वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
पृष्ठ 427, कुल 489 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 427
अध्याय ८४] प्रह्लादके तीर्थयात्रा-प्रसङ्गमें त्रिकूटगिरिस्थित सरोवरमें ग्राहद्वारा गजेन्द्रका पकड़ा जाना ४१७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अश्वत्थं भास्करं गङ्गां नैमिषारण्यमेव च।<br>संस्मरिष्यन्ति मनुजाः प्रयताः स्थिरबुद्धयः ॥ ६९<br>कीर्तयिष्यन्ति भक्त्या च श्रोष्यन्ति च शुचिव्रताः।<br>दुःस्वप्नो नश्यते तेषां सुस्वप्नश्च भविष्यति ॥ ७०<br>मात्स्यं कौर्मञ्च वाराहं वामनं तार्क्ष्यमेव च।<br>नारसिंहं च नागेन्द्रं सृष्टिप्रलयकारकम् ॥ ७१<br>एतानि प्रातरुत्थाय संस्मरिष्यन्ति ये नराः।<br>सर्वपापैः प्रमुच्यन्ते पुण्यं लोकमवाप्नुयुः ॥ ७२ | एवं मेरु पुत्रके रूप, पीपल, सूर्य, गङ्गा और नैमिषारण्यका श्रद्धापूर्वक स्मरण एवं कीर्तन तथा श्रवण करेंगे उनके दुःस्वप्नका विनाश हो जायगा एवं सुस्वप्नकी सृष्टि होगी। जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर मत्स्यावतार, कूर्मावतार, वराहावतार, वामनावतार, गरुड़, नरसिंहावतार, गजेन्द्र और सृष्टि-प्रलय करनेवाले (भगवान्)-का स्मरण करेंगे, वे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर पुण्यलोकको प्राप्त करेंगे॥ ६८–७२॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>एवमुक्त्वा हृषीकेशो गजेन्द्रं गरुडध्वजः।<br>स्पर्शयामास हस्तेन गजं गन्धर्वमेव च ॥ ७३<br>ततो दिव्यवपुर्भूत्वा गजेन्द्रो मधुसूदनम्।<br>जगाम शरणं विप्र नारायणपरायणः ॥ ७४<br>ततो नारायणः श्रीमान् मोक्षयित्वा गजोत्तमम्।<br>पापबन्धाच्च शापाच्च ग्राहं चाद्भुतकर्मकृत् ॥ ७५<br>ऋषिभिः स्तूयमानश्च देवगुह्यपरायणैः।<br>गतः स भगवान् विष्णुर्दुर्विज्ञेयगतिः प्रभुः ॥ ७६ | पुलस्त्यजी बोले—(नारदजी!) गजेन्द्रसे ऐसा कहकर गरुड़ध्वज हृषीकेशने हाथसे गजेन्द्र और गन्धर्व दोनोंका स्पर्श किया। हे विप्र! उसके बाद नारायणकी आराधना करनेमें लीन गजेन्द्र दिव्य शरीर धारणकर मधुसूदनकी शरणमें चला गया। उसके बाद अद्भुत कर्म करनेवाले श्रीमान् नारायणने गजोत्तम एवं ग्राहको पाप-बन्धसे एवं शापसे मुक्त किया। भगवद्भक्त ऋषियोंद्वारा स्तुत होते हुए वे अविज्ञेय गतिवाले प्रभु भगवान् विष्णु (अपने धाम) चले गये॥ ७३—७६॥ |
| गजेन्द्रमोक्षणं दृष्ट्वा देवाः शक्रपुरोगमाः।<br>ववन्दिरे महात्मानं प्रभुं नारायणं हरिम् ॥ ७७<br>महर्षयश्चारणाश्च दृष्ट्वा गजविमोक्षणम्।<br>विस्मयोत्फुल्लनयनाः संस्तुवन्ति जनार्दनम् ॥ ७८<br>प्रजापतिपतिर्ब्रह्मा चक्रपाणिविचेष्टितम्।<br>गजेन्द्रमोक्षणं दृष्ट्वा इदं वचनमब्रवीत् ॥ ७९<br>य इदं शृणुयान्नित्यं प्रातरुत्थाय मानवः।<br>प्राप्नुयात् परमां सिद्धिं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति ॥ ८० | गजेन्द्रके मोक्षको देखकर इन्द्र आदि देवोंने महात्मा प्रभु नारायण श्रीहरिकी वन्दना की। गजको ग्राहसे मुक्त हुए देखकर विस्मयसे खिले नेत्रोंवाले महर्षियों एवं चारणोंने जनार्दनकी स्तुति की। चक्रपाणिके गजेन्द्रमोक्षणरूपी कर्मको देखकर प्रजापति ब्रह्माने यह वचन कहा—जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर प्रतिदिन इसे सुनेगा, वह परमसिद्धिको प्राप्त करेगा और उसका दुःस्वप्न विनष्ट हो जायगा॥ ७७—८०॥ |
| गजेन्द्रमोक्षणं पुण्यं सर्वपापप्रणाशनम्।<br>कथितेन स्मृतेनाथ श्रुतेन च तपोधन।<br>गजेन्द्रमोक्षणेनेह सद्यः पापात् प्रमुच्यते ॥ ८१<br>एतत्पवित्रं परमं सुपुण्यं<br>संकीर्तनीयं चरितं मुरारेः।<br>यस्मिन् किलोक्ते बहुपापबन्धनात्<br>लभ्येत मोक्षो द्विरदेन यद्वत् ॥ ८२<br>अजं वरेण्यं वरपद्मनाभं<br>नारायणं ब्रह्मनिधिं सुरेशम्। | तपोधन! गजेन्द्रमोक्ष पवित्र और सब प्रकारके पापोंका नाश करनेवाला है। इस गजेन्द्रमोक्षके कहने, स्मरण करने और सुननेसे मनुष्य तुरंत सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। मुरारि विष्णुका यह पवित्र चरित्र पुण्य प्रदान करनेवाला तथा कीर्तन करने योग्य है। इसे कहनेसे मनुष्य गजेन्द्रके समान अनेक पापोंके बन्धनसे मुक्त हो जाता है। मैं अज, वरेण्य, श्रेष्ठ, पद्मनाभ, नारायण, ब्रह्मनिधि, सुरेश, |