वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
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अध्याय ८४] प्रह्लादके तीर्थयात्रा-प्रसङ्गमें त्रिकूटगिरिस्थित सरोवरमें ग्राहद्वारा गजेन्द्रका पकड़ा जाना ४१३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| गृहीतस्तेन रौद्रेण ग्राहेणाव्यक्तमूर्तिना।<br>पश्यन्तीनां करेणूनां क्रोशन्तीनां च दारुणम्॥ २३<br><br>ह्रियते पङ्कजवने ग्राहेणातिबलीयसा।<br>वारुणैः संयतः पाशैर्निष्प्रयत्नगतिः कृतः॥ २४ | (जलके भीतर) अपने शरीरको छिपाये हुए एक भयंकर ग्राहने उसे पकड़ लिया। करुण स्वरसे चिग्घाड़ कर रही हथिनियोंके देखते-ही-देखते अत्यन्त बलवान् ग्राह उसे कमलोंसे संकुल जलमें खींच ले गया और वरुणके पाशोंसे बाँधकर उसे चेष्टारहित एवं गतिहीन (विवश) कर दिया॥ १९—२४॥ |
| वेष्ट्यमानः सुघोरैस्तु पाशैर्नागो दृढैस्तथा।<br>विस्फूर्य च यथाशक्ति विक्रोशंश्च महारवान्॥ २५<br><br>व्यथितः स निरुत्साहो गृहीतो घोरकर्मणा।<br>परमापदमापन्नो मनसाऽचिन्तयद्धरिम्॥ २६<br><br>स तु नागवरः श्रीमान् नारायणपरायणः।<br>तमेव शरणं देवं गतः सर्वात्मना तदा॥ २७<br><br>एकात्मा निगृहीतात्मा विशुद्धेनान्तरात्मना।<br>जन्मजन्मान्तराभ्यासाद् भक्तिमान् गरुडध्वजे॥ २८<br><br>नान्यं देवं महादेवात् पूजयामास केशवात्।<br>मथितामृतफेनाभं शङ्खचक्रगदाधरम्॥ २९<br><br>सहस्रशुभनामानमादिदेवमजं विभुम्।<br>प्रगृह्य पुष्कराग्रेण काञ्चनं कमलोत्तमम्।<br>आपद्विमोक्षमन्विच्छन् गजः स्तोत्रमुदीरयत्॥ ३० | वहाँ सुदृढ और भयङ्कर पाशोंसे आबद्ध हो जानेके कारण गजराज यथाशक्ति छटपटाकर ऊँचे स्वरसे चिग्घाड़ने लगा। क्रूर कर्मवाले (उस ग्राह)-के द्वारा पकड़े जानेपर वह पीड़ित और उत्साहरहित हो गया। भारी विपत्तिमें पड़कर वह मनसे भगवान् श्रीहरिका ध्यान करने लगा। वह सुन्दर गजराज (पूर्वजन्मका) नारायणका भक्त था। इसलिये वह उस समय सर्वतोभावेन उन्हीं देवकी शरणमें प्रपन्न हो गया। वह गजराज जन्म-जन्मान्तरके अभ्याससे एकाग्र एवं संयतचित्त होकर विशुद्ध अन्तःकरणसे गरुडध्वज भगवान् विष्णुकी भक्तिमें लग गया था। उसने महान् देव केशव (श्रीविष्णु)-के सिवा अन्य देवताओंकी पूजा नहीं की। उस गजने मथे हुए अमृतके फेनके समान कान्तिवाले, शङ्ख तथा चक्र और गदाको धारण करनेवाले, सहस्रों शुभ नामोंवाले, आदिदेव एवं अजन्मा सर्वव्यापक विष्णु (नारायण)-का ध्यान किया और अपने शुण्डके अग्रभागमें एक उत्तम स्वर्ण-कमल लेकर (इस) आपत्तिसे मुक्ति प्राप्त करनेकी इच्छासे इस स्तोत्रका पाठ करने लगा॥ २५—३०॥ |
| गजेन्द्र उवाच<br><br>ॐ नमो मूलप्रकृतये अजिताय महात्मने।<br>अनाश्रिताय देवाय निःस्पृहाय नमोऽस्तु ते॥ ३१<br><br>नम आद्याय बीजाय आर्षेयाय प्रवर्तिने।<br>अनन्तराय चैकाय अव्यक्ताय नमो नमः॥ ३२<br><br>नमो गुह्याय गूढाय गुणाय गुणवर्तिने।<br>अप्रतर्क्याप्रमेयाय अतुलाय नमो नमः॥ ३३<br><br>नमः शिवाय शान्ताय निश्चिन्ताय यशस्विने।<br>सनातनाय पूर्वाय पुराणाय नमो नमः॥ ३४ | गजेन्द्र बोला— ॐ मूलप्रकृतिस्वरूप महान् आत्मा अजित विष्णुभगवान्को नमस्कार है। अन्योंपर आश्रित न रहनेवाले एवं (किसी वस्तुकी प्राप्तिकी) इच्छासे रहित आप देवको नमस्कार है। आद्यबीजस्वरूप, ऋषियोंके आराध्यदेव संसारचक्रके प्रवर्तक आपको नमस्कार है। अन्तररहित—सर्वत्र व्याप्त एकमात्र अव्यक्तको पुनः-पुनः नमस्कार है। गुह्य, गूढ़, गुणस्वरूप एवं गुणोंमें रहनेवालेको नमस्कार है। तर्कसे अतीत, निर्णयात्मिका बुद्धिसे भी नहीं समझे जानेयोग्य, अतुलनीय (आप)-को बार-बार नमस्कार है। प्रथम मङ्गलमय, शान्त, निश्चिन्त, यशस्वी, सनातन और पुराणपुरुषको बार-बार नमस्कार है॥ ३१—३४॥ |