वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ४१२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ८४ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नानाधात्वङ्कितैः शृङ्गैः प्रस्रवद्भिः समन्ततः।<br>शोभितो रुचिरप्रख्यैस्त्रिभिर्विस्तीर्णसानुभिः॥ १०॥<br><br>मृगैः शाखामृगैः सिंहैर्मतङ्गजैश्च सदामदैः।<br>जीवंजीवकसंघुष्टैश्चकोरशिखिनादितैः ॥ ११॥<br><br>तस्यैकं काञ्चनं शृङ्गं सेवते यं दिवाकरः।<br>नानापुष्पसमाकीर्णं नानागन्धाधिवासितम्॥ १२॥<br><br>द्वितीयं राजतं शृङ्गं सेवते यं निशाकरः।<br>पाण्डुराम्बुदसंकाशं तुषारचयसंनिभम्॥ १३॥ | वह पर्वत भाँति-भाँतिकी धातुओंसे चमकती चोटियों, चारों ओरसे बहनेवाले झरनों और अत्यन्त मनोहर तथा सुदूर देशमें फैले हुए तीन शिखरोंसे शोभित है। वह पर्वत हरिण, बन्दर, सिंह, मदसे मतवाले हाथी, चातक, चकोर एवं मोर आदिके शब्दोंसे सदा शब्दायमान होता रहता है। कई प्रकारके फूलोंसे भरे-पूरे एवं तरह-तरहकी सुगन्धोंसे सुवासित उसके एक सुनहले शिखरका सेवन सूर्य करते हैं। सफेद बादलोंकी तरह एवं बर्फके ढेरके समान चाँदी-जैसी उसकी दूसरी चोटीका सेवन चन्द्रमा करते हैं॥ १०—१३॥ |
| वज्रेन्द्रनीलवैडूर्यतेजोभिर्भासयन् दिशः।<br>तृतीयं ब्रह्मसदनं प्रकृष्टं शृङ्गमुत्तमम्॥ १४॥<br><br>न तत् कृतघ्नाः पश्यन्ति न नृशंसा न नास्तिकाः।<br>नातप्ततपसो लोके ये च पापकृतो जनाः॥ १५॥<br><br>तस्य सानुमतः पृष्ठे सरः काञ्चनपङ्कजम्।<br>कारण्डवसमाकीर्णं राजहंसोपशोभितम्॥ १६॥<br><br>कुमुदोत्पलकह्लारैः पुण्डरीकैश्च मण्डितम्।<br>कमलैः शतपत्रैश्च काञ्चनैः समलङ्कृतम्॥ १७॥<br><br>पत्रैर्मरकतप्रख्यैः पुष्पैः काञ्चनसंनिभैः।<br>गुल्मैः कीचकवेणूनां समन्तात् परिवेष्टितम्॥ १८॥ | हीरा, इन्द्रनील, वैडूर्य आदि रत्नोंकी चमकसे दिशाओंको प्रकाशित करनेवाला उसका अत्यन्त उत्तम तीसरा शिखर ब्रह्माका निवास-स्थान है। कृतघ्न, क्रूर, नास्तिक, तपस्यासे हीन एवं लोकमें पापकर्म करनेवाले मनुष्य उसे नहीं देख सकते। उस पर्वतके पीछेकी ओर कमलोंसे युक्त, कारण्डव पक्षियोंसे भरे, राजहंसोंसे सुशोभित, कुमुद, उत्पल, कह्लार, पुण्डरीक आदि अनेक प्रकारके सुनहले कमलोंसे अलङ्कृत एवं सुनहले शतपत्रोंवाले तथा अन्य प्रकारके कमलोंसे (और भी) सुशोभित एवं मरकतके सदृश पत्तों तथा सोनेके समान पुष्पों और हवासे चूँ-चूँ शब्द करनेवाले बाँसके झाड़ोंसे चारों ओरसे घिरा एक सरोवर है॥ १४—१८॥ |
| तस्मिन् सरसि दुष्टात्मा विरूपोऽन्तर्जलेशयः।<br>आसीद् ग्राहो गजेन्द्राणां रिपुराकेकरेक्षणः॥ १९॥ | उस सरोवरके जलमें हाथियोंका शत्रु दुष्ट स्वभावका आधी खुली आँखोंवाला कुरूप एक मगर रहता था। |
| अथ दन्तोज्ज्वलमुखः कदाचिद् गजयूथपः।<br>मदस्रावी जलाकाङ्क्षी पादचारीव पर्वतः॥ २०॥ | एक समय उज्ज्वल दाँतोंवाला, मदस्रावी, पैरसे चलनेवाले पर्वतके समान, मदके गन्धसे वासित |
| वासयन्मदगन्धेन गिरिमैरावतोपमः।<br>गजो ह्यञ्जनसंकाशो मदाच्चलितलोचनः॥ २१॥ | ऐरावतके सदृश अञ्जनकी भाँति काला, मदके कारण चञ्चल नेत्रोंवाला, प्यासा एक गजयूथपति पानी पीनेकी |
| तृषितः पातुकामोऽसौ अवतीर्णश्च तज्जलम्।<br>सलीलः पङ्कजवने यूथमध्यगतश्चरन्॥ २२॥ | इच्छासे उस सरोवरके जलमें पैठा और कमलोंके समूहमें अपने झुंडके बीचमें रहकर क्रीडा करने लगा। |