वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ४२४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ८५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| दामोदरमुदाराक्षं पुण्डरीकाक्षमच्युतम्।<br>प्रणतोऽस्मि स्तुतं स्तुत्यैः स मे पापं व्यपोहतु॥ ६९ | पापको दूर करें। दामोदर, उदाराक्ष, पुण्डरीकाक्ष, स्तवनीय स्तोत्रोंसे स्तुत अच्युतको मैं नमस्कार करता हूँ। वे मेरे पापोंको दूर करें। नारायण, नर, शौरि, माधव, मधुसूदन एवं धराको धारण करनेवाले भगवान्को मैं प्रणाम करता हूँ। वे मेरे पापको दूर करें॥ ६४—७०॥ |
| नारायणं नरं शौरिं माधवं मधुसूदनम्।<br>प्रणतोऽस्मि धराधारं स मे पापं व्यपोहतु॥ ७० | |
| केशवं चन्द्रसूर्याक्षं कंसकेशिनिषूदनम्।<br>प्रणतोऽस्मि महाबाहुं स मे पापं व्यपोहतु॥ ७१ | चन्द्र एवं सूर्यरूपी नेत्रोंवाले, कंस और केशीको मारनेवाले महाबाहु केशवको मैं प्रणाम करता हूँ। वे मेरे पापोंको दूर करें। वक्षःस्थलपर श्रीवत्स धारण करनेवाले, श्रीश, श्रीधर, श्रीनिकेतन एवं श्रीकान्तको मैं प्रणाम करता हूँ। वे मेरे पापोंको दूर करें। संयम करनेवाले लोग जिन सब प्राणियोंके स्वामी, अक्षर एवं अनिर्देश्य वासुदेवका ध्यान करते हैं मैं उनकी शरण ग्रहण करता हूँ। (संन्यासी लोग) अन्य समस्त सहारोंसे मनकी गतिको लौटाकर जिस वासुदेव नामक ईश्वरका ध्यान करते हैं, मैं उनकी शरणमें जाता हूँ। मैं सर्वगत, सर्वभूत, सर्वाधार ईश्वर एवं वासुदेव नामक परब्रह्मकी शरण जाता हूँ। श्रेष्ठ बुद्धिसम्पन्न लोग कर्मका नाश होनेपर जिन अदृष्ट, अविनाशी, परमात्मदेवको प्राप्त करते हैं, मैं उनकी शरणमें जाता हूँ। पुण्य तथा पापसे रहित योगीलोग जिन्हें पाकर फिर जन्म ग्रहण नहीं करते, मैं उनकी शरणमें जाता हूँ। ब्रह्माका रूप धारण कर देवता, दैत्य एवं मनुष्योंसे युक्त सारे जगत्की सृष्टि करनेवाले अच्युत देवकी मैं शरणमें जाता हूँ॥ ७१—७८॥ |
| श्रीवत्सवक्षसं श्रीशं श्रीधरं श्रीनिकेतनम्।<br>प्रणतोऽस्मि श्रियः कान्तं स मे पापं व्यपोहतु॥ ७२ | |
| यमीशं सर्वभूतानां ध्यायन्ति यतयोऽक्षरम्।<br>वासुदेवमनिर्देश्यं तमस्मि शरणं गतः॥ ७३ | |
| समस्तालम्बनेभ्यो यं व्यावृत्य मनसो गतिम्।<br>ध्यायन्ति वासुदेवाख्यं तमस्मि शरणं गतः॥ ७४ | |
| सर्वगं सर्वभूतं च सर्वस्याधारमीश्वरम्।<br>वासुदेवं परं ब्रह्म तमस्मि शरणं गतः॥ ७५ | |
| परमात्मानमव्यक्तं यं प्रयान्ति सुमेधसः।<br>कर्मक्षयेऽक्षयं देवं तमस्मि शरणं गतः॥ ७६ | |
| पुण्यपापविनिर्मुक्ता यं प्रविश्य पुनर्भवम्।<br>न योगिनः प्राप्नुवन्ति तमस्मि शरणं गतः॥ ७७ | |
| ब्रह्मा भूत्वा जगत् सर्वं सदेवासुरमानुषम्।<br>यः सृजत्यच्युतो देवस्तमस्मि शरणं गतः॥ ७८ | |
| ब्रह्मत्वे यस्य वक्त्रेभ्यश्चतुर्वेदमयं वपुः।<br>प्रभुः पुरातनो जज्ञे तमस्मि शरणं गतः॥ ७९ | ब्रह्माका रूप धारण करनेपर जिनके मुखोंसे चारों वेदोंसे युक्त शरीर धारण करनेवाले पुरातन प्रभुका आविर्भाव हुआ था, मैं उनकी शरणमें जाता हूँ। मैं सृष्टिके लिये स्रष्टारूपसे स्थित ब्रह्मरूप धारण करनेवाले सनातन जगद्योनि जनार्दनको प्रणाम करता हूँ। सृष्टिकर्ता होकर योगिरूपमें विद्यमान एवं स्थितिकालमें राक्षसोंका नाश करनेवाले आदिपुरुष जनार्दनको मैं प्रणाम करता हूँ। मैं उन आदिपुरुष ईश्वर जनार्दन विष्णुको प्रणाम करता हूँ, जिन्होंने पृथिवीको धारण किया है, दैत्योंको |
| ब्रह्मरूपधरं देवं जगद्योनिं जनार्दनम्।<br>स्रष्टृत्वे संस्थितं सृष्टौ प्रणतोऽस्मि सनातनम्॥ ८० | |
| स्रष्टा भूत्वा स्थितो योगी स्थितावसूरसूदनः।<br>तमादिपुरुषं विष्णुं प्रणतोऽस्मि जनार्दनम्॥ ८१ | |
| धृता मही हता दैत्याः परित्रातास्तथा सुराः।<br>येन तं विष्णुमाद्येशं प्रणतोऽस्मि जनार्दनम्॥ ८२ |