भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

पृष्ठ 426, कुल 489 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 426
४१६श्रीवामनपुराण[ अध्याय ८४
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
आदिदेवमजं शम्भुं व्यक्ताव्यक्तं सनातनम्।<br>नारायणमणीयांसं प्रपद्ये ब्राह्मणप्रियम् ॥ ५५करता हूँ। मैं आदिदेव, अजन्मा, शम्भु, व्यक्त और अव्यक्तस्वरूप, सनातन, परम सूक्ष्म, ब्राह्मणप्रिय नारायणकी शरण ग्रहण करता हूँ॥ ५१—५५॥
नमो वराय देवाय नमः सर्वसहाय च।<br>प्रपद्ये देवदेवेशमणीयांसमणोः सदा॥ ५६<br>एकाय लोकतत्त्वाय परतः परमात्मने।<br>नमः सहस्रशिरसे अनन्ताय महात्मने॥ ५७<br><br>त्वामेव परमं देवमृषयो वेदपारगाः।<br>कीर्तयन्ति च यं सर्वे ब्रह्मादीनां परायणम् ॥ ५८<br><br>नमस्ते पुण्डरीकाक्ष भक्तानामभयप्रद।<br>सुब्रह्मण्य नमस्तेऽस्तु त्राहि मां शरणागतम्॥ ५९श्रेष्ठ देवको नमस्कार है। सर्वशक्तिमान्‌को नमस्कार है। मैं सदा सूक्ष्म-से-सूक्ष्म देवदेवेशकी शरण हूँ। लोकतत्त्वस्वरूप, एकमात्र परात्पर परमात्मा, सहस्रशीर्ष महात्मा अनन्तको नमस्कार है। वेदोंके पारगामी ऋषिगण आपको ही परम देव एवं ब्रह्मा आदि देवोंका आश्रयस्थान कहते हैं। हे पुण्डरीकाक्ष! हे भक्तोंको अभयदान देनेवाले! आपको नमस्कार है। सुब्रह्मण्य! आपको नमस्कार है। आप मुझ शरणागतकी रक्षा करें॥ ५६—५९॥
पुलस्त्य उवाच<br>भक्तिं तस्यानुसंचिन्त्य नागस्यामोघसम्भवः।<br>प्रीतिमानभवद् विष्णुः शङ्खचक्रगदाधरः ॥ ६०<br>सान्निध्यं कल्पयामास तस्मिन् सरसि केशवः।<br>गरुडस्थो जगत्स्वामी लोकाधारस्तपोधनः ॥ ६१<br>ग्राहग्रस्तं गजेन्द्रं तं तं च ग्राहं जलाशयात्।<br>उज्जहाराप्रमेयात्मा तरसा मधुसूदनः ॥ ६२<br>स्थलस्थं दारयामास ग्राहं चक्रेण माधवः।<br>मोक्षयामास नागेन्द्रं पाशेभ्यः शरणागतम् ॥ ६३<br>स हि देवलशापेन हूहूर्गन्धर्वसत्तमः।<br>ग्राहत्वमगमत् कृष्णाद् वधं प्राप्य दिवंगतः ॥ ६४पुलस्त्यजी बोले—शङ्ख, चक्र एवं गदाको धारण करनेवाले, सफलताके आश्रय विष्णु उस गजेन्द्रकी भक्तिका विचार कर प्रसन्न हो गये। उसके बाद संसारके आधार जगत्स्वामी तपोधन केशव गरुड़पर सवार हो उस सरोवरके निकट गये। अप्रमेय आत्मस्वरूप मधुसूदनने ग्राहके द्वारा पकड़े गये उस गजेन्द्र तथा उस ग्राहको वेगपूर्वक सरोवरसे बाहर निकाला। माधवने पृथ्वीपर स्थित ग्राहको चक्रके द्वारा विदीर्ण कर शरणापन्न गजेन्द्रको बन्धनसे मुक्त कर दिया। देवलके शापसे ग्राह बना हुआ गन्धर्वश्रेष्ठ हूहू भगवान् श्रीकृष्णसे मृत्यु पाकर स्वर्ग चला गया॥ ६०—६४॥
गजोऽपि विष्णुना स्पृष्टो जातो दिव्यवपुः पुमान्।<br>आपद्विमुक्तौ युगपद् गजगन्धर्वसत्तमौ ॥ ६५<br>प्रीतिमान् पुण्डरीकाक्षः शरणागतवत्सलः।<br>अभवत् त्वथ देवेशस्ताभ्यां चैव प्रपूजितः॥ ६६<br>इदं च भगवान् योगी गजेन्द्रं शरणागतम्।<br>प्रोवाच मुनिशार्दूल मधुरं मधुसूदनः ॥ ६७भगवान् विष्णुका स्पर्श होनेसे वह हाथी भी दिव्य शरीर धारण करनेवाला पुरुष हो गया। इस प्रकार हाथी एवं गन्धर्वश्रेष्ठ दोनों एक ही साथ संकटसे मुक्त हो गये। मुनिवर! उसके बाद उन दोनोंसे पूजित होकर शरणागतवत्सल पुण्डरीकाक्ष देवेश प्रसन्न हुए और उन योगी भगवान् मधुसूदनने शरणागत गजेन्द्रसे यह मधुर वचन कहा—॥ ६५—६७॥
श्रीभगवानुवाच<br>ये मां त्वां च सरश्चैव ग्राहस्य च विदारणम्।<br>गुल्मकीचकरेणूनां रूपं मेरोः सुतस्य च ॥ ६८श्रीभगवान्‌ने कहा—स्थिर बुद्धिसे पवित्र व्रत धारण करनेवाले जो मनुष्य प्रयत्नपूर्वक मेरा, तुम्हारा तथा इस सरोवरका एवं ग्राहके विदारण, गुल्म, कीचक, रेणु