भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय ८५] सारस्वतस्तोत्रके संदर्भमें विष्णुपञ्जरस्तोत्र, सारस्वतस्तव-कथन-प्रसङ्गमें राक्षस-वृत्तान्त ४२५


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
यज्ञैर्यजन्ति यं विप्रा यज्ञेशं यज्ञभावनम्।<br>तं यज्ञपुरुषं विष्णुं प्रणतोऽस्मि सनातनम्॥ ८३<br><br>पातालवीथीभूतानि तथा लोकान् निहन्ति यः।<br>तमन्तपुरुषं रुद्रं प्रणतोऽस्मि सनातनम्॥ ८४<br><br>सम्भक्षयित्वा सकलं यथासृष्टमिदं जगत्।<br>यो वै नृत्यति रुद्रात्मा प्रणतोऽस्मि जनार्दनम्॥ ८५<br><br>सुरासुराः पितृगणाः यक्षगन्धर्वराक्षसाः।<br>सम्भूता यस्य देवस्य सर्वगं तं नमाम्यहम्॥ ८६मारा है एवं देवताओंकी रक्षा की है। ब्राह्मणलोग यज्ञोंके द्वारा जिनकी अर्चना करते हैं, मैं उन यज्ञपुरुष, यज्ञभावन, यज्ञेश, सनातन विष्णुको प्रणाम करता हूँ। मैं पाताललोकमें रहनेवाले प्राणियों तथा लोकोंका विनाश करनेवाले उन अन्तपुरुष सनातन रुद्रको प्रणाम करता हूँ। सृष्ट किये गये इस समस्त जगत्का भक्षणकर नृत्य करनेवाले रुद्रात्मा जनार्दनको मैं प्रणाम करता हूँ। मैं सर्वत्र गमन करनेवाले देवको प्रणाम करता हूँ, जिनसे समस्त सुर, असुर, पितृगण, यक्ष, गन्धर्व एवं राक्षस उत्पन्न हुए हैं॥ ७९-८६॥
समस्तदेवाः सकला मनुष्याणां च जातयः।<br>यस्यांशभूता देवस्य सर्वगं तं नतोऽस्म्यहम्॥ ८७<br><br>वृक्षगुल्मादयो यस्य तथा पशुमृगादयः।<br>एकांशभूता देवस्य सर्वगं तं नमाम्यहम्॥ ८८<br><br>यस्मान्नान्यत् परं किञ्चिद् यस्मिन् सर्वं महात्मनि।<br>यः सर्वमध्यगोऽनन्तः सर्वगं तं नमाम्यहम्॥ ८९<br><br>यथा सर्वेषु भूतेषु गूढोऽग्निरिव दारुषु।<br>विष्णुरेवं तथा पापं ममाशेषं प्रणश्यतु॥ ९०<br><br>यथा विष्णुमयं सर्वं ब्रह्मादि सचराचरम्।<br>यच्च ज्ञानपरिच्छेद्यं पापं नश्यतु मे तथा॥ ९१<br><br>शुभाशुभानि कर्माणि रजःसत्त्वतमांसि च।<br>अनेकजन्मकर्मोत्थं पापं नश्यतु मे तथा॥ ९२<br><br>यन्निशायां च यत्प्रातर्यन्मध्याह्नापराह्नयोः।<br>सन्ध्ययोश्च कृतं पापं कर्मणा मनसा गिरा॥ ९३<br><br>यत्तिष्ठता यद् व्रजता यच्च शय्यागतेन मे।<br>कृतं यदशुभं कर्म कायेन मनसा गिरा॥ ९४<br><br>अज्ञानतो ज्ञानतो वा मदाच्चलितमानसैः।<br>तत् क्षिप्रं विलयं यातु वासुदेवस्य कीर्तनात्॥ ९५मैं उन सर्वव्यापी देवको प्रणाम करता हूँ जिनके अंशसे सम्पूर्ण देव एवं मनुष्योंकी सभी जातियाँ उत्पन्न हुई हैं। वृक्ष, गुल्म आदि तथा पशु, मृग आदि जिन परमदेवके एक अंशरूप हैं, मैं उन सर्वगामी देवको प्रणाम करता हूँ। मैं उन सर्वव्यापी देवको प्रणाम करता हूँ जिनसे पृथक् कोई वस्तु नहीं है एवं जिन महात्मामें सम्पूर्ण पदार्थ स्थित हैं तथा जो सभीके अन्तःकरणमें रहनेवाले और अनन्त हैं। काष्ठमें अग्निके समान समस्त प्राणियोंमें व्याप्त विष्णु मेरे सम्पूर्ण पापोंको नष्ट करें; क्योंकि विष्णुसे ब्रह्मा आदि समस्त चराचरात्मक जगत् व्याप्त है तथा जो ज्ञानके द्वारा धारण करने योग्य हैं। इसलिये मेरे पाप नष्ट हो जायें। (विष्णुकी कृपासे) मेरे शुभ तथा अशुभ कर्म, सत्त्व, रज एवं तमोगुण तथा अनेक जन्मोंके कर्मसे उत्पन्न पाप नष्ट हो जायें। शरीर, कर्म, मन एवं वाणीके द्वारा रात्रिमें तथा प्रातःकाल, मध्याह्नकाल, अपराह्नकाल और सन्ध्याकालमें चलते, बैठते और शयन करते हुए ज्ञान या अज्ञानपूर्वक अथवा निरहंकार मनसे मैंने जो अशुभ (पाप) कर्म किये हों वे वासुदेवके नाम-कीर्तनसे शीघ्र नष्ट हो जायें॥ ८७-९५॥
परदारपरद्रव्यवाञ्छाद्रोहोद्भवं च यत्।<br>परपीड़ोद्भवं निन्दां कुर्वता यन्महात्मनाम्॥ ९६<br><br>यच्च भोज्ये तथा पेये भक्ष्ये चोष्ये विलेहने।<br>तद् यातु विलयं तोये यथा लवणभाजनम्॥ ९७परस्त्री और परधनकी कामना, द्रोह, परपीड़ा, महात्माओंकी निन्दा तथा (निषिद्ध) भोज्य, पेय, भक्ष्य, चोष्य एवं चाटनेवाले वस्तुके कारण उत्पन्न सम्पूर्ण पाप इस प्रकार नष्ट हो जायें जैसे लवण रखनेवाला मिट्टीका