्लक्षावतरणमें जाकर उन्होंने श्रीनिवासकी अर्चना की। फिर कुण्डिनमें जाकर प्राणोंके तृप्तिदाता देवका अर्चन किया। उन्होंने शूर्पारकममें चतुर्भुज देवकी भलीभाँति पूजा करनेके बाद मागधारण्यमें जाकर वसुधाधिपका दर्शन किया। उन विश्वेशका पूजन कर वे प्रजामुखमें गये। उसके बाद उन्होंने महातीर्थमें स्नानकर वासुदेवको प्रणाम किया। उन्होंने शोणतटपर जाकर स्वर्णकवच धारण करनेवाले ईश्वरका पूजन किया। उसके बाद श्रद्धालु (प्रह्लाद)-ने महाकोशीमें हंस नामक महादेवका अर्चन किया एवं श्रेष्ठ सैन्धवारण्यमें जाकर शङ्ख तथा शूल धारण करनेवाले सुनेत्र नामक पूज्य ईश्वरका पूजन किया। उसके बाद वे महाबाहु त्रिविष्टप चले गये॥ ५४-६१॥ |
| तत्र देवं महेशानं जटाधरमिति श्रुतम्।<br>तं दृष्ट्वाऽर्च्य हरिं चासौ तीर्थं कनखलं ययौ॥ ६२ | वहाँ जटाधर नामसे प्रसिद्ध महेशान देवका दर्शन और विष्णुकी पूजा कर वे कनखलतीर्थमें गये। |
| ४९० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ८३ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तत्राच्र्य भद्रकालीशं वीरभद्रं च दानवः।<br>धनाधिपं च मेघाङ्कं ययावथ गिरिव्रजम्॥ ६३<br>तत्र देवं पशुपतिं लोकनाथं महेश्वरम्।<br>सम्पूजयित्वा विधिवत्कामरूपं जगाम ह॥ ६४<br>शशिप्रभं देववरं त्रिनेत्रं सम्पूजयित्वा सह वै मृडान्या।<br>जगाम तीर्थप्रवरं महाख्यं तस्मिन् महादेवमपूजयत् सः॥ ६५ | दानव प्रह्लाद वहाँ भद्रकालीश और वीरभद्र तथा धनाधिप मेघाङ्ककी पूजा कर गिरिव्रज चले गये। वहाँ लोकनाथ महेश्वर पशुपति देवका विधिवत् अर्चन कर वे कामरूप चले गये। वहाँ चन्द्रकी कान्तिसे युक्त देवश्रेष्ठ त्रिनेत्र शंकरकी मृडानी (पार्वती)-के साथ विधिवत् अर्चना कर प्रह्लाद श्रेष्ठ महाख्यतीर्थमें गये और वहाँपर (भी) उन्होंने महादेवकी अर्चना की॥ ६२-६५॥ |
| ततस्त्रिकूटं गिरिमत्रिपुत्रं जगाम द्रष्टुं स हि चक्रपाणिणम्।<br>तमीड्य भक्त्या तु गजेन्द्रमोक्षणं जजाप जप्यं परमं पवित्रम्॥ ६६<br>तत्रोष्य दैत्येश्वरसूनुरादरा-<br>न्मासत्रयं मूलफलाम्बुभक्षी।<br>निवेद्य विप्रप्रवरेषु काञ्चनं जगाम घोरं स हि दण्डकं वनम्॥ ६७<br>तत्र दिव्यं महाशाखं वनस्पतिवपुर्धरम्।<br>ददर्श पुण्डरीकाक्षं महाश्वापदवारणम्॥ ६८<br>तस्याधस्तात् त्रिरात्रं स महाभागवतोऽसुरः।<br>स्थितः स्थण्डिलशायी तु पठन् सारस्वतं स्तवम्॥ ६९ | उसके बाद वे अत्रिपुत्र चक्रपाणि विष्णुका दर्शन करनेके लिये त्रिकूटपर्वतपर चले गये और श्रद्धापूर्वक उनकी पूजा कर उन्होंने परम पवित्र जपनेयोग्य गजेन्द्रमोक्षणस्तवका पाठ किया। मूल, फल एवं जलका भक्षण करते हुए दैत्येश्वर-पुत्र प्रह्लादने वहाँ तीन मासतक श्रद्धापूर्वक निवास किया। उसके बाद श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको सुवर्ण दान कर वे घोर दण्डकवन चले गये। वहाँ उन्होंने महान् हिंस्र पशुओंके निवारक, महान् शाखाओंसे युक्त वनस्पतिका शरीर धारण करनेवाले पुण्डरीकाक्षका दर्शन किया। सारस्वतस्तोत्रका पाठ करते हुए महान् विष्णुभक्त असुर प्रह्लादने तीन रातोंतक उसके नीचे बिना विस्तरके चबूतरेपर शयन किया॥ ६६-६९॥ |
| तस्मात् तीर्थवरं विद्वान् सर्वपापप्रमोचनम्।<br>जगाम दानवो द्रष्टुं सर्वपापहरं हरिम्॥ ७०<br>तस्याग्रतो जजापासौ स्तवौ पापप्रणाशनौ।<br>यौ पुरा भगवान् प्राह क्रोडरूपी जनार्दनः॥ ७१<br>तस्मादथागाद् दैत्येन्द्रः शालग्रामं महाफलम्।<br>यत्र संनिहितो विष्णुश्चरेषु स्थावरेषु च॥ ७२<br>तत्र सर्वगतं विष्णुं मत्वा चक्रे रतिं बली।<br>पूजयन् भगवत्पादौ महाभागवतो मुने॥ ७३<br>इयं तवोक्ता मुनिसंघजुष्टा प्रह्लादतीर्थानुगतिः सुपुण्या।<br>यत्कीर्तनाच्छ्रवणात् स्पर्शनाच्च विमुक्तपापा मनुजा भवन्ति॥ ७४ | विद्वान् दानव (प्रह्लादजी) वहाँसे सर्वपापहारी हरिका दर्शन करनेके लिये सर्वपापनाशक श्रेष्ठ तीर्थमें चले गये। उन्होंने उनके सामने प्राचीन कालमें क्रोडरूपी जनार्दनसे कथित पापनाश करनेवाले दो स्तोत्रोंका पाठ किया। उसके बाद वे वहाँसे दैत्येन्द्र (प्रह्लाद) महाफलदायक शालग्रामतीर्थमें गये। वहाँ विष्णु समस्त चर और स्थावर पदार्थोंमें विराजमान हैं। (पुलस्त्यजी कहते हैं—) मुने! वहाँ महान् विष्णुभक्त बलवान् प्रह्लाद विष्णुको सर्वव्यापी जानकर भगवान्के चरणोंकी पूजा करते हुए उन (-की भक्ति)-में परायण हो गये। मैंने तुमसे मुनियोंके समूहोंसे सेवित अत्यन्त पवित्र प्रह्लादकी तीर्थयात्राका वर्णन कर दिया, जिसके कीर्तन, श्रवण एवं स्पर्शसे मनुष्य निष्पाप हो जाते हैं॥ ७०-७४॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें तिरासीवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ८३॥
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अध्याय ८४ ] प्रह्लादके तीर्थयात्रा-प्रसङ्गमें त्रिकूटगिरिस्थित सरोवरमें ग्राहद्वारा गजेन्द्रका पकड़ा जाना ४११
चौरासीवाँ अध्याय
प्रह्लादके तीर्थयात्रा-प्रसङ्गमें त्रिकूटगिरिस्थित सरोवरमें ग्राहद्वारा गजेन्द्रका पकड़ा जाना, गजेन्द्रद्वारा विष्णुकी स्तुति, गज-ग्राहका उद्धार एवं ‘गजेन्द्रमोक्षणस्तोत्र' की फलश्रुति
| Sanskrit | Hindi |
|---|---|
| नारद उवाच<br>यान् जप्यान् भगवद्भक्त्या प्रह्लादो दानवोजपत्।<br>गजेन्द्रमोक्षणादींस्तु चतुरस्तान् वदस्व मे॥ १ | **नारदजीने कहा—**दनुवंशमें उत्पन्न हुए प्रह्लादने भगवान्की भक्तिसे भावित होकर जप (पाठ) करनेयोग्य गजेन्द्रमोक्षणादि जिन चार स्तोत्रोंका जप किया था उन चारों स्तोत्रोंको आप मुझे बतलावें॥ १॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>शृणुष्व कथयिष्यामि जप्यानेतांस्तपोधन।<br>दुःस्वप्ननाशो भवति यैरुक्तैः संश्रुतैः स्मृतैः॥ २<br><br>गजेन्द्रमोक्षणं त्वादौ शृणुष्व तदनन्तरम्।<br>सारस्वतं ततः पुण्यौ पापप्रशमनौ स्तवौ॥ ३<br><br>सर्वरत्नमयः श्रीमांस्त्रिकूटो नाम पर्वतः।<br>सुतः पर्वतराजस्य सुमेरोर्भास्करद्युतेः॥ ४<br><br>क्षीरोदजलवीच्यग्रैर्धौतामलशिलातलः ।<br>उत्थितः सागरं भित्त्वा देवर्षिगणसेवितः॥ ५ | **पुलस्त्यजी बोले—**तपोधन! मैं उन (जप करनेयोग्य) स्तोत्रोंका वर्णन करता हूँ जिनके कहने, सुनने और स्मरण करनेसे दुःस्वप्नोंका विनाश होता है उसे आप सुनें। पहले गजेन्द्रमोक्षणस्तोत्र सुनिये। उसके बाद सारस्वतस्तोत्र एवं उसके बाद पापोंके प्रशमन करनेवाले (दो पवित्र) स्तोत्रोंका वर्णन करूँगा। सूर्यके सदृश कान्तिवाले पर्वतराज सुमेरुका पुत्र सर्वरत्नोंसे भरा श्रीसे सम्पन्न त्रिकूट नामका एक पर्वत है। क्षीरसागरके जलकी लहरोंसे धुले हुए निर्मल शिलातलवाला वह पर्वत समुद्रका भेदन कर उसके ऊपर निकल आया है एवं देवता और ऋषिगण वहाँ सदा निवास करते हैं॥ २—५॥ |
| अप्सरोभिः परिवृतः श्रीमान् प्रस्त्रवणाकुलः।<br>गन्धर्वैः किन्नरैर्यक्षैः सिद्धचारणपन्नगैः॥ ६<br><br>विद्याधरैः सपत्नीकैः संयतैश्च तपस्विभिः।<br>वृकद्वीपिगजेन्द्रैश्च वृतगात्रो विराजते॥ ७<br><br>पुन्नागैः कर्णिकारैश्च बिल्वामलकपाटलैः।<br>चूतनीपकदम्बैश्च चन्दनागुरुचम्पकैः॥ ८<br><br>शालैस्तालैस्तमालैश्च सरलार्जुनपर्पटैः।<br>तथान्यैर्विविधैर्वृक्षैः सर्वतः समलङ्कृतः॥ ९ | अप्सराओंसे घिरा, झरते हुए झरनोंवाला, गन्धर्वों, किन्नरों, यक्षों, सिद्धों, चारणों, पन्नगों, पत्नीके साथ विद्याधरों, संयमका पालन करनेवाले तपस्वियों और भेड़ियों, चीतों एवं गजेन्द्रोंसे भरा-पूरा वह शोभाशाली पर्वत अत्यन्त सुशोभित है। पुंनाग, कर्णिकार, बिल्व, आमलक, पाटल, आम्र, नीप, कदम्ब, चन्दन, अगुरु, चम्पक, शाल, ताल, तमाल, सरल, अर्जुन, पर्पट तथा दूसरे बहुत प्रकारके वृक्षोंसे वह पर्वत सब तरहसे सुशोभित है॥ ६—९॥ |
| ४१२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ८४ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नानाधात्वङ्कितैः शृङ्गैः प्रस्रवद्भिः समन्ततः।<br>शोभितो रुचिरप्रख्यैस्त्रिभिर्विस्तीर्णसानुभिः॥ १०॥<br><br>मृगैः शाखामृगैः सिंहैर्मतङ्गजैश्च सदामदैः।<br>जीवंजीवकसंघुष्टैश्चकोरशिखिनादितैः ॥ ११॥<br><br>तस्यैकं काञ्चनं शृङ्गं सेवते यं दिवाकरः।<br>नानापुष्पसमाकीर्णं नानागन्धाधिवासितम्॥ १२॥<br><br>द्वितीयं राजतं शृङ्गं सेवते यं निशाकरः।<br>पाण्डुराम्बुदसंकाशं तुषारचयसंनिभम्॥ १३॥ | वह पर्वत भाँति-भाँतिकी धातुओंसे चमकती चोटियों, चारों ओरसे बहनेवाले झरनों और अत्यन्त मनोहर तथा सुदूर देशमें फैले हुए तीन शिखरोंसे शोभित है। वह पर्वत हरिण, बन्दर, सिंह, मदसे मतवाले हाथी, चातक, चकोर एवं मोर आदिके शब्दोंसे सदा शब्दायमान होता रहता है। कई प्रकारके फूलोंसे भरे-पूरे एवं तरह-तरहकी सुगन्धोंसे सुवासित उसके एक सुनहले शिखरका सेवन सूर्य करते हैं। सफेद बादलोंकी तरह एवं बर्फके ढेरके समान चाँदी-जैसी उसकी दूसरी चोटीका सेवन चन्द्रमा करते हैं॥ १०—१३॥ |
| वज्रेन्द्रनीलवैडूर्यतेजोभिर्भासयन् दिशः।<br>तृतीयं ब्रह्मसदनं प्रकृष्टं शृङ्गमुत्तमम्॥ १४॥<br><br>न तत् कृतघ्नाः पश्यन्ति न नृशंसा न नास्तिकाः।<br>नातप्ततपसो लोके ये च पापकृतो जनाः॥ १५॥<br><br>तस्य सानुमतः पृष्ठे सरः काञ्चनपङ्कजम्।<br>कारण्डवसमाकीर्णं राजहंसोपशोभितम्॥ १६॥<br><br>कुमुदोत्पलकह्लारैः पुण्डरीकैश्च मण्डितम्।<br>कमलैः शतपत्रैश्च काञ्चनैः समलङ्कृतम्॥ १७॥<br><br>पत्रैर्मरकतप्रख्यैः पुष्पैः काञ्चनसंनिभैः।<br>गुल्मैः कीचकवेणूनां समन्तात् परिवेष्टितम्॥ १८॥ | हीरा, इन्द्रनील, वैडूर्य आदि रत्नोंकी चमकसे दिशाओंको प्रकाशित करनेवाला उसका अत्यन्त उत्तम तीसरा शिखर ब्रह्माका निवास-स्थान है। कृतघ्न, क्रूर, नास्तिक, तपस्यासे हीन एवं लोकमें पापकर्म करनेवाले मनुष्य उसे नहीं देख सकते। उस पर्वतके पीछेकी ओर कमलोंसे युक्त, कारण्डव पक्षियोंसे भरे, राजहंसोंसे सुशोभित, कुमुद, उत्पल, कह्लार, पुण्डरीक आदि अनेक प्रकारके सुनहले कमलोंसे अलङ्कृत एवं सुनहले शतपत्रोंवाले तथा अन्य प्रकारके कमलोंसे (और भी) सुशोभित एवं मरकतके सदृश पत्तों तथा सोनेके समान पुष्पों और हवासे चूँ-चूँ शब्द करनेवाले बाँसके झाड़ोंसे चारों ओरसे घिरा एक सरोवर है॥ १४—१८॥ |
| तस्मिन् सरसि दुष्टात्मा विरूपोऽन्तर्जलेशयः।<br>आसीद् ग्राहो गजेन्द्राणां रिपुराकेकरेक्षणः॥ १९॥ | उस सरोवरके जलमें हाथियोंका शत्रु दुष्ट स्वभावका आधी खुली आँखोंवाला कुरूप एक मगर रहता था। |
| अथ दन्तोज्ज्वलमुखः कदाचिद् गजयूथपः।<br>मदस्रावी जलाकाङ्क्षी पादचारीव पर्वतः॥ २०॥ | एक समय उज्ज्वल दाँतोंवाला, मदस्रावी, पैरसे चलनेवाले पर्वतके समान, मदके गन्धसे वासित |
| वासयन्मदगन्धेन गिरिमैरावतोपमः।<br>गजो ह्यञ्जनसंकाशो मदाच्चलितलोचनः॥ २१॥ | ऐरावतके सदृश अञ्जनकी भाँति काला, मदके कारण चञ्चल नेत्रोंवाला, प्यासा एक गजयूथपति पानी पीनेकी |
| तृषितः पातुकामोऽसौ अवतीर्णश्च तज्जलम्।<br>सलीलः पङ्कजवने यूथमध्यगतश्चरन्॥ २२॥ | इच्छासे उस सरोवरके जलमें पैठा और कमलोंके समूहमें अपने झुंडके बीचमें रहकर क्रीडा करने लगा। |
अध्याय ८४] प्रह्लादके तीर्थयात्रा-प्रसङ्गमें त्रिकूटगिरिस्थित सरोवरमें ग्राहद्वारा गजेन्द्रका पकड़ा जाना ४१३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| गृहीतस्तेन रौद्रेण ग्राहेणाव्यक्तमूर्तिना।<br>पश्यन्तीनां करेणूनां क्रोशन्तीनां च दारुणम्॥ २३<br><br>ह्रियते पङ्कजवने ग्राहेणातिबलीयसा।<br>वारुणैः संयतः पाशैर्निष्प्रयत्नगतिः कृतः॥ २४ | (जलके भीतर) अपने शरीरको छिपाये हुए एक भयंकर ग्राहने उसे पकड़ लिया। करुण स्वरसे चिग्घाड़ कर रही हथिनियोंके देखते-ही-देखते अत्यन्त बलवान् ग्राह उसे कमलोंसे संकुल जलमें खींच ले गया और वरुणके पाशोंसे बाँधकर उसे चेष्टारहित एवं गतिहीन (विवश) कर दिया॥ १९—२४॥ |
| वेष्ट्यमानः सुघोरैस्तु पाशैर्नागो दृढैस्तथा।<br>विस्फूर्य च यथाशक्ति विक्रोशंश्च महारवान्॥ २५<br><br>व्यथितः स निरुत्साहो गृहीतो घोरकर्मणा।<br>परमापदमापन्नो मनसाऽचिन्तयद्धरिम्॥ २६<br><br>स तु नागवरः श्रीमान् नारायणपरायणः।<br>तमेव शरणं देवं गतः सर्वात्मना तदा॥ २७<br><br>एकात्मा निगृहीतात्मा विशुद्धेनान्तरात्मना।<br>जन्मजन्मान्तराभ्यासाद् भक्तिमान् गरुडध्वजे॥ २८<br><br>नान्यं देवं महादेवात् पूजयामास केशवात्।<br>मथितामृतफेनाभं शङ्खचक्रगदाधरम्॥ २९<br><br>सहस्रशुभनामानमादिदेवमजं विभुम्।<br>प्रगृह्य पुष्कराग्रेण काञ्चनं कमलोत्तमम्।<br>आपद्विमोक्षमन्विच्छन् गजः स्तोत्रमुदीरयत्॥ ३० | वहाँ सुदृढ और भयङ्कर पाशोंसे आबद्ध हो जानेके कारण गजराज यथाशक्ति छटपटाकर ऊँचे स्वरसे चिग्घाड़ने लगा। क्रूर कर्मवाले (उस ग्राह)-के द्वारा पकड़े जानेपर वह पीड़ित और उत्साहरहित हो गया। भारी विपत्तिमें पड़कर वह मनसे भगवान् श्रीहरिका ध्यान करने लगा। वह सुन्दर गजराज (पूर्वजन्मका) नारायणका भक्त था। इसलिये वह उस समय सर्वतोभावेन उन्हीं देवकी शरणमें प्रपन्न हो गया। वह गजराज जन्म-जन्मान्तरके अभ्याससे एकाग्र एवं संयतचित्त होकर विशुद्ध अन्तःकरणसे गरुडध्वज भगवान् विष्णुकी भक्तिमें लग गया था। उसने महान् देव केशव (श्रीविष्णु)-के सिवा अन्य देवताओंकी पूजा नहीं की। उस गजने मथे हुए अमृतके फेनके समान कान्तिवाले, शङ्ख तथा चक्र और गदाको धारण करनेवाले, सहस्रों शुभ नामोंवाले, आदिदेव एवं अजन्मा सर्वव्यापक विष्णु (नारायण)-का ध्यान किया और अपने शुण्डके अग्रभागमें एक उत्तम स्वर्ण-कमल लेकर (इस) आपत्तिसे मुक्ति प्राप्त करनेकी इच्छासे इस स्तोत्रका पाठ करने लगा॥ २५—३०॥ |
| गजेन्द्र उवाच<br><br>ॐ नमो मूलप्रकृतये अजिताय महात्मने।<br>अनाश्रिताय देवाय निःस्पृहाय नमोऽस्तु ते॥ ३१<br><br>नम आद्याय बीजाय आर्षेयाय प्रवर्तिने।<br>अनन्तराय चैकाय अव्यक्ताय नमो नमः॥ ३२<br><br>नमो गुह्याय गूढाय गुणाय गुणवर्तिने।<br>अप्रतर्क्याप्रमेयाय अतुलाय नमो नमः॥ ३३<br><br>नमः शिवाय शान्ताय निश्चिन्ताय यशस्विने।<br>सनातनाय पूर्वाय पुराणाय नमो नमः॥ ३४ | गजेन्द्र बोला— ॐ मूलप्रकृतिस्वरूप महान् आत्मा अजित विष्णुभगवान्को नमस्कार है। अन्योंपर आश्रित न रहनेवाले एवं (किसी वस्तुकी प्राप्तिकी) इच्छासे रहित आप देवको नमस्कार है। आद्यबीजस्वरूप, ऋषियोंके आराध्यदेव संसारचक्रके प्रवर्तक आपको नमस्कार है। अन्तररहित—सर्वत्र व्याप्त एकमात्र अव्यक्तको पुनः-पुनः नमस्कार है। गुह्य, गूढ़, गुणस्वरूप एवं गुणोंमें रहनेवालेको नमस्कार है। तर्कसे अतीत, निर्णयात्मिका बुद्धिसे भी नहीं समझे जानेयोग्य, अतुलनीय (आप)-को बार-बार नमस्कार है। प्रथम मङ्गलमय, शान्त, निश्चिन्त, यशस्वी, सनातन और पुराणपुरुषको बार-बार नमस्कार है॥ ३१—३४॥ |
| ४१४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय.८४ |
|---|
| नमो देवाधिदेवाय स्वभावाय नमो नमः।<br>नमो जगत्प्रतिष्ठाय गोविन्दाय नमो नमः॥ ३५<br><br>नमोऽस्तु पद्मनाभाय नमो योगोद्भवाय च।<br>विश्वेश्वराय देवाय शिवाय हरये नमः॥ ३६<br><br>नमोऽस्तु तस्मै देवाय निर्गुणाय गुणात्मने।<br>नारायणाय विश्वाय देवानां परमात्मने॥ ३७<br><br>नमो नमः कारणवामनाय<br>नारायणायामितविक्रमाय ।<br>श्रीशाङ्गिर्चक्रासिगदाधराय<br>नमोऽस्तु तस्मै पुरुषोत्तमाय॥ ३८ | आप देवाधिदेवको नमस्कार है। स्वभावस्वरूपी आपको बार-बार नमस्कार है। जगत्की प्रतिष्ठा करनेवाले (आप)-को नमस्कार है। गोविन्दको बार-बार नमस्कार है। पद्मनाभको नमस्कार है और योगसे उत्पन्न होनेवाले (आप) योगोद्भवको नमस्कार है। विश्वेश्वर, देव, शिव, हरिको नमस्कार है। निर्गुण और गुणात्मा उन (प्रसिद्ध) देवको नमस्कार है। विश्वात्मा, नारायण एवं देवोंके परम आत्मा (आप)-को नमस्कार हैं। कारणवश वामनरूप धारण करनेवाले, अतुल विक्रमवाले नारायणको नमस्कार है। श्री, शार्ङ्ग, चक्र, तलवार एवं गदा धारण करनेवाले उन पुरुषोत्तमको नमस्कार है॥ ३५–३८॥ | | गुह्याय वेदनिलयाय महोदराय<br>सिंहाय दैत्यनिधनाय चतुर्भुजाय।<br>ब्रह्मेन्द्ररुद्रमुनिचारणसंस्तुताय<br>देवोत्तमाय वरदाय नमोऽच्युताय॥ ३९<br><br>नागेन्द्रदेहशयनासनसुप्रियाय<br>गोक्षीरहेमशुकनीलघनोपमाय ।<br>पीताम्बराय मधुकैटभनाशनाय<br>विश्वाय चारुमुकुटाय नमोऽजराय॥ ४०<br><br>नाभिप्रजातकमलस्थचतुर्मुखाय<br>क्षीरोदकार्णवनिकेतयशोधराय ।<br>नानाविचित्रमुकुटाङ्गदभूषणाय<br>सर्वेश्वराय वरदाय नमो वराय॥ ४१<br><br>भक्तिप्रियाय वरदीप्तिसुदर्शनाय<br>फुल्लारविन्दविपुलायतलोचनाय ।<br>देवेन्द्रविघ्नशमनोद्यतपौरुषाय<br>योगेश्वराय विरजाय नमो वराय॥ ४२ | गुह्य, वेदनिलय, महोदर, दैत्यके निधनके लिये सिंहरूप धारण करनेवाले, चार भुजाओंवाले, ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र, मुनि तथा चारणोंके द्वारा स्तुत किये गये वरदानी देवोत्तम अच्युतभगवान्को नमस्कार है। शेषनागके शरीरपर प्रसन्नतापूर्वक शयन करनेवाले, गोदुग्ध, स्वर्ण, शुक एवं नीलघनकी उपमासे युक्त, पीला वस्त्र धारण करनेवाले, मधु-कैटभका विनाश करनेवाले, सुन्दर मुकुट धारण करनेवाले, वृद्धावस्थासे रहित, विश्वकी आत्मा आप देवको नमस्कार है। नाभिसे उत्पन्न हुए कमलपर स्थित ब्रह्मासे युक्त, क्षीरसमुद्रको अपना निवास बनानेवाले, यशस्वी, अनेक प्रकारके विचित्र मुकुट एवं अङ्गद आदि आभूषणोंसे युक्त, वरदानी तथा वरस्वरूप सर्वेश्वरको नमस्कार है। भक्तिके प्रेमी, श्रेष्ठ दीप्तिसे सर्वथा पूर्ण सुन्दर दिखलायी देनेवाले, खिले हुए कमलके समान विशाल आँखोंवाले, देवेन्द्रके विघ्नोंका विनाश करनेके लिये पुरुषार्थ करनेको उद्यत वरस्वरूप, विरज योगेश्वरको नमस्कार है॥ ३९–४२॥ | | ब्रह्मायनाय त्रिदशायनाय<br>लोकाधिनाथाय भवापनाय।<br>नारायणायात्महितायनाय<br>महावराहाय नमस्करोमि॥ ४३<br><br>कूटस्थमव्यक्तमचिन्त्यरूपं<br>नारायणं कारणमादिदेवम्। | ब्रह्मा और अन्य देवोंके आधारस्वरूप, लोकाधिनाथ, भवहर्त्ता, नारायण आत्महितके आश्रयस्थान महावराहको नमस्कार करता हूँ। मैं कूटस्थ, अव्यक्त, अचिन्त्य रूपवाले, कारणस्वरूप, आदिदेव |
अध्याय ८४] प्रह्लादके तीर्थयात्रा-प्रसङ्गमें त्रिकूटगिरिस्थित सरोवरमें ग्राहद्वारा गजेन्द्रका पकड़ा जाना ४१५
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| युगान्तशेषं पुरुषं पुराणं<br>तं देवदेवं शरणं प्रपद्ये ॥ ४४<br>योगेश्वरं चारुविचित्रमौलि-<br>मज्ञेयमग्र्यं प्रकृतेः परस्थम्।<br>क्षेत्रज्ञमात्मप्रभवं वरेण्यं<br>तं वासुदेवं शरणं प्रपद्ये ॥ ४५<br>अदृश्यमव्यक्तमचिन्त्यमव्ययं<br>महर्षयो ब्रह्ममयं सनातनम्।<br>वदन्ति यं वै पुरुषं सनातनं<br>तं देवगुह्यं शरणं प्रपद्ये ॥ ४६ | नारायण, युगान्तमें शेष रहनेवाले पुराणपुरुष, देवाधिदेवकी शरण ग्रहण करता हूँ। मैं योगेश्वर, सुन्दर विचित्र रंगोंसे युक्त मुकुटको धारण करनेवाले, अज्ञेय, सर्वश्रेष्ठ, प्रकृतिके परे अवस्थित, क्षेत्रज्ञ, आत्मप्रभव, वरेण्य उन वासुदेवकी शरण ग्रहण करता हूँ। ब्रह्मर्षिजन जिन्हें अदृश्य, अव्यक्त, अचिन्तनीय, अव्यय, ब्रह्ममय और सनातन पुरुष कहते हैं, उन देवगुह्यकी मैं शरण ग्रहण करता हूँ॥ ४३—४६॥ |
| यदक्षरं ब्रह्म वदन्ति सर्वगं<br>निशम्य यं मृत्युमुखात् प्रमुच्यते।<br>तमीश्वरं तृप्तमनुत्तमैर्गुणैः<br>परायणं विष्णुमुपैमि शाश्वतम् ॥ ४७<br>कार्यं क्रिया कारणमप्रमेयं<br>हिरण्यबाहुं वरपद्मनाभम्।<br>महाबलं वेदनिधिं सुरेशं<br>व्रजामि विष्णुं शरणं जनार्दनम् ॥ ४८<br>किरीटकेयूरमहार्हनिष्कै-<br>र्मण्युत्तमालङ्कृतसर्वगात्रम् ।<br>पीताम्बरं काञ्चनभक्तिचित्रं<br>मालाधरं केशवमभ्युपैमि ॥ ४९<br>भवोद्भवं वेदविदां वरिष्ठं<br>योगात्मनां सांख्यविदां वरिष्ठम्।<br>आदित्यरुद्राश्विवसुप्रभावं<br>प्रभुं प्रपद्येऽच्युतमात्मवन्तम् ॥ ५० | (ब्रह्मवेत्ता) जिसे अक्षर एवं सर्वव्यापी ब्रह्म कहते हैं तथा जिसके श्रवणसे मृत्युके मुखसे मुक्ति मिल जाती है, मैं उसी श्रेष्ठ गुणोंसे युक्त, आत्मतृप्त, शाश्वत आश्रयस्वरूप ईश्वरकी शरण ग्रहण करता हूँ। मैं कार्य, क्रिया और कारणस्वरूप, प्रमाणसे अगम्य, हिरण्यबाहु, नाभिमें श्रेष्ठ कमल धारण करनेवाले, महाबलशाली, वेदोंकी निधि, सुरेश्वर जनार्दन विष्णुकी शरणमें जाता हूँ। मैं किरीट, केयूर एवं अतिमूल्यवान् श्रेष्ठ मणियोंसे सुसज्जित समस्त शरीरवाले, पीताम्बर धारण करनेवाले, स्वर्णिम पत्र-रचनासे अलङ्कृत, माला धारण करनेवाले केशवकी शरणमें जाता हूँ। मैं संसारको उत्पन्न करनेवाले, वेदके जाननेवालोंमें श्रेष्ठ, योगात्माओं तथा सांख्यशास्त्रके ज्ञाताओंमें श्रेष्ठ, आदित्य, रुद्र, अश्विनीकुमार एवं वसुओंके प्रभावसे युक्त अच्युत, आत्मस्वरूप प्रभुकी शरण ग्रहण करता हूँ॥ ४७—५०॥ |
| श्रीवत्साङ्कं महादेवं देवगुह्यमनौपमम्।<br>प्रपद्ये सूक्ष्ममचलं वरेण्यमभयप्रदम् ॥ ५१ | मैं श्रीवत्स-चिह्न धारण करनेवाले, महान् देव, देवताओंमें गुह्य, उपमासे रहित, सूक्ष्म, अचल तथा अभय देनेवाले वरेण्य देवकी शरण ग्रहण करता हूँ। |
| प्रभवं सर्वभूतानां निर्गुणं परमेश्वरम्।<br>प्रपद्ये मुक्तसङ्गानां यतीनां परमां गतिम् ॥ ५२ | मैं समस्त प्राणियोंकी सृष्टि करनेवाले, निर्गुण, निःसङ्ग, यम और नियमका पालन करनेवाले संन्यासियोंकी परम गतिस्वरूप परमेश्वरकी शरण ग्रहण करता हूँ। |
| भगवन्तं गुणाध्यक्षमक्षरं पुष्करेक्षणम्।<br>शरण्यं शरणं भक्त्या प्रपद्ये भक्तवत्सलम् ॥ ५३ | मैं गुणाध्यक्ष, अक्षर, कमलनयन, आश्रय ग्रहण करनेयोग्य, शरण देनेवाले, भक्तोंसे प्रेम रखनेवाले भगवान्की श्रद्धापूर्वक शरण ग्रहण करता हूँ। |
| त्रिविक्रमं त्रिलोकेशं सर्वेषां प्रपितामहम्।<br>योगात्मानं महात्मानं प्रपद्येऽहं जनार्दनम् ॥ ५४ | मैं तीन पगोंमें तीनों लोकोंको नाप लेनेवाले, तीनों लोकोंके ईश्वर, सभीके प्रपितामह, योगकी मूर्ति, महात्मा जनार्दनकी शरण ग्रहण |
| ४१६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ८४ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| आदिदेवमजं शम्भुं व्यक्ताव्यक्तं सनातनम्।<br>नारायणमणीयांसं प्रपद्ये ब्राह्मणप्रियम् ॥ ५५ | करता हूँ। मैं आदिदेव, अजन्मा, शम्भु, व्यक्त और अव्यक्तस्वरूप, सनातन, परम सूक्ष्म, ब्राह्मणप्रिय नारायणकी शरण ग्रहण करता हूँ॥ ५१—५५॥ |
| नमो वराय देवाय नमः सर्वसहाय च।<br>प्रपद्ये देवदेवेशमणीयांसमणोः सदा॥ ५६<br>एकाय लोकतत्त्वाय परतः परमात्मने।<br>नमः सहस्रशिरसे अनन्ताय महात्मने॥ ५७<br><br>त्वामेव परमं देवमृषयो वेदपारगाः।<br>कीर्तयन्ति च यं सर्वे ब्रह्मादीनां परायणम् ॥ ५८<br><br>नमस्ते पुण्डरीकाक्ष भक्तानामभयप्रद।<br>सुब्रह्मण्य नमस्तेऽस्तु त्राहि मां शरणागतम्॥ ५९ | श्रेष्ठ देवको नमस्कार है। सर्वशक्तिमान्को नमस्कार है। मैं सदा सूक्ष्म-से-सूक्ष्म देवदेवेशकी शरण हूँ। लोकतत्त्वस्वरूप, एकमात्र परात्पर परमात्मा, सहस्रशीर्ष महात्मा अनन्तको नमस्कार है। वेदोंके पारगामी ऋषिगण आपको ही परम देव एवं ब्रह्मा आदि देवोंका आश्रयस्थान कहते हैं। हे पुण्डरीकाक्ष! हे भक्तोंको अभयदान देनेवाले! आपको नमस्कार है। सुब्रह्मण्य! आपको नमस्कार है। आप मुझ शरणागतकी रक्षा करें॥ ५६—५९॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>भक्तिं तस्यानुसंचिन्त्य नागस्यामोघसम्भवः।<br>प्रीतिमानभवद् विष्णुः शङ्खचक्रगदाधरः ॥ ६०<br>सान्निध्यं कल्पयामास तस्मिन् सरसि केशवः।<br>गरुडस्थो जगत्स्वामी लोकाधारस्तपोधनः ॥ ६१<br>ग्राहग्रस्तं गजेन्द्रं तं तं च ग्राहं जलाशयात्।<br>उज्जहाराप्रमेयात्मा तरसा मधुसूदनः ॥ ६२<br>स्थलस्थं दारयामास ग्राहं चक्रेण माधवः।<br>मोक्षयामास नागेन्द्रं पाशेभ्यः शरणागतम् ॥ ६३<br>स हि देवलशापेन हूहूर्गन्धर्वसत्तमः।<br>ग्राहत्वमगमत् कृष्णाद् वधं प्राप्य दिवंगतः ॥ ६४ | पुलस्त्यजी बोले—शङ्ख, चक्र एवं गदाको धारण करनेवाले, सफलताके आश्रय विष्णु उस गजेन्द्रकी भक्तिका विचार कर प्रसन्न हो गये। उसके बाद संसारके आधार जगत्स्वामी तपोधन केशव गरुड़पर सवार हो उस सरोवरके निकट गये। अप्रमेय आत्मस्वरूप मधुसूदनने ग्राहके द्वारा पकड़े गये उस गजेन्द्र तथा उस ग्राहको वेगपूर्वक सरोवरसे बाहर निकाला। माधवने पृथ्वीपर स्थित ग्राहको चक्रके द्वारा विदीर्ण कर शरणापन्न गजेन्द्रको बन्धनसे मुक्त कर दिया। देवलके शापसे ग्राह बना हुआ गन्धर्वश्रेष्ठ हूहू भगवान् श्रीकृष्णसे मृत्यु पाकर स्वर्ग चला गया॥ ६०—६४॥ |
| गजोऽपि विष्णुना स्पृष्टो जातो दिव्यवपुः पुमान्।<br>आपद्विमुक्तौ युगपद् गजगन्धर्वसत्तमौ ॥ ६५<br>प्रीतिमान् पुण्डरीकाक्षः शरणागतवत्सलः।<br>अभवत् त्वथ देवेशस्ताभ्यां चैव प्रपूजितः॥ ६६<br>इदं च भगवान् योगी गजेन्द्रं शरणागतम्।<br>प्रोवाच मुनिशार्दूल मधुरं मधुसूदनः ॥ ६७ | भगवान् विष्णुका स्पर्श होनेसे वह हाथी भी दिव्य शरीर धारण करनेवाला पुरुष हो गया। इस प्रकार हाथी एवं गन्धर्वश्रेष्ठ दोनों एक ही साथ संकटसे मुक्त हो गये। मुनिवर! उसके बाद उन दोनोंसे पूजित होकर शरणागतवत्सल पुण्डरीकाक्ष देवेश प्रसन्न हुए और उन योगी भगवान् मधुसूदनने शरणागत गजेन्द्रसे यह मधुर वचन कहा—॥ ६५—६७॥ |
| श्रीभगवानुवाच<br>ये मां त्वां च सरश्चैव ग्राहस्य च विदारणम्।<br>गुल्मकीचकरेणूनां रूपं मेरोः सुतस्य च ॥ ६८ | श्रीभगवान्ने कहा—स्थिर बुद्धिसे पवित्र व्रत धारण करनेवाले जो मनुष्य प्रयत्नपूर्वक मेरा, तुम्हारा तथा इस सरोवरका एवं ग्राहके विदारण, गुल्म, कीचक, रेणु |
अध्याय ८४] प्रह्लादके तीर्थयात्रा-प्रसङ्गमें त्रिकूटगिरिस्थित सरोवरमें ग्राहद्वारा गजेन्द्रका पकड़ा जाना ४१७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अश्वत्थं भास्करं गङ्गां नैमिषारण्यमेव च।<br>संस्मरिष्यन्ति मनुजाः प्रयताः स्थिरबुद्धयः ॥ ६९<br>कीर्तयिष्यन्ति भक्त्या च श्रोष्यन्ति च शुचिव्रताः।<br>दुःस्वप्नो नश्यते तेषां सुस्वप्नश्च भविष्यति ॥ ७०<br>मात्स्यं कौर्मञ्च वाराहं वामनं तार्क्ष्यमेव च।<br>नारसिंहं च नागेन्द्रं सृष्टिप्रलयकारकम् ॥ ७१<br>एतानि प्रातरुत्थाय संस्मरिष्यन्ति ये नराः।<br>सर्वपापैः प्रमुच्यन्ते पुण्यं लोकमवाप्नुयुः ॥ ७२ | एवं मेरु पुत्रके रूप, पीपल, सूर्य, गङ्गा और नैमिषारण्यका श्रद्धापूर्वक स्मरण एवं कीर्तन तथा श्रवण करेंगे उनके दुःस्वप्नका विनाश हो जायगा एवं सुस्वप्नकी सृष्टि होगी। जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर मत्स्यावतार, कूर्मावतार, वराहावतार, वामनावतार, गरुड़, नरसिंहावतार, गजेन्द्र और सृष्टि-प्रलय करनेवाले (भगवान्)-का स्मरण करेंगे, वे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर पुण्यलोकको प्राप्त करेंगे॥ ६८–७२॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>एवमुक्त्वा हृषीकेशो गजेन्द्रं गरुडध्वजः।<br>स्पर्शयामास हस्तेन गजं गन्धर्वमेव च ॥ ७३<br>ततो दिव्यवपुर्भूत्वा गजेन्द्रो मधुसूदनम्।<br>जगाम शरणं विप्र नारायणपरायणः ॥ ७४<br>ततो नारायणः श्रीमान् मोक्षयित्वा गजोत्तमम्।<br>पापबन्धाच्च शापाच्च ग्राहं चाद्भुतकर्मकृत् ॥ ७५<br>ऋषिभिः स्तूयमानश्च देवगुह्यपरायणैः।<br>गतः स भगवान् विष्णुर्दुर्विज्ञेयगतिः प्रभुः ॥ ७६ | पुलस्त्यजी बोले—(नारदजी!) गजेन्द्रसे ऐसा कहकर गरुड़ध्वज हृषीकेशने हाथसे गजेन्द्र और गन्धर्व दोनोंका स्पर्श किया। हे विप्र! उसके बाद नारायणकी आराधना करनेमें लीन गजेन्द्र दिव्य शरीर धारणकर मधुसूदनकी शरणमें चला गया। उसके बाद अद्भुत कर्म करनेवाले श्रीमान् नारायणने गजोत्तम एवं ग्राहको पाप-बन्धसे एवं शापसे मुक्त किया। भगवद्भक्त ऋषियोंद्वारा स्तुत होते हुए वे अविज्ञेय गतिवाले प्रभु भगवान् विष्णु (अपने धाम) चले गये॥ ७३—७६॥ |
| गजेन्द्रमोक्षणं दृष्ट्वा देवाः शक्रपुरोगमाः।<br>ववन्दिरे महात्मानं प्रभुं नारायणं हरिम् ॥ ७७<br>महर्षयश्चारणाश्च दृष्ट्वा गजविमोक्षणम्।<br>विस्मयोत्फुल्लनयनाः संस्तुवन्ति जनार्दनम् ॥ ७८<br>प्रजापतिपतिर्ब्रह्मा चक्रपाणिविचेष्टितम्।<br>गजेन्द्रमोक्षणं दृष्ट्वा इदं वचनमब्रवीत् ॥ ७९<br>य इदं शृणुयान्नित्यं प्रातरुत्थाय मानवः।<br>प्राप्नुयात् परमां सिद्धिं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति ॥ ८० | गजेन्द्रके मोक्षको देखकर इन्द्र आदि देवोंने महात्मा प्रभु नारायण श्रीहरिकी वन्दना की। गजको ग्राहसे मुक्त हुए देखकर विस्मयसे खिले नेत्रोंवाले महर्षियों एवं चारणोंने जनार्दनकी स्तुति की। चक्रपाणिके गजेन्द्रमोक्षणरूपी कर्मको देखकर प्रजापति ब्रह्माने यह वचन कहा—जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर प्रतिदिन इसे सुनेगा, वह परमसिद्धिको प्राप्त करेगा और उसका दुःस्वप्न विनष्ट हो जायगा॥ ७७—८०॥ |
| गजेन्द्रमोक्षणं पुण्यं सर्वपापप्रणाशनम्।<br>कथितेन स्मृतेनाथ श्रुतेन च तपोधन।<br>गजेन्द्रमोक्षणेनेह सद्यः पापात् प्रमुच्यते ॥ ८१<br>एतत्पवित्रं परमं सुपुण्यं<br>संकीर्तनीयं चरितं मुरारेः।<br>यस्मिन् किलोक्ते बहुपापबन्धनात्<br>लभ्येत मोक्षो द्विरदेन यद्वत् ॥ ८२<br>अजं वरेण्यं वरपद्मनाभं<br>नारायणं ब्रह्मनिधिं सुरेशम्। | तपोधन! गजेन्द्रमोक्ष पवित्र और सब प्रकारके पापोंका नाश करनेवाला है। इस गजेन्द्रमोक्षके कहने, स्मरण करने और सुननेसे मनुष्य तुरंत सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। मुरारि विष्णुका यह पवित्र चरित्र पुण्य प्रदान करनेवाला तथा कीर्तन करने योग्य है। इसे कहनेसे मनुष्य गजेन्द्रके समान अनेक पापोंके बन्धनसे मुक्त हो जाता है। मैं अज, वरेण्य, श्रेष्ठ, पद्मनाभ, नारायण, ब्रह्मनिधि, सुरेश, |
| ४१८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ८५ |
|---|
| तं देवगुह्यं पुरुषं पुराणं<br>वन्दाम्यहं लोकपतिं वरेण्यम्॥ ८३<br>पुलस्त्य उवाच<br>एतत् तवोक्तं प्रवरं स्तवानां<br>स्तवं मुरारेर्वरनागकीर्तनम्।<br>यं कीर्त्य संश्रुत्य तथा विचिन्त्य<br>पापापनोदं पुरुषो लभेत॥ ८४ | देवगुह्य, पुराणपुरुष उन लोक-स्वामीकी वन्दना करता हूँ॥ ८१-८३॥<br><br>पुलस्त्यजी बोले—स्तुतियोंमें श्रेष्ठ गजेन्द्रद्वारा कीर्तित मुरारिके इस श्रेष्ठ स्तोत्रको मैंने तुमसे कहा। इसके कीर्तन, श्रवण तथा चिन्तन करनेसे मनुष्य पापोंसे विमुक्ति पा जाता है॥ ८४॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें चौरासीवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ८४॥
पचासीवाँ अध्याय
सारस्वतस्तोत्रके संदर्भमें विष्णुपञ्जरस्तोत्र, सारस्वतस्तव-कथन-प्रसङ्गमें राक्षस-वृत्तान्त, राक्षसग्रस्त मुनिकी अग्नि-प्रार्थना, सारस्वतस्तोत्र और मुनिद्वारा राक्षसको उपदेश
| पुलस्त्य उवाच<br>कश्चिदासीद् द्विजद्रोग्धा पिशुनः क्षत्रियाधमः।<br>परपीडारुचिः क्षुद्रः स्वभावादपि निर्घृणः॥ १<br>पर्यासिताः सदा तेन पितृदेवद्विजातयः।<br>स त्वायुषि परिक्षीणे जज्ञे घोरो निशाचरः॥ २<br>तेनैव कर्मदोषेण स्वेन पापकृतां वरः।<br>क्रूरैश्चक्रे ततो वृत्तिं राक्षसत्वाद् विशेषतः॥ ३<br>तस्य पापरतस्यैवं जग्मुर्वर्षशतानि तु।<br>तेनैव कर्मदोषेण नान्यां वृत्तिमरोचयत्॥ ४<br>यं यं पश्यति सत्त्वं स तं तमादाय राक्षसः।<br>चखाद रौद्रकर्मासौ बाहुगोचरमागतम्॥ ५<br>एवं तस्यातिदुष्टस्य कुर्वतः प्राणिनां वधम्।<br>जगाम च महान् कालः परिणामं तथा वयः॥ ६<br><br>स कदाचित् तपस्यन्तं ददर्श सरितस्तटे।<br>महाभागमूर्ध्वभुजं यथावत्संयतेन्द्रियम्॥ ७ | पुलस्त्यजी बोले—(नारदजी!) ब्राह्मणसे वैर और घृणा रखनेवाला, चुगलखोर, दूसरोंको कष्ट देनेवाला, नीच, स्वभावसे भी निर्दय एक अधम क्षत्रिय था। उसने सदा ही पितरों, देवों एवं द्विजातियोंका अपमान किया। आयु समाप्त होनेपर वह भयंकर राक्षस हुआ। अपने उसी कर्मके दोष एवं विशेषकर राक्षस होनेके कारण वह नीच पापी अशुभ कर्मोंद्वारा जीवनका निर्वाह करता रहा। पापकर्म करते हुए उसके सौ वर्ष बीत गये। उसी कर्म-दोषके कारण जीविकाके दूसरे साधनोंमें उसकी इच्छा नहीं होती थी। वह निन्दनीय कर्म करनेवाला राक्षस जिस प्राणीको देखता उसे अपनी भुजाओंसे पकड़कर खा जाता था॥ १-५॥<br><br>इस प्रकार प्राणियोंका संहार करते हुए उस अतिदुष्टका अधिक समय बीत गया और उसकी अवस्था ढलने लगी। किसी समय उसने नदी-तीरपर बाँह ऊपर उठाये एवं भलीभाँति इन्द्रियोंपर संयत किये हुए महाभाग्यशाली |
अध्याय ८५ ] सारस्वतस्तोत्रके संदर्भमें विष्णुपञ्जरस्तोत्र, सारस्वतस्तव-कथन-प्रसङ्गमें राक्षस-वृत्तान्त ४१९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अनया रक्षया ब्रह्मन् कृतरक्षं तपोनिधिम्।<br>योगाचार्यं शुचिं दक्षं वासुदेवपरायणम्॥ ८<br><br>विष्णुः प्राच्यां स्थितश्चक्री विष्णुर्दक्षिणतो गदी।<br>प्रतीच्यां शार्ङ्गधृग्विष्णुर्विष्णुः खड्गी ममोत्तरे॥ ९<br><br>हृषीकेशो विकोणेषु तच्छिद्रेषु जनार्दनः।<br>क्रोडरूपी हरिर्भूमौ नारसिंहोऽम्बरे मम॥ १०<br><br>क्षुरान्तममलं चक्रं भ्रमत्येतत् सुदर्शनम्।<br>अस्यांशुमाला दुष्प्रेक्ष्या हन्तुं प्रेतनिशाचरान्॥ ११ | ऋषिको तपस्या करते हुए देखा। ब्रह्मन्! तपोनिधि पवित्र दक्ष और वासुदेवकी आराधना करनेमें तत्पर उस योगाचार्यने अपनी रक्षा इस रक्षामन्त्रके द्वारा कर ली थी कि 'पूर्व दिशामें चक्र धारण करनेवाले विष्णु, दक्षिण दिशामें गदा धारण करनेवाले विष्णु, पश्चिम दिशामें शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले विष्णु और उत्तर दिशामें खड्ग धारण करनेवाले विष्णु मेरी रक्षा करें। दिशाओंके कोणों (अग्निकोण, नैर्ऋत्यकोण, वायव्यकोण, ईशानकोणों)-में हृषीकेश, उन दिशाओं और कोणोंके मध्य अवशिष्ट स्थानोंमें जनार्दन, भूमिमें वराहरूप धारण करनेवाले हरि एवं आकाशमें नृसिंहभगवान् मेरी रक्षा करें। प्रेतों एवं निशाचरोंके संहारके लिये छुरेकी धारके समान अत्यन्त तीक्ष्ण यह निर्मल सुदर्शन चक्र घूम रहा है। इसकी किरणमालाका दर्शन होना प्रयत्न करनेपर भी सम्भव नहीं है॥ ६—११॥ |
| गदा चेयं सहस्रार्चिरुद्गमन् पावको यथा।<br>रक्षोभूतपिशाचानां डाकिनीनां च शातनी॥ १२<br><br>शार्ङ्गं विस्फूर्जितं चैव वासुदेवस्य मद्रिपून्।<br>तिर्यङ्मनुष्यकूष्माण्डप्रेतादीन् हन्त्वशेषतः॥ १३<br><br>खड्गधाराज्वलज्ज्योत्स्नानिर्धूता ये ममाहिताः।<br>ते यान्तु सौम्यतां सद्यो गरुडेनेव पन्नगाः॥ १४<br><br>ये कूष्माण्डास्तथा यक्षा दैत्या ये च निशाचराः।<br>प्रेता विनायकाः क्रूरा मनुष्या जृम्भकाः खगाः॥ १५<br><br>सिंहादयो ये पशवो दन्दशूकाश्च पन्नगाः।<br>सर्वे भवन्तु मे सौम्या विष्णुचक्ररवाहताः॥ १६ | ज्वाला उगलनेवाली अग्निकी भाँति हजारों किरणोंसे युक्त यह गदा राक्षसों, भूतों, पिशाचों और डाकिनियोंका संहार करे। वासुदेवका चमकनेवाला शार्ङ्गधनुष मेरे साथ शत्रुता काम करनेवाले हिंसक पशु-पक्षियों, मनुष्यों, दानवों तथा प्रेतोंका जड़-मूलसे विनाश करे। जैसे गरुड़को देखकर साँप शान्त हो जाते हैं, उसी प्रकार (विष्णुके) खड्गकी चमकती हुई तेज धारसे मेरा अहित करनेवाले निष्प्रभ होकर तत्काल शान्त हो जायँ। सारे कूष्माण्ड, यक्ष, दैत्य, निशाचर, प्रेत, विनायक, क्रूर मनुष्य, जृम्भक, पक्षी, सिंहादि पशु एवं तीव्र दाँतोंसे काट खानेवाले सर्प आदि—ये सभी विष्णुके चक्रकी तीव्र गतिसे घायल होकर मेरे प्रति सरल बन जायँ॥ १२—१६॥ |
| चित्तवृत्तिहरा ये च ये जनाः स्मृतिहारकाः।<br>बलौजसां च हर्तारश्छायाविध्वंसकाश्च ये॥ १७<br><br>ये चोपभोगहर्तारो ये च लक्षणनाशकाः।<br>कूष्माण्डास्ते प्रणश्यन्तु विष्णुचक्ररवाहताः॥ १८<br><br>बुद्धिस्वास्थ्यं मनःस्वास्थ्यं स्वास्थ्यमैन्द्रियकं तथा।<br>ममास्तु देवदेवस्य वासुदेवस्य कीर्तनात्॥ १९ | जो चित्तकी वृत्तियों—मानसिक आचार-व्यवहारोंका हरण करनेवाले, स्मृतिको हरण करनेवाले, बल और ओजको अपहरण करनेवाले, कान्तिका विध्वंस करनेवाले, सुखोंका विनाश करनेवाले तथा सुलक्षणोंके विनाशक हैं, वे सभी कूष्माण्डादि (भूत-प्रेत) विष्णुके चक्रकी तीव्र गतिसे घायल होकर नष्ट हो जायँ। देवदेव वासुदेवके कीर्तनसे मुझे बुद्धि, मन तथा इन्द्रियोंकी |
४२० श्रीवामनपुराण [ अध्याय ८५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पृष्ठे पुरस्तादथ दक्षिणोत्तरे<br>विकोणतश्चास्तु जनार्दनो हरिः।<br>तमीड्यमीशानमनन्तमच्युतं<br>जनार्दनं प्रणिपतितो न सीदति॥ २० | सबलता प्राप्त हो। जनार्दन हरि मेरे पीछे, आगे, दायें, बायें एवं दिशाओंके कोणों (अग्निकोण, नैर्ऋत्यकोण, वायव्यकोण, ईशानकोण)-में स्थित रहें। स्तुतियोग्य उन ईशान, अनन्त, अच्युत जनार्दनको साष्टाङ्ग प्रणिपात करनेवाला मनुष्य दुःखी नहीं होता॥ १७—२०॥ |
| यथा परं ब्रह्म हरिस्तथा परं<br>जगत्स्वरूपश्च स एव केशवः।<br>ऋतेन तेनाच्युतनामकीर्तनात्<br>प्रणाशमेतु त्रिविधं ममाशुभम्॥ २१<br>इत्यासावात्मरक्षार्थं कृत्वा वै विष्णुपञ्जरम्।<br>संस्थितोऽसावपि बली राक्षसः समुपाद्रवत्॥ २२<br>ततो द्विजनियुक्तायां रक्षायां रजनीचरः।<br>निर्धूतवेगः सहसा तस्थौ मासचतुष्टयम्॥ २३<br>यावद् द्विजस्य देवर्षे समाप्तिर्वै समाधितः।<br>जाते जप्यावसानेऽसौ तं ददर्श निशाचरम्॥ २४<br>दीनं हतबलोत्साहं कान्दिशीकं हतौजसम्।<br>तं दृष्ट्वा कृपयाविष्टः समाश्वास्य निशाचरम्॥ २५<br>पप्रच्छागमने हेतुं स चाचष्ट यथातथम्।<br>स्वभावमात्मनो द्रष्टुं रक्षया तेजसः क्षितिम्॥ २६<br>कथयित्वा च तद्रक्षः कारणं विविधं ततः।<br>प्रसीदेत्यब्रवीद् विप्रं निर्विण्णः स्वेन कर्मणा॥ २७ | जैसे ब्रह्म श्रेष्ठ है उसी प्रकार हरि भी श्रेष्ठ हैं। वे केशव ही जगत्के (नित्य) स्वरूप हैं। अच्युतभगवान्के नाम-कीर्तनके उस सत्यद्वारा मेरे तीनों प्रकारके अमङ्गल नष्ट हो जायँ। इस प्रकार अपनी रक्षाके लिये विष्णुपञ्जरस्तोत्रका पाठकर वे खड़े थे। वह बलवान् राक्षस उनकी ओर दौड़ा। देवर्षे! उसके बाद द्विजद्वारा रक्षाकी व्यवस्था रहनेपर वह राक्षस गतिहीन होकर चार मासतक, जबतक कि ब्राह्मणकी समाधि समाप्त नहीं हुई तबतक, रुका रहा। जप समाप्त होनेपर उन्होंने उस निशाचरको देखा। उन्होंने दीन, बलसे हीन, उत्साहसे रहित, भयसे आकुल तथा निस्तेज हुए उस निशाचरको देखकर दयापूर्वक उसे निर्भयता प्रदान कर दी तथा उसके आनेका कारण पूछा। उसने अपने यथार्थ स्वभाववश देखनेकी इच्छा एवं आनेपर तेजका नाश होना बताया। उसके बाद दूसरे और भी बहुत-से कारणोंका वर्णन कर अपने कर्मसे दुखी हुए उस राक्षसने ब्राह्मणसे कहा—आप प्रसन्न हो जायँ॥ २१—२७॥ |
| बहूनि पापानि मया कृतानि बहवो हताः।<br>कृताः स्त्रियो मया बह्व्यो विधवाः पुत्रवर्जिताः।<br>अनागसां च सत्त्वानामल्पकानां क्षयः कृतः॥ २८<br>तस्मात् पापादहं मोक्षमिच्छामि त्वत्प्रसादतः।<br>पापप्रशमनायालं कुरु मे धर्मदेशनम्॥ २९<br>पापस्यास्य क्षयकरमुपदेशं प्रयच्छ मे।<br>तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राक्षसस्य द्विजोत्तमः॥ ३०<br>वचनं प्राह धर्मात्मा हेतुमच्च सुभाषितम्।<br>कथं क्रूरस्वभावस्य सतस्तव निशाचर।<br>सहसैव समायाता जिज्ञासा धर्मवर्त्मनि॥ ३१ | मैंने बहुत पाप किये हैं। मैंने बहुत-से मनुष्योंको मारा है। मैंने बहुत-सी स्त्रियोंको विधवा एवं पुत्रसे हीन कर दिया है तथा निर्दोष और निर्बल प्राणियोंका विनाश किया है। आपकी दयासे मैं उन पापोंसे मुक्त होना चाहता हूँ; अतः आप मुझे पापोंका नाश करनेवाले धर्माचरणका उपदेश दें। आप मुझे इस पापको नष्ट करनेवाला उपदेश प्रदान करें। उस राक्षसके उस वचनको सुनकर धर्मात्मा द्विजोत्तमने युक्तियुक्त मधुर वचन कहा—निशाचर! क्रूर स्वभावके होते हुए भी एकाएक धर्मके मार्गमें तुम्हारी जिज्ञासा कैसे उत्पन्न हुई?॥ २८—३१॥ |
| राक्षस उवाच<br>त्वां वै समागतोऽस्म्यद्य क्षिप्तोऽहं रक्षया बलात्।<br>तव संसर्गतो ब्रह्मन् जातो निर्वेद उत्तमः॥ ३२ | राक्षसने कहा— मैं आज आपके निकट आते ही बलपूर्वक रक्षाद्वारा फेंक दिया गया। ब्रह्मन्! आपके सम्पर्कसे मुझे श्रेष्ठ वैराग्य प्राप्त हो गया। |
| अध्याय ८५ ] | सारस्वतस्तोत्रके संदर्भमें विष्णुपञ्जरस्तोत्र, सारस्वतस्तव-कथन-प्रसङ्गमें राक्षस-वृत्तान्त | ४२१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| का सा रक्षा न तां वेद्मि वेद्मि नास्याः परायणम्।<br>यस्याः संसर्गमासाद्य निर्वेदं प्रापितं परम्॥ ३३<br><br>त्वं कृपां कुरु धर्मज्ञ मय्यनुक्रोशमावह।<br>यथा पापापनोदो मे भवत्वार्य तथा कुरु॥ ३४ | मैं यह नहीं समझ पाता हूँ कि जिसका सम्पर्क पाकर मुझे श्रेष्ठ वैराग्य उत्पन्न हुआ है वह रक्षा क्या है और उसका आधार कौन है? धर्मज्ञ! आर्य! आप कृपा करें। मेरे ऊपर दया करें। आप वह कार्य करें जिससे मेरे पापोंका विनाश हो जाय॥ ३२—३४॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>इत्येवमुक्तः स मुनिस्तदा वै तेन रक्षसा।<br>प्रत्युवाच महाभागो विमृश्य सुचिरं मुनिः॥ ३५ | पुलस्त्यजी बोले— उस राक्षसके इस प्रकार कहनेपर उन महाभाग मुनिने बहुत देरतक विचार कर उत्तर दिया॥ ३५॥ |
| ऋषिरुवाच<br>यन्मामाहोपदेशार्थं निर्विण्णः स्वेन कर्मणा।<br>युक्तमेतद्धि पापानां निवृत्तिरुपकारिका॥ ३६<br><br>करिष्ये यातुधानानां न त्वहं धर्मदेशनम्।<br>तान् सम्पृच्छ द्विजान् सौम्य ये वै प्रवचने रताः॥ ३७<br><br>एवमुक्त्वा ययौ विप्रश्चिन्तामाप स राक्षसः।<br>कथं पापापनोदः स्यादिति चिन्ताकुलेन्द्रियः॥ ३८<br><br>न चखाद स सत्त्वानि क्षुधा सम्बाधितोऽपि सन्।<br>षष्ठे षष्ठे तदा काले जन्तुमेकमभक्षयत्॥ ३९<br><br>स कदाचित्क्षुधाविष्टः पर्यटन् विपुले वने।<br>ददर्शाथ फलाहारमागतं ब्रह्मचारिणम्॥ ४०<br><br>गृहीतो रक्षसा तेन स तदा मुनिदारकः।<br>निराशो जीविते प्राह सामपूर्वं निशाचरम्॥ ४१ | ऋषिने उत्तर दिया— अपने कर्मसे पीड़ित होकर तुमने मुझसे जो उपदेश देनेके लिये कहा है, सो ठीक ही है। पापोंकी निवृत्तिसे उपकार होता है। परंतु मैं राक्षसोंको धर्मका उपदेश नहीं दूँगा। अतः भले राक्षस! इस विषयको तुम उन ब्राह्मणोंसे पूछो जो विषयोंपर शास्त्रीय व्याख्यान करते हैं। इस प्रकार कहकर वह ब्राह्मण चला गया। वह राक्षस चिन्तासे आकुल हो गया। मेरे पाप किस प्रकार दूर होंगे—इस विषयकी चिन्तासे उसकी इन्द्रियाँ घबड़ा गयीं। (पर) भूखसे कष्ट पानेपर भी उसने प्राणियोंका भक्षण करना छोड़ दिया। (प्रतिदिन) प्रत्येक छठे समय एक जीवका आहार करने लगा। किसी समय भूखसे पीड़ित होकर विशाल वनमें घूमते हुए उसने फल लेनेके लिये आये हुए एक ब्रह्मचारीको देखा। राक्षसने मुनिपुत्रको पकड़ लिया। उसके बाद जीवनसे निराश होकर उस ब्रह्मचारीने शान्त भाव प्रकट करनेवाला वचन कहा॥ ३६—४१॥ |
| ब्राह्मण उवाच<br>भो भद्र ब्रूहि यत् कार्यं गृहीतो येन हेतुना।<br>तदनुब्रूहि भद्रं ते अयमस्म्यनुशाधि माम्॥ ४२ | ब्राह्मणने कहा— भद्र! यह बतलाओ कि तुम्हारा क्या कार्य है, तुमने मुझे क्यों पकड़ा है? तुम्हारा कल्याण हो। यह मैं प्रस्तुत हूँ। मुझे आज्ञा दो॥ ४२॥ |
| राक्षस उवाच<br>षष्ठे काले त्वमाहारः क्षुधितस्य समागतः।<br>निःश्रोकस्यातिपापस्य निर्घृणस्य द्विजद्रुहः॥ ४३ | राक्षसने कहा— ब्रह्मचारिन्! इस समय मैं ब्राह्मणोंसे द्वेष और घृणा करनेके कारण श्रीसे हीन, अत्यन्त पापी और निर्दय हो गया हूँ। मुझे भूख लगी हुई है। आज छठे समयमें तुम मेरे भोजनके रूपमें आये हो॥ ४३॥ |
| ब्राह्मण उवाच<br>यद्यवश्यं त्वया चाहं भक्षितव्यो निशाचर।<br>आयास्यामि तवाद्यैव निवेद्य गुरवे फलम्॥ ४४ | ब्राह्मणने कहा— निशाचर! यदि अवश्य ही तुम मुझे खाना चाहते हो तो मैं यह फल गुरुको समर्पित |
| ४२२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ८५ |
|---|
| गुर्वर्थमेतदागत्य यत्फल Tow...<br>गुर्वर्थमेतदागत्य यत्फलग्रहणं कृतम्।<br>ममात्र निष्ठा प्राप्तस्य फलानि विनिवेदितुम्॥ ४५<br><br>स त्वं मुहूर्तमात्रं मामत्रैव प्रतिपालय।<br>निवेद्य गुरवे यावदिहागच्छाम्यहं फलम्॥ ४६ | करके अभी आ जाता हूँ। यहाँ आकर गुरुके लिये मैंने जो फल एकत्र किये हैं, उन्हें गुरुको समर्पित करनेके लिये मेरी अत्यन्त श्रद्धा है। अतः तुम यहाँ मुहूर्तमात्र मेरी प्रतीक्षा करो, जबतक कि मैं इन फलोंको गुरुको देकर लौट आता हूँ॥ ४४-४६॥ | | राक्षस उवाच<br>षष्ठे काले न मे ब्रह्मन् कश्चिद् ग्रहणमागतः।<br>प्रतिमुच्येत देवोऽपि इति मे पापजीविका॥ ४७<br>एक एवात्र मोक्षस्य तव हेतुः शृणुष्व तत्।<br>मुञ्चाम्यहमसंदिग्धं यदि तत् कुरुते भवान्॥ ४८ | **राक्षसने कहा—**ब्रह्मन्! छठे समयमें मेरे पंजेमें आया हुआ कोई देवता भी छूट नहीं सकता। यही मेरी पापजीविका है। तुम्हारे छूटनेका एक ही उपाय है, उसे सुनो। यदि तुम उसे करो तो निःसंदेह मैं तुमको छोड़ दूँगा॥ ४७-४८॥ | | ब्राह्मण उवाच<br>गुरोर्यन्न विरोधाय यन्न धर्मोपरोधकम्।<br>तत् करिष्याम्यहं रक्षो यन्न व्रतहरं मम॥ ४९ | **ब्राह्मणने कहा—**राक्षस! यदि वह कार्य गुरुकी सेवाकार्यमें विरोध डालनेवाला, धर्मके विषयमें बाधा डालनेवाला एवं मेरे व्रतको नष्ट करनेवाला न होगा तो मैं उसे करूँगा केवल तुमसे अपने छुटकारेके लिये नहीं॥ ४९॥ | | राक्षस उवाच<br>मया निसर्गतो ब्रह्मन् जातिदोषाद् विशेषतः।<br>निर्विवेकेन चित्तेन पापकर्म सदा कृतम्॥ ५०<br><br>आबाल्यान्मम पापेषु न धर्मेषु रतं मनः।<br>तत्पापसंक्षयान्मोक्षं प्राप्नुयां येन तद् वद॥ ५१<br><br>यानि पापानि कर्माणि बालत्वाच्चरितानि च।<br>दुष्टां योनिमिमां प्राप्य तन्मुक्तिं कथय द्विज॥ ५२<br><br>यद्येतद् द्विजपुत्र त्वं समाख्यास्यस्यशेषतः।<br>ततः क्षुधार्तान्मत्तस्त्वं नियतं मोक्षमाप्स्यसि॥ ५३<br><br>न चेत् तत्पापशीलोऽहमत्यर्थं क्षुत्पिपासितः।<br>षष्ठे काले नृशंसात्मा भक्षयिष्यामि निर्घृणः॥ ५४ | **राक्षसने कहा—**ब्रह्मन्! मैंने स्वभावतः तथा विशेषतः जातिदोषके कारण और विचारशक्तिसे रहित मनके कारण सदा पापका कार्य किया है। बाल्यावस्थासे ही मेरा मन धर्ममें नहीं, अपितु पापमें आसक्त रहा है। इसलिये तुम वह उपाय बताओ जिससे पापका नाश होकर मेरी मुक्ति हो जाय। द्विज! इस पापयोनिको पाकर अज्ञानवश मैंने जिन पापकर्मोंका आचरण किया है, उनसे छुटकारा पानेका उपाय बतलाओ। ब्राह्मणपुत्र! यदि तुम मुझे यह भलीभाँति बतलाओ तो मुझ भूखसे पीड़ित हुएसे निःसंदेह छुटकारा पा जाओगे। यदि ऐसा नहीं हुआ तो अत्यन्त भूखा-प्यासा निर्दय हुआ मैं छठे समयमें (प्राप्त हुए) तुमको खा जाऊँगा॥ ५०-५४॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>एवमुक्तो मुनिसुतस्तेन घोरेण रक्षसा।<br>चिन्तामवाप महतीमशक्तस्तदुदीरणे॥ ५५ | **पुलस्त्यजी बोले—**उस भयंकर राक्षसके इस प्रकार कहनेपर मुनिपुत्र (राक्षसकी पापसे मुक्तिका उपाय) कहनेमें असमर्थ होनेसे बहुत चिन्तित हुआ। |
| अध्याय ८५ ] | सारस्वतस्तोत्रके संदर्भमें विष्णुपञ्जरस्तोत्र, सारस्वतस्तव-कथन-प्रसङ्गमें राक्षस-वृत्तान्त | ४२३ | | :--- | :--- |
| स विमृश्य चिरं विप्रः शरणं जातवेदसम्।<br>जगाम ज्ञानदानाय संशयं परमं गतः॥ ५६<br><br>यदि शुश्रूषितो वह्निर्गुरुशुश्रूषणादनु।<br>व्रतानि वा सुचीर्णानि सप्तार्चिः पातु मां ततः॥ ५७<br><br>न मातरं न पितरं गौरवेण यथा गुरुम्।<br>सर्वदैवावगच्छामि तथा मां पातु पावकः॥ ५८<br><br>यथा गुरुं न मनसा कर्मणा वचसाऽपि वा।<br>अवजानाम्यहं तेन पातु सत्येन पावकः॥ ५९<br><br>इत्येवं मनसा सत्यान् कुर्वतः शपथान् पुनः।<br>सप्तार्चिषा समादिष्टा प्रादुरासीत् सरस्वती॥ ६०<br><br>सा प्रोवाच द्विजसुतं राक्षसग्रहणाकुलम्।<br>मा भैर्द्विजसुताहं त्वां मोक्षयिष्यामि संकटात्॥ ६१<br><br>यदस्य रक्षसः श्रेयो जिह्वाग्रे संस्थिता तव।<br>तत् सर्वं कथयिष्यामि ततो मोक्षमवाप्स्यसि॥ ६२<br><br>अदृश्या रक्षसा तेन प्रोक्त्वेत्थं सा सरस्वती।<br>अदर्शनं गता सोऽपि द्विजः प्राह निशाचरम्॥ ६३ | बहुत समयतक विचार करनेके पश्चात् अत्यन्त संशययुक्त ब्राह्मण ज्ञानदानके हेतु अग्निके पास गया। (उसने कहा—) अग्निदेव! गुरुकी सेवा करनेके बाद यदि मैंने आपकी सेवा की हो तथा व्रतोंका अच्छी तरह पालन किया हो तो हे सप्तार्चि! आप मेरी रक्षा करें। अग्निदेव! यदि मैंने गौरवमें माता-पितासे गुरुको अधिक महत्त्व दिया हो तो आप मेरी रक्षा करें। यदि मन, कर्म एवं वाणीसे भी मैंने गुरुका अनादर न किया हो तो उस सत्यके कारण अग्निदेव आप मेरी रक्षा करें। इस प्रकार मनसे सत्य शपथोंके लेनेवाले उसके सामने अग्निदेवके आदेशसे सरस्वती प्रकट हुईं। उन्होंने राक्षसके द्वारा पकड़े जानेके कारण व्याकुल हुए ब्राह्मणके पुत्रसे कहा—ब्राह्मणपुत्र! डरो मत। मैं तुम्हें संकटसे मुक्त करूँगी। तुम्हारी जीभके अग्रभागपर स्थित होकर मैं राक्षसके कल्याणकारी समस्त विषयोंका कथन करूँगी। उसके बाद तुम मुक्त हो जाओगे। उस राक्षससे अदृश्य रहती हुई सरस्वती ऐसा कहनेके बाद अन्तर्धान हो गयी। उस ब्राह्मणने निशाचरसे (सरस्वतीकी शक्तिसे) कहा—॥ ५५—६३॥ | | ब्राह्मण उवाच<br>श्रूयतां तव यच्छ्रेयस्तथाऽन्येषां च पापिनाम्।<br>समस्तपापशुद्ध्यर्थं पुण्योपचयदं च यत्॥ ६४ | ब्राह्मणने कहा—(निशाचर!) सुनो! तुम्हारे और दूसरे अन्य पापियोंके लिये कल्याणकर सारे पापोंकी शुद्धि एवं पुण्य बढ़ानेवाले तत्त्वोंको मैं कहता हूँ। | | प्रातरुत्थाय जप्तव्यं मध्याह्नेऽह्नःक्षयेऽपि वा।<br>असंशयं सदा जप्यो जपतां पुष्टिशान्तिदः॥ ६५ | प्रातःकाल उठकर, मध्याह्नमें अथवा सायंकाल इस जपने योग्य स्तोत्रका सदा जप करना चाहिये। यह जप जप करनेवालेको निःसंदेह शान्ति एवं पुष्टि प्रदान करता है। | | ॐ हरिं कृष्णं हृषीकेशं वासुदेवं जनार्दनम्।<br>प्रणतोऽस्मि जगन्नाथं स मे पापं व्यपोहतु॥ ६६ | ॐ, हरि, कृष्ण, हृषीकेश, वासुदेव, जनार्दन, जगन्नाथको मैं प्रणाम करता हूँ। वे मेरे पापको दूर करें। | | चराचरगुरुं नाथं गोविन्दं शेषशायिनम्।<br>प्रणतोऽस्मि परं देवं स मे पापं व्यपोहतु॥ ६७ | चर और अचरके गुरु, नाथ, शेषशय्यापर विराजमान, परमदेव गोविन्दको मैं प्रणाम करता हूँ। वे मेरे पापको दूर करें। | | शङ्खिनं चक्रिणं शार्ङ्गधारिणं स्रग्धरं परम्।<br>प्रणतोऽस्मि पतिं लक्ष्म्याः स मे पापं व्यपोहतु॥ ६८ | शङ्ख धारण करनेवाले, चक्र धारण करनेवाले, शार्ङ्ग धारण करनेवाले एवं उत्तम मालाधारी, लक्ष्मीपतिको मैं प्रणाम करता हूँ। वे मेरे |
| ४२४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ८५ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| दामोदरमुदाराक्षं पुण्डरीकाक्षमच्युतम्।<br>प्रणतोऽस्मि स्तुतं स्तुत्यैः स मे पापं व्यपोहतु॥ ६९ | पापको दूर करें। दामोदर, उदाराक्ष, पुण्डरीकाक्ष, स्तवनीय स्तोत्रोंसे स्तुत अच्युतको मैं नमस्कार करता हूँ। वे मेरे पापोंको दूर करें। नारायण, नर, शौरि, माधव, मधुसूदन एवं धराको धारण करनेवाले भगवान्को मैं प्रणाम करता हूँ। वे मेरे पापको दूर करें॥ ६४—७०॥ |
| नारायणं नरं शौरिं माधवं मधुसूदनम्।<br>प्रणतोऽस्मि धराधारं स मे पापं व्यपोहतु॥ ७० | |
| केशवं चन्द्रसूर्याक्षं कंसकेशिनिषूदनम्।<br>प्रणतोऽस्मि महाबाहुं स मे पापं व्यपोहतु॥ ७१ | चन्द्र एवं सूर्यरूपी नेत्रोंवाले, कंस और केशीको मारनेवाले महाबाहु केशवको मैं प्रणाम करता हूँ। वे मेरे पापोंको दूर करें। वक्षःस्थलपर श्रीवत्स धारण करनेवाले, श्रीश, श्रीधर, श्रीनिकेतन एवं श्रीकान्तको मैं प्रणाम करता हूँ। वे मेरे पापोंको दूर करें। संयम करनेवाले लोग जिन सब प्राणियोंके स्वामी, अक्षर एवं अनिर्देश्य वासुदेवका ध्यान करते हैं मैं उनकी शरण ग्रहण करता हूँ। (संन्यासी लोग) अन्य समस्त सहारोंसे मनकी गतिको लौटाकर जिस वासुदेव नामक ईश्वरका ध्यान करते हैं, मैं उनकी शरणमें जाता हूँ। मैं सर्वगत, सर्वभूत, सर्वाधार ईश्वर एवं वासुदेव नामक परब्रह्मकी शरण जाता हूँ। श्रेष्ठ बुद्धिसम्पन्न लोग कर्मका नाश होनेपर जिन अदृष्ट, अविनाशी, परमात्मदेवको प्राप्त करते हैं, मैं उनकी शरणमें जाता हूँ। पुण्य तथा पापसे रहित योगीलोग जिन्हें पाकर फिर जन्म ग्रहण नहीं करते, मैं उनकी शरणमें जाता हूँ। ब्रह्माका रूप धारण कर देवता, दैत्य एवं मनुष्योंसे युक्त सारे जगत्की सृष्टि करनेवाले अच्युत देवकी मैं शरणमें जाता हूँ॥ ७१—७८॥ |
| श्रीवत्सवक्षसं श्रीशं श्रीधरं श्रीनिकेतनम्।<br>प्रणतोऽस्मि श्रियः कान्तं स मे पापं व्यपोहतु॥ ७२ | |
| यमीशं सर्वभूतानां ध्यायन्ति यतयोऽक्षरम्।<br>वासुदेवमनिर्देश्यं तमस्मि शरणं गतः॥ ७३ | |
| समस्तालम्बनेभ्यो यं व्यावृत्य मनसो गतिम्।<br>ध्यायन्ति वासुदेवाख्यं तमस्मि शरणं गतः॥ ७४ | |
| सर्वगं सर्वभूतं च सर्वस्याधारमीश्वरम्।<br>वासुदेवं परं ब्रह्म तमस्मि शरणं गतः॥ ७५ | |
| परमात्मानमव्यक्तं यं प्रयान्ति सुमेधसः।<br>कर्मक्षयेऽक्षयं देवं तमस्मि शरणं गतः॥ ७६ | |
| पुण्यपापविनिर्मुक्ता यं प्रविश्य पुनर्भवम्।<br>न योगिनः प्राप्नुवन्ति तमस्मि शरणं गतः॥ ७७ | |
| ब्रह्मा भूत्वा जगत् सर्वं सदेवासुरमानुषम्।<br>यः सृजत्यच्युतो देवस्तमस्मि शरणं गतः॥ ७८ | |
| ब्रह्मत्वे यस्य वक्त्रेभ्यश्चतुर्वेदमयं वपुः।<br>प्रभुः पुरातनो जज्ञे तमस्मि शरणं गतः॥ ७९ | ब्रह्माका रूप धारण करनेपर जिनके मुखोंसे चारों वेदोंसे युक्त शरीर धारण करनेवाले पुरातन प्रभुका आविर्भाव हुआ था, मैं उनकी शरणमें जाता हूँ। मैं सृष्टिके लिये स्रष्टारूपसे स्थित ब्रह्मरूप धारण करनेवाले सनातन जगद्योनि जनार्दनको प्रणाम करता हूँ। सृष्टिकर्ता होकर योगिरूपमें विद्यमान एवं स्थितिकालमें राक्षसोंका नाश करनेवाले आदिपुरुष जनार्दनको मैं प्रणाम करता हूँ। मैं उन आदिपुरुष ईश्वर जनार्दन विष्णुको प्रणाम करता हूँ, जिन्होंने पृथिवीको धारण किया है, दैत्योंको |
| ब्रह्मरूपधरं देवं जगद्योनिं जनार्दनम्।<br>स्रष्टृत्वे संस्थितं सृष्टौ प्रणतोऽस्मि सनातनम्॥ ८० | |
| स्रष्टा भूत्वा स्थितो योगी स्थितावसूरसूदनः।<br>तमादिपुरुषं विष्णुं प्रणतोऽस्मि जनार्दनम्॥ ८१ | |
| धृता मही हता दैत्याः परित्रातास्तथा सुराः।<br>येन तं विष्णुमाद्येशं प्रणतोऽस्मि जनार्दनम्॥ ८२ |
अध्याय ८५] सारस्वतस्तोत्रके संदर्भमें विष्णुपञ्जरस्तोत्र, सारस्वतस्तव-कथन-प्रसङ्गमें राक्षस-वृत्तान्त ४२५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यज्ञैर्यजन्ति यं विप्रा यज्ञेशं यज्ञभावनम्।<br>तं यज्ञपुरुषं विष्णुं प्रणतोऽस्मि सनातनम्॥ ८३<br><br>पातालवीथीभूतानि तथा लोकान् निहन्ति यः।<br>तमन्तपुरुषं रुद्रं प्रणतोऽस्मि सनातनम्॥ ८४<br><br>सम्भक्षयित्वा सकलं यथासृष्टमिदं जगत्।<br>यो वै नृत्यति रुद्रात्मा प्रणतोऽस्मि जनार्दनम्॥ ८५<br><br>सुरासुराः पितृगणाः यक्षगन्धर्वराक्षसाः।<br>सम्भूता यस्य देवस्य सर्वगं तं नमाम्यहम्॥ ८६ | मारा है एवं देवताओंकी रक्षा की है। ब्राह्मणलोग यज्ञोंके द्वारा जिनकी अर्चना करते हैं, मैं उन यज्ञपुरुष, यज्ञभावन, यज्ञेश, सनातन विष्णुको प्रणाम करता हूँ। मैं पाताललोकमें रहनेवाले प्राणियों तथा लोकोंका विनाश करनेवाले उन अन्तपुरुष सनातन रुद्रको प्रणाम करता हूँ। सृष्ट किये गये इस समस्त जगत्का भक्षणकर नृत्य करनेवाले रुद्रात्मा जनार्दनको मैं प्रणाम करता हूँ। मैं सर्वत्र गमन करनेवाले देवको प्रणाम करता हूँ, जिनसे समस्त सुर, असुर, पितृगण, यक्ष, गन्धर्व एवं राक्षस उत्पन्न हुए हैं॥ ७९-८६॥ |
| समस्तदेवाः सकला मनुष्याणां च जातयः।<br>यस्यांशभूता देवस्य सर्वगं तं नतोऽस्म्यहम्॥ ८७<br><br>वृक्षगुल्मादयो यस्य तथा पशुमृगादयः।<br>एकांशभूता देवस्य सर्वगं तं नमाम्यहम्॥ ८८<br><br>यस्मान्नान्यत् परं किञ्चिद् यस्मिन् सर्वं महात्मनि।<br>यः सर्वमध्यगोऽनन्तः सर्वगं तं नमाम्यहम्॥ ८९<br><br>यथा सर्वेषु भूतेषु गूढोऽग्निरिव दारुषु।<br>विष्णुरेवं तथा पापं ममाशेषं प्रणश्यतु॥ ९०<br><br>यथा विष्णुमयं सर्वं ब्रह्मादि सचराचरम्।<br>यच्च ज्ञानपरिच्छेद्यं पापं नश्यतु मे तथा॥ ९१<br><br>शुभाशुभानि कर्माणि रजःसत्त्वतमांसि च।<br>अनेकजन्मकर्मोत्थं पापं नश्यतु मे तथा॥ ९२<br><br>यन्निशायां च यत्प्रातर्यन्मध्याह्नापराह्नयोः।<br>सन्ध्ययोश्च कृतं पापं कर्मणा मनसा गिरा॥ ९३<br><br>यत्तिष्ठता यद् व्रजता यच्च शय्यागतेन मे।<br>कृतं यदशुभं कर्म कायेन मनसा गिरा॥ ९४<br><br>अज्ञानतो ज्ञानतो वा मदाच्चलितमानसैः।<br>तत् क्षिप्रं विलयं यातु वासुदेवस्य कीर्तनात्॥ ९५ | मैं उन सर्वव्यापी देवको प्रणाम करता हूँ जिनके अंशसे सम्पूर्ण देव एवं मनुष्योंकी सभी जातियाँ उत्पन्न हुई हैं। वृक्ष, गुल्म आदि तथा पशु, मृग आदि जिन परमदेवके एक अंशरूप हैं, मैं उन सर्वगामी देवको प्रणाम करता हूँ। मैं उन सर्वव्यापी देवको प्रणाम करता हूँ जिनसे पृथक् कोई वस्तु नहीं है एवं जिन महात्मामें सम्पूर्ण पदार्थ स्थित हैं तथा जो सभीके अन्तःकरणमें रहनेवाले और अनन्त हैं। काष्ठमें अग्निके समान समस्त प्राणियोंमें व्याप्त विष्णु मेरे सम्पूर्ण पापोंको नष्ट करें; क्योंकि विष्णुसे ब्रह्मा आदि समस्त चराचरात्मक जगत् व्याप्त है तथा जो ज्ञानके द्वारा धारण करने योग्य हैं। इसलिये मेरे पाप नष्ट हो जायें। (विष्णुकी कृपासे) मेरे शुभ तथा अशुभ कर्म, सत्त्व, रज एवं तमोगुण तथा अनेक जन्मोंके कर्मसे उत्पन्न पाप नष्ट हो जायें। शरीर, कर्म, मन एवं वाणीके द्वारा रात्रिमें तथा प्रातःकाल, मध्याह्नकाल, अपराह्नकाल और सन्ध्याकालमें चलते, बैठते और शयन करते हुए ज्ञान या अज्ञानपूर्वक अथवा निरहंकार मनसे मैंने जो अशुभ (पाप) कर्म किये हों वे वासुदेवके नाम-कीर्तनसे शीघ्र नष्ट हो जायें॥ ८७-९५॥ |
| परदारपरद्रव्यवाञ्छाद्रोहोद्भवं च यत्।<br>परपीड़ोद्भवं निन्दां कुर्वता यन्महात्मनाम्॥ ९६<br><br>यच्च भोज्ये तथा पेये भक्ष्ये चोष्ये विलेहने।<br>तद् यातु विलयं तोये यथा लवणभाजनम्॥ ९७ | परस्त्री और परधनकी कामना, द्रोह, परपीड़ा, महात्माओंकी निन्दा तथा (निषिद्ध) भोज्य, पेय, भक्ष्य, चोष्य एवं चाटनेवाले वस्तुके कारण उत्पन्न सम्पूर्ण पाप इस प्रकार नष्ट हो जायें जैसे लवण रखनेवाला मिट्टीका |
| ४२६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ८५ |
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| यद् बाल्ये यच्च कौमारे यत् पापं यौवने मम।<br>वयःपरिणतौ यच्च यच्च जन्मान्तरे कृतम्॥ ९८<br>तन्नारायण गोविन्द हरिकृष्णेश कीर्तनात्।<br>प्रयातु विलयं तोये यथा लवणभाजनम्॥ ९९<br>विष्णवे वासुदेवाय हरये केशवाय च।<br>जनार्दनाय कृष्णाय नमो भूयो नमो नमः॥ १००<br>भविष्यन्नरकघ्नाय नमः कंसविघातिने।<br>अरिष्टकेशिचाणूरदेवारिक्षयिणे नमः॥ १०१<br>कोऽन्यो बलेर्वञ्चयिता त्वामृते वै भविष्यति।<br>कोऽन्यो नाशयति बलाद् दर्पं हैहयभूपतेः॥ १०२<br>कः करिष्यत्यथाऽन्यो वै सागरे सेतुबन्धनम्।<br>वधिष्यति दशग्रीवं कः सामात्यपुरःसरम्॥ १०३ | पात्र पानीमें (पड़ते ही) नष्ट हो जाता है। नारायण, गोविन्द, हरि, कृष्ण, ईशका कीर्तन करनेसे बाल्यकाल, कुमारावस्था, यौवन, वार्द्धक्य एवं जन्मान्तरमें किये गये मेरे सम्पूर्ण पाप इस प्रकार नष्ट हो जायँ जैसे जलमें नमक रखनेवाला मिट्टीका बर्तन विलीन हो जाता (गल जाता) है। विष्णु, वासुदेव, हरि, केशव, जनार्दन, कृष्णको पुनः-पुनः प्रणाम है। भावी नरकका नाश करनेवाले तथा कंसको मारनेवालेको नमस्कार है। अरिष्ट, केशी एवं चाणूर आदि राक्षसोंके नष्ट करनेवालेको नमस्कार है। आपके सिवाय बलिको कौन छल सकता था एवं आपके बिना हैहयनरेशके घमंडको कौन नष्ट कर सकता था? आपके सिवाय समुद्रमें सेतुको कौन बाँध सकता था तथा मन्त्री आदिके साथ ही दशग्रीव रावणको कौन मार सकता था॥ ९६—१०३॥ | | कस्त्वामृतेऽन्यो नन्दस्य गोकुले रतिमेष्यति।<br>प्रलम्बपूतनादीनां त्वामृते मधुसूदन।<br>निहन्ताऽप्यथवा शास्ता देवदेव भविष्यति॥ १०४<br>जपन्नेवं नरः पुण्यं वैष्णवं धर्ममुत्तमम्।<br>इष्टानिष्टप्रसङ्गेभ्यो ज्ञानतोऽज्ञानतोऽपि वा॥ १०५<br>कृतं तेन तु यत् पापं सप्तजन्मान्तराणि वै।<br>महापातकसंज्ञं वा तथा चैवोपपातकम्॥ १०६<br>यज्ञादीनि च पुण्यानि जपहोमव्रतानि च।<br>नाशयेद् योगिनां सर्वमामपात्रमिवाम्भसि॥ १०७<br>नरः संवत्सरं पूर्णं तिलपात्राणि षोडश।<br>अहन्यहनि यो दद्यात् पठत्येच्च तत्समम्॥ १०८<br>अविलुप्तब्रह्मचर्यं सम्प्राप्य स्मरणं हरेः।<br>विष्णुलोकमवाप्नोति सत्यमेतन्मयोदितम्॥ १०९<br>यथैतत् सत्यमुक्तं मे न ह्यल्पमपि मे मृषा।<br>राक्षसस्त्रस्तसर्वाङ्गं तथा मामेष मुञ्चतु॥ ११० | मधुसूदन! आपके सिवाय कौन ऐसा है जो नन्दके गोकुलमें प्रेममयी क्रीडा कर सके? देवदेव! आपके सिवा प्रलम्ब और पूतना आदिका वध एवं शासन कौन कर सकता था? इस धर्ममय उत्तम वैष्णव मन्त्रका जप करनेवाला मनुष्य इष्ट और अनिष्टके प्रसङ्गवश तथा ज्ञान या अज्ञानपूर्वक सात जन्मोंमें किये अपने महापातकों, उपपातकों, यज्ञ, होम एवं व्रत आदिके पुण्य कर्मोंके भी योगको इस प्रकार नष्ट कर देता है जैसे जलमें मिट्टीका कच्चा घड़ा नष्ट हो जाता है। मैं यह सत्य कहता हूँ कि अखण्डित ब्रह्मचर्य एवं हरिस्मरणपूर्वक एक वर्षतक इस स्तोत्रके पाठके साथ प्रतिदिन तिलसे भरे सोलह पात्रोंका दान करनेवाला मनुष्य विष्णुलोकको प्राप्त करता है। यदि मैंने यह सत्य कहा हो एवं इसमें अल्पमात्र भी असत्य न हो तो यह राक्षस सब अङ्गोंसे पीड़ित हो चुके मुझे छोड़ दे॥ १०४—११०॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>एवमुच्चारिते तेन मुक्तो विप्रस्तु रक्षसा।<br>अकामेन द्विजो भूयस्तमाह रजनीचरम्॥ १११ | **पुलस्त्यजी बोले—**उसके ऐसा कहते ही राक्षसने ब्राह्मणको छोड़ दिया। पुनः द्विजने निष्कामभावसे राक्षससे कहा—॥ १११॥ | | ब्राह्मण उवाच<br>एतद् भद्र मया ख्यातं तव पातकनाशनम्।<br>विष्णोः सारस्वतं स्तोत्रं यज्जगाद सरस्वती॥ ११२ | **ब्राह्मणे कहा—**भद्र! सरस्वती देवीने जिस पापका नाश करनेवाले सारस्वत विष्णुस्तोत्रको कहा है, |