वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 424, कुल 489 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४१४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय.८४ |
|---|
| नमो देवाधिदेवाय स्वभावाय नमो नमः।<br>नमो जगत्प्रतिष्ठाय गोविन्दाय नमो नमः॥ ३५<br><br>नमोऽस्तु पद्मनाभाय नमो योगोद्भवाय च।<br>विश्वेश्वराय देवाय शिवाय हरये नमः॥ ३६<br><br>नमोऽस्तु तस्मै देवाय निर्गुणाय गुणात्मने।<br>नारायणाय विश्वाय देवानां परमात्मने॥ ३७<br><br>नमो नमः कारणवामनाय<br>नारायणायामितविक्रमाय ।<br>श्रीशाङ्गिर्चक्रासिगदाधराय<br>नमोऽस्तु तस्मै पुरुषोत्तमाय॥ ३८ | आप देवाधिदेवको नमस्कार है। स्वभावस्वरूपी आपको बार-बार नमस्कार है। जगत्की प्रतिष्ठा करनेवाले (आप)-को नमस्कार है। गोविन्दको बार-बार नमस्कार है। पद्मनाभको नमस्कार है और योगसे उत्पन्न होनेवाले (आप) योगोद्भवको नमस्कार है। विश्वेश्वर, देव, शिव, हरिको नमस्कार है। निर्गुण और गुणात्मा उन (प्रसिद्ध) देवको नमस्कार है। विश्वात्मा, नारायण एवं देवोंके परम आत्मा (आप)-को नमस्कार हैं। कारणवश वामनरूप धारण करनेवाले, अतुल विक्रमवाले नारायणको नमस्कार है। श्री, शार्ङ्ग, चक्र, तलवार एवं गदा धारण करनेवाले उन पुरुषोत्तमको नमस्कार है॥ ३५–३८॥ | | गुह्याय वेदनिलयाय महोदराय<br>सिंहाय दैत्यनिधनाय चतुर्भुजाय।<br>ब्रह्मेन्द्ररुद्रमुनिचारणसंस्तुताय<br>देवोत्तमाय वरदाय नमोऽच्युताय॥ ३९<br><br>नागेन्द्रदेहशयनासनसुप्रियाय<br>गोक्षीरहेमशुकनीलघनोपमाय ।<br>पीताम्बराय मधुकैटभनाशनाय<br>विश्वाय चारुमुकुटाय नमोऽजराय॥ ४०<br><br>नाभिप्रजातकमलस्थचतुर्मुखाय<br>क्षीरोदकार्णवनिकेतयशोधराय ।<br>नानाविचित्रमुकुटाङ्गदभूषणाय<br>सर्वेश्वराय वरदाय नमो वराय॥ ४१<br><br>भक्तिप्रियाय वरदीप्तिसुदर्शनाय<br>फुल्लारविन्दविपुलायतलोचनाय ।<br>देवेन्द्रविघ्नशमनोद्यतपौरुषाय<br>योगेश्वराय विरजाय नमो वराय॥ ४२ | गुह्य, वेदनिलय, महोदर, दैत्यके निधनके लिये सिंहरूप धारण करनेवाले, चार भुजाओंवाले, ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र, मुनि तथा चारणोंके द्वारा स्तुत किये गये वरदानी देवोत्तम अच्युतभगवान्को नमस्कार है। शेषनागके शरीरपर प्रसन्नतापूर्वक शयन करनेवाले, गोदुग्ध, स्वर्ण, शुक एवं नीलघनकी उपमासे युक्त, पीला वस्त्र धारण करनेवाले, मधु-कैटभका विनाश करनेवाले, सुन्दर मुकुट धारण करनेवाले, वृद्धावस्थासे रहित, विश्वकी आत्मा आप देवको नमस्कार है। नाभिसे उत्पन्न हुए कमलपर स्थित ब्रह्मासे युक्त, क्षीरसमुद्रको अपना निवास बनानेवाले, यशस्वी, अनेक प्रकारके विचित्र मुकुट एवं अङ्गद आदि आभूषणोंसे युक्त, वरदानी तथा वरस्वरूप सर्वेश्वरको नमस्कार है। भक्तिके प्रेमी, श्रेष्ठ दीप्तिसे सर्वथा पूर्ण सुन्दर दिखलायी देनेवाले, खिले हुए कमलके समान विशाल आँखोंवाले, देवेन्द्रके विघ्नोंका विनाश करनेके लिये पुरुषार्थ करनेको उद्यत वरस्वरूप, विरज योगेश्वरको नमस्कार है॥ ३९–४२॥ | | ब्रह्मायनाय त्रिदशायनाय<br>लोकाधिनाथाय भवापनाय।<br>नारायणायात्महितायनाय<br>महावराहाय नमस्करोमि॥ ४३<br><br>कूटस्थमव्यक्तमचिन्त्यरूपं<br>नारायणं कारणमादिदेवम्। | ब्रह्मा और अन्य देवोंके आधारस्वरूप, लोकाधिनाथ, भवहर्त्ता, नारायण आत्महितके आश्रयस्थान महावराहको नमस्कार करता हूँ। मैं कूटस्थ, अव्यक्त, अचिन्त्य रूपवाले, कारणस्वरूप, आदिदेव |